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  • विवाह, तलाक और लिव-इन संबंधों पर एक कानून: असम UCC बिल ने कानूनी ढांचे में किए बड़े बदलाव

    विवाह, तलाक और लिव-इन संबंधों पर एक कानून: असम UCC बिल ने कानूनी ढांचे में किए बड़े बदलाव


    नई दिल्ली। असम में पेश किए गए यूनिफॉर्म सिविल कोड से जुड़े नए विधेयक ने सामाजिक और कानूनी व्यवस्था को लेकर एक नई बहस शुरू कर दी है। प्रस्तावित कानून का उद्देश्य राज्य में शादी, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों जैसे मामलों के लिए एक समान कानूनी ढांचा तैयार करना है। सरकार का मानना है कि इस तरह की व्यवस्था से विभिन्न समुदायों के बीच कानूनी समानता स्थापित होगी और नागरिक अधिकारों से जुड़े मामलों में एकरूपता लाई जा सकेगी।

    इस प्रस्तावित कानून की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें विवाह और तलाक के पंजीकरण को अनिवार्य बनाने का प्रावधान किया गया है। नए नियमों के अनुसार विवाह के बाद निर्धारित समय सीमा के भीतर संबंधित अधिकारियों के सामने आवश्यक दस्तावेज जमा करना अनिवार्य होगा। इसी प्रकार तलाक की प्रक्रिया को भी एक समान कानूनी ढांचे में शामिल करने का प्रयास किया गया है। इस व्यवस्था का उद्देश्य विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों के बीच मौजूद अंतर को कम करना माना जा रहा है।

    प्रस्तावित कानून में एक विवाह व्यवस्था को प्राथमिकता दी गई है और विवाह की न्यूनतम आयु को लेकर भी स्पष्ट प्रावधान तय किए गए हैं। हालांकि सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं को ध्यान में रखते हुए विभिन्न समुदायों के पारंपरिक विवाह समारोहों को बनाए रखने की बात भी कही गई है। इससे यह संकेत मिलता है कि समानता के साथ सांस्कृतिक विविधता को संतुलित रखने की कोशिश की जा रही है।

    उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में भी नए प्रस्ताव को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसमें पुरुष और महिला दोनों के अधिकारों को समान रूप से महत्व देने की बात कही गई है। परिवार के सदस्यों को उत्तराधिकार के मामलों में समान श्रेणी में रखने का विचार लैंगिक समानता की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। इसके साथ ही वसीयत से संबंधित कानूनी अधिकारों को भी स्पष्ट रूप से परिभाषित करने का प्रयास किया गया है।

    इस विधेयक का एक और महत्वपूर्ण पहलू लिव-इन संबंधों से जुड़ा है। प्रस्तावित नियमों के अनुसार ऐसे संबंधों को भी एक कानूनी ढांचे के भीतर लाने की कोशिश की गई है। इसके तहत निर्धारित समय सीमा के भीतर पंजीकरण की व्यवस्था प्रस्तावित है। साथ ही ऐसे संबंधों से जुड़े बच्चों और साथी के अधिकारों को लेकर भी प्रावधान जोड़े गए हैं ताकि सामाजिक और कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

    प्रस्तावित कानून में नियमों के उल्लंघन पर कड़े दंड का भी प्रावधान किया गया है। कानूनी प्रक्रियाओं की अनदेखी करने या गलत जानकारी देने जैसी स्थितियों पर कार्रवाई की व्यवस्था बनाई गई है। फिलहाल इस विधेयक को लेकर अलग-अलग वर्गों में चर्चा जारी है। समर्थकों का मानना है कि इससे समानता और कानूनी स्पष्टता बढ़ेगी, जबकि कुछ लोग इसे सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देख रहे हैं।

  • सख्त कानून, बड़ी सजा और बुलडोजर की चेतावनी… फिर भी क्यों नहीं टूट रहा पेपर लीक माफियाओं का नेटवर्क?

    सख्त कानून, बड़ी सजा और बुलडोजर की चेतावनी… फिर भी क्यों नहीं टूट रहा पेपर लीक माफियाओं का नेटवर्क?

    नई दिल्ली।देश में भर्ती परीक्षाओं और प्रवेश परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाएं लंबे समय से युवाओं के भविष्य के सामने बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। हर बार किसी बड़े परीक्षा विवाद के बाद सख्त कानून और कठोर कार्रवाई की बातें सामने आती हैं, लेकिन इसके बावजूद हालात में बड़ा बदलाव दिखाई नहीं देता। युवाओं की मेहनत, वर्षों की तैयारी और उम्मीदें बार-बार ऐसे मामलों की भेंट चढ़ती रही हैं। इसी समस्या पर रोक लगाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने वर्ष 2024 में सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम लागू किया था। उस समय यह दावा किया गया था कि इस कानून के बाद पेपर लीक माफियाओं के लिए बच निकलना लगभग असंभव हो जाएगा और दोषियों को किसी भी स्थिति में छोड़ा नहीं जाएगा। लेकिन समय बीतने के साथ तस्वीर कुछ अलग दिखाई देने लगी है।

    कानून में बेहद सख्त प्रावधान किए गए थे। इसमें दोषियों के लिए 10 साल तक की जेल, एक करोड़ रुपये तक जुर्माना और संपत्ति कुर्क करने जैसे कदम शामिल किए गए थे। परीक्षा में गड़बड़ी करने वाले संगठित गिरोहों, सॉल्वर गैंग और एजेंसियों के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई का प्रावधान रखा गया था। उम्मीद थी कि इतने कड़े नियमों के बाद पेपर लीक जैसी घटनाओं में भारी कमी आएगी। लेकिन हाल ही में सामने आए नए विवादों ने इस उम्मीद पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कानून बना देने से समस्या खत्म नहीं होती, बल्कि उसका प्रभावी क्रियान्वयन सबसे ज्यादा जरूरी होता है। अब तक सामने आए कई मामलों में जांच एजेंसियों की कार्रवाई निचले स्तर के लोगों तक ही सीमित दिखाई दी है। छोटे कर्मचारी, परीक्षा केंद्र से जुड़े लोग या डमी उम्मीदवार गिरफ्त में आते हैं, लेकिन असली मास्टरमाइंड और बड़े नेटवर्क कानून की पकड़ से दूर नजर आते हैं। इससे अपराधियों में डर की बजाय व्यवस्था की कमजोरियों का भरोसा बढ़ता दिखाई देता है।

    एक और बड़ी चिंता जांच और न्यायिक प्रक्रिया की धीमी रफ्तार को लेकर सामने आ रही है। कई मामलों में अदालतों तक मामला पहुंचने और अंतिम फैसला आने में लंबा समय लग जाता है। जब सजा में देरी होती है तो कानून का प्रभाव भी कमजोर पड़ने लगता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अपराधियों के मन में डर पैदा करने के लिए त्वरित कार्रवाई और समयबद्ध फैसले बेहद जरूरी हैं।

    इसके अलावा कुछ कानूनी प्रावधानों पर भी सवाल उठ रहे हैं। व्यवस्था में ऐसे प्रावधान मौजूद हैं जिनके जरिए कई बार तकनीकी गड़बड़ी या प्रशासनिक त्रुटियों को आधार बनाकर बड़ी जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश की जाती है। ऐसे मामलों में जवाबदेही तय करना कठिन हो जाता है और जांच लंबी खिंचती चली जाती है।

    लगातार सामने आ रही पेपर लीक घटनाओं ने युवाओं का भरोसा भी प्रभावित किया है। लाखों छात्र वर्षों की मेहनत के बाद परीक्षाओं में बैठते हैं और जब ऐसे विवाद सामने आते हैं तो केवल परीक्षा नहीं, बल्कि उनका आत्मविश्वास भी टूटता है। अब छात्र केवल सख्त कानून की घोषणा नहीं, बल्कि जमीन पर उसके असर को देखना चाहते हैं। क्योंकि जब तक बड़े नेटवर्क और असली दोषियों पर निर्णायक कार्रवाई नहीं होगी, तब तक पेपर लीक की यह समस्या खत्म होने की उम्मीद अधूरी ही रहेगी।

  • केजरीवाल सिसोदिया की फिर बढ़ी मुश्किलें, तुषार मेहता की दलीलों से दिल्ली शराब नीति केस में आया नया मोड़

    केजरीवाल सिसोदिया की फिर बढ़ी मुश्किलें, तुषार मेहता की दलीलों से दिल्ली शराब नीति केस में आया नया मोड़


    नई दिल्‍ली । दिल्ली शराब नीति मामले में नया मोड़ आया है। कथित आबकारी नीति घोटाला मामले में दिल्ली हाई कोर्ट में सोमवार को सुनवाई हुई। अदालत ने कहा कि प्रवर्तन निदेशालय ED के हवाला एंगल से जुड़े मामले में फिलहाल आगे की सुनवाई नहीं होगी जब तक हाई कोर्ट में चल रही कार्यवाही पूरी नहीं हो जाती। हाई कोर्ट में सुनवाई पूरी होने तक ईडी से जुड़े मामले में अरविंद केजरीवाल मनीष सिसोदिया समेत कुल 23 आरोपियों की आरोपमुक्ति फिलहाल प्रभावी नहीं मानी जाएगी। और सभी आरोपमुक्त आरोपियों को नोटिस जारी किया गया है। इस मामले में अगली सुनवाई 16 मार्च को तय की गई है।

    अदालत ने इस मामले में निचली अदालत से आरोपमुक्त किए गए सभी आरोपियों को नोटिस जारी किया है और उनसे जवाब मांगा है। वहीं अदालत ने राउज एवेन्यू कोर्ट के उस आदेश के एक हिस्से पर रोक लगाने की बात कही है जिसमें केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो CBI के जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच की सिफारिश की गई थी। उच्च न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि निचली अदालत के कुछ अवलोकन तथ्यात्मक रूप से सही नहीं थे। हालांकि अदालत ने फिलहाल निचली अदालत के उस आदेश पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई है जिसमें केजरीवाल सिसोदिया समेत 23 आरोपियों को आरोपमुक्त किया गया था। ऐसे में इस चरण में CBI को तत्काल राहत नहीं मिली है।

    उच्च न्यायालय ने कहा कि वह निचली अदालत को प्रवर्तन निदेशालय ईडी द्वारा धनशोधन मामले की जांच पर कार्यवाही को बाद की तारीख तक स्थगित करने का आदेश देगी। सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा किए गए अनुरोध पर उच्च न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि वह सीबीआई अधिकारियों पर अधीनस्थ अदालत द्वारा की गई पूर्वग्रहपूर्ण टिप्पणियों के अमल पर रोक लगाएगी। मेहता ने अदालत से सीबीआई की याचिका पर सुनवाई के लिए समय निर्धारित करके अंतिम निर्णय लेने का आग्रह किया। मेहता ने तर्क दिया कि आबकारी नीति मामले में केजरीवाल और सिसोदिया को अरोप मुक्त करने का निचली अदालत का आदेश अनुचित था और आपराधिक कानून को ही उलट देता है।

    शराब नीति का मामला सबसे बड़े घोटालों में से एक

    तुषार मेहता ने उच्च न्यायालय से कहा कि शराब नीति मामला सबसे बड़े घोटालों में से एक था और भ्रष्टाचार का स्पष्ट उदाहरण था। मेहता ने दावा किया कि निचली अदालत ने केजरीवाल सिसोदिया और अन्य के पक्ष में बिना सुनवाई के आरोप मुक्त करने का आदेश सुना दिया। उन्होंने यह भी कहा कि एजेंसी ने शराब नीति में हेरफेर के लिए साजिश और रिश्वतखोरी को दर्शाने वाले विस्तृत सबूत जुटाए थे। उन्होंने कहा कि केजरीवाल सिसोदिया और अन्य आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं और सीबीआई के मामले के पक्ष में कई गवाह हैं।

    बता दें कि निचली अदालत ने 27 फरवरी को केजरीवाल सिसोदिया और 21 अन्य को आरोप मुक्त कर दिया और सीबीआई को फटकार लगाते हुए कहा कि उसका मामला न्यायिक जांच में पूरी तरह से विफल रहा और पूरी तरह से निराधार साबित हुआ। इस मामले में जिन 21 लोगों को क्लीन चिट दी गई है उनमें तेलंगाना जागृति की अध्यक्ष के. कविता भी शामिल हैं। सीबीआई आम आदमी पार्टी की पिछली सरकार द्वारा अब रद्द की जा चुकी शराब नीति के निर्माण और कार्यान्वयन में कथित भ्रष्टाचार की जांच कर रही है।

    हाईकोर्ट के फैसले पर आप का बयान

    दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले पर संजय सिंह ने कहा सबसे पहले तो उन्हें कोई स्टे नहीं मिला है जो सीबीआई के लिए एक झटका है। दूसरा हम अपने वकीलों से सभी जानकारी जुटाने के बाद आधिकारिक रूप से अपना पक्ष रखेंगे। उन्हें कोई स्टे नहीं मिला है। CBI कोर्ट का फैसला अभी भी बरकरार है और उस पर कोई रोक नहीं लगाई गई है।

  • मिलने बुलाया, फिर सरेराह पिटाई, पुलिस ने आरोपी को किया हिरासत में

    मिलने बुलाया, फिर सरेराह पिटाई, पुलिस ने आरोपी को किया हिरासत में


    भोपाल। भाई की सलाह पर एक छात्रा ने आरोपी को मिलने के लिए बुलाया, लेकिन जैसे ही वह मौके पर पहुंचा, छात्रा के भाई और भाभी ने उसे सरेराह पीट दिया। घटना के बाद आरोपी को पुलिस के हवाले कर दिया गया।

    पुलिस ने बताया कि पीड़िता के परिवार ने औपचारिक एफआईआर दर्ज कराने से इनकार किया, इसलिए कानूनी प्रक्रिया के तहत आरोपी के खिलाफ धारा 151 (शांति भंग) के तहत कार्रवाई की गई। पुलिस का कहना है कि फिलहाल यह मामला परिवार के आंतरिक विवाद का प्रतीत होता है, लेकिन कानून के अनुसार हर कदम उठाया जा रहा है।

    घटना स्थल पर मौजूद पुलिस अधिकारियों ने बताया कि आरोपी को हिरासत में लेकर उसकी पहचान और पिटाई की वास्तविक वजह का पता लगाया जा रहा है। साथ ही, परिवार और पीड़िता से बयान लेकर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

    यह मामला न केवल स्थानीय प्रशासन बल्कि समाज में कानून और व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी को भी उजागर करता है। अधिकारियों ने यह भी कहा कि किसी भी प्रकार की हिंसा की घटनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा और अपराधी को कड़ी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।

    इस घटना से यह संदेश जाता है कि विवादों का समाधान हाथापाई या हिंसा से नहीं, बल्कि कानून और संवाद से होना चाहिए।

  • छिंदवाड़ा में कानून की धज्जियाँ जन्मदिन पर तलवार लहराते युवक का वायरल वीडियो कोर्ट परिसर में पुलिसकर्मी के साथ बनाई रील

    छिंदवाड़ा में कानून की धज्जियाँ जन्मदिन पर तलवार लहराते युवक का वायरल वीडियो कोर्ट परिसर में पुलिसकर्मी के साथ बनाई रील


    छिंदवाड़ा । मध्य प्रदेश छिंदवाड़ा शहर के कुण्डीपुरा थाना क्षेत्र में एक युवक का जन्मदिन पार्टी के दौरान तलवार लहराते हुए वीडियो वायरल हुआ है। इस वीडियो ने एक बार फिर शहर की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। वीडियो में युवक तेज संगीत पर अपने दोस्तों के साथ नाचते हुए खुलेआम तलवार लहरा रहा है जो सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गया है। यह वीडियो इंस्टाग्राम पर ‘सुमित मालवी’ नाम की एक आईडी से पोस्ट किया गया था और इसके बाद से यह शहर भर में चर्चा का विषय बन गया। विशेष रूप से रिहायशी इलाके में इस तरह के हथियारों का प्रदर्शन स्थानीय लोगों में डर और चिंता का कारण बन रहा है।

    दूसरी ओर हैरान करने वाली बात यह है कि युवक का एक और वीडियो सामने आया है जिसमें वह छिंदवाड़ा जिला न्यायालय परिसर के भीतर एक पुलिसकर्मी के साथ रील बनाता हुआ नजर आ रहा है। इस वीडियो में बैकग्राउंड में गाने के बोल हैं  कचहरी अपना ठिकाना है” और कोतवाली से रिश्ता पुराना है जो उसकी बेखौफ मानसिकता को उजागर करता है।इंटरनेट मीडिया पर वायरल हुए इस वीडियो के बाद पुलिस प्रशासन में हड़कंप मच गया है। पुलिस का कहना है कि यह घटना कानून और व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती पेश करती है। पुलिस ने इंस्टाग्राम आईडी के आधार पर युवक की पहचान शुरू कर दी है और मामले की जांच जारी है।

    पुलिस अधिकारियों का कहना है कि सार्वजनिक रूप से हथियारों का प्रदर्शन और प्रतिबंधित क्षेत्रों में इस तरह की रील बनाने के लिए युवक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। इस मामले ने यह भी दर्शाया कि युवा वर्ग में कानून के प्रति कितनी लापरवाही और बेखौफ मानसिकता फैल रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की घटनाएँ समाज में असुरक्षा का माहौल पैदा करती हैं और पुलिस प्रशासन को इसे सख्ती से नियंत्रित करना चाहिए।

  • उत्तराखंड धर्मांतरण कानून पर राज्यपाल ने दी ब्रेक सरकार को वापस लौटा बिल

    उत्तराखंड धर्मांतरण कानून पर राज्यपाल ने दी ब्रेक सरकार को वापस लौटा बिल


    नई दिल्ली । उत्तराखंड की धामी सरकार ने जबरन धर्मांतरण के मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान रखने वाले संशोधित उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता संशोधन विधेयक 2025 को राज्यपाल को मंजूरी के लिए भेजा था। हालांकि राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह सेनि ने विधेयक को मंजूरी देने के बजाय तकनीकी आधार पर पुनर्विचार के लिए सरकार को लौटा दिया है। सूत्रों के मुताबिक लोकभवन ने विधेयक के ड्राफ्ट में कुछ तकनीकी गलतियों की वजह से यह कदम उठाया है।

    अब राज्य सरकार के सामने दो विकल्प हैं। पहला सरकार इस विधेयक को अगले विधानसभा सत्र में फिर से पारित कराए या दूसरा राज्यपाल की मंजूरी के बिना अध्यादेश लाकर इसे तत्काल लागू किया जाए। अगर सरकार अध्यादेश लाती है तो यह विधेयक तत्काल प्रभाव से लागू हो सकता है लेकिन विधानसभा में इसे फिर से पारित करना अधिक सुरक्षित रास्ता हो सकता है।

    यह विधेयक उत्तराखंड में जबरन धर्मांतरण पर सजा को और भी कड़ा करता है। इसे पहले 2018 में लागू किया गया था और 2022 में इसमें कुछ संशोधन किए गए थे। 13 अगस्त 2025 को राज्य सरकार ने एक बार फिर इस कानून में बदलाव करते हुए उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता संशोधन विधेयक 2025 को मंजूरी दी थी। इस बिल के तहत धर्मांतरण के मामलों में सजा को और सख्त किया गया है जिससे राज्य में इस पर पूरी तरह से अंकुश लगाने की कोशिश की जा रही है।

    नए विधेयक के अनुसार यदि कोई व्यक्ति छल-बल से धर्मांतरण कराता है तो उसे कड़ी सजा दी जाएगी। पहले यह सजा तीन से 10 साल तक थी जिसे अब बढ़ाकर तीन से 20 साल तक किया गया है। इसके अलावा अगर कोई धर्मांतरण के लिए नाबालिगों का शोषण करता है या महिला को विवाह के झांसे में फंसा कर धर्म परिवर्तन कराता है तो उसे न्यूनतम 20 साल की सजा और अधिकतम आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान किया गया है। इसके साथ ही ऐसे मामलों में जुर्माना भी 10 लाख रुपये तक हो सकता है।

    इसके अलावा अब किसी भी व्यक्ति को धर्मांतरण के मामलों की शिकायत करने का अधिकार होगा जबकि पहले यह केवल खून के रिश्तेदारों तक सीमित था। इस विधेयक में एक और महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि जिलाधिकारी को गैंगस्टर एक्ट के तहत आरोपी की संपत्ति कुर्क करने का अधिकार दिया गया है।

    हालांकि राज्यपाल ने विधेयक को तकनीकी गलतियों के कारण वापस कर दिया है लेकिन यह स्पष्ट है कि धामी सरकार धर्मांतरण के मामलों में कठोर कदम उठाने के लिए प्रतिबद्ध है। अब देखना यह है कि राज्य सरकार इस विधेयक को फिर से कैसे पारित करती है और इसे लागू करने के लिए कौन सा रास्ता अपनाती है।

  • जानें—कार में ब्लैक-फिल्म लगाने पर कितना जुर्माना लगता है, किसे है छूट..

    जानें—कार में ब्लैक-फिल्म लगाने पर कितना जुर्माना लगता है, किसे है छूट..


    नई दिल्ली/ हाल ही में देश के कई राज्यों में कारों पर ब्लैक या टिंटेड फिल्म लगाने वालों पर पुलिस ने सख्त कार्रवाई तेज कर दी है। दिल्ली यातायात पुलिस ने सिर्फ एक हफ्ते में 2,235 से अधिक चालान काटे, जबकि उत्तर प्रदेश के मेरठ में ‘ऑपरेशन ब्लैक कैट’ चलाकर तीन दिन में 454 वाहनों पर चालान किए गए। आंकड़े बताते हैं कि लाखों लोग अब भी इस नियम को या तो जानते नहीं, या जानबूझकर उसका उल्लंघन करते हैं। सिर्फ दिल्ली में पिछले एक साल में 20,232 चालान ब्लैक फिल्म को लेकर किए गए। लेकिन आखिर ब्लैक फिल्म हटाने पर इतनी कड़ाई क्यों है? इसका सीधा संबंध सड़क सुरक्षा, कानून व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा से है।

    लोग ब्लैक फिल्म क्यों लगवाते हैं?
    अक्सर कार मालिक कुछ कारणों से ब्लैक/टिंटेड फिल्म लगवा लेते हैं- कार के अंदर गर्मी को कम करने के लिए  ज़्यादा प्राइवेसी पाने के लिए मॉडिफिकेशन और लग्जरी लुक के शौक के चलते  कानून की जानकारी न होने के कारण  लेकिन फायदे के बावजूद यह पूरी तरह अवैध है-चाहे फिल्म हल्की ही क्यों न हो या VLT मानकों को पूरा करती हो।

    कानून क्या कहता है?
    इस विषय में सुप्रीम कोर्ट का फैसला सबसे महत्वपूर्ण है।सुप्रीम कोर्ट का 2012 का आदेश Abhishek Goenka vs Union of India कोर्ट ने साफ कहा- कार खरीदने के बाद बाहर से किसी भी प्रकार की फिल्म लगवाना गैर-कानूनी है, चाहे वह ब्लैक हो, कलर्ड हो, स्मोक्ड हो या हल्की ही क्यों न हो।पुलिस को अधिकार है कि वह मौके पर फिल्म उतरवाए और चालान करे।

    CMVR नियम 100 (1989)
    यह नियम फैक्ट्री में बने ग्लास के VLT Visible Light Transmission मानक तय करता है-फ्रंट और रियर विंडशील्ड – कम से कम 70% विजिबिलिटी साइड विंडो – कम से कम 50% विजिबिलिटी अर्थात् कार कंपनियां हल्का टिंट दे सकती हैं लेकिन यह फैक्ट्री से ही होना चाहिए और मानक के भीतर होना चाहिए। बाजार में लगवाई गई कोई भी फिल्म अवैध है।

    ब्लैक फिल्म से होने वाले खतरे

    1. सड़क सुरक्षा को बड़ा जोखिम
    ब्लैक या स्मोक्ड फिल्म से विजिबिलिटी 40–70% तक कम हो जाती है।
    रात, धुंध, बारिश या हाईवे पर इससे दुर्घटना की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।

    2. अपराधों को बढ़ावा
    पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि- ब्लैक फिल्म के कारण कार के अंदर क्या हो रहा है, यह बाहर से दिखाई नहीं देता। अपहरण, छेड़छाड़, तस्करी और कई आपराधिक गतिविधियों में ऐसे वाहनों का उपयोग बढ़ता है। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें सुरक्षा के लिए खतरा बताया था।

    कितना जुर्माना लगता है?

    अधिकतर राज्यों में चालान- 100 से 1,000 कुछ राज्यों में इसे बढ़ाकर- ₹2,000 तक कर दिया गया है। बार-बार पकड़े जाने पर जुर्माना और अधिक लगाया जा सकता है। पुलिस मौके पर फिल्म उतरवाने का अधिकार भी रखती है।

    किन लोगों को छूट मिलती है?

    केवल Z+ या Z श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त VIPs को वह भी सरकारी अनुमति पत्र के साथ।
    Ministers, MPs, MLAs, Judges-किसी को भी व्यक्तिगत छूट नहीं। छूट सिर्फ विशेष सुरक्षा श्रेणी के लिए है। फिल्म हटाने का सुरक्षित तरीका फिल्म को खींचकर नहीं उतारें। हेयर ड्रायर या हीट गन से ग्लास को हल्का गर्म करें। किनारे से धीरे-धीरे फिल्म निकालें। बचा गोंद ग्लास क्लीनर या साबुन-पानी से साफ करें।

    क्या इससे इंश्योरेंस क्लेम पर असर पड़ता है?

    हाँ! अवैध मॉडिफिकेशन होने पर- क्लेम कम किया जा सकता है या पूरी तरह रिजेक्ट भी हो सकता है अगर पहले चालान हो चुका है  तो बीमा कंपनी इसे रूल वायलेशन मानकर केस और सख्ती से जांचती है।

    पुलिस कैसे जांच करती है?

    VLT मीटर टिंट मीटर से विजुअल इंस्पेक्शन – अगर फिल्म साफ दिख रही हो, तो चालान तुरंत

     किया जाता है।