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  • भ्रष्टाचार का खेल दिव्यांग से भी नहीं छोड़ा 65 हजार लेकर बना दिया गार्ड और अधिकारी बने दर्शक

    भ्रष्टाचार का खेल दिव्यांग से भी नहीं छोड़ा 65 हजार लेकर बना दिया गार्ड और अधिकारी बने दर्शक

    नई दिल्ली । बिहार के मुजफ्फरपुर नगर निगम में सामने आया ताजा मामला सरकारी सिस्टम की संवेदनहीनता और भ्रष्टाचार की गहरी जड़ों को उजागर करता है जहां नौकरी देने के नाम पर न सिर्फ भारी भरकम अवैध वसूली की गई बल्कि एक दिव्यांग व्यक्ति तक को नहीं बख्शा गया। आउटसोर्सिंग एजेंसी मेसर्स गोस्वामी सिक्यूरिटी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड पर आरोप है कि उसने गार्ड और सफाईकर्मी की नौकरी दिलाने के बदले लोगों से मोटी रकम वसूली और नियमों को खुली चुनौती देते हुए 65 हजार रुपये लेकर एक दिव्यांग व्यक्ति को गार्ड की नौकरी पर लगा दिया जबकि उसकी शारीरिक स्थिति इस काम के लिए पूरी तरह उपयुक्त नहीं थी।

    स्थिति और भी चिंताजनक इसलिए हो जाती है क्योंकि इस पूरे मामले के दौरान नगर निगम के अधिकारी सब कुछ देखते रहे लेकिन किसी ने भी हस्तक्षेप करने या कार्रवाई करने की जरूरत नहीं समझी। यह केवल एक व्यक्ति के साथ अन्याय नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता का उदाहरण है जहां गरीब और जरूरतमंद लोगों को रोजगार के नाम पर ठगा जा रहा है। एजेंसी ने कर्मचारियों से न केवल नौकरी के लिए पैसे लिए बल्कि उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित भी किया और विरोध करने पर धमकाकर चुप रहने के लिए मजबूर किया।

    वेतन और अन्य सुविधाओं के मामले में भी भारी अनियमितताएं सामने आई हैं। कर्मचारियों को उनके ईपीएफ और अन्य कटौतियों की स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई जिससे उनके भविष्य की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। इतना ही नहीं हर गार्ड से एक सेट वर्दी के नाम पर 5600 रुपये वसूले गए जबकि बाजार में इसकी वास्तविक कीमत दो से ढाई हजार रुपये के बीच होती है। यह सीधे तौर पर कर्मचारियों के शोषण और धोखाधड़ी का मामला है।

    इस एजेंसी का विवादों से पुराना नाता भी रहा है। लगभग नौ साल पहले भी नगर निगम में ईपीएफ और ईएसआईसी घोटाले में इसका नाम सामने आया था जब कर्मचारियों के खाते में जमा की जाने वाली राशि का भुगतान नहीं किया गया था। इसके अलावा वर्ष 2014 में सारण जिले में इस एजेंसी के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। इन तथ्यों को छिपाकर एजेंसी ने लाइसेंस हासिल किया था जिसे बाद में नवंबर 2025 में गृह विभाग द्वारा निरस्त कर दिया गया।

    अब जब यह मामला सामने आया है तो नगर निगम प्रशासन ने जांच और कार्रवाई की बात जरूर कही है लेकिन सवाल यह है कि जब इतनी बड़ी अनियमितताएं लंबे समय से चल रही थीं तब तक जिम्मेदार अधिकारी चुप क्यों बैठे रहे। क्या यह लापरवाही थी या फिर मिलीभगत इसका जवाब मिलना अभी बाकी है। फिलहाल दो आउटसोर्सिंग एजेंसियों पर वित्तीय अनियमितताओं के चलते कार्रवाई की तलवार लटक रही है और उनसे वेतन भुगतान में देरी सहित अन्य मुद्दों पर स्पष्टीकरण मांगा गया है।

    यह घटना केवल एक शहर या एक एजेंसी तक सीमित नहीं है बल्कि यह देशभर में फैल रही उस व्यवस्था की तस्वीर है जहां आउटसोर्सिंग के नाम पर पारदर्शिता की कमी और जवाबदेही का अभाव आम लोगों के शोषण का कारण बन रहा है। जरूरत इस बात की है कि ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई हो ताकि भविष्य में कोई भी एजेंसी गरीब और मजबूर लोगों के अधिकारों का इस तरह दुरुपयोग करने की हिम्मत न कर सके।

  • लापरवाही से गई जान: बैतूल में पानी की टंकी से गिरकर मजदूर की मौत, बिना सुरक्षा काम करवा रहा था ठेकेदार

    लापरवाही से गई जान: बैतूल में पानी की टंकी से गिरकर मजदूर की मौत, बिना सुरक्षा काम करवा रहा था ठेकेदार


    बैतूल। मध्य प्रदेश के बैतूल जिले से एक बेहद गंभीर और झकझोर देने वाली घटना सामने आई है, जहां सरकारी योजना के तहत बन रही पानी की टंकी एक मजदूर की मौत का कारण बन गई। यह हादसा न सिर्फ एक व्यक्ति की जान जाने का मामला है, बल्कि सिस्टम और ठेकेदारी व्यवस्था की भारी लापरवाही को भी उजागर करता है।

    बैतूल जिले की बडोरा ग्राम पंचायत में जल जीवन मिशन के तहत निर्माणाधीन पानी की टंकी से गिरकर एक मजदूर की दर्दनाक मौत हो गई। मृतक की पहचान मुकेश सिरसाम, निवासी हमलापुर के रूप में हुई है। जानकारी के अनुसार, मुकेश करीब 100 फीट ऊंची पानी की टंकी पर पुताई का काम कर रहा था। हैरानी की बात यह है कि वह बिना सेफ्टी बेल्ट, बिना हेलमेट और बिना किसी सुरक्षा उपकरण के काम कर रहा था।

    काम के दौरान अचानक उसका संतुलन बिगड़ गया और वह ऊंचाई से नीचे गिर पड़ा। हादसे में उसके सिर में गंभीर चोटें आईं। मौके पर मौजूद लोगों ने उसे तुरंत जिला अस्पताल बैतूल पहुंचाया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।

    नियम साफ कहते हैं कि ऊंचाई पर काम करने वाले मजदूरों के लिए सुरक्षा उपकरण अनिवार्य हैं। इसके बावजूद ठेकेदार द्वारा बिना किसी सुरक्षा व्यवस्था के मजदूर से काम करवाया जाना गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या जल जीवन मिशन के नाम पर मजदूरों की जान से खिलवाड़ किया जा रहा है? क्या ठेकेदार खुद को कानून से ऊपर समझ रहे हैं?

    बताया जा रहा है कि यह पानी की टंकी पीएचई लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के अंतर्गत ठेकेदार के माध्यम से बनाई जा रही थी। हैरानी की बात यह है कि हादसे के बाद न तो ठेकेदार सामने आया है और न ही पीएचई विभाग की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी किया गया है। मृतक मजदूर के परिजनों को अब तक किसी तरह की आर्थिक सहायता या राहत की घोषणा भी नहीं की गई है।

    मुकेश सिरसाम की मौत सिर्फ एक दुर्घटना नहीं है, बल्कि यह उस लापरवाह सिस्टम का नतीजा है, जिसमें गरीब मजदूरों की जान की कीमत कुछ भी नहीं मानी जाती। सवाल यह भी है कि क्या इस मामले में जिम्मेदार ठेकेदार पर कार्रवाई होगी, क्या पीएचई विभाग अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करेगा या फिर यह मामला भी अन्य हादसों की तरह फाइलों में दबा दिया जाएगा। स्थानीय लोगों में घटना को लेकर आक्रोश है और वे दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। अब निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं कि वह इस मामले में कितनी गंभीरता दिखाता है।

  • राघव चड्ढा बने Blinkit डिलीवरी बॉय, गिग वर्कर्स की मेहनत और हक़ के लिए किया असरदार प्रदर्शन

    राघव चड्ढा बने Blinkit डिलीवरी बॉय, गिग वर्कर्स की मेहनत और हक़ के लिए किया असरदार प्रदर्शन


    नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी (AAP) के सांसद राघव चड्ढा इन दिनों सोशल मीडिया पर जबरदस्त चर्चा में हैं। वजह है उनका एक वीडियो, जिसमें वह Blinkit के डिलीवरी बॉय की यूनिफॉर्म पहनकर स्कूटी से सामान डिलीवर करते नजर आ रहे हैं। एक सांसद का इस तरह सड़कों पर उतरकर डिलीवरी करना लोगों को चौंका रहा है और यही वीडियो तेजी से वायरल हो गया।

    दरअसल, राघव चड्ढा ने यह कदम किसी ब्रांड प्रमोशन के लिए नहीं, बल्कि एक खास सामाजिक संदेश देने के लिए उठाया। उन्होंने खुद Blinkit डिलीवरी पार्टनर की तरह तैयार होकर स्कूटी चलाई और ग्राहकों तक सामान पहुंचाया, ताकि गिग इकॉनमी में काम करने वाले लाखों डिलीवरी वर्कर्स की मेहनत, संघर्ष और चुनौतियों को लोग करीब से समझ सकें।

    https://x.com/raghav_chadha/status/2010585064737001647?ref_src=twsrc%5Etfw%7Ctwcamp%5Etweetembed%7Ctwterm%5E2010585064737001647%7Ctwgr%5Ee049355dcf70984a5d0e15354faecd71da5e61cc%7Ctwcon%5Es1_&ref_url=https%3A%2F%2Fwww.aajtak.in%2Ftrending%2Fstory%2Fraghav-chadha-wears-blinkit-delivery-boy-tshirt-gig-workers-viral-rttw-dskc-2436928-2026-01-12

    राघव चड्ढा का कहना है कि आज क्विक डिलीवरी ऐप्स के दौर में डिलीवरी पार्टनर्स पर समय का भारी दबाव होता है। तेज धूप, बारिश, ठंड और ट्रैफिक के बीच ये लोग समय पर डिलीवरी करने की कोशिश करते हैं, लेकिन इसके बदले उन्हें कम कमाई, ज्यादा तनाव और सुरक्षा की कमी जैसी समस्याओं से जूझना पड़ता है। 10 मिनट की डिलीवरी के पीछे किसी इंसान की थकान और जोखिम छिपा होता है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

    Blinkit डिलीवरी बॉय की तरह सड़कों पर उतरना राघव चड्ढा का एक प्रतीकात्मक कदम था।

    इसके जरिए उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की कि डिलीवरी पार्टनर सिर्फ किसी ऐप का हिस्सा नहीं, बल्कि मेहनतकश लोग हैं, जिनके लिए बेहतर नियम, बीमा, सुरक्षा और सम्मान बेहद जरूरी है। उनका यह अंदाज आम नेताओं से अलग नजर आया और इसी वजह से लोगों का ध्यान खींच पाया।

    सोशल मीडिया पर इस वीडियो को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कई यूजर्स ने राघव चड्ढा की तारीफ करते हुए कहा कि नेताओं को जमीनी हकीकत समझने के लिए ऐसे कदम उठाने चाहिए।

    कुछ लोगों ने इसे गिग इकॉनमी में काम करने वाले लोगों की आवाज बताने वाला मजबूत सोशल मैसेज कहा। वहीं, कुछ यूजर्स ने सवाल भी उठाए कि क्या यह पूरी तरह नियमों के तहत किया गया था या सिर्फ प्रतीकात्मक वीडियो था।

    कुल मिलाकर, Blinkit डिलीवरी बॉय बनकर सामान पहुंचाना राघव चड्ढा का एक अलग लेकिन असरदार तरीका रहा, जिसने गिग वर्कर्स की मेहनत और उनकी समस्याओं को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।