नेपाली मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बुधवार को मंजूर की गई “सरकार कार्य विभाजन नियमावली” के तहत इस खुफिया एजेंसी को गृह मंत्रालय से हटाकर PMO के नियंत्रण में लाया गया है। यह फैसला ऐसे समय पर लिया गया है जब देश में यह चर्चा चल रही थी कि खुफिया तंत्र को फिर से गृह मंत्रालय के अधीन किया जाए या प्रधानमंत्री कार्यालय के सीधे नियंत्रण में रखा जाए।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह कदम पूर्व प्रधानमंत्री KP Sharma Oli की नीतियों की याद दिलाता है, जिन्होंने अपने कार्यकाल में कई अहम विभागों को PMO के अधीन कर सत्ता को केंद्रीकृत किया था। उस समय उनकी सरकार पर विपक्ष और जनता ने तानाशाही शैली में शासन करने के आरोप लगाए थे।
बाद में सत्ता परिवर्तन के बाद पूर्व मुख्य न्यायाधीश Sushila Karki के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने इन फैसलों को पलटते हुए खुफिया और अन्य एजेंसियों को उनके मूल मंत्रालयों के अधीन वापस कर दिया था। लेकिन अब बालेन शाह सरकार द्वारा इन्हें दोबारा PMO के अधीन लाने के फैसले ने राजनीतिक हलचल तेज कर दी है।
जानकारों के मुताबिक, इस बदलाव के साथ ही राजस्व जांच विभाग को भी भंग कर दिया गया है, जिसे पहले ओली सरकार के दौरान PMO के अधीन किया गया था। इसे सीधे तौर पर सत्ता के बढ़ते केंद्रीकरण की दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है।
नेपाल की राजनीति में इस फैसले के बाद नई बहस छिड़ गई है कि क्या यह प्रशासनिक सुधार है या फिर सत्ता को एक ही केंद्र में सीमित करने की कोशिश। विपक्षी दलों और विशेषज्ञों का कहना है कि इससे संस्थागत संतुलन प्रभावित हो सकता है, जबकि सरकार इसे प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने वाला कदम बता रही है।

