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  • शरद पूर्णिमा पर श्रीकृष्ण ने क्यों रचाया था महारास, गोपी बनने के बाद गोपेश्वर महादेव कैसे पड़े प्रसिद्ध

    शरद पूर्णिमा पर श्रीकृष्ण ने क्यों रचाया था महारास, गोपी बनने के बाद गोपेश्वर महादेव कैसे पड़े प्रसिद्ध

    नई दिल्ली । शरद पूर्णिमा का हिंदू धर्म में विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, द्वापर युग में इसी पूर्णिमा की चांदनी रात भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में गोपियों के साथ महारास रचाया था। श्रीकृष्ण की इस दिव्य लीला को देखने और उसमें शामिल होने के लिए देवता भी उत्सुक थे। ब्रज में प्रचलित एक कथा के मुताबिक, भगवान शिव भी माता पार्वती के साथ वृंदावन पहुंचे थे। महारास में प्रवेश करने के लिए उन्हें गोपी का रूप धारण करना पड़ा। इसी प्रसंग से भगवान शिव के गोपेश्वर महादेव के रूप में प्रसिद्ध होने की मान्यता जुड़ी है।

    शरद पूर्णिमा की रात वृंदावन की प्राकृतिक सुंदरता और चंद्रमा की चांदनी को महारास की कथा से जोड़ा जाता है। श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला का विस्तार से वर्णन मिलता है। धार्मिक वर्णन के अनुसार, शरद ऋतु की एक रात आकाश में पूर्ण चंद्रमा चमक रहा था। वृंदावन में खिले फूलों और यमुना के किनारे बहती शीतल हवा के बीच भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी बांसुरी बजाई।

    बांसुरी की मधुर धुन सुनकर गोपियां उनकी ओर आकर्षित हुईं और उनके पास पहुंच गईं। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया से अनेक रूप धारण किए, जिससे प्रत्येक गोपी को अनुभव हुआ कि श्रीकृष्ण केवल उसी के साथ रास कर रहे हैं। इस लीला को भक्ति और भगवान के प्रति समर्पण के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। ब्रज में शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहा जाता है।

    भगवान शिव के गोपी रूप में महारास में शामिल होने की कथा भी ब्रज की प्रचलित धार्मिक मान्यताओं में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। कथा के अनुसार, भगवान शिव श्रीकृष्ण की इस दिव्य लीला के दर्शन करना चाहते थे। वह माता पार्वती के साथ वृंदावन पहुंचे, लेकिन महारास मंडल में प्रवेश के समय उन्हें रोक दिया गया। मान्यता के अनुसार, वहां श्रीकृष्ण के साथ सखी भाव से लीला में शामिल होने के लिए गोपी रूप में होना आवश्यक था।

    महारास में प्रवेश पाने की इच्छा से भगवान शिव ने गोपी का रूप धारण करने का निर्णय लिया। कथा के अनुसार, उन्होंने यमुना में स्नान किया और गोपी का रूप लेकर महारास मंडल में प्रवेश किया। वह लीला में इतने मग्न हो गए कि उनका घूंघट हट गया और वहां मौजूद गोपियों को उनके वास्तविक स्वरूप का पता चल गया। भगवान शिव को देखकर गोपियां हंसने लगीं। भगवान श्रीकृष्ण भी उनकी भक्ति और लीला में शामिल होने की इच्छा से प्रसन्न हुए। इसके बाद भगवान शिव को गोपेश्वर नाम से संबोधित किए जाने की मान्यता प्रचलित हुई। वृंदावन में स्थित गोपेश्वर महादेव मंदिर इसी धार्मिक परंपरा से जुड़ा है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने महारास के माध्यम से गोपियों की मनोकामना पूरी की थी। इस लीला को कामदेव के अहंकार पर विजय से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि रास के दौरान भगवान श्रीकृष्ण की योगमाया से प्रत्येक गोपी को उनके साथ होने का अनुभव हुआ, लेकिन इस दिव्य प्रसंग में सांसारिक कामना के बजाय भक्ति और समर्पण का भाव प्रमुख रहा।

    कथा में यह भी बताया जाता है कि महारास के दौरान भगवान श्रीकृष्ण ने अनंत रूप धारण किए थे। चंद्रमा की चांदनी और उस रात के दिव्य वातावरण का वर्णन भी इस प्रसंग का हिस्सा है। शरद पूर्णिमा की रात को लेकर ब्रज में आज भी धार्मिक आयोजन और श्रीकृष्ण की लीलाओं का स्मरण किया जाता है।

    श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध के अध्याय 29 से 33 तक रासलीला का वर्णन मिलता है। इन पांच अध्यायों को रास पंचाध्यायी कहा जाता है। इनमें श्रीकृष्ण की बांसुरी सुनकर गोपियों का उनके पास पहुंचना, उनका अंतर्धान होना, गोपियों का विरह और फिर महारास का प्रसंग शामिल है। शरद पूर्णिमा पर कई श्रद्धालु रास पंचाध्यायी का पाठ या श्रवण करते हैं। धार्मिक विश्वास के अनुसार, श्रीकृष्ण की लीलाओं का स्मरण करने से भक्ति भाव और मानसिक शांति की अनुभूति होती है।

  • रानी मुखर्जी की मां कृष्णा मुखर्जी का 75 साल की उम्र में निधन, परिवार ने की निजता का सम्मान करने की अपील

    रानी मुखर्जी की मां कृष्णा मुखर्जी का 75 साल की उम्र में निधन, परिवार ने की निजता का सम्मान करने की अपील

    नई दिल्ली । बॉलीवुड अभिनेत्री रानी मुखर्जी की मां कृष्णा मुखर्जी का 75 साल की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने मंगलवार दोपहर आखिरी सांस ली। उनके निधन की जानकारी परिवार की ओर से दी गई है। परिवार ने इस मुश्किल समय में लोगों से निजता का सम्मान करने की अपील की है।

    कृष्णा मुखर्जी के निधन की खबर सामने आने के बाद रानी मुखर्जी के प्रशंसकों और फिल्म जगत से जुड़े लोगों के बीच शोक की लहर है। रानी अपनी मां के बेहद करीब थीं और दोनों के बीच गहरा भावनात्मक रिश्ता था। कृष्णा अक्सर बेटी के साथ सार्वजनिक मौकों पर नजर आती थीं और उनके करियर में भी उनका लगातार साथ रहा।

    कृष्णा मुखर्जी के निधन की पुष्टि रानी मुखर्जी के पति आदित्य चोपड़ा की कंपनी की ओर से की गई। जानकारी के अनुसार, कृष्णा ने मंगलवार दोपहर दुनिया को अलविदा कहा। परिवार ने लोगों से अपील की है कि इस कठिन समय में उन्हें निजी समय दिया जाए। परिवार की ओर से मिले प्यार और प्रार्थनाओं के लिए भी आभार जताया गया है।

    हालांकि, कृष्णा मुखर्जी के निधन की वजह अभी सामने नहीं आई है। परिवार की ओर से भी उनकी मौत के कारण को लेकर कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। ऐसे में फिलहाल उनके निधन की परिस्थितियों के बारे में किसी तरह की पुष्टि नहीं हुई है।

    कृष्णा मुखर्जी का फिल्मों से पुराना जुड़ाव रहा था। उन्होंने फिल्म निर्माता राम मुखर्जी से शादी की थी। कृष्णा ने अभिनय के क्षेत्र में काम नहीं किया, लेकिन बंगाली सिनेमा से उनका नाता रहा। उन्होंने कई बंगाली फिल्मों के लिए प्लेबैक सिंगर के तौर पर अपनी आवाज दी थी।

    रानी मुखर्जी अपने माता-पिता दोनों से बेहद जुड़ी हुई थीं। उनके पिता राम मुखर्जी का निधन वर्ष 2017 में हुआ था। राम मुखर्जी फिल्म निर्माण से जुड़े हुए थे और बंगाली तथा हिंदी सिनेमा में उनका योगदान रहा। पिता के निधन के बाद कृष्णा मुखर्जी परिवार के लिए महत्वपूर्ण सहारा बनी रहीं।

    रानी मुखर्जी के फिल्मी सफर में भी उनकी मां का खास योगदान रहा। रानी ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत बंगाली सिनेमा से की थी। इसके बाद उन्होंने हिंदी फिल्मों में कदम रखा और धीरे-धीरे अपनी अलग पहचान बनाई।

    रानी मुखर्जी ने अपने लंबे करियर में कई चर्चित फिल्मों में काम किया है। इनमें कुछ कुछ होता है, गुलाम, साथिया, हम तुम, ब्लैक और मर्दानी जैसी फिल्में शामिल हैं। अलग-अलग तरह के किरदारों के जरिए उन्होंने हिंदी सिनेमा में अपनी खास जगह बनाई।

    रानी मुखर्जी के निजी जीवन में उनकी मां कृष्णा मुखर्जी का हमेशा अहम स्थान रहा। मां-बेटी के इस रिश्ते की झलक कई सार्वजनिक मौकों पर भी देखने को मिलती रही है। कृष्णा अपनी बेटी के काम और उपलब्धियों को लेकर हमेशा साथ खड़ी नजर आती थीं।

    रानी मुखर्जी को आखिरी बार मर्दानी 3 में देखा गया था। अब मां कृष्णा मुखर्जी के निधन के बाद अभिनेत्री और उनका परिवार निजी तौर पर शोक के दौर से गुजर रहा है। परिवार की ओर से लोगों से इस कठिन समय में उनकी निजता का सम्मान करने की अपील की गई है।

  • 4 सितंबर को मनाई जाएगी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग से बढ़ा पर्व का महत्व

    4 सितंबर को मनाई जाएगी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग से बढ़ा पर्व का महत्व

    नई दिल्ली ।श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व इस वर्ष 4 सितंबर को मनाया जा रहा है। हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 4 सितंबर को रात 2 बजकर 25 मिनट से शुरू हुई और 5 सितंबर की रात 12 बजकर 13 मिनट तक रहेगी। धार्मिक परंपरा में जन्माष्टमी की तारीख निर्धारित करते समय केवल अष्टमी तिथि ही नहीं, बल्कि मध्यरात्रि और रोहिणी नक्षत्र की स्थिति को भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

    इन्हीं पंचांग गणनाओं के आधार पर शुक्रवार को जन्माष्टमी का मुख्य उत्सव मनाया जाएगा। रात में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव और विशेष पूजा की जाएगी। इस बार पर्व को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह है, क्योंकि ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार कई शुभ संयोग एक साथ बन रहे हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में रोहिणी नक्षत्र और वृष राशि के संयोग में हुआ था। वर्ष 2026 में जन्माष्टमी पर भी अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का विशेष मेल बताया जा रहा है। इसी कारण इस संयोग को जयंती योग के रूप में विशेष महत्व दिया जा रहा है।

    इस वर्ष जन्माष्टमी पर जयंती योग के अलावा सर्वार्थ सिद्धि योग, हर्षण योग, हंस योग, मालव्य योग, बुधादित्य राजयोग और नवपंचम राजयोग बनने की बात कही गई है। धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं में शुभ योगों को पूजा, व्रत, भक्ति और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए अनुकूल माना जाता है।

    जन्माष्टमी की सबसे महत्वपूर्ण पूजा मध्यरात्रि के निशीथ काल में की जाती है। इस वर्ष निशीथ काल रात 11 बजकर 58 मिनट से 12 बजकर 44 मिनट तक रहेगा। यानी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की मुख्य पूजा के लिए श्रद्धालुओं को लगभग 46 मिनट का समय मिलेगा।

    अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग को देखते हुए इस अवधि में श्रीकृष्ण की पूजा को विशेष महत्व दिया जा रहा है। श्रद्धालु इस दौरान भगवान का अभिषेक, पूजन, आरती और जन्मोत्सव से जुड़े धार्मिक अनुष्ठान कर सकते हैं। कई भक्त जन्माष्टमी पर व्रत रखते हैं और मध्यरात्रि में पूजा के बाद व्रत का पारण करते हैं।

    4 सितंबर के दिन की शुरुआत हर्षण योग से होगी, जो दोपहर 3 बजकर 44 मिनट तक रहने की जानकारी दी गई है। इसके बाद अन्य ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार दिन और रात में अलग-अलग योगों की स्थिति रहेगी। इन योगों को लेकर धार्मिक मान्यताएं अलग-अलग हैं और श्रद्धालु अपनी परंपरा के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं।

    छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर समेत कई शहरों में जन्माष्टमी को लेकर मंदिरों में विशेष तैयारियां की गई हैं। राजधानी के इस्कॉन मंदिर, खाटू श्याम मंदिर और राधा-कृष्ण मंदिरों में शुक्रवार सुबह से ही धार्मिक कार्यक्रम, भजन और अन्य आयोजन शुरू होने की तैयारी है। मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण के श्रृंगार, झांकी और जन्मोत्सव के लिए व्यवस्थाएं पूरी कर ली गई हैं।

    जन्माष्टमी केवल धार्मिक अनुष्ठान का पर्व नहीं है, बल्कि श्रीकृष्ण के जीवन, उनके उपदेशों और धर्म तथा कर्म की अवधारणा को स्मरण करने का अवसर भी माना जाता है। इस दिन देशभर में श्रद्धालु भगवान कृष्ण की बाल रूप में पूजा करते हैं और मध्यरात्रि में उनके जन्म का उत्सव मनाते हैं। इस बार बनने वाले विशेष ज्योतिषीय संयोगों के कारण पर्व का धार्मिक महत्व और अधिक चर्चा में है।

  • Janmashtami 2026: MP के इंदौर जिले का अनोखा मंदिर…. जहां विराजमान हैं मूछों वाले कृष्ण

    Janmashtami 2026: MP के इंदौर जिले का अनोखा मंदिर…. जहां विराजमान हैं मूछों वाले कृष्ण


    इंदौर।
    देशभर में आज भगवान श्रीकृष्ण (Lord Shri Krishna) के जन्मोत्सव (Janmashtami 2026) की धूम मची हुई है. सभी मंदिरों में विशेष साज-सज्जा की गई है और कान्हा के जन्म की तैयारियां चल रही हैं. लेकिन आज हम आपको मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के इंदौर जिले (Indore district) के एक ऐसे अनोखे कृष्ण मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसके बारे में जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे। आइए जानते हैं इस मंदिर की खासियत….

    इंदौर जिले के सबसे आखिरी गांव गिरोता में भगवान श्रीकृष्ण का एक ऐसा मंदिर है, जहां कान्हा अपने सामान्य स्वरूप से बिल्कुल अलग मूंछों वाले कृष्ण के रूप में विराजमान हैं. ये मूंछें आन-बान-शान का प्रतीक मानी जाती हैं. मूंछें आत्मसम्मान और मर्यादा का भी प्रतीक मानी जाती हैं. इसी रूप में यहां भगवान श्रीकृष्ण विराजमान हैं. इतना ही नहीं, इस मंदिर को लेकर कई ऐसी मान्यताएं और कथाएं प्रचलित हैं, जो इसे बेहद खास बनाती हैं।


    अनोखी प्रतिमा विराजमान

    गांव के मुख्य चौराहे पर स्थित इस मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की अनोखी प्रतिमा विराजमान है. भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा में मूंछें हैं. यही वजह है कि यहां कान्हा को ‘मूंछों वाले कृष्ण’ के नाम से जाना जाता है. गांव के मुख्य चौराहे पर स्थित होने के कारण इस मंदिर को ‘चौराहे वाले बा के मंदिर’ के रूप में भी श्रद्धा के साथ पूजा जाता है।


    मंदिर से जुड़ी मान्यताएं

    इस मंदिर से जुड़ी कई मान्यताएं और कथाएं भी हैं. इसको लेकर स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों पहले गांव में ज्यादातर घर लकड़ी के बने हुआ करते थे. इसी दौरान एक बार गांव में अचानक भीषण आग लग गई. आग की लपटों ने मंदिर के आसपास बने कई घरों को अपनी चपेट में ले लिया, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि मंदिर भी लकड़ी का होने के बावजूद आग से सुरक्षित रहा. बताया जाता है कि जब पुजारी ने आग की लपटों को बढ़ते देखा तो भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा को वहां से हटाने का प्रयास किया, लेकिन प्रतिमा अपने स्थान से नहीं हिली. इसके बाद लोगों की आस्था इस मंदिर के प्रति और भी मजबूत हो गई।


    मंदिर की बनावट अलग

    इस मंदिर की बनावट भी इसे दूसरे मंदिरों से अलग दिखती है. मंदिर एक तरह से द्वार के आकार में बना हुआ है. यही वजह है कि गांव के लोग मंदिर के नीचे से होकर गुजरते हैं. स्थानीय मान्यता है कि मंदिर के नीचे से होकर गुजरने से भगवान श्रीकृष्ण का आशीर्वाद मिलता है और श्रद्धालुओं के मनोरथ एवं कार्य सिद्ध होते हैं।


    जन्माष्टमी पर आयोजन

    मंदिर के पुजारी का कहना है कि वैसे तो मंदिर में प्रतिदिन पूजा-पाठ और भजन-कीर्तन का दौर चलता रहता है, लेकिन श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और एकादशी के मौके पर यहां विशेष आयोजन किए जाते हैं. जन्माष्टमी पर मंदिर को विशेष रूप से सजाया जाता है. बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए पहुंचते हैं और रात तक भजन-कीर्तन का दौर चलता है।


    बारिश से जुड़ी मान्यता

    इस मंदिर से जुड़ी एक और बेहद खास मान्यता है. बताया जाता है कि जब आसपास के इलाकों में बारिश नहीं होती और लोग परेशान हो जाते हैं, तब मंदिर में विशेष रूप से डोल सजाया जाता है. श्रद्धालु इस डोल के आसपास कुछ दिनों तक फेरे लगाते हैं और ‘हरे राम, हरे कृष्ण’ का संकीर्तन करते हैं. स्थानीय लोगों की मान्यता है कि इस धार्मिक अनुष्ठान के बाद क्षेत्र में अच्छी बारिश होती है।

  • राजस्थान के मांगणियार मुस्लिम कलाकारों की कृष्ण भक्ति परंपरा ने संगीत जगत में रचा सांस्कृतिक एकता का अनोखा अध्याय

    राजस्थान के मांगणियार मुस्लिम कलाकारों की कृष्ण भक्ति परंपरा ने संगीत जगत में रचा सांस्कृतिक एकता का अनोखा अध्याय

    नई दिल्ली । राजस्थान की लोकसंगीत परंपरा में मांगणियार समुदाय का नाम विशेष सम्मान और सांस्कृतिक गौरव के साथ लिया जाता है। यह समुदाय सदियों से अपनी अनोखी संगीत साधना और पारंपरिक गायन शैली के लिए जाना जाता है, जिसने उन्हें न केवल देश में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विशिष्ट पहचान दिलाई है। इन कलाकारों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनकी संगीत यात्रा की शुरुआत धार्मिक सीमाओं से परे जाकर कृष्ण भजनों और मीराबाई के पदों से होती है, जो भारतीय संस्कृति की गहरी एकता और समरसता को दर्शाती है।

    मांगणियार समुदाय राजस्थान के उन क्षेत्रों से जुड़ा रहा है जहां लोकसंस्कृति और दरबारी परंपराओं का गहरा प्रभाव रहा है। ऐतिहासिक रूप से ये कलाकार राजपूत शासकों और जमींदार परिवारों के संरक्षण में रहते हुए दरबारी संगीतकार के रूप में अपनी सेवाएं देते थे। उस दौर में अधिकांश संरक्षक परिवार कृष्ण भक्ति से जुड़े थे, जिसके कारण सुबह के समय भजन गायन की परंपरा विकसित हुई। यह परंपरा समय के साथ केवल एक धार्मिक अभ्यास न रहकर एक सांस्कृतिक पहचान बन गई और पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही।

    आज भी यह परंपरा जीवित है जहां मांगणियार कलाकार अपने दैनिक अभ्यास की शुरुआत पारंपरिक रीति से करते हैं। वे अपने वाद्य यंत्रों के साथ जब रियाज शुरू करते हैं, तो सबसे पहले कृष्ण भक्ति और मीरा के पदों की गूंज सुनाई देती है। यह अभ्यास केवल संगीत की तैयारी नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक अनुशासन भी माना जाता है, जो उनकी गायकी को गहराई और आत्मीयता प्रदान करता है। इसी परंपरा ने राजस्थान के लोकसंगीत को एक ऐसा स्वरूप दिया है जो धार्मिक और सांस्कृतिक सीमाओं से ऊपर उठकर इंसानी भावनाओं को जोड़ता है।

    मांगणियार कलाकारों की यह संगीत परंपरा समय के साथ व्यापक मंचों तक पहुंची है। लोकधुनों और पारंपरिक गायकी की यह शैली अब फिल्मी संगीत और आधुनिक प्रस्तुतियों में भी अपनी जगह बना चुकी है। इस समुदाय के कई कलाकारों ने अपनी प्रतिभा के दम पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान बनाई है। उनकी गायकी में राजस्थान की मिट्टी की सादगी, लोकधुनों की गहराई और सांस्कृतिक विरासत की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

    इस परंपरा की सबसे बड़ी ताकत इसकी पीढ़ीगत शिक्षा प्रणाली है, जिसमें बच्चे बचपन से ही संगीत की बारीकियां सीखना शुरू कर देते हैं। घरों में ही उन्हें राग, ताल और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की शिक्षा दी जाती है, जिससे उनकी कला में स्वाभाविक निखार आता है। यह निरंतर अभ्यास और पारिवारिक परंपरा ही उनकी गायकी को विशिष्ट बनाती है और उसे वैश्विक मंचों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

    आज मांगणियार संगीत केवल एक क्षेत्रीय परंपरा नहीं रह गया है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक समरसता का प्रतीक बन चुका है। कृष्ण भजनों से शुरू होकर आधुनिक मंचों तक पहुंचने वाली यह यात्रा इस बात का प्रमाण है कि संगीत न केवल कला है, बल्कि यह समाज को जोड़ने और एकता का संदेश देने का भी माध्यम है।

  • खेल-खेल में हादसा: घड़ी का सेल निगलने के बाद बच्चे की जान बचाई डॉक्टरों ने

    खेल-खेल में हादसा: घड़ी का सेल निगलने के बाद बच्चे की जान बचाई डॉक्टरों ने


    खंडवा से बुधवार को एक चौंकाने वाला मामला सामने आया। बुरहानपुर निवासी 10 वर्षीय कृष्णा खेलते समय गलती से अपनी घड़ी का सेल निगल बैठा। छोटे बच्चे की लापरवाही एक बड़ी परेशानी बन गई, जब सेल गले के निचले हिस्से में फंस गया। कृष्णा को तेज दर्द, बेचैनी और सांस लेने में कठिनाई होने लगी, जिससे उसकी हालत तेजी से बिगड़ने लगी।

    परिवार ने देखते ही बच्चे को जिला अस्पताल सह शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय खंडवा पहुंचाया। वहां के नाक-कान-गला विभाग (ईएनटी) में डॉक्टरों ने बच्चे की गंभीर स्थिति को देखते हुए तुरंत एक्स-रे जांच कराई। जांच में स्पष्ट हुआ कि घड़ी का सेल आहार नली के निचले हिस्से में फंस गया है और यदि समय पर कार्रवाई न की जाए तो स्थिति और गंभीर हो सकती थी।

    विभागाध्यक्ष और ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. सुनील बाजोलिया ने तुरंत उपचार की कमान संभाली। उन्होंने अपनी टीम के साथ बिना समय गंवाए दूरबीन पद्धति यानी एंडोस्कोपिक प्रक्रिया से ऑपरेशन शुरू किया। यह प्रक्रिया बेहद संवेदनशील और जटिल थी, क्योंकि घड़ी का सेल गले के नाजुक हिस्से में फंसा हुआ था।

    करीब आधे घंटे की लगातार मेहनत और विशेषज्ञता के बाद डॉक्टरों ने बच्चे की घड़ी का सेल सुरक्षित निकाल लिया। बच्चे की जान इस समय पूरी तरह सुरक्षित बताई जा रही है और वह अब धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में लौट रहा है।

    डॉ. बाजोलिया ने बताया कि बच्चों की ऐसी लापरवाही अक्सर गंभीर परिणाम दे सकती है। खेलते समय छोटे सामान निगल जाने की घटनाएं आम हैं, लेकिन समय पर इलाज मिलने से बड़ी अनहोनी टली जा सकती है। उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि बच्चों पर नजर रखें और छोटे-छोटे खतरनाक सामान उनके हाथों से दूर रखें।

    इस घटना ने खंडवा अस्पताल की ईएनटी टीम की विशेषज्ञता और तत्परता को भी उजागर किया। बच्चे की स्थिति को देखते हुए तुरंत एक्स-रे, सही निदान और एंडोस्कोपिक प्रक्रिया ने मुश्किल हालात में भी जान बचाई। परिवार ने डॉक्टरों की सराहना की और कहा कि समय पर इलाज मिलने से बड़े हादसे से बचा जा सका।

    खेलते समय बच्चों की सुरक्षा और सतर्कता पर इस घटना ने एक बार फिर जोर दिया। अस्पताल अधिकारियों का कहना है कि समय रहते सही कदम उठाने से ऐसी अनहोनी टाली जा सकती है और छोटे-छोटे हादसे बड़े संकट में नहीं बदलते।