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  • भारतीय नौसेना को मिली नई सामरिक ताकत, एक और MH-60R सीहॉक हेलीकॉप्टर हुआ शामिल; भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग पहुंचा नए स्तर पर

    भारतीय नौसेना को मिली नई सामरिक ताकत, एक और MH-60R सीहॉक हेलीकॉप्टर हुआ शामिल; भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग पहुंचा नए स्तर पर

    नई दिल्ली । भारतीय नौसेना की परिचालन क्षमता को और सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए उसके बेड़े में एक और अत्याधुनिक MH-60R सीहॉक नौसैनिक हेलीकॉप्टर शामिल किया गया है। इस नई डिलीवरी के साथ भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग को नई गति मिली है। आधुनिक तकनीक से लैस यह हेलीकॉप्टर समुद्री सुरक्षा, पनडुब्बी रोधी अभियानों और निगरानी क्षमताओं को पहले से अधिक प्रभावी बनाने में अहम भूमिका निभाएगा।

    भारत अपनी समुद्री सीमाओं की सुरक्षा और हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक उपस्थिति को लगातार मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है। इसी उद्देश्य से अमेरिका से 24 MH-60R सीहॉक हेलीकॉप्टरों की खरीद का समझौता किया गया था। इन हेलीकॉप्टरों की चरणबद्ध तरीके से आपूर्ति की जा रही है और नई खेप के शामिल होने से भारतीय नौसेना की युद्धक तैयारियों को अतिरिक्त मजबूती मिलेगी।

    यह हेलीकॉप्टर अत्याधुनिक मल्टी-रोल नौसैनिक प्लेटफॉर्म के रूप में जाना जाता है। इसे विशेष रूप से पनडुब्बियों का पता लगाने, समुद्री निगरानी, खोज एवं बचाव अभियान, विशेष नौसैनिक ऑपरेशन और युद्धकालीन मिशनों के लिए विकसित किया गया है। आधुनिक रडार, सोनार, इलेक्ट्रॉनिक सेंसर और उन्नत हथियार प्रणालियों से लैस होने के कारण यह समुद्र में लंबी दूरी तक प्रभावी निगरानी और त्वरित कार्रवाई करने में सक्षम है।

    भारतीय नौसेना इन हेलीकॉप्टरों को अपने युद्धपोतों पर तैनात करेगी, जिससे समुद्र में निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक मजबूत होगी। विशेष रूप से हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती सामरिक चुनौतियों और समुद्री गतिविधियों के बीच यह क्षमता भारत के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। आधुनिक तकनीक से लैस यह प्लेटफॉर्म समुद्री सीमाओं की निगरानी के साथ-साथ संभावित खतरों की समय रहते पहचान करने में भी सहायक होगा।

    भारत और अमेरिका के बीच रक्षा क्षेत्र में सहयोग पिछले कुछ वर्षों में लगातार मजबूत हुआ है। दोनों देश रक्षा तकनीक, संयुक्त अभ्यास, सैन्य उपकरणों की आपूर्ति और रणनीतिक साझेदारी के विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा रहे हैं। नवीनतम हेलीकॉप्टर की डिलीवरी को इसी व्यापक रक्षा सहयोग का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। यह साझेदारी केवल सैन्य क्षमता तक सीमित नहीं है, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता और समुद्री सुरक्षा को बढ़ावा देने के साझा उद्देश्य को भी दर्शाती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय सुरक्षा परिदृश्य में भारतीय नौसेना के लिए आधुनिक नौसैनिक हेलीकॉप्टरों की उपलब्धता अत्यंत महत्वपूर्ण है। समुद्री मार्गों की सुरक्षा, पनडुब्बियों की निगरानी और बहुआयामी नौसैनिक अभियानों के दौरान ऐसे प्लेटफॉर्म निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इससे भारतीय नौसेना की त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता और दूरदराज समुद्री क्षेत्रों में संचालन की दक्षता भी बढ़ेगी।

    आने वाले समय में शेष हेलीकॉप्टरों की आपूर्ति पूरी होने के बाद भारतीय नौसेना की समुद्री युद्ध क्षमता में और व्यापक विस्तार होने की उम्मीद है। अत्याधुनिक तकनीक से लैस इन प्लेटफॉर्मों के शामिल होने से भारत की समुद्री सुरक्षा व्यवस्था और अधिक मजबूत होगी तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी रणनीतिक उपस्थिति को भी नई मजबूती मिलेगी। रक्षा विशेषज्ञ इसे भारत की दीर्घकालिक समुद्री सुरक्षा रणनीति और आधुनिक सैन्य आधुनिकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देख रहे हैं।

  • ईरान ने भारत से बुलाए 180 नौसैनिक, कोच्चि से उड़ान भरेंगे; अमेरिकी हमले में मृतकों के शव भी लौटाए जा रहे

    ईरान ने भारत से बुलाए 180 नौसैनिक, कोच्चि से उड़ान भरेंगे; अमेरिकी हमले में मृतकों के शव भी लौटाए जा रहे



    नई दिल्ली। मध्य पूर्व में ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बीच भारत ने एक संवेदनशील कूटनीतिक मिशन अंजाम दिया है। ईरान ने अपने युद्धपोत IRIS Lavan के लगभग 180 गैर-जरूरी नौसैनिकों को भारत के कोच्चि से स्वदेश लौटाने की विशेष व्यवस्था की है। साथ ही, श्रीलंका के तट के पास अमेरिकी हमले में मारे गए नौसैनिकों के शव भी भारत के माध्यम से ईरान भेजे जा रहे हैं।

    सूत्रों के अनुसार, जहाज को 1 मार्च को तकनीकी खराबी के चलते आपातकालीन डॉकिंग की अनुमति मिली थी और यह 4 मार्च से कोच्चि में खड़ा है। जहाज पर कुल 183 चालक दल मौजूद थे, जिन्हें भारतीय नौसेना की सुविधाओं में रखा गया था। अब 180 गैर-जरूरी नाविकों को तुर्की एयरलाइन की उड़ान से पहले आर्मेनिया ले जाया जाएगा, और वहां से सड़क मार्ग के जरिए ईरान भेजा जाएगा। जबकि कुछ तकनीकी और आवश्यक कर्मचारी जहाज पर ही रहेंगे।

    यह घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब श्रीलंका के तट के पास अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरानी युद्धपोत IRIS Dena पर हमला किया था। इस हमले में कुल 130 नाविक सवार थे, जिनमें से 32 को बचा लिया गया, जबकि दर्जनों अभी भी लापता हैं।

    भारत इस समय गंभीर ऊर्जा संकट से जूझ रहा है। देश में रसोई गैस की कमी और जनजीवन पर असर पड़ रहा है। ऐसे में भारत ने अपने बंदरगाहों पर जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए ईरान के साथ लगातार कूटनीतिक संपर्क बनाए रखा। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ईरानी समकक्ष अब्बास अरागची से चार बार फोन पर बातचीत कर सुरक्षा और ऊर्जा जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा की।

    भारतीय नौसेना ने ईरान की विशेष परिवहन मांग को पूरा किया। कोच्चि से उड़ान भरने वाले नौसैनिक और शवों की सुरक्षित हवाई व सड़क मार्ग से वापसी क्षेत्रीय सुरक्षा और भारत-ईरान कूटनीति के लिहाज से अहम मानी जा रही है। यह मिशन मध्य पूर्व युद्ध और दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव के बीच बेहद संवेदनशील और रणनीतिक कदम माना जा रहा है।

  • तकनीकी खराबी के कारण ईरानी युद्धपोत ‘आईआरआईएस लावान’ को कोच्चि में दी गई डॉकिंग की अनुमति

    तकनीकी खराबी के कारण ईरानी युद्धपोत ‘आईआरआईएस लावान’ को कोच्चि में दी गई डॉकिंग की अनुमति


    नई दिल्ली।
    भारत सरकार ने श्रीलंका के दक्षिण में हुए ‘आईआरआईएस डेना’ से जुड़े घटनाक्रम से कुछ दिन पहले ईरान ने अपने एक अन्य युद्धपोत आईआरआईएस लावान को भारत में शरण देने का अनुरोध किया था।

    भारत सरकार के सूत्रों के अनुसार, ईरान ने 28 फरवरी को भारत से संपर्क कर अपने नौसैनिक पोत आईआरआईएस लावान को कोच्चि बंदरगाह पर डॉकिंग की अनुमति देने का आग्रह किया था। उस समय यह पोत अंतरराष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू में भाग लेने के लिए क्षेत्र में मौजूद था, लेकिन इसमें तकनीकी खराबी आ जाने के कारण तत्काल डॉकिंग की आवश्यकता बताई गई थी। भारत सरकार ने इस अनुरोध पर विचार करने के बाद 1 मार्च को जहाज को कोच्चि में डॉकिंग की अनुमति प्रदान कर दी। इसके बाद ईरानी युद्धपोत 4 मार्च को केरल के कोच्चि स्थित बंदरगाह पर पहुंचकर सुरक्षित रूप से डॉक हो गया।

    सरकारी सूत्रों के मुताबिक, जहाज के तकनीकी मुद्दों के समाधान तक उसके चालक दल के 183 सदस्यों को कोच्चि स्थित भारतीय नौसेना की सुविधाओं में ठहराया गया है। वहां उन्हें आवश्यक सहायता और सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। सूत्रों ने कहा कि यह कदम मानवीय आधार और समुद्री परंपराओं के अनुरूप उठाया गया है, जिसके तहत किसी भी जहाज को तकनीकी समस्या या आपात स्थिति में सुरक्षित बंदरगाह उपलब्ध कराना अंतरराष्ट्रीय समुद्री सहयोग का हिस्सा माना जाता है।

    गौरतलब है कि यह घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब श्रीलंका के दक्षिणी समुद्री क्षेत्र में ईरानी नौसैनिक जहाज आईआरआईएस डेना से जुड़ी घटना को लेकर भी चर्चा हो रही है। हालांकि सरकारी सूत्रों ने स्पष्ट किया है कि कोच्चि में आईआरआईएस लावान की डॉकिंग केवल तकनीकी समस्या के कारण की गई है और यह नियमित समुद्री सहायता की प्रक्रिया के तहत हुई है।

    सूत्रों ने यह भी बताया कि जहाज की मरम्मत और तकनीकी जांच पूरी होने के बाद उसके आगे के कार्यक्रम के बारे में निर्णय लिया जाएगा।सूत्रों ने बताया कि ईरान ने 28 फरवरी 2026 को भारत से संपर्क कर अपने नौसैनिक पोत आईआरआईएस लावान को कोच्चि बंदरगाह पर डॉकिंग की अनुमति देने का आग्रह किया था। उस समय यह पोत अंतरराष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू में भाग लेने के लिए क्षेत्र में मौजूद था, लेकिन इसमें तकनीकी खराबी आ जाने के कारण तत्काल डॉकिंग की आवश्यकता बताई गई थी।

    भारत सरकार ने इस अनुरोध पर विचार करने के बाद 1 मार्च को जहाज को कोच्चि में डॉकिंग की अनुमति प्रदान कर दी। इसके बाद ईरानी युद्धपोत 4 मार्च को केरल के कोच्चि स्थित बंदरगाह पर पहुंचकर सुरक्षित रूप से डॉक हो गया।

    सरकारी सूत्रों के मुताबिक, जहाज के तकनीकी मुद्दों के समाधान तक उसके चालक दल के 183 सदस्यों को कोच्चि स्थित भारतीय नौसेना की सुविधाओं में ठहराया गया है। वहां उन्हें आवश्यक सहायता और सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। सूत्रों ने कहा कि यह कदम मानवीय आधार और समुद्री परंपराओं के अनुरूप उठाया गया है, जिसके तहत किसी भी जहाज को तकनीकी समस्या या आपात स्थिति में सुरक्षित बंदरगाह उपलब्ध कराना अंतरराष्ट्रीय समुद्री सहयोग का हिस्सा माना जाता है।

    गौरतलब है कि यह घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब श्रीलंका के दक्षिणी समुद्री क्षेत्र में ईरानी नौसैनिक जहाज आईआरआईएस डेना से जुड़ी घटना को लेकर भी चर्चा हो रही है। हालांकि सरकारी सूत्रों ने स्पष्ट किया है कि कोच्चि में आईआरआईएस लावान की डॉकिंग केवल तकनीकी समस्या के कारण की गई है और यह नियमित समुद्री सहायता की प्रक्रिया के तहत हुई है। सूत्रों ने यह भी बताया कि जहाज की मरम्मत और तकनीकी जांच पूरी होने के बाद उसके आगे के कार्यक्रम के बारे में निर्णय लिया जाएगा।