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  • कौन हैं ITBP के शौर्य कमांडो, LAC पर चीनी सैनिकों के सामने कैसे संभालते हैं मोर्चा..

    कौन हैं ITBP के शौर्य कमांडो, LAC पर चीनी सैनिकों के सामने कैसे संभालते हैं मोर्चा..


    नई दिल्ली
    । भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर सीमा सुरक्षा और सैनिकों की गश्त को लेकर सतर्कता लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है। अरुणाचल प्रदेश के संवेदनशील इलाकों में दोनों देशों के सैनिकों के आमने-सामने आने की स्थितियों के बीच भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के शौर्य कमांडो विशेष चर्चा में हैं। कठिन पहाड़ी परिस्थितियों में काम करने के लिए प्रशिक्षित ये जवान सीमा पर त्वरित प्रतिक्रिया देने और तनावपूर्ण परिस्थितियों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    राजस्थान के अलवर में आयोजित ITBP के वार्षिक अभिनंदन समारोह में संगठन के महानिदेशक शत्रुजीत सिंह कपूर ने अरुणाचल प्रदेश में LAC के कई स्थानों पर भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच आमना-सामना तथा तनातनी की स्थिति बने रहने की बात कही। उन्होंने शौर्य कमांडो के प्रदर्शन और उनकी भूमिका की भी सराहना की। इन विशेष दस्तों का उद्देश्य संवेदनशील सीमा क्षेत्रों में जवानों की प्रतिक्रिया क्षमता बढ़ाना और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में प्रभावी ढंग से काम करना है।

    शौर्य कमांडो दस्तों के गठन की पृष्ठभूमि वर्ष 2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प से जुड़ी है। इस घटना के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गश्त, निगरानी और सैनिकों की त्वरित तैनाती को लेकर विशेष सतर्कता की जरूरत महसूस की गई। इसी दिशा में ITBP ने अपने जवानों में से शारीरिक रूप से सक्षम, मानसिक तौर पर मजबूत और कठिन परिस्थितियों में काम करने वाले कर्मियों को चुनकर विशेष प्रशिक्षण देने की व्यवस्था विकसित की।

    इन कमांडो को भारतीय सेना की घातक प्लाटून की तर्ज पर तैयार किया गया है। इनके प्रशिक्षण में पर्वतीय क्षेत्रों में आवाजाही, अत्यधिक ठंड में काम करना, हाथों से मुकाबला करने की तकनीक, हथियारों का संचालन और तनावपूर्ण परिस्थितियों में संयम बनाए रखना शामिल है। ऊंचाई वाले इलाकों में ऑक्सीजन की कमी, दुर्गम रास्तों और बेहद कम तापमान के बीच काम करना इनके लिए बड़ी चुनौती होती है। इसलिए शारीरिक क्षमता के साथ मानसिक दृढ़ता भी इनके प्रशिक्षण का अहम हिस्सा है।

    ITBP की तैनाती व्यवस्था के तहत चीन सीमा पर तैनात प्रत्येक बटालियन के साथ कम से कम एक शौर्य कमांडो टीम जोड़े जाने की जानकारी दी गई है। अरुणाचल प्रदेश जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में इनकी भूमिका को देखते हुए दो अतिरिक्त इकाइयां तैयार किए जाने का भी उल्लेख किया गया है। भविष्य में इन दस्तों को कंपनी स्तर तक विकसित करने और एक अलग, समर्पित बटालियन बनाने की योजना पर काम किए जाने की बात कही गई है। ऐसी इकाई तैयार होने पर जरूरत के समय विशेष प्रशिक्षित जवानों को तनावग्रस्त क्षेत्रों में तेजी से पहुंचाने की क्षमता बढ़ सकती है।

    अरुणाचल प्रदेश में बुमला और मेचूका जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में सीमा पर गश्त और सैनिकों की गतिविधियों पर निगरानी महत्वपूर्ण है। जब दोनों देशों के जवान आमने-सामने आते हैं, तब प्रशिक्षित टीमें स्थिति को संभालने, रास्ता रोकने और भारतीय क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बनाए रखने में भूमिका निभा सकती हैं। ऐसी परिस्थितियों में त्वरित प्रतिक्रिया के साथ तनाव को अनावश्यक रूप से बढ़ने से रोकना भी महत्वपूर्ण होता है।

    सीमा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए ITBP आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल पर भी जोर दे रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, संगठन ड्रोन और ड्रोन रोधी प्रणालियों सहित तकनीकी संसाधनों पर निवेश बढ़ा रहा है। सीमा पर तैनात बटालियनों में ड्रोन प्लाटून शामिल किए जाने की व्यवस्था भी बताई गई है, जिनका संचालन प्रशिक्षित जवान करते हैं। ड्रोन के जरिए दुर्गम घाटियों और ऊंची चोटियों पर गतिविधियों की निगरानी की जा सकती है। इससे जमीन पर तैनात जवानों को परिस्थितियों की जानकारी मिलने और जरूरत के अनुसार कार्रवाई करने में सहायता मिलती है।

    इस तरह शौर्य कमांडो की विशेष ट्रेनिंग, बटालियन स्तर पर तैनाती और आधुनिक निगरानी तकनीक का इस्तेमाल LAC पर ITBP की तैयारियों का हिस्सा है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में सीमा की सुरक्षा करते हुए इन दस्तों की भूमिका त्वरित प्रतिक्रिया, सतर्कता और संवेदनशील परिस्थितियों के प्रबंधन से जुड़ी हुई है।

  • मोदी-जिनपिंग मुलाकात के बाद LAC पर चीन ने घटाई PLA की तैनाती, गलवान झड़प के बाद पहली बार डि-एस्केलेशन

    मोदी-जिनपिंग मुलाकात के बाद LAC पर चीन ने घटाई PLA की तैनाती, गलवान झड़प के बाद पहली बार डि-एस्केलेशन

    नई दिल्ली ।भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC पर लंबे समय से जारी सैन्य तनाव के बीच चीनी सेना की तैनाती में कमी सामने आई है। रक्षा मंत्रालय की 2025-26 की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2025 में उत्तरी सीमा के सामने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी यानी PLA की तैनाती में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। रिपोर्ट के अनुसार पूर्वी लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक भारतीय सेना की स्थिति मजबूत है और वह किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए तैयार है।

    रिपोर्ट में भारत और चीन के बीच राजनीतिक, कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर जारी संपर्क का सीमा की स्थिति पर सकारात्मक प्रभाव पड़ने की बात कही गई है। इसमें वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोआर्डिनेशन और भारत-चीन सीमा से संबंधित स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव वार्ता का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक इन प्रयासों से उत्तरी सीमा पर स्थिरता लाने में मदद मिली है।

    यह घटनाक्रम 2024 में दोनों देशों के बीच हुई डिसएंगेजमेंट प्रक्रिया के बाद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक चीन ने अब भारतीय पक्ष की डि-एस्केलेशन से जुड़ी शर्त को भी स्वीकार किया है। डि-एस्केलेशन के तहत सीमा पर तैनात सैनिकों की संख्या कम की जाती है। हालांकि सैनिकों को पूरी तरह पीछे स्थित बैरकों में भेजने की प्रक्रिया यानी डि-इंडक्शन अभी बाकी है। इसके बाद ही LAC पर 2020 की गलवान घाटी की झड़प से पहले जैसी स्थिति बहाल होने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकेगा।

    रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में बताया गया है कि चीन की कंबाइंड आर्म्स ब्रिगेड में करीब 14 से 15 हजार सैनिक हो सकते हैं। इसमें पैदल सेना के साथ मैकेनाइज्ड कॉलम, बख्तरबंद वाहन, तोपखाना, एयर डिफेंस सिस्टम और ड्रोन वॉरफेयर से जुड़ी इकाइयां शामिल होती हैं। रिपोर्ट में LAC पर चीन की करीब 10 कंबाइंड ब्रिगेड की तैनाती का उल्लेख किया गया है, जिससे वहां बड़ी संख्या में चीनी सैनिकों की मौजूदगी का संकेत मिलता है।

    हालांकि सीमा पर तैनाती में कमी के बावजूद भारत के लिए चिंता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। रिपोर्ट के अनुसार PLA के करीब डेढ़ लाख सैनिक भारतीय सीमा के करीब ट्रेनिंग क्षेत्रों में भी तैनात हैं। इन क्षेत्रों से सैनिकों को जरूरत पड़ने पर LAC की ओर तेजी से भेजा जा सकता है। इसी वजह से भारतीय सेना चीन से डि-इंडक्शन की प्रक्रिया आगे बढ़ाने पर जोर दे रही है।

    गलवान घाटी में 2020 की झड़प के समय अकेले पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में चीन के करीब एक लाख सैनिक तैनात बताए गए थे। इसके बाद पिछले छह वर्षों में 3488 किलोमीटर लंबी LAC पर चीन की सैन्य तैनाती में कमी आई है।

    इसी बीच अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबानसिरी क्षेत्र में पिछले एक महीने से भारत और चीन की सेनाओं के बीच फेस-ऑफ की स्थिति बनी हुई है। गतिरोध दूर करने के लिए दोनों देशों के बीच कोर कमांडर स्तर की दो बैठकें हो चुकी हैं, लेकिन क्षेत्र में तनाव अभी बरकरार है।

    रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सीमा पर स्थिरता के लिए जारी संवाद और उच्चस्तरीय संपर्क महत्वपूर्ण रहे हैं। भारत-चीन संबंधों में सैन्य स्तर की बातचीत के साथ राजनीतिक और कूटनीतिक संपर्कों को भी सीमा पर स्थिति सुधारने की प्रक्रिया का हिस्सा बताया गया है।

  • अरुणाचल प्रदेश में भारत-चीन कोर कमांडर वार्ता आज, वचा-दमाई में एलएसी तनाव घटाने पर होगी अहम चर्चा

    अरुणाचल प्रदेश में भारत-चीन कोर कमांडर वार्ता आज, वचा-दमाई में एलएसी तनाव घटाने पर होगी अहम चर्चा


    नई दिल्ली । 
    अरुणाचल प्रदेश में वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी पर हालिया तनाव के बीच भारत और चीन की सेनाओं के बीच आज 6 सितंबर को पहली बार कोर कमांडर स्तर की उच्चस्तरीय सैन्य वार्ता होने जा रही है। यह बैठक अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सुबनसिरी जिले के ताकसिंग क्षेत्र में स्थित वचा-दमाई बॉर्डर मीटिंग पॉइंट पर आयोजित की जाएगी। दोनों पक्षों के बीच होने वाली इस बातचीत को पूर्वी सेक्टर में सीमा प्रबंधन और तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    अब तक भारत और चीन के बीच कोर कमांडर स्तर की अधिकांश महत्वपूर्ण सैन्य वार्ताएं पूर्वी लद्दाख के चुशूल-मोल्दो बॉर्डर मीटिंग पॉइंट पर होती रही हैं। अरुणाचल प्रदेश में पहली बार इसी स्तर की बैठक होने से दोनों सेनाओं के बीच पूर्वी सेक्टर से जुड़े स्थानीय और परिचालन संबंधी मुद्दों पर सीधे संवाद का नया माध्यम स्थापित होगा।

    भारतीय पक्ष का नेतृत्व 3 कोर के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल गिरीश कालिया करेंगे। रंगापहार स्थित 3 कोर, जिसे स्पीयर कोर के नाम से भी जाना जाता है, अरुणाचल प्रदेश में एलएसी के कई संवेदनशील और दुर्गम इलाकों की सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालती है। राज्य में एलएसी की सुरक्षा के लिए तेजपुर स्थित 4 कोर और रंगापहार स्थित 3 कोर की महत्वपूर्ण भूमिका है।

    बैठक की पृष्ठभूमि में ऊपरी सुबनसिरी जिले के ताकसिंग क्षेत्र में हालिया तनाव और दोनों पक्षों के बीच उत्पन्न गतिरोध को प्रमुख वजह माना जा रहा है। भारत और चीन के बीच एलएसी की स्थिति को लेकर अलग-अलग धारणाएं हैं। कई स्थानों पर इन्हीं मतभेदों के कारण सैनिक आमने-सामने आ जाते हैं और स्थानीय स्तर पर तनाव की स्थिति बनती है।

    ऐसे में सैन्य कमांडरों की सीधी बातचीत का उद्देश्य जमीन पर पैदा होने वाली गलतफहमियों को रोकना और मौजूदा मतभेदों का बातचीत के माध्यम से समाधान तलाशना है। भारत की ओर से सीमा से जुड़े मामलों में स्पष्ट और दृढ़ रुख बनाए रखने के साथ सैन्य संपर्क के माध्यम से स्थिरता कायम करने पर जोर दिया जाता रहा है।

    अरुणाचल प्रदेश में होने वाली यह बैठक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की हालिया चीन यात्रा के बाद बने व्यापक कूटनीतिक माहौल में हो रही है। दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों के बीच सीमा प्रबंधन, शांति और सैन्य संपर्क को मजबूत करने को लेकर बातचीत हुई थी। इसी प्रक्रिया के तहत सीमा पर संवाद के अतिरिक्त तंत्र विकसित करने की दिशा में भी कदम उठाए गए हैं।

    भारत और चीन के संबंधों में वर्ष 2020 के गलवान संघर्ष के बाद एलएसी पर सैन्य तैयारियों को लेकर विशेष सतर्कता रही है। पूर्वी लद्दाख में लंबे समय तक चले गतिरोध के दौरान भारत ने सीमावर्ती क्षेत्रों में अपनी सैन्य मौजूदगी और परिचालन क्षमता को मजबूत किया। अब अरुणाचल सेक्टर में उच्चस्तरीय सैन्य संवाद शुरू होना सीमा प्रबंधन के दायरे के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है।

    भारतीय सेना ने अरुणाचल क्षेत्र में अपनी परिचालन तैयारियों की भी समीक्षा की है। 3 कोर मुख्यालय में वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की ओर से क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति, तैनाती और क्षमताओं को लेकर नियमित आकलन किया जाता रहा है। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों वाले इस क्षेत्र में सैन्य बुनियादी ढांचे और तैयारियों का महत्व भी काफी अधिक है।

    वचा-दमाई में होने वाली वार्ता से तत्काल किसी बड़े समाधान की अपेक्षा के बजाय दोनों सेनाओं के बीच संवाद को मजबूत करने, स्थानीय तनाव नियंत्रित करने और एलएसी पर स्थिरता बनाए रखने के प्रयासों को आगे बढ़ाने की उम्मीद है। पूर्वी सेक्टर में इस नए सैन्य संपर्क तंत्र से भविष्य में सीमा से जुड़े मुद्दों पर सीधे बातचीत का रास्ता और मजबूत हो सकता है।

  • अजीत डोभाल कल चीन जाएंगे, वांग यी के साथ LAC तनाव, सैनिक तैनाती और सीमा विवाद पर अहम बातचीत की संभावना

    अजीत डोभाल कल चीन जाएंगे, वांग यी के साथ LAC तनाव, सैनिक तैनाती और सीमा विवाद पर अहम बातचीत की संभावना

    नई दिल्ली । भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को लेकर कूटनीतिक स्तर पर एक बार फिर महत्वपूर्ण बातचीत होने जा रही है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल सोमवार को चीन की राजधानी बीजिंग का दौरा करेंगे। इस दौरान वह भारत-चीन सीमा प्रश्न पर विशेष प्रतिनिधियों की वार्ता में हिस्सा लेंगे। बैठक में चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ सीमा विवाद और दोनों देशों के संबंधों से जुड़े कई अहम मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है।

    डोभाल और वांग यी के बीच होने वाली बातचीत ऐसे समय में महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जब भारत और चीन के बीच लंबे समय से चले आ रहे सीमा तनाव को कम करने के प्रयास जारी हैं। दोनों देशों के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी पर शांति और स्थिरता बनाए रखना द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य करने की दिशा में प्रमुख मुद्दा रहा है।

    विशेष प्रतिनिधि स्तर की बातचीत में एलएसी की मौजूदा स्थिति, सैनिकों की तैनाती, सैन्य गतिविधियों में कमी, डिसएंगेजमेंट और सीमा प्रबंधन जैसे विषय प्रमुखता से उठ सकते हैं। दोनों पक्ष सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने के उपायों पर भी विचार कर सकते हैं।

    भारत और चीन के रिश्तों में जून 2020 की गलवान घाटी की हिंसक झड़प के बाद गंभीर तनाव पैदा हुआ था। इसके बाद पूर्वी लद्दाख में दोनों देशों ने बड़ी संख्या में सैनिक और सैन्य संसाधन तैनात किए थे। तनाव कम करने के लिए सैन्य और राजनयिक स्तर पर कई दौर की बातचीत हुई है।

    सीमा पर तनाव कम करने के साथ दोनों देशों के बीच व्यापक संबंधों को धीरे-धीरे सामान्य बनाने की कोशिश भी चलती रही है। भारत का लगातार रुख रहा है कि सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता के बिना द्विपक्षीय संबंधों में पूरी तरह सामान्य स्थिति बहाल करना मुश्किल होगा।

    विशेष प्रतिनिधि तंत्र की भूमिका केवल तत्काल सैन्य तनाव को संभालने तक सीमित नहीं है। यह भारत और चीन के बीच सीमा प्रश्न के व्यापक और दीर्घकालिक समाधान की संभावनाओं पर बातचीत का महत्वपूर्ण माध्यम भी है। ऐसे में डोभाल की यात्रा को सीमा विवाद के राजनीतिक और कूटनीतिक समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    वांग यी के साथ बातचीत में दोनों देशों के बीच आपसी विश्वास बढ़ाने और सीमा पर तनाव की पुनरावृत्ति रोकने के उपायों पर भी विचार हो सकता है। सीमा प्रबंधन से जुड़े मौजूदा तंत्र को अधिक प्रभावी बनाने तथा सैन्य गतिविधियों के कारण उत्पन्न होने वाली संभावित गलतफहमियों को रोकने पर चर्चा महत्वपूर्ण हो सकती है।

    डोभाल और वांग यी पहले भी भारत-चीन विशेष प्रतिनिधि वार्ता के माध्यम से सीमा से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर बातचीत करते रहे हैं। दोनों देशों के शीर्ष स्तर के अधिकारियों के बीच यह संवाद सीमा विवाद को कूटनीतिक माध्यम से संभालने की प्रक्रिया का हिस्सा है।

    भारत के लिए सीमा पर स्थायी शांति और सैनिकों की स्थिति से जुड़े मुद्दे महत्वपूर्ण हैं, जबकि चीन के साथ व्यापक द्विपक्षीय संबंधों को स्थिर रखने की जरूरत भी बनी हुई है। व्यापार, आर्थिक सहयोग और अन्य क्षेत्रों में संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए सीमा पर तनाव कम करना आवश्यक माना जाता है।

    अजीत डोभाल का बीजिंग दौरा इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है। वार्ता से तत्काल किसी बड़े समझौते की उम्मीद के बजाय सीमा पर स्थिरता, संवाद को निरंतर बनाए रखने और दोनों देशों के बीच भरोसा बढ़ाने की दिशा में प्रगति पर नजर रहेगी। विशेष प्रतिनिधियों की बैठक से निकलने वाले संकेत आने वाले समय में भारत-चीन संबंधों की दिशा के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

  • भारत-चीन सीमा वार्ता में LAC पर शांति के साथ नदी जल डेटा साझा करने और अपस्ट्रीम परियोजनाओं में पारदर्शिता पर जोर

    भारत-चीन सीमा वार्ता में LAC पर शांति के साथ नदी जल डेटा साझा करने और अपस्ट्रीम परियोजनाओं में पारदर्शिता पर जोर


    नई दिल्ली ।
    भारत और चीन के बीच सीमा मामलों को लेकर बातचीत का एक और महत्वपूर्ण दौर हुआ, जिसमें वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC की मौजूदा स्थिति, लंबित सीमा मुद्दों, सीमा प्रबंधन और दोनों देशों के बीच नदी सहयोग से जुड़े विषयों पर चर्चा की गई। बातचीत के दौरान भारत ने स्पष्ट किया कि सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता दोनों देशों के संबंधों को सामान्य दिशा में आगे बढ़ाने के लिए बेहद जरूरी है। इसके साथ ही भारत ने चीन की अपस्ट्रीम नदी परियोजनाओं से जुड़ी गतिविधियों में पारदर्शिता बढ़ाने और निचले बहाव वाले देशों के हितों का ध्यान रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।

    भारत की ओर से सीमा पार नदियों से जुड़े सहयोग को दोबारा सक्रिय करने का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। भारत ने 2006 में स्थापित एक्सपर्ट लेवल मैकेनिज्म ऑन ट्रांस-बॉर्डर रिवर्स की अगली बैठक जल्द आयोजित करने की जरूरत बताई। इस तंत्र के माध्यम से दोनों देशों के बीच सीमा पार बहने वाली नदियों से जुड़े तकनीकी और जल संसाधन संबंधी विषयों पर बातचीत होती रही है। भारत ने अपस्ट्रीम परियोजनाओं से संबंधित तकनीकी सूचनाओं को साझा करने को भी महत्वपूर्ण बताया है, ताकि नदियों के प्रवाह और संभावित प्रभावों को लेकर बेहतर समन्वय कायम किया जा सके।

    यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि चीन की ओर से बड़े बांध और जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर गतिविधियां बढ़ी हैं। भारत लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि ऊपरी बहाव में बनने वाली बड़ी जल परियोजनाओं का असर निचले बहाव वाले देशों के हितों पर नहीं पड़ना चाहिए। भारत ने चीन के समक्ष अपनी चिंताओं को रखते हुए कहा है कि अपस्ट्रीम गतिविधियों के संबंध में पर्याप्त पारदर्शिता और समय पर जानकारी साझा करना जरूरी है।

    हाइड्रोलॉजिकल डेटा यानी नदियों के जल प्रवाह और जल स्तर से संबंधित आंकड़ों को साझा करना भी दोनों देशों के बीच सहयोग का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। भारत का मानना है कि नियमित और विश्वसनीय आंकड़ों की उपलब्धता से बाढ़ जैसी परिस्थितियों से निपटने, जल संसाधन प्रबंधन बेहतर करने और सीमा पार नदियों से जुड़े संभावित जोखिमों को समझने में मदद मिल सकती है। इसी वजह से भारत ने सीमा पार नदी सहयोग को फिर से मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

    भारत-चीन सीमा मामलों पर बातचीत के लिए गठित वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोऑर्डिनेशन यानी WMCC की 36वीं बैठक में इन मुद्दों के साथ LAC से जुड़े लंबित विषयों पर भी विस्तार से चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने गलतफहमी और तनाव की स्थिति से बचने के लिए उपलब्ध कूटनीतिक और सैन्य माध्यमों का इस्तेमाल जारी रखने पर सहमति जताई। सीमा क्षेत्रों में स्थिरता बनाए रखना दोनों देशों के बीच व्यापक संबंधों में सुधार के लिए महत्वपूर्ण माना गया।

    बैठक में सीमा निर्धारण और बॉर्डर मैनेजमेंट से जुड़े विषयों पर भी चर्चा हुई। पिछले वर्ष हुई स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव स्तर की 24वीं वार्ता के परिणामों को आगे बढ़ाने पर दोनों पक्षों ने विचार किया। इसी प्रक्रिया के तहत सीमा निर्धारण से जुड़े कुछ मुद्दों पर शुरुआती प्रगति की संभावनाओं का अध्ययन करने के लिए WMCC के तहत विशेषज्ञ समूह गठित करने की दिशा में भी काम आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया है।

    भारत और चीन के बीच सीमा विवाद लंबे समय से दोनों देशों के संबंधों के लिए संवेदनशील मुद्दा रहा है। ऐसे में LAC पर शांति बनाए रखने के साथ नदी जल और सीमा पार सहयोग जैसे विषयों पर नियमित संवाद दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण है। ताजा बातचीत से संकेत मिलता है कि दोनों पक्ष विवादित मुद्दों के साथ-साथ व्यावहारिक सहयोग के क्षेत्रों में भी संवाद बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। आने वाले समय में सीमा वार्ता और नदी सहयोग से जुड़े तंत्र की अगली बैठकों से यह स्पष्ट होगा कि इन मुद्दों पर जमीनी स्तर पर कितना आगे बढ़ा जा सकता है।

  • भारत-चीन सीमा वार्ता में डिलिमिटेशन, सीमा प्रबंधन और ट्रांस-बॉर्डर सहयोग पर बातचीत, एलएसी पर शांति बनाए रखने पर जोर

    भारत-चीन सीमा वार्ता में डिलिमिटेशन, सीमा प्रबंधन और ट्रांस-बॉर्डर सहयोग पर बातचीत, एलएसी पर शांति बनाए रखने पर जोर

    नई दिल्ली । भारत और चीन ने सीमा मामलों पर परामर्श और समन्वय के लिए कार्य तंत्र यानी डब्ल्यूएमसीसी की 36वीं बैठक में सीमा से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की। नई दिल्ली में 6 अगस्त को आयोजित बैठक में दोनों देशों ने सीमा निर्धारण, सीमा प्रबंधन, मौजूदा तंत्र को मजबूत करने और सीमा पार सहयोग से जुड़े विषयों पर विचार साझा किए। वार्ता के दौरान लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी एलएसी पर मौजूदा स्थिति की भी समीक्षा की गई।

    बैठक में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव सुजीत घोष ने किया, जबकि चीनी प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई चीन के विदेश मंत्रालय के बाउंड्री और ओशनिक अफेयर्स डिपार्टमेंट की महानिदेशक होउ यांकी ने की। दोनों पक्षों के बीच बातचीत को स्पष्ट और व्यावहारिक बताया गया। चर्चा का मुख्य उद्देश्य सीमा क्षेत्रों में स्थिरता बनाए रखने और लंबित मुद्दों के समाधान के लिए संवाद को आगे बढ़ाना रहा।

    भारत और चीन ने इस बात पर जोर दिया कि सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और स्थिरता दोनों देशों के व्यापक द्विपक्षीय संबंधों के विकास के लिए महत्वपूर्ण है। एलएसी पर किसी भी तरह की गलतफहमी या गलत आकलन को रोकने के लिए दोनों पक्षों ने मौजूदा राजनयिक और सैन्य माध्यमों का इस्तेमाल जारी रखने पर सहमति जताई।

    इन माध्यमों में डब्ल्यूएमसीसी के अलावा स्थानीय कमांडर स्तर की बैठकें और पहले से निर्धारित अन्य संवाद तंत्र शामिल हैं। दोनों देशों का मानना है कि नियमित बातचीत के जरिए सीमा पर पैदा होने वाली परिस्थितियों को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है और लंबित मामलों के समाधान की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।

    बैठक में 24वें विशेष प्रतिनिधि स्तर के दौर की वार्ता के परिणामों के बाद सीमा से जुड़े विषयों पर आगे चर्चा की गई। इसमें सीमा निर्धारण, सीमा प्रबंधन, संस्थागत तंत्र के निर्माण और सीमा पार सहयोग जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। दोनों पक्षों ने इन क्षेत्रों में आपसी संवाद और समन्वय बनाए रखने की जरूरत पर सहमति जताई।

    भारत ने सीमा पार नदियों से संबंधित विशेषज्ञ स्तर के तंत्र की अगली बैठक जल्द आयोजित करने की आवश्यकता भी दोहराई। भारतीय पक्ष ने विशेष रूप से चीन की ओर से ऊपरी क्षेत्रों में प्रस्तावित या संचालित परियोजनाओं से जुड़े तकनीकी विवरण साझा करने के महत्व पर जोर दिया। सीमा पार नदियों से जुड़े विषय भारत के लिए रणनीतिक और पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

    भारत और चीन के संबंधों में हाल के समय में लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने से जुड़े कुछ कदम भी उठाए गए हैं। इनमें कैलाश मानसरोवर यात्रा की दोबारा शुरुआत और दोनों देशों के बीच नागरिक विमानन संपर्क बहाल करना शामिल है। इन कदमों को दोनों देशों के बीच जनस्तरीय संपर्क सुधारने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    विदेश मंत्रालय ने भी भारत-चीन संबंधों में सकारात्मक प्रगति की उम्मीद जताई है। मंत्रालय के अनुसार दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है और संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए लोगों के बीच संपर्क बेहतर करने वाले कदम उठाए जा रहे हैं। भारत का मानना है कि इस तरह के प्रयासों से द्विपक्षीय संबंधों में सकारात्मक माहौल मजबूत हो सकता है।

    इस बीच चीन के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भारतीयों और भारतीय संस्कृति के खिलाफ आपत्तिजनक सामग्री बढ़ने को लेकर भी भारतीय समुदाय की चिंताएं सामने आई हैं। बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास के एक खुले संवाद कार्यक्रम में समुदाय के सदस्यों ने यह मुद्दा उठाया था। सीमा संबंधी बातचीत के साथ लोगों के बीच संपर्क और आपसी विश्वास मजबूत करना भी भारत-चीन संबंधों के लिए महत्वपूर्ण बना हुआ है।