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  • अमेरिका में ग्रीन कार्ड नियम पर कानूनी जंग, 22 राज्यों ने ट्रंप प्रशासन को कोर्ट में घेरा

    अमेरिका में ग्रीन कार्ड नियम पर कानूनी जंग, 22 राज्यों ने ट्रंप प्रशासन को कोर्ट में घेरा

    नई दिल्ली। अमेरिका में ग्रीन कार्ड से जुड़े नए ‘पब्लिक चार्ज’ नियम को लेकर कानूनी लड़ाई शुरू हो गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के इस नियम को चुनौती देते हुए 14 सितंबर को दो अलग-अलग मुकदमे दायर किए गए। एक याचिका 22 अमेरिकी राज्यों और कोलंबिया जिले ने दाखिल की है, जबकि दूसरी न्यूयॉर्क शहर के नेतृत्व में शिकागो, सैन फ्रांसिस्को, सिएटल समेत स्थानीय सरकारों ने दायर की है। नया नियम 18 सितंबर 2026 से लागू होना है।

    ग्रीन कार्ड क्यों अहम है?

    अमेरिका में स्थायी रूप से रहने और काम करने की अनुमति देने वाला ग्रीन कार्ड लाखों प्रवासियों के लिए महत्वपूर्ण है। रोजगार आधारित आव्रजन के जरिए स्थायी निवास का इंतजार कर रहे भारतीय पेशेवरों के लिए भी इसका खास महत्व है। ग्रीन कार्ड स्थायी निवास का दर्जा देता है और आगे चलकर अमेरिकी नागरिकता के लिए आवेदन करने का रास्ता भी खोल सकता है।

    क्या है नया ‘पब्लिक चार्ज’ नियम?

    नए नियम के तहत अमेरिकी आव्रजन अधिकारी ग्रीन कार्ड, कुछ वीजा या अमेरिका में प्रवेश से जुड़े आवेदनों पर फैसला लेते समय आवेदक के सार्वजनिक सहायता कार्यक्रमों के इस्तेमाल को भी ध्यान में रख सकेंगे। इनमें मेडिकेड, खाद्य सहायता, आवास सहायता और बच्चों से जुड़ी कुछ स्वास्थ्य योजनाएं शामिल हैं। सरकार का तर्क है कि स्थायी निवास हासिल करने वालों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना चाहिए और नीति का उद्देश्य सार्वजनिक संसाधनों की सुरक्षा करना है।

    22 राज्यों ने क्यों दी चुनौती?

    22 राज्यों और कोलंबिया जिले का कहना है कि नियम से उन परिवारों पर असर पड़ सकता है जो कानूनी रूप से सरकारी सहायता के पात्र हैं। मुकदमे में तर्क दिया गया है कि नियम की अस्पष्टता के कारण प्रवासी परिवार सहायता लेने से बच सकते हैं, भले ही वे उसके लिए पात्र हों। राज्यों ने यह भी कहा है कि इससे स्वास्थ्य सेवाओं, पोषण कार्यक्रमों और राज्य के वित्त पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

    DHS के अनुमान के मुताबिक करीब 9.5 लाख लोग सार्वजनिक सहायता योजनाओं से नाम वापस ले सकते हैं या उनमें नया नामांकन नहीं करा सकते हैं। राज्यों का कहना है कि इसका असर उन अमेरिकी नागरिक बच्चों पर भी पड़ सकता है जिनके माता-पिता अप्रवासी हैं और जो स्वयं इन योजनाओं के पात्र हो सकते हैं।

    ममदानी के नेतृत्व में दूसरा मुकदमा

    न्यूयॉर्क शहर के मेयर जोहरान ममदानी के नेतृत्व में दायर दूसरे मुकदमे में शिकागो, सैन फ्रांसिस्को, सिएटल और कुछ काउंटी सरकारें भी शामिल हैं। इन स्थानीय सरकारों का कहना है कि नियम से परिवार जरूरी स्वास्थ्य और सामाजिक सेवाओं का इस्तेमाल करने से डर सकते हैं। इस मुकदमे में नियम की वैधानिकता और उसके व्यापक प्रभाव को चुनौती दी गई है।

    ट्रंप प्रशासन का क्या कहना है?

    ट्रंप प्रशासन नए नियम को आत्मनिर्भरता और सार्वजनिक संसाधनों की सुरक्षा से जोड़ रहा है। प्रशासन का कहना है कि स्थायी निवास के लिए आवेदन करने वालों की आर्थिक स्थिति और संभावित सरकारी निर्भरता पर विचार करना आव्रजन कानून के तहत सरकार के अधिकारों के दायरे में आता है। दूसरी ओर, मुकदमा दायर करने वाले राज्यों और स्थानीय सरकारों का तर्क है कि नए नियम से आव्रजन अधिकारियों को बहुत व्यापक विवेकाधिकार मिल जाएगा।

    भारतीयों के लिए क्या बदलेगा?

    नियम का मतलब यह नहीं है कि ग्रीन कार्ड के हर आवेदक को सरकारी सहायता लेने पर स्वतः आवेदन खारिज कर दिया जाएगा। प्रभाव आवेदक की व्यक्तिगत परिस्थितियों, संबंधित लाभ और आव्रजन अधिकारी के आकलन पर निर्भर करेगा। हालांकि, भारतीय पेशेवरों और अन्य प्रवासियों के लिए यह अमेरिकी स्थायी निवास प्रक्रिया में एक नया कारक जोड़ता है।

    फिलहाल सबसे अहम सवाल यह है कि 18 सितंबर से नियम लागू होने से पहले अदालतें इसकी समीक्षा के दौरान क्या आदेश देती हैं। दोनों मुकदमों में नए नियम को रोकने और उसे गैरकानूनी घोषित करने की मांग की गई है।

  • धार्मिक जगत में नया विवाद, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और आशुतोष ब्रह्मचारी के बीच आरोप-प्रत्यारोप

    धार्मिक जगत में नया विवाद, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और आशुतोष ब्रह्मचारी के बीच आरोप-प्रत्यारोप


    नई दिल्ली। वाराणसी में धार्मिक जगत में एक नया विवाद सामने आया है, जहां यौन शोषण और आय से अधिक संपत्ति के आरोपों को लेकर कानूनी लड़ाई तेज हो गई है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों को निराधार बताते हुए इसे “संगठित तरीके से किया जा रहा कॉकटेल प्रहार” करार दिया है। दूसरी ओर, आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज ने प्रयागराज की विशेष पॉक्सो अदालत में शिकायत दर्ज कर गुरुकुल की आड़ में नाबालिगों के शोषण का आरोप लगाया है। अदालत ने दोनों पक्षों को नोटिस जारी कर 20 फरवरी को पेश होने को कहा है।

    शिकायत में कहा गया है कि कथित घटनाएं माघ मेला और गुरुकुल परिसर से जुड़ी हैं। शिकायतकर्ता ने दावा किया है कि उनके पास दो नाबालिगों के बयान और दस्तावेजी साक्ष्य मौजूद हैं। प्रारंभिक शिकायत पुलिस को देने के बाद, न्यायालय की शरण ली गई।

    स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने वाराणसी में मीडिया से बातचीत में कहा कि उनके सामाजिक और धार्मिक दृष्टिकोण पर मुखर रुख अपनाने के कारण “बदनाम करने का अभियान” चलाया जा रहा है। उन्होंने भरोसा जताया कि अदालत में आवश्यक साक्ष्य प्रस्तुत कर दिए गए हैं और न्यायपालिका पर उनका पूरा विश्वास है। साथ ही उन्होंने संकेत दिया कि यदि आरोप असत्य पाए जाते हैं, तो झूठी शिकायत के खिलाफ वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।

    इस विवाद के पीछे धार्मिक नेतृत्व के बीच मतभेद भी एक महत्वपूर्ण पहलू बन गए हैं। शिकायतकर्ता, जगद्गुरु रामभद्राचार्य के शिष्य बताए जाते हैं, जबकि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पहले भी सार्वजनिक मंचों पर राज्य नीतियों और धार्मिक मुद्दों पर बयान दे चुके हैं, जिससे विवाद और गहराया है।

    कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि पॉक्सो जैसे मामलों में नाबालिगों की पहचान की गोपनीयता और साक्ष्यों की विश्वसनीयता निर्णायक होती है। अदालत की निगरानी में जांच आगे बढ़ेगी और इसी दौरान आरोप और बचाव दोनों की कसौटी तय होगी। प्रशासनिक स्तर पर भी शिकायतों की समीक्षा और आवश्यक कार्रवाई की तैयारी चल रही है।

    यह विवाद यह भी दर्शाता है कि धार्मिक संस्थाओं और गुरुकुलों में कानूनी निगरानी और पारदर्शिता की आवश्यकता कितनी महत्वपूर्ण है। समाज में धार्मिक नेताओं के व्यक्तित्व और उनके कार्यों के प्रति विश्वास और जवाबदेही दोनों की कसौटी अदालत और साक्ष्यों के सामने आएगी।

    आगे की सुनवाई 20 फरवरी को होने वाली है, जहां अदालत दोनों पक्षों के बयान सुनकर आगे की जांच और जवाबी कार्रवाई का रास्ता तय करेगी। इस मामले में कानूनी प्रक्रिया और साक्ष्यों की पारदर्शिता ही तय करेगी कि आरोप कितने सत्य हैं और किस तरह की कार्रवाई की जानी चाहिए।