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  • टैरिफ दबाव के बीच जयशंकर का रूस दौरा अहम, लावरोव से मुलाकात में तेल व्यापार और रणनीतिक सहयोग पर चर्चा संभव

    टैरिफ दबाव के बीच जयशंकर का रूस दौरा अहम, लावरोव से मुलाकात में तेल व्यापार और रणनीतिक सहयोग पर चर्चा संभव

    नई दिल्ली । विदेश मंत्री एस. जयशंकर 23 अगस्त से दो दिन के रूस दौरे पर जा रहे हैं। उनका यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब भारत और रूस के संबंधों के साथ-साथ भारत के ऊर्जा हित भी अंतरराष्ट्रीय दबावों के बीच चर्चा में हैं। यात्रा के दौरान जयशंकर रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से मुलाकात करेंगे और दोनों देशों के बीच क्षेत्रीय तथा वैश्विक मुद्दों पर बातचीत करेंगे।

    जयशंकर व्यापार, विज्ञान, तकनीक और संस्कृति से जुड़े भारत-रूस अंतर-सरकारी आयोग की 27वीं बैठक की सह-अध्यक्षता भी करेंगे। इस बैठक में दोनों देशों के बीच आर्थिक और कारोबारी सहयोग को आगे बढ़ाने के साथ विभिन्न क्षेत्रों में चल रही साझेदारी की समीक्षा किए जाने की उम्मीद है।

    जयशंकर का रूस दौरा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से रूस से तेल, गैस और यूरेनियम खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की धमकी के बीच हो रहा है। ऐसे में भारत-रूस ऊर्जा कारोबार इस यात्रा के महत्वपूर्ण संदर्भों में शामिल है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है और रूस पिछले कुछ समय में उसके प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में शामिल रहा है।

    यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों की पाबंदियों और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बदलाव के बीच भारत ने रूसी तेल की खरीद जारी रखी थी। हालांकि अमेरिकी दबाव और भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता के बीच रूसी तेल आयात में बदलाव की स्थिति बनी रही। इसके बाद पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ने से ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ी और भारत के लिए रूसी तेल का महत्व फिर बढ़ गया।

    जुलाई में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से अधिक पहुंचने की बात सामने आई। यह आंकड़ा बताता है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा में रूसी आपूर्ति कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। ऐसे में जयशंकर की यात्रा के दौरान ऊर्जा सहयोग और व्यापार से जुड़े मुद्दों पर बातचीत को विशेष महत्व मिल सकता है।

    दौरे का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू रक्षा और सैन्य तकनीकी सहयोग है। भारत और रूस लंबे समय से रक्षा क्षेत्र में साझेदार रहे हैं। हाल ही में दोनों देशों के अंतर-सरकारी आयोग के सैन्य और सैन्य-तकनीकी सहयोग से जुड़े कार्य समूह की बैठक भी हुई थी। इसमें दोनों पक्षों ने सशस्त्र बलों के बीच सहयोग बढ़ाने और आगामी गतिविधियों की योजना पर चर्चा की थी।

    इस पृष्ठभूमि में जयशंकर की रूस यात्रा दोनों देशों के व्यापक रणनीतिक संबंधों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। रक्षा उपकरणों की आपूर्ति, तकनीकी सहयोग और सैन्य साझेदारी से जुड़े विषय भी द्विपक्षीय बातचीत के एजेंडे में रह सकते हैं, हालांकि किसी विशेष नई रक्षा डील की पुष्टि अभी नहीं हुई है।

    भारत और रूस के संबंध केवल रक्षा और ऊर्जा तक सीमित नहीं हैं। दोनों देश व्यापार, विज्ञान, तकनीक, संस्कृति और आर्थिक सहयोग के नए क्षेत्रों में भी साझेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। अंतर-सरकारी आयोग की बैठक इसी व्यापक सहयोग को संस्थागत स्तर पर आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण मंच है।

    रूसी नेतृत्व भी हाल के समय में भारत के आर्थिक और तकनीकी विकास की सराहना करता रहा है। ऐसे में जयशंकर की यात्रा को दोनों देशों के बीच पारंपरिक रणनीतिक संबंधों को मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। अमेरिकी टैरिफ दबाव, ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच भारत के लिए रूस के साथ संवाद बनाए रखना महत्वपूर्ण है।

  • ईरानी जहाज पर कथित यूक्रेनी हमले से बढ़ा तनाव, अराघची और लावरोव ने फोन पर साझा की रणनीतिक चिंता

    ईरानी जहाज पर कथित यूक्रेनी हमले से बढ़ा तनाव, अराघची और लावरोव ने फोन पर साझा की रणनीतिक चिंता

    नई दिल्ली । कैस्पियन सागर में एक ईरानी वाणिज्यिक जहाज पर हुए कथित हमले के बाद पश्चिम एशिया और यूरोपीय क्षेत्र में कूटनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। इस घटनाक्रम के बीच ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची और रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने फोन पर बातचीत कर सुरक्षा स्थिति, क्षेत्रीय तनाव और आगे की रणनीति पर विचार-विमर्श किया। दोनों नेताओं ने हमले की निंदा करते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध बताया।

    ईरानी विदेश मंत्रालय के अनुसार, अराघची ने बातचीत के दौरान कहा कि किसी भी संप्रभु देश के वाणिज्यिक जहाज को निशाना बनाना गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने इस घटना को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा बताते हुए कहा कि ईरान अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और समुद्री हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने का अधिकार रखता है। उनका कहना था कि ऐसे हमलों को अनदेखा नहीं किया जा सकता और जिम्मेदार पक्षों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।

    रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भी कथित हमले की आलोचना करते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की घटनाएं रूस और ईरान के बीच विकसित हो रहे व्यापारिक और समुद्री संपर्क मार्गों के लिए भी जोखिम पैदा करती हैं। दोनों देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि समुद्री व्यापार की सुरक्षा सुनिश्चित करना क्षेत्रीय और वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है।

    बातचीत के दौरान दोनों विदेश मंत्रियों ने हाल के क्षेत्रीय घटनाक्रमों पर भी चर्चा की। इसमें होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी सुरक्षा स्थिति और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का भी उल्लेख किया गया। दोनों पक्षों ने माना कि मौजूदा परिस्थितियों में कूटनीतिक प्रयासों को मजबूत करना और तनाव को नियंत्रित करने के लिए संवाद बनाए रखना आवश्यक है।

    ईरानी विदेश मंत्री ने इससे पहले यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काजा कैलास के साथ भी टेलीफोन पर बातचीत की थी। इस दौरान उन्होंने कथित हमले की निंदा करते हुए यूरोपीय संघ, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इस घटना की निष्पक्ष जांच कराने तथा जिम्मेदार लोगों के खिलाफ उचित कार्रवाई सुनिश्चित करने की अपील की। दोनों पक्षों ने क्षेत्रीय सुरक्षा और समुद्री मार्गों की स्थिरता बनाए रखने की आवश्यकता पर भी चर्चा की।

    ईरान ने इस मामले को लेकर तेहरान में यूक्रेन के प्रभारी राजनयिक को तलब कर औपचारिक विरोध दर्ज कराया है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, संबंधित अधिकारी को विरोध पत्र सौंपते हुए घटना पर ईरान की कड़ी आपत्ति से अवगत कराया गया। मंत्रालय का कहना है कि कथित हमला स्थानीय समयानुसार शनिवार तड़के हुआ, जिसमें जहाज को नुकसान पहुंचा और एक नाविक की मृत्यु हो गई।

    ईरानी विदेश मंत्री ने सार्वजनिक रूप से भी इस घटना पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि देश अपनी सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े मामलों पर दृढ़ रुख अपनाएगा। दूसरी ओर, इस पूरे घटनाक्रम पर यूक्रेन की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में मामले को लेकर अलग-अलग पक्षों के दावों के बीच अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निगाहें संभावित कूटनीतिक कदमों और आगे की जांच पर टिकी हुई हैं। यह घटनाक्रम पहले से संवेदनशील क्षेत्रीय परिस्थितियों के बीच समुद्री सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।