Tag: language

  • तमिलनाडु दिवस पर सीएम विजय की अपील, तमिल भाषा और सांस्कृतिक विरासत बचाने के लिए दिया खास संदेश..

    तमिलनाडु दिवस पर सीएम विजय की अपील, तमिल भाषा और सांस्कृतिक विरासत बचाने के लिए दिया खास संदेश..

    नई दिल्ली ।चेन्नई। तमिलनाडु दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री विजय ने राज्य के नागरिकों से तमिल भाषा की रक्षा करने और अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने की अपील की। रविवार, 1 नवंबर को जारी अपने संदेश में उन्होंने तमिलनाडु की ऐतिहासिक पहचान, मातृभाषा के महत्व और राज्य के गठन के लिए हुए संघर्षों को याद किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि तमिल भाषा और संस्कृति का संरक्षण समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने लोगों से अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक गौरव को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का आग्रह किया।

    मुख्यमंत्री विजय ने अपने संदेश में उन लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित की, जिन्होंने तमिल भाषा की रक्षा और तमिल भाषी क्षेत्रों को एक राज्य के अंतर्गत लाने के लिए संघर्ष किया था। उन्होंने कहा कि इन लोगों के प्रयास और बलिदान तमिल समाज की एकता तथा साझा पहचान के लिए हमेशा प्रेरणा बने रहेंगे। उनके संघर्षों ने तमिलनाडु के गठन और उसकी विशिष्ट पहचान को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    उन्होंने तमिलनाडु दिवस को केवल राज्य स्थापना की वर्षगांठ तक सीमित नहीं बताया, बल्कि इसे राज्य के इतिहास, भाषा और सांस्कृतिक विरासत को याद करने का अवसर भी माना। मुख्यमंत्री के अनुसार, यह दिन उन ऐतिहासिक प्रयासों को सम्मान देने का मौका है, जिनके माध्यम से तमिल भाषी लोगों की पहचान को एकजुट स्वरूप मिला।

    विजय ने नागरिकों से तमिल थाई यानी मातृ तमिल भाषा के प्रति सम्मान बनाए रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि भाषा किसी भी समाज के इतिहास, संस्कृति और सामूहिक पहचान से गहराई से जुड़ी होती है। इसलिए तमिल भाषा की रक्षा करना अपनी सांस्कृतिक परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत को सुरक्षित रखने के समान है। उन्होंने लोगों से भाषा से जुड़ी परंपराओं को निरंतर आगे बढ़ाने का आग्रह किया।

    मुख्यमंत्री ने उन शहीदों और संघर्षकर्ताओं के योगदान को भी याद किया, जिन्होंने तमिल भाषी क्षेत्रों को एकजुट करने तथा मातृभाषा के सम्मान के लिए प्रयास किए। उन्होंने कहा कि उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों को अपनी भाषाई और सांस्कृतिक पहचान के प्रति जागरूक करता रहेगा। ऐसे ऐतिहासिक प्रयासों को याद रखना समाज में एकता और अपनत्व की भावना को मजबूत करने के लिए जरूरी है।

    तमिलनाडु दिवस का संबंध राज्यों के भाषाई आधार पर पुनर्गठन और राज्य के गठन की ऐतिहासिक प्रक्रिया से है। हर साल 1 नवंबर को यह दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर राज्य के गठन में योगदान देने वाले लोगों और उन संघर्षों को याद किया जाता है, जिन्होंने तमिल भाषी क्षेत्रों को एक अलग पहचान दिलाने में भूमिका निभाई।

    मुख्यमंत्री विजय ने अपने शुभकामना संदेश में इस ऐतिहासिक अवसर को तमिलनाडु की विशिष्ट पहचान और गौरव से जोड़ते हुए नागरिकों से अपनी विरासत के प्रति प्रतिबद्ध रहने का आह्वान किया। उन्होंने भाषा, संस्कृति और इतिहास के संरक्षण को राज्य की पहचान बनाए रखने का महत्वपूर्ण आधार बताया। उनका संदेश तमिलनाडु दिवस के ऐतिहासिक महत्व के साथ मातृभाषा और सांस्कृतिक परंपराओं को सम्मान देने पर केंद्रित रहा।

  • इटली: मेलोनी सरकार ने स्कूलों के लिए बदले नियम… भाषा की सीमा तय, नकाब पर भी रोक

    इटली: मेलोनी सरकार ने स्कूलों के लिए बदले नियम… भाषा की सीमा तय, नकाब पर भी रोक


    रोम।
    इटली (Italy) में स्कूलों (Schools) को लेकर प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी (Prime Minister Giorgia Meloni) की सरकार ने बड़ा फैसला लिया है. सरकार ने स्कूलों (Schools) में इटैलियन भाषा (Italian language) की कम जानकारी रखने वाले बच्चों की संख्या पर एक सीमा तय कर दी है. इसके साथ ही स्कूलों में नकाब पर भी रोक लगाने का फैसला लिया गया है।

    फैसले के पक्ष में मेलोनी प्रशासन का कहना है कि इन नियमों से छात्रों में इटैलियन भाषा को सीखने और स्कूलों में एकीकरण को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी. लेकिन विपक्ष के साथ ही कुछ शिक्षक संगठनों और यूनियनों ने इस फैसले पर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि इस फैसले से छात्रों और उनके परिवारों पर असर पड़ सकता है।

    सरकार के नए प्लान के मुताबिक किसी भी क्लास में इटैलियन भाषा पर कम पकड़ वाले बच्चों की संख्या 30 फीसदी होगी. इस फैसले में खास बात यह है कि बच्चों की सीमा नागरिकता के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी भाषा की क्षमता के आधार पर तय की जाएगी। यानी अगर किसी दूसरे यूरोपीय संघ के देश का छात्र भी इटैलियन भाषा अच्छी तरह नहीं बोलता, तो वह भी इस नियम के दायरे में आएगा. सरकार का तर्क है कि इससे स्कूलों में ऐसी क्लासेज कम होंगी, जहां ज्यादातर बच्चों को भाषा समझने में दिक्कत हो।


    स्कूलों में चेहरा ढकने पर भी रोक

    इन्हीं नियमों में स्कूलों में ऐसे इस्लामिक पहनावे पर भी रोक लगाने का फैसला किया गया है, जिससे चेहरा पूरी तरह ढक जाता हो. नियम का हवाला देते हुए सरकार का कहना है कि इससे स्कूलों में कम्यूनिकेशन और एकीकरण को बढ़ावा मिलेगा. मेलोनी ने इन फैसलों को सोशल मीडिया पर “कॉमन सेंस” वाले उपाय बताए. उनके मुताबिक इनका मकसद छात्रों को अलग-अलग समूहों में बांटना नहीं, बल्कि सभी को समान अवसर देना है।


    विपक्ष ने नियमों पर उठाए सवाल

    सरकार के फैसले का विरोध भी शुरू हो गया है. आलोचकों का कहना है कि 30 फीसदी की सीमा के चलते कुछ छात्रों को अपने घर के आसपास के स्कूल के बजाय दूसरे इलाके के स्कूल में जाना पड़ सकता है. विपक्षी दलों और कुछ शिक्षकों ने यह भी आरोप लगाया है कि सरकार इमिग्रेशन के मुद्दे को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला रही है।

    सरकार का डिक्री तुरंत लागू हो गया है, लेकिन इसे 60 दिनों के भीतर संसद की मंजूरी लेनी होगी. संसद में मेलोनी के गठबंधन के पास बहुमत है. ऐसे में आने वाले दिनों में इटली की इमिग्रेशन और पहचान पर भी इस फैसले का असर दिख सकता है।

  • कंगना रनौत की टिप्पणी के बाद बढ़ी बहस, आशुतोष राणा ने सार्वजनिक जीवन में संयमित भाषा पर दिया जोर

    कंगना रनौत की टिप्पणी के बाद बढ़ी बहस, आशुतोष राणा ने सार्वजनिक जीवन में संयमित भाषा पर दिया जोर

    नई दिल्ली । अभिनेत्री और सांसद कंगना रनौत की जेन-जी को लेकर की गई टिप्पणी के बाद शुरू हुई बहस लगातार तेज होती जा रही है। सोशल मीडिया से लेकर सार्वजनिक मंचों तक इस मुद्दे पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। इसी बीच अभिनेता आशुतोष राणा ने भाषा की गरिमा, संवाद की मर्यादा और सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदार अभिव्यक्ति को लेकर अपनी राय साझा की है। उनके बयान को विवाद से इतर संतुलित और विचारशील दृष्टिकोण के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें उन्होंने किसी व्यक्ति विशेष पर टिप्पणी करने के बजाय भाषा के महत्व पर जोर दिया।

    हाल के दिनों में छात्र विरोध प्रदर्शनों के संदर्भ में कंगना रनौत की जेन-जी से जुड़ी टिप्पणी चर्चा का विषय बनी हुई है। बयान सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इसे लेकर व्यापक बहस छिड़ गई। एक वर्ग ने उनकी भाषा और अभिव्यक्ति पर सवाल उठाए, जबकि कुछ लोगों ने उनके विचारों का समर्थन किया। देखते ही देखते यह मुद्दा मनोरंजन जगत से निकलकर सामाजिक और राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बन गया।

    इसी क्रम में पटना प्रवास के दौरान मीडिया से बातचीत में आशुतोष राणा ने सार्वजनिक जीवन में शब्दों की भूमिका पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति का व्यक्तित्व केवल उसके कार्यों से नहीं, बल्कि उसकी भाषा और व्यवहार से भी पहचाना जाता है। उनके अनुसार शब्द व्यक्ति के संस्कार, सोच और दृष्टिकोण का परिचय देते हैं, इसलिए बोलते समय संयम और संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।

    आशुतोष राणा ने कहा कि भाषा केवल विचार व्यक्त करने का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह समाज में सम्मान और विश्वास का आधार भी बनती है। उन्होंने कहा कि एक ही शब्द किसी संबंध को मजबूत भी कर सकता है और अनावश्यक विवाद का कारण भी बन सकता है। इसलिए सार्वजनिक मंचों पर बोलने वाले लोगों को अपने शब्दों के प्रभाव और सामाजिक जिम्मेदारी का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

    इस विवाद पर मनोरंजन जगत के अन्य कलाकारों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। अभिनेता सोनू सूद ने भी हाल ही में सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों को सोच-समझकर अपनी बात रखने की सलाह दी थी। उनका कहना था कि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों के बयान समाज के बड़े वर्ग को प्रभावित करते हैं, इसलिए संवाद में संतुलन और संवेदनशीलता बनाए रखना जरूरी है।

    दूसरी ओर कंगना रनौत ने अपने बयान का बचाव करते हुए सोशल मीडिया पर कई पोस्ट साझा किए। उन्होंने छात्र आंदोलन और वायरल वीडियो से जुड़े संदर्भों का उल्लेख करते हुए अपने विचार दोहराए। साथ ही उन्होंने सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों पर भी अपनी राय रखी, जिसके बाद यह बहस और अधिक व्यापक हो गई। उनके समर्थक और आलोचक लगातार अपने-अपने पक्ष में तर्क प्रस्तुत कर रहे हैं।

    पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सार्वजनिक जिम्मेदारी और भाषा की मर्यादा जैसे विषयों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन असहमति व्यक्त करते समय संवाद की गरिमा बनाए रखना उतना ही महत्वपूर्ण है। फिलहाल यह मुद्दा सोशल मीडिया, राजनीतिक विमर्श और मनोरंजन जगत में चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है तथा आने वाले दिनों में भी इस पर प्रतिक्रियाओं का सिलसिला जारी रहने की संभावना है।

  • West-Bangal: SIR प्रक्रिया को गति देने के लिए 150 बाहरी जजों की तैनाती… लेकिन भाषा बनी बड़ी चुनौती

    West-Bangal: SIR प्रक्रिया को गति देने के लिए 150 बाहरी जजों की तैनाती… लेकिन भाषा बनी बड़ी चुनौती


    कोलकाता।
    प. बंगाल (West-Bangal) में एसआईआर प्रक्रिया (SIR Process) को रफ्तार देने के लिए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के निर्देश पर दूसरे राज्यों से 150 से अधिक न्यायाधीशों की तैनाती की गई है। जमीनी स्तर पर इन बाहरी जजों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है बांग्ला भाषा को समझना। कलकत्ता हाईकोर्ट (Calcutta High Court) के पूर्व न्यायाधीशों को भी इस प्रक्रिया में जोड़ा गया है। ये सभी दावों-आपत्तियों के निपटारे, दस्तावेजों के सत्यापन और अंतिम निर्णय की प्रक्रिया में लगे हैं।

    इतनी बड़ी न्यायिक तैनाती के बावजूद कामकाज में सबसे बड़ी अड़चन भाषा बन रही है। एसआईआर के तहत आने वाले अधिकांश फॉर्म, दस्तावेज व गवाहों के बयान बांग्ला में हैं, जिन्हें दूसरे राज्यों से आए न्यायिक अधिकारी सीधे तौर पर समझ नहीं पा रहे हैं। बाहरी राज्य से आए एक न्यायाधीश ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा कि रोज सैकड़ों फाइलें देखनी होती हैं, जो बांग्ला में हैं। ऐसे में हर केस को समझने के लिए अनुवाद पर निर्भर रहना पड़ रहा है। सूत्रों के अनुसार, काम प्रभावित न हो, इसके लिए कई न्यायाधीशों को ट्रांसलेटर खुद रखने पड़ रहे हैं।


    फाइलें निपटाने में देरी संभव

    न्यायाधीशों के सामने भाषा की चुनौती का सीधा असर प्रक्रिया पर पड़ सकता है। बांग्ला न समझ पाने के कारण फाइलों के अनुवाद पर निर्भरता बढ़ रही है, जिससे मामलों के निपटारे में देरी संभव है। चुनाव आयोग के अनुसार, पहली सप्लीमेंट्री वोटर लिस्ट सोमवार को जारी होगी। इसमें उन वोटरों के नाम शामिल होंगे, जिनके दावे सही पाए गए हैं। फिर अपील और ट्रिब्यूनल प्रक्रिया से अंतिम सूची तैयार होगी।


    एसआईआर की यह स्थिति

    कुल दावे-आपत्तियां : 60 लाख से अधिक, 27 लाख मामले अब तक निपटाए गए।
    हटाए गए नाम : करीब 63 लाख से ज्यादा, 30 लाख मामले पुनर्विचार/विचाराधीन…बड़े पैमाने पर जोड़-घटाव जारी है।