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  • इजरायल चुनाव में नेतन्याहू की अग्निपरीक्षा, गाजा और ईरान युद्ध के बीच विपक्ष ने बढ़ाई सत्ता की चुनौती..

    इजरायल चुनाव में नेतन्याहू की अग्निपरीक्षा, गाजा और ईरान युद्ध के बीच विपक्ष ने बढ़ाई सत्ता की चुनौती..

    नई दिल्ली ।इजरायल में मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को आम चुनाव के लिए मतदान कराया गया। इस चुनाव को प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वर्ष 2023 में हमास के हमले और उसके बाद गाजा में शुरू हुए सैन्य अभियान के साथ ईरान के साथ संघर्ष को संभालने के तरीके को लेकर नेतन्याहू की सरकार की आलोचना होती रही है। ऐसे में चुनाव के परिणाम देश की राजनीति और आने वाली सरकार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

    इस चुनाव में करीब 73 लाख मतदाता मतदान के पात्र थे। नेतन्याहू के सामने पूर्व सैन्य प्रमुख और मध्यमार्गी नेता गादी आइजेनकोट प्रमुख चुनौती के रूप में मैदान में हैं। इसके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट भी उनके राजनीतिक गठबंधन को चुनौती दे रहे हैं। चुनाव से पहले हुए सर्वेक्षणों में दोनों पक्षों के बीच कड़ी टक्कर के संकेत मिले थे। हालांकि, इजरायल की गठबंधन आधारित राजनीतिक व्यवस्था के कारण किसी एक दल या गठबंधन के लिए स्पष्ट बहुमत हासिल करना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।

    77 वर्षीय बेंजामिन नेतन्याहू इजरायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता हैं। उनके समर्थक सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के मुद्दों पर उनके नेतृत्व को महत्वपूर्ण मानते हैं। वहीं, आलोचक 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले को रोकने में हुई विफलताओं, युद्ध से जुड़े फैसलों और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर उनकी सरकार पर सवाल उठाते रहे हैं। चुनाव में इन मुद्दों का असर राजनीतिक दलों के प्रदर्शन पर पड़ सकता है।

    गादी आइजेनकोट इजरायल डिफेंस फोर्सेज के पूर्व प्रमुख रह चुके हैं। वह याशर पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं और खुद को नेतन्याहू के विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं। दूसरी ओर, पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट भी विपक्षी खेमे में सक्रिय हैं। उनके नेतृत्व वाले बी’याचद गठबंधन में पूर्व प्रधानमंत्री यायर लैपिड की येश अतीद पार्टी भी शामिल है। इस तरह नेतन्याहू के सामने अलग-अलग राजनीतिक दलों और नेताओं का संयुक्त मुकाबला है।

    चुनाव से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नेतन्याहू के समर्थन में बयान दिया था। सोमवार को पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि नेतन्याहू ने कठिन परिस्थितियों में प्रधानमंत्री के रूप में अच्छा काम किया है। नेतन्याहू ने भी अमेरिका और इजरायल के संबंधों को लेकर ट्रंप की प्रशंसा की थी। उन्होंने दोनों देशों के नेताओं के बीच असाधारण मित्रता होने की बात कही। चुनाव के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति का यह समर्थन भी राजनीतिक चर्चा का विषय रहा।

    इजरायल में संसदीय चुनाव की प्रक्रिया भारत से अलग है। यहां आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर मतदान होता है। पूरे देश को एक ही चुनाव क्षेत्र माना जाता है। मतदाता किसी व्यक्तिगत उम्मीदवार के बजाय राजनीतिक दल की सूची के पक्ष में वोट डालते हैं। इसी प्रक्रिया के जरिए संसद यानी नेसेट के 120 सदस्यों का चयन किया जाता है।

    संसद में प्रतिनिधित्व हासिल करने के लिए किसी राजनीतिक दल को कम से कम 3.25 प्रतिशत वैध मत प्राप्त करना जरूरी है। इस व्यवस्था के कारण कई छोटे दल भी चुनाव में हिस्सा लेते हैं और संसद में उनकी मौजूदगी सरकार गठन के दौरान महत्वपूर्ण हो सकती है।

    इजरायल में सरकार बनाने के लिए 120 सदस्यीय संसद में कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है। सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाला दल अपने आप सरकार नहीं बना सकता। चुनाव के बाद राष्ट्रपति राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श करते हैं और उस सांसद को सरकार बनाने का अवसर देते हैं, जिसके पास बहुमत जुटाने की संभावना होती है।

    इसके बाद राजनीतिक दलों के बीच गठबंधन बनाने को लेकर बातचीत होती है। यदि कोई दल या गठबंधन 61 सांसदों का समर्थन हासिल नहीं कर पाता, तो सरकार गठन की प्रक्रिया लंबी हो सकती है। ऐसी स्थिति में छोटे दलों और गठबंधन सहयोगियों की भूमिका निर्णायक बन जाती है।

    इस चुनाव के परिणामों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नजर रहेगी। नई सरकार की संरचना का असर इजरायल की सुरक्षा नीति, गाजा और ईरान से जुड़े क्षेत्रीय संघर्षों तथा अमेरिका सहित अन्य देशों के साथ उसके संबंधों पर पड़ सकता है। अंतिम राजनीतिक तस्वीर मतदान के परिणाम और उसके बाद होने वाली गठबंधन वार्ताओं से स्पष्ट होगी।

  • इजरायल चुनाव में नेतन्याहू और गादी आइजनकोट के बीच मुकाबला, बहुमत के लिए 61 सीटों का आंकड़ा अहम

    इजरायल चुनाव में नेतन्याहू और गादी आइजनकोट के बीच मुकाबला, बहुमत के लिए 61 सीटों का आंकड़ा अहम

    नई दिल्ली । इजरायल में 27 अक्टूबर 2026 को संसदीय चुनाव के लिए मतदान हो रहा है। इस चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सामने पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट की चुनौती है। चुनाव से पहले सामने आए ओपिनियन पोल में दोनों पक्षों के बीच कड़े मुकाबले के संकेत मिले हैं। कुछ सर्वेक्षणों में आइजनकोट की यशार पार्टी को सबसे बड़ी पार्टी बनने की स्थिति में दिखाया गया है, लेकिन किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलने का अनुमान नहीं है। ऐसे में चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए छोटे दलों का समर्थन महत्वपूर्ण हो सकता है।

    इजरायल की संसद में 120 सीटें, बहुमत के लिए 61 जरूरी

    इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है, जिसमें कुल 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए किसी गठबंधन को कम से कम 61 सांसदों का समर्थन हासिल करना जरूरी है। देश की चुनाव व्यवस्था में मतदाता सीधे प्रधानमंत्री का चुनाव नहीं करते, बल्कि राजनीतिक दलों को वोट देते हैं। पार्टियों को मिले वोटों के अनुपात के आधार पर संसद में सीटें आवंटित होती हैं।

    नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और उसके सहयोगी दलों का मुकाबला विपक्षी खेमे से है। विपक्ष में गादी आइजनकोट की यशार पार्टी के साथ नफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड के नेतृत्व वाला टुगेदर गठबंधन तथा अन्य दल भी शामिल हैं। चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए इन दलों के बीच समर्थन जुटाने और गठबंधन तैयार करने की प्रक्रिया अहम होगी।

    ओपिनियन पोल में क्या संकेत मिले?

    चुनाव से पहले जारी सर्वेक्षणों में अलग-अलग दलों और गठबंधनों की स्थिति को लेकर अंतर दिखाई दिया है। 23 अक्टूबर तक के एक सर्वे औसत में नेतन्याहू के गठबंधन को लगभग 52 सीटें और उनके विरोधी जियोनिस्ट दलों को करीब 50 सीटें मिलने का अनुमान था। दूसरी ओर, कुछ अन्य सर्वेक्षणों में आइजनकोट की पार्टी को सबसे बड़ी पार्टी बनने की स्थिति में दिखाया गया।

    हालांकि, किसी पार्टी को सबसे ज्यादा सीटें मिलना और उसके गठबंधन को सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत मिलना अलग-अलग बातें हैं। चुनाव के बाद छोटे दलों का समर्थन और राजनीतिक गठबंधन की बातचीत निर्णायक हो सकती है। इसलिए केवल ओपिनियन पोल के आधार पर नेतन्याहू की विदाई या आइजनकोट के प्रधानमंत्री बनने को तय नहीं माना जा सकता।

    चुनाव के चार प्रमुख मुद्दे

    पहला मुद्दा 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले से जुड़ी सुरक्षा चूक है। उस हमले के बाद इजरायल की सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया एजेंसियों की तैयारियों पर सवाल उठे थे। विपक्षी नेताओं ने सरकार से जवाबदेही की मांग की है। इस चुनाव में मतदाताओं के लिए यह अहम सवाल है कि भविष्य में ऐसे हमलों को रोकने के लिए किस तरह की सुरक्षा नीति अपनाई जाएगी।

    दूसरा बड़ा मुद्दा अति-रूढ़िवादी यहूदी समुदाय के लोगों को सैन्य सेवा से मिलने वाली छूट है। इजरायल में अधिकांश यहूदी नागरिकों के लिए सैन्य सेवा अनिवार्य है, लेकिन धार्मिक अध्ययन करने वाले हरेदी समुदाय के कई लोगों को इससे छूट मिलती रही है। इस व्यवस्था को लेकर देश में विवाद है। आइजनकोट सहित विपक्ष के कई नेता सैन्य सेवा की जिम्मेदारी अधिक व्यापक रूप से लागू करने के पक्ष में हैं, जबकि नेतन्याहू के गठबंधन को हरेदी दलों का समर्थन मिलता रहा है।

    तीसरा मुद्दा सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों और न्यायपालिका में सुधार का है। नेतन्याहू सरकार के न्यायिक बदलावों के प्रस्तावों के विरोध में देश में बड़े प्रदर्शन हुए थे। विरोधियों ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर चिंता जताई, जबकि सरकार के समर्थकों ने बदलावों को सुधार की जरूरत से जोड़ा।

    चौथा प्रमुख विषय युद्ध, राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय संघर्षों का भविष्य है। मतदाताओं के सामने सुरक्षा सुनिश्चित करने, लंबे संघर्ष की कीमत और भविष्य की सैन्य रणनीति से जुड़े सवाल हैं। नेतन्याहू ने सुरक्षा को प्राथमिकता दी है, जबकि विपक्ष ने सरकार के फैसलों और युद्ध प्रबंधन पर सवाल उठाए हैं।

    नेतन्याहू और आइजनकोट की सैन्य पृष्ठभूमि

    बेंजामिन नेतन्याहू ने इजरायली सेना की विशेष इकाई सायरेट मटकल में सेवा दी थी। उनके बड़े भाई योनातन नेतन्याहू की 1976 में युगांडा के एंटेबे में बंधकों को छुड़ाने के अभियान के दौरान मौत हो गई थी।

    गादी आइजनकोट ने 1978 में गोलानी ब्रिगेड में सैनिक के रूप में अपना सैन्य करियर शुरू किया। करीब चार दशक की सेवा के बाद वह 2015 में इजरायली सेना के प्रमुख बने और 2019 तक इस पद पर रहे। दिसंबर 2023 में गाजा में युद्ध के दौरान उनके बेटे गैल की मौत हो गई थी। अगले दिन उनके भतीजे माओर कोहेन आइजनकोट भी दक्षिणी गाजा में लड़ाई के दौरान मारे गए थे।

    चुनाव के बाद सरकार बनाने की चुनौती

    मतदान के बाद तस्वीर इस बात से स्पष्ट होगी कि कौन-से दल कितनी सीटें हासिल करते हैं और कौन बहुमत के लिए जरूरी समर्थन जुटा पाता है। यदि कोई गठबंधन 61 सीटों का समर्थन हासिल नहीं कर पाता, तो सरकार गठन की प्रक्रिया कठिन हो सकती है। छोटे दलों और अरब समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है, हालांकि अलग-अलग दलों के बीच राजनीतिक मतभेद गठबंधन की राह में बाधा बन सकते हैं।

    इसलिए इजरायल के चुनाव का परिणाम केवल सबसे बड़ी पार्टी तय नहीं करेगा। सरकार किसकी बनेगी, यह संसद में बहुमत जुटाने और चुनाव के बाद होने वाली राजनीतिक बातचीत पर निर्भर करेगा।

  • इजरायल चुनाव में नेतन्याहू की सत्ता पर नजर, गाजा युद्ध और ईरान संघर्ष के बीच विपक्ष से कड़ी चुनौती

    इजरायल चुनाव में नेतन्याहू की सत्ता पर नजर, गाजा युद्ध और ईरान संघर्ष के बीच विपक्ष से कड़ी चुनौती

    नई दिल्ली । इजरायल में 27 अक्टूबर 2026 को आम चुनाव के लिए मतदान हो रहा है। इस चुनाव को प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हमास के 7 अक्टूबर 2023 के हमले और उसके बाद गाजा में सैन्य कार्रवाई तथा ईरान के साथ संघर्ष को संभालने के तरीके को लेकर नेतन्याहू की सरकार आलोचनाओं का सामना करती रही है। चुनाव में मतदाताओं का रुख यह तय करने में अहम होगा कि देश की सत्ता मौजूदा नेतृत्व के पास रहती है या विपक्ष को सरकार बनाने का अवसर मिलता है।

    इस चुनाव में करीब 73 लाख मतदाता मतदान के पात्र हैं। नेतन्याहू को पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट और पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट से चुनौती मिल रही है। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में मुकाबला कड़ा रहने के संकेत दिए गए हैं। हालांकि, इजरायल की चुनाव प्रणाली में किसी एक दल के लिए स्पष्ट बहुमत हासिल करना आसान नहीं होता। इसलिए चुनावी नतीजों के साथ-साथ अलग-अलग दलों के बीच गठबंधन की बातचीत भी अगली सरकार का स्वरूप तय करेगी।

    77 वर्षीय नेतन्याहू इजरायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता हैं। उनके समर्थक सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के मुद्दों पर उनके नेतृत्व को महत्वपूर्ण बताते हैं। वहीं, आलोचक 7 अक्टूबर 2023 के हमले को रोकने में हुई विफलताओं, युद्ध से जुड़े फैसलों और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर उनकी जवाबदेही पर सवाल उठाते हैं। चुनाव के दौरान इन मुद्दों का राजनीतिक बहस में महत्वपूर्ण स्थान बना हुआ है।

    गादी आइजेनकोट इजरायल डिफेंस फोर्सेज के पूर्व प्रमुख रह चुके हैं। वह याशर पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं और खुद को नेतन्याहू के विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं। दूसरी ओर, नफ्ताली बेनेट भी मौजूदा प्रधानमंत्री के गठबंधन को चुनौती दे रहे हैं। उनके नेतृत्व वाले बी’याचद गठबंधन में पूर्व प्रधानमंत्री यायर लैपिड की येश अतीद पार्टी भी शामिल है। विपक्षी दलों के बीच सहयोग सरकार बनाने की संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है।

    चुनाव से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नेतन्याहू का समर्थन किया। सोमवार को पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि नेतन्याहू ने कठिन परिस्थितियों में प्रधानमंत्री के रूप में अच्छा काम किया है। नेतन्याहू ने भी ट्रंप की तारीफ करते हुए दोनों देशों के नेताओं के बीच असाधारण मित्रता का उल्लेख किया। अमेरिका और इजरायल के संबंध चुनावी चर्चा के महत्वपूर्ण पहलुओं में शामिल हैं।

    इजरायल में संसदीय चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत होते हैं। पूरे देश को एक ही चुनावी क्षेत्र माना जाता है और मतदाता संसद यानी नेसेट की 120 सीटों के लिए राजनीतिक दलों की सूची पर वोट डालते हैं। मतदाता सीधे किसी व्यक्तिगत सांसद का चुनाव नहीं करते। संसद में प्रतिनिधित्व पाने के लिए किसी पार्टी को कम से कम 3.25 प्रतिशत वैध मत हासिल करना जरूरी है। इस व्यवस्था में छोटी पार्टियां भी सरकार गठन के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

    सरकार बनाने के लिए संसद में कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जुटाना आवश्यक है। सबसे अधिक सीटें हासिल करने वाला दल अपने आप सरकार नहीं बना लेता। मतदान के बाद राष्ट्रपति राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श करते हैं और उस सांसद को सरकार बनाने का अवसर देते हैं, जिसके बहुमत जुटाने की संभावना हो। इसके बाद गठबंधन बनाने के लिए बातचीत होती है। यदि कोई नेता 61 सांसदों का समर्थन हासिल नहीं कर पाता, तो सरकार गठन की प्रक्रिया लंबी हो सकती है।

    इस चुनाव के नतीजों का असर इजरायल की सुरक्षा नीति, क्षेत्रीय संघर्षों और दूसरे देशों के साथ उसके संबंधों पर पड़ सकता है। गाजा में युद्ध और ईरान के साथ टकराव के बीच नई सरकार के सामने सुरक्षा तथा कूटनीति से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दे रहेंगे। चुनाव परिणामों के बाद गठबंधन का स्वरूप तय करेगा कि आने वाले समय में देश की नीतियों को किस दिशा में आगे बढ़ाया जाएगा।