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  • शांतिपूर्ण प्रदर्शन संवैधानिक अधिकार, केवल विरोध के आधार पर लाठीचार्ज उचित नहीं: सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

    शांतिपूर्ण प्रदर्शन संवैधानिक अधिकार, केवल विरोध के आधार पर लाठीचार्ज उचित नहीं: सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

    नई दिल्ली । नीट पेपर लीक से जुड़े विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी नागरिक को शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है और केवल प्रदर्शन होने के आधार पर लाठीचार्ज जैसी कार्रवाई को उचित नहीं माना जा सकता। अदालत ने संकेत दिए हैं कि ऐसे मामलों के लिए पूरे देश में लागू होने वाली एक समान गाइडलाइन तैयार करने की आवश्यकता है।

    मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यह विवाद केवल किसी एक स्थान या एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर में विरोध प्रदर्शनों के दौरान अपनाई जाने वाली कार्यप्रणाली से जुड़ा व्यापक मुद्दा है। अदालत ने कहा कि विभिन्न राज्यों में दर्ज याचिकाओं और संबंधित मामलों पर एक साथ विचार किया जाएगा ताकि एक समान कानूनी दृष्टिकोण विकसित किया जा सके। इस संबंध में विस्तृत सुनवाई मंगलवार को निर्धारित की गई है।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि विरोध-प्रदर्शन लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और इन्हें संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। इसलिए प्रशासन और पुलिस की कार्रवाई भी लोकतांत्रिक मूल्यों तथा कानून के दायरे में रहनी चाहिए। अदालत का मानना है कि ऐसी परिस्थितियों में स्पष्ट और एकरूप प्रोटोकॉल होने से पुलिस, प्रशासन और नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखने में सहायता मिलेगी।

    पीठ ने यह भी कहा कि प्रदर्शन के दौरान यदि असामाजिक तत्व भीड़ में शामिल हो जाते हैं, तो उस स्थिति से निपटने के लिए अलग और प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए। अदालत ने संकेत दिया कि भविष्य में बनने वाली संभावित गाइडलाइन में ऐसे मामलों के लिए भी स्पष्ट दिशा-निर्देश शामिल किए जा सकते हैं, ताकि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों और कानून व्यवस्था बिगाड़ने वाले तत्वों के बीच अंतर किया जा सके।

    सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने पुलिस व्यवस्था से जुड़े एक महत्वपूर्ण पहलू पर भी सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि बड़ी भीड़ को नियंत्रित करने के दौरान पुलिसकर्मियों को पर्याप्त सुरक्षा उपकरण और संसाधन क्यों उपलब्ध नहीं कराए जाते। अदालत ने माना कि कानून व्यवस्था बनाए रखने वाले कर्मियों की सुरक्षा भी उतनी ही आवश्यक है, जितनी प्रदर्शनकारियों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना।

    सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रदर्शन के दौरान यदि किसी भी पक्ष की ओर से अत्यधिक बल प्रयोग, हिंसा या अन्य प्रकार की ज्यादती के आरोप सामने आते हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायसंगत प्रक्रिया तभी सुनिश्चित हो सकती है, जब पुलिस और प्रदर्शनकारियों दोनों के आचरण की निष्पक्ष समीक्षा की जाए और तथ्यों के आधार पर आवश्यक कार्रवाई की जाए।

    शीर्ष अदालत की इन टिप्पणियों को प्रदर्शन संबंधी मामलों में भविष्य की न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि राष्ट्रीय स्तर पर एक समान दिशा-निर्देश तैयार किए जाते हैं, तो इससे शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार, कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी और पुलिस की कार्रवाई के मानकों के बीच बेहतर संतुलन स्थापित करने में मदद मिल सकती है। मामले की अगली सुनवाई में अदालत इस विषय पर विस्तृत विचार करेगी।

  • CJP प्रदर्शन के बाद तेज हुई राजनीतिक हलचल, घायल छात्रों से मिलने अस्पताल पहुंचे जेपी नड्डा, राहुल गांधी ने भी जाना हाल

    CJP प्रदर्शन के बाद तेज हुई राजनीतिक हलचल, घायल छात्रों से मिलने अस्पताल पहुंचे जेपी नड्डा, राहुल गांधी ने भी जाना हाल


    नई दिल्ली ।
    CJP के संसद मार्च के दौरान हुई झड़प और पुलिस कार्रवाई के बाद राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। प्रदर्शन के दौरान घायल हुए छात्रों से मिलने केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा मंगलवार को दिल्ली स्थित राम मनोहर लोहिया अस्पताल पहुंचे। उन्होंने अस्पताल में भर्ती छात्रों का हालचाल जाना और उनके उपचार में लगे चिकित्सकों से भी बातचीत की। इससे पहले प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधियों से मुलाकात कर उनकी मांगों पर चर्चा की जा चुकी थी। इसी बीच लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी अस्पताल पहुंचकर घायल छात्रों से मुलाकात की और उनका हाल जाना।

    संसद मार्च के दौरान बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़ रहे थे। पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बल प्रयोग किया। इस दौरान लाठीचार्ज और आंसू गैस के इस्तेमाल की घटनाएं सामने आईं, जिसमें कई प्रदर्शनकारी घायल हुए। पुलिस के अनुसार झड़प के दौरान कई पुलिसकर्मियों को भी चोटें आईं। घटनास्थल के आसपास कुछ स्थानों पर तोड़फोड़ की भी सूचना मिली, जिसके बाद सुरक्षा व्यवस्था और सख्त कर दी गई।

    घटना के बाद राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं लगातार सामने आ रही हैं। कांग्रेस ने प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठाए हैं। पार्टी का कहना है कि युवाओं की मांगों को सुनने के बजाय उन पर बल प्रयोग किया गया, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी इस मुद्दे को लेकर सरकार से जवाब मांगा और कहा कि ऐसे मामलों पर संसद में विस्तृत चर्चा होनी चाहिए।

    दूसरी ओर सरकार की ओर से प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधियों से बातचीत की पहल की गई है। केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधियों से मुलाकात कर उनकी मांगों को सुना था। इसके बाद अस्पताल पहुंचकर घायल छात्रों से मुलाकात को सरकार की ओर से संवाद और स्थिति की समीक्षा के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि विपक्ष का कहना है कि यह कदम घटना के बाद उठाया गया, जबकि शुरुआत में सरकार की प्रतिक्रिया पर्याप्त नहीं थी।

    इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी परीक्षा से जुड़े विवादों और अनियमितताओं के मामलों में दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का भरोसा जताया है। सरकार का कहना है कि युवाओं के हितों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और किसी भी प्रकार की गड़बड़ी करने वालों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। वहीं विपक्ष लगातार इस पूरे घटनाक्रम को लेकर सरकार की जवाबदेही तय करने की मांग कर रहा है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसद मार्च के बाद उत्पन्न स्थिति ने एक बार फिर छात्र आंदोलनों, लोकतांत्रिक विरोध और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता को रेखांकित किया है। सरकार और विपक्ष दोनों इस मुद्दे पर अपने-अपने पक्ष को मजबूती से रख रहे हैं, जबकि घायल प्रदर्शनकारियों के उपचार और पूरे घटनाक्रम की जांच भी जारी है। आने वाले दिनों में इस विषय पर संसद और राजनीतिक मंचों पर चर्चा और तेज होने की संभावना है।

  • संसद मार्च पर बवाल के बीच सरकार की सक्रियता तेज, आरएमएल अस्पताल पहुंचे जेपी नड्डा, लाठीचार्ज को लेकर विपक्ष ने घेरा

    संसद मार्च पर बवाल के बीच सरकार की सक्रियता तेज, आरएमएल अस्पताल पहुंचे जेपी नड्डा, लाठीचार्ज को लेकर विपक्ष ने घेरा

    नई दिल्ली । संसद मार्च के दौरान हुई झड़प और उसके बाद उपजे राजनीतिक विवाद के बीच केंद्र सरकार ने स्थिति पर सक्रियता बढ़ा दी है। केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने राजधानी स्थित डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल पहुंचकर उन प्रदर्शनकारियों और पुलिसकर्मियों का हालचाल जाना, जो प्रदर्शन के दौरान घायल हुए थे। उन्होंने अस्पताल में भर्ती लोगों से बातचीत कर उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली और उपचार कर रहे चिकित्सकों से भी पूरे घटनाक्रम तथा इलाज की स्थिति पर विस्तार से चर्चा की। इस मुलाकात को ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जब संसद मार्च को लेकर राजनीतिक माहौल लगातार गर्म बना हुआ है।

    संसद की ओर निकाले गए मार्च के दौरान बड़ी संख्या में युवा राजधानी की सड़कों पर पहुंचे थे। प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोकने का प्रयास किया। इसी दौरान हालात तनावपूर्ण हो गए और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज तथा आंसू गैस का सहारा लेना पड़ा। इस कार्रवाई में कई प्रदर्शनकारी घायल हुए, वहीं ड्यूटी पर तैनात कई पुलिसकर्मियों को भी चोटें आईं। झड़प के दौरान कुछ स्थानों पर तोड़फोड़ की घटनाएं भी सामने आईं, जिससे राजधानी के प्रमुख इलाकों में कुछ समय के लिए सामान्य जनजीवन प्रभावित हुआ।

    घटनाक्रम के बाद सरकार की ओर से लगातार संवाद स्थापित करने की कोशिशें भी देखने को मिलीं। जेपी नड्डा ने अस्पताल पहुंचने से पहले संगठन के प्रतिनिधियों से मुलाकात कर उनकी मांगों और शिकायतों को भी सुना था। इसके बाद घायलों से सीधे मिलना सरकार की ओर से संवेदनशीलता दिखाने की पहल माना जा रहा है। अस्पताल में उन्होंने चिकित्सकों से यह सुनिश्चित करने को कहा कि सभी घायलों को आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं समय पर उपलब्ध कराई जाएं और उनके उपचार में किसी प्रकार की कमी न रहे।

    इस पूरे घटनाक्रम को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। विपक्ष ने प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा किया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि इस विषय पर संसद में चर्चा होनी चाहिए थी और सरकार को पूरे मामले पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए। उनका आरोप है कि प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर बल प्रयोग उचित नहीं था और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने वालों की आवाज दबाने का प्रयास किया गया। विपक्ष ने यह भी कहा कि यदि संसद में ऐसे मुद्दों पर चर्चा नहीं होगी तो लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर होगा।

    वहीं सरकार की ओर से कानून-व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि भीड़ को नियंत्रित करना आवश्यक था ताकि किसी बड़े नुकसान से बचा जा सके। प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान और सुरक्षा व्यवस्था पर पड़े प्रभाव की भी समीक्षा की जा रही है। राजधानी में सुरक्षा एजेंसियां पूरे घटनाक्रम का आकलन कर रही हैं और भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए आवश्यक कदमों पर भी विचार किया जा रहा है।

    संसद मार्च के बाद शुरू हुआ यह विवाद अब केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह गया है, बल्कि राजनीतिक बहस का भी प्रमुख विषय बन चुका है। एक ओर सरकार घायलों के उपचार और संवाद के जरिए स्थिति सामान्य करने की कोशिश कर रही है, वहीं विपक्ष इस मुद्दे को संसद और जनता के बीच उठाकर जवाबदेही की मांग कर रहा है। आने वाले दिनों में इस मामले को लेकर राजनीतिक गतिविधियां और तेज होने की संभावना है।

  • संसद मार्च के दौरान प्रदर्शन पर बवाल, लाठीचार्ज के बाद सरकार पर बरसे शशि थरूर, विपक्ष ने संसद में चर्चा की उठाई मांग

    संसद मार्च के दौरान प्रदर्शन पर बवाल, लाठीचार्ज के बाद सरकार पर बरसे शशि थरूर, विपक्ष ने संसद में चर्चा की उठाई मांग


    नई दिल्ली ।
    संसद के मानसून सत्र के पहले दिन राजधानी में हुए प्रदर्शन और उसके दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर राजनीतिक माहौल गर्म हो गया। जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों को रोकने के दौरान हुई झड़प और पुलिस द्वारा भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बल प्रयोग किए जाने के बाद विपक्ष ने केंद्र सरकार पर तीखे सवाल उठाए। इस घटनाक्रम को लेकर संसद के भीतर और बाहर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है।

    प्रदर्शनकारियों ने अपनी विभिन्न मांगों को लेकर संसद की ओर मार्च करने का प्रयास किया। सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए पुलिस ने उन्हें आगे बढ़ने से रोका। इस दौरान स्थिति तनावपूर्ण हो गई और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज तथा आंसू गैस का इस्तेमाल किया। घटना के बाद कई प्रदर्शनकारी मौके से हट गए, जबकि पूरे घटनाक्रम को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का सिलसिला शुरू हो गया।

    कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इस कार्रवाई पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध प्रदर्शन करने वालों की बात सुनी जानी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि सरकार के पास पर्याप्त बहुमत है तो फिर चर्चा से परहेज क्यों किया जा रहा है। थरूर ने कहा कि संसद का उद्देश्य जनहित के मुद्दों पर विचार-विमर्श करना है और लोकतांत्रिक संस्थाओं का महत्व संवाद से ही मजबूत होता है। उन्होंने प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए शांतिपूर्ण तरीके से समाधान निकालने की आवश्यकता पर बल दिया।

    कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी इस घटनाक्रम पर सरकार की आलोचना की। उन्होंने कहा कि छात्रों और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर सरकार को अधिक संवेदनशील रवैया अपनाना चाहिए। उनका कहना था कि यदि परीक्षा व्यवस्था और उससे जुड़े मामलों में लगातार विवाद सामने आ रहे हैं तो सरकार को इसकी जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए। उन्होंने प्रदर्शनकारियों पर हुई कार्रवाई को लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत बताते हुए इस पूरे मामले पर जवाबदेही तय करने की मांग की।

    इधर, संसद के मानसून सत्र के दौरान भी विपक्ष ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। विपक्षी दलों ने शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा संबंधी विवादों और युवाओं से जुड़े विषयों पर विस्तृत चर्चा कराने की मांग दोहराई। उनका कहना है कि ऐसे विषय सीधे लाखों छात्रों और उनके भविष्य से जुड़े हैं, इसलिए सरकार को इन पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए।

    इस बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की। मुलाकात को लेकर विभिन्न तरह की राजनीतिक चर्चाएं शुरू हुईं, हालांकि आधिकारिक तौर पर बैठक के एजेंडे या किसी संभावित निर्णय की जानकारी सामने नहीं आई। वहीं, प्रदर्शन से जुड़े कुछ प्रमुख प्रतिनिधियों ने अपने आंदोलन की आगामी रणनीति पर भी विचार किया। आंदोलन से जुड़े अभिजीत दीपके ने अपनी भूख हड़ताल समाप्त करने की घोषणा की, जबकि पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने भी अपनी ओर से आंदोलन को लेकर आगे की रूपरेखा साझा की और सरकार के सामने रखी गई मांगों का उल्लेख किया।

    संसद सत्र के साथ ही यह मुद्दा अब राजनीतिक बहस का प्रमुख विषय बन गया है। आने वाले दिनों में संसद के भीतर इस पर तीखी चर्चा होने की संभावना जताई जा रही है। विपक्ष सरकार से इस पूरे घटनाक्रम पर विस्तृत जवाब और संबंधित मुद्दों पर चर्चा की मांग कर रहा है, जबकि सरकार की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है।

  • मेरठ लाठीचार्ज मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सख्ती, यूपी के डीजीपी और गृह विभाग से तलब की विस्तृत रिपोर्ट

    मेरठ लाठीचार्ज मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सख्ती, यूपी के डीजीपी और गृह विभाग से तलब की विस्तृत रिपोर्ट

    नई दिल्ली । मेरठ में एक प्रदर्शन के दौरान हुई कथित पुलिस लाठीचार्ज की घटना पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। आयोग ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और प्रमुख सचिव (गृह) को नोटिस जारी कर घटना से जुड़े सभी तथ्यों, पुलिस कार्रवाई की परिस्थितियों और घायलों को उपलब्ध कराई गई सहायता की जानकारी निर्धारित समय में प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। इस कार्रवाई के बाद मामला प्रशासनिक और कानूनी स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है।

    आयोग के समक्ष प्रस्तुत शिकायत में आरोप लगाया गया है कि मेरठ में आयोजित एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने बल प्रयोग किया, जिससे कई प्रदर्शनकारी घायल हो गए। शिकायत के अनुसार, यह प्रदर्शन एक हत्या के मामले में न्याय की मांग को लेकर आयोजित किया गया था। आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान बिना पर्याप्त कारण के लाठीचार्ज किया गया और इससे कई लोगों को चोटें आईं। इन आरोपों के आधार पर आयोग ने मामले की प्रारंभिक जांच शुरू करने का निर्णय लिया।

    राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी कार्यवाही के तहत राज्य सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा है कि पुलिस को बल प्रयोग की आवश्यकता किन परिस्थितियों में महसूस हुई। साथ ही आयोग ने यह भी पूछा है कि पुलिस कार्रवाई किस कानूनी आधार पर की गई, प्रदर्शनकारियों को कितनी और किस प्रकार की चोटें आईं तथा घायलों को तत्काल चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने के लिए क्या कदम उठाए गए।

    आयोग ने अपने नोटिस में जवाबदेही के पहलू पर भी विशेष जोर दिया है। यदि जांच के दौरान यह पाया जाता है कि पुलिस द्वारा निर्धारित नियमों या मानवाधिकार संबंधी मानकों का उल्लंघन हुआ है, तो संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध क्या कार्रवाई की गई है अथवा भविष्य में क्या कार्रवाई प्रस्तावित है, इसकी जानकारी भी मांगी गई है। आयोग ने इस पूरे प्रकरण को संभावित मानवाधिकार उल्लंघन के दृष्टिकोण से गंभीर माना है।

    मानवाधिकार आयोग का हस्तक्षेप ऐसे मामलों में तथ्यों की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने की प्रक्रिया का हिस्सा माना जाता है। आयोग का उद्देश्य किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी संबंधित पक्षों से जानकारी प्राप्त करना और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय करना होता है। इसलिए फिलहाल आयोग ने केवल रिपोर्ट तलब की है और मामले पर अंतिम राय जांच पूरी होने के बाद ही बनाई जाएगी।

    कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि सार्वजनिक प्रदर्शन के दौरान पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी होती है, वहीं प्रदर्शनकारियों को भी शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। ऐसी स्थिति में यदि बल प्रयोग किया जाता है तो उसकी आवश्यकता, अनुपात और प्रक्रिया का परीक्षण संबंधित प्राधिकारियों द्वारा किया जाना आवश्यक होता है।

    अब सभी की निगाहें उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आयोग को भेजी जाने वाली रिपोर्ट पर टिकी हैं। रिपोर्ट के अध्ययन के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग यह तय करेगा कि मामले में आगे किसी अतिरिक्त जांच, सिफारिश या अन्य कानूनी कार्रवाई की आवश्यकता है या नहीं। फिलहाल यह प्रकरण जांच की प्रक्रिया में है और आयोग द्वारा मांगी गई जानकारी के आधार पर आगे की कार्यवाही निर्धारित की जाएगी।