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  • परिसीमन विधेयक पर कांग्रेस ने किया रुख स्पष्ट, जयराम रमेश बोले- समर्थन की खबरें पूरी तरह झूठी और भ्रामक

    परिसीमन विधेयक पर कांग्रेस ने किया रुख स्पष्ट, जयराम रमेश बोले- समर्थन की खबरें पूरी तरह झूठी और भ्रामक

    नई दिल्ली । संसद के मॉनसून सत्र की शुरुआत से पहले प्रस्तावित परिसीमन विधेयक को लेकर राष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छिड़ गई है। आगामी सत्र में इस विधेयक को पेश किए जाने की संभावनाओं के बीच कांग्रेस ने अपने रुख को स्पष्ट करते हुए कहा है कि पार्टी इस प्रस्ताव का समर्थन नहीं कर रही है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने उन दावों का खंडन किया है जिनमें कहा जा रहा था कि सर्वदलीय बैठक के दौरान कांग्रेस ने परिसीमन विधेयक के पक्ष में अपनी सहमति दे दी है। उन्होंने ऐसे सभी दावों को पूरी तरह निराधार और भ्रामक बताया है।

    जयराम रमेश ने कहा कि कुछ माध्यमों में कांग्रेस के रुख को लेकर गलत जानकारी प्रसारित की जा रही है। उनके अनुसार पार्टी ने न तो सर्वदलीय बैठक में इस विधेयक का समर्थन किया और न ही ऐसा कोई संकेत दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कांग्रेस का आधिकारिक रुख वही है जो पार्टी की ओर से सार्वजनिक रूप से रखा गया है और किसी भी प्रकार की भ्रामक खबर पर विश्वास नहीं किया जाना चाहिए। इस बयान के बाद परिसीमन विधेयक को लेकर विपक्ष की रणनीति पर चल रही अटकलों को नया मोड़ मिल गया है।

    राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि केंद्र सरकार मॉनसून सत्र के दौरान महिला आरक्षण से जुड़े प्रावधानों के साथ लोकसभा और विधानसभा सीटों के पुनर्गठन के उद्देश्य से परिसीमन विधेयक को फिर से सदन में ला सकती है। माना जा रहा है कि इस बार सभी राज्यों में सीटों की संख्या बढ़ाने से संबंधित संशोधित प्रस्ताव भी शामिल किया जा सकता है। हालांकि सरकार की ओर से अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

    संविधान संशोधन से जुड़े ऐसे किसी भी विधेयक को पारित कराने के लिए संसद में विशेष बहुमत आवश्यक होता है। वर्तमान लोकसभा की कुल 543 सीटों में कुछ स्थान रिक्त होने के बावजूद विधेयक को पारित कराने के लिए लगभग 360 सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता मानी जा रही है। इसी कारण सरकार और विपक्ष दोनों अपने-अपने राजनीतिक समीकरणों को मजबूत करने में जुटे हुए हैं।

    संसद के भीतर बदलते राजनीतिक घटनाक्रमों ने भी इस विषय को और महत्वपूर्ण बना दिया है। विभिन्न दलों के सांसदों के समर्थन, संभावित राजनीतिक पुनर्संरेखण और गठबंधनों में बदलाव की चर्चाओं के बीच यह आकलन लगाया जा रहा है कि यदि कुछ क्षेत्रीय दल सरकार के साथ आते हैं तो सत्ता पक्ष का संख्याबल पहले की तुलना में अधिक मजबूत हो सकता है। दूसरी ओर विपक्षी दल भी साझा रणनीति बनाकर इस मुद्दे पर एकजुट रहने का प्रयास कर रहे हैं।

    परिसीमन का विषय लंबे समय से राजनीतिक और संवैधानिक बहस का केंद्र रहा है क्योंकि इसका सीधा संबंध संसदीय प्रतिनिधित्व, राज्यों के बीच सीटों के वितरण और लोकतांत्रिक संतुलन से जुड़ा माना जाता है। यही कारण है कि इस मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक दलों की अलग-अलग राय सामने आती रही है। मॉनसून सत्र के दौरान यदि सरकार यह विधेयक पेश करती है तो संसद में इस पर व्यापक चर्चा और तीखी राजनीतिक बहस होने की संभावना है। फिलहाल कांग्रेस ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए यह संकेत दे दिया है कि परिसीमन विधेयक पर विपक्ष की रणनीति को लेकर फैल रही अटकलों को सही नहीं माना जाना चाहिए। आने वाले दिनों में सरकार की आधिकारिक घोषणा और संसद में होने वाली कार्यवाही के बाद ही इस महत्वपूर्ण विधेयक की दिशा और राजनीतिक तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।

  • मध्य प्रदेश में UCC की दिशा में बड़ा कदम, उच्च स्तरीय समिति ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को सौंपी अंतिम रिपोर्ट, अब विधेयक की तैयारी तेज

    मध्य प्रदेश में UCC की दिशा में बड़ा कदम, उच्च स्तरीय समिति ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को सौंपी अंतिम रिपोर्ट, अब विधेयक की तैयारी तेज

    मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए राज्य सरकार द्वारा गठित उच्च स्तरीय समिति ने अपना अंतिम प्रतिवेदन मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को सौंप दिया है। मुख्यमंत्री ने निर्धारित समय-सीमा के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने पर समिति के अध्यक्ष और सभी सदस्यों का आभार व्यक्त किया। इसके साथ ही राज्य में यूसीसी को लेकर आगे की विधायी प्रक्रिया शुरू होने का मार्ग भी प्रशस्त हो गया है। सरकार ने रिपोर्ट को विधि विभाग को भेज दिया है, जहां आवश्यक परीक्षण और संशोधन की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

    समिति द्वारा प्रस्तुत अंतिम प्रतिवेदन तीन अलग-अलग खंडों में तैयार किया गया है। पहले खंड में समिति की सिफारिशें शामिल हैं, जिनमें अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर लागू विभिन्न कानूनों, परंपराओं और व्यवस्थाओं का अध्ययन कर सुझाव दिए गए हैं। इस भाग में कुल दस अध्याय शामिल किए गए हैं, जिनमें विभिन्न कानूनी और सामाजिक पहलुओं का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

    रिपोर्ट का दूसरा खंड प्रस्तावित विधेयक के प्रारूप से संबंधित है। समिति ने मध्य प्रदेश में लागू कानूनों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए विधेयक का मसौदा तैयार किया है। प्रस्तावित प्रारूप में चार भाग, 404 धाराएं और सात अनुसूचियां शामिल हैं। इसका उद्देश्य राज्य की परिस्थितियों के अनुरूप समान नागरिक संहिता का व्यावहारिक और कानूनी ढांचा तैयार करना है।

    तीसरे खंड में व्यापक जन-परामर्श का विवरण दिया गया है। समिति ने जिला स्तर, राज्य स्तर और ऑनलाइन माध्यमों से सुझाव आमंत्रित किए थे। इस प्रक्रिया में 9.58 लाख से अधिक सुझाव प्राप्त हुए। रिपोर्ट में इन सुझावों का प्रश्नवार, लिंगवार और समुदायवार विश्लेषण भी शामिल किया गया है। समिति ने अपनी सिफारिशों में अनुसूचित जनजातियों को समान नागरिक संहिता के दायरे से बाहर रखने की अनुशंसा भी की है।

    राज्य सरकार ने समिति को विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण और लिव-इन संबंधों जैसे व्यक्तिगत एवं पारिवारिक कानूनों का अध्ययन कर मध्य प्रदेश की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप सुझाव तैयार करने का दायित्व सौंपा था। समिति ने अपने प्रतिवेदन में लैंगिक समानता, संवैधानिक मूल्यों, प्रचलित परंपराओं और सामाजिक विविधता के बीच संतुलन बनाए रखने पर विशेष जोर दिया है। साथ ही यह भी सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है कि विभिन्न समुदायों की परंपरागत धार्मिक और सांस्कृतिक प्रथाएं अनावश्यक रूप से प्रभावित न हों।

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस अवसर पर समिति के अध्यक्ष, सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई सहित अन्य सदस्यों के योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि अब रिपोर्ट विधि विभाग के पास है, जहां आवश्यक प्रक्रिया पूरी होने के बाद इसे वरिष्ठ सचिव समिति और मंत्रिपरिषद के समक्ष रखा जाएगा। इसके बाद सरकार इसे विधानसभा के आगामी मानसून सत्र में विधेयक के रूप में प्रस्तुत करने पर विचार कर सकती है।

    मुख्यमंत्री ने इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों से भी स्पष्ट रुख अपनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि समान नागरिक संहिता जैसे विषय पर सभी पक्षों को अपने विचार स्पष्ट रूप से रखने चाहिए। सरकार का कहना है कि व्यापक जन-परामर्श और कानूनी अध्ययन के आधार पर तैयार यह प्रतिवेदन राज्य में समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार दस्तावेज के रूप में काम करेगा।

  • राष्ट्रीय पुरुष आयोग की मांग फिर चर्चा में, कानूनी अड़चनें, सामाजिक बहस और राजनीतिक सहमति की चुनौती बरकरार

    राष्ट्रीय पुरुष आयोग की मांग फिर चर्चा में, कानूनी अड़चनें, सामाजिक बहस और राजनीतिक सहमति की चुनौती बरकरार

    नई दिल्ली । देश में राष्ट्रीय पुरुष आयोग के गठन की मांग एक बार फिर सार्वजनिक और राजनीतिक चर्चा का विषय बन गई है। महिला आयोग, बाल अधिकार आयोग, अल्पसंख्यक आयोग और अन्य वैधानिक संस्थाओं की तरह पुरुषों के लिए भी एक अलग राष्ट्रीय आयोग बनाए जाने की मांग पिछले कई वर्षों से उठती रही है। हालांकि यह मुद्दा समय-समय पर चर्चा में आने के बावजूद अब तक किसी ठोस कानूनी रूप में सामने नहीं आ सका है। इसके पीछे कानूनी, राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर कई तरह की चुनौतियां बताई जाती हैं।

    हाल के वर्षों में पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक विवाद, आत्महत्या के मामलों और कुछ कानूनों के कथित दुरुपयोग को लेकर कई संगठनों ने अलग आयोग की आवश्यकता पर जोर दिया है। समर्थकों का कहना है कि पुरुषों से जुड़े ऐसे मामलों की सुनवाई और अध्ययन के लिए एक समर्पित संस्थागत व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे उनकी शिकायतों को व्यवस्थित तरीके से सुना जा सके और आवश्यक सुझाव सरकार तक पहुंच सकें।

    राष्ट्रीय पुरुष आयोग की मांग को लेकर न्यायपालिका और संसद दोनों स्तरों पर प्रयास किए गए हैं। इस विषय पर जनहित याचिकाएं दायर हुईं और एक निजी सदस्य विधेयक भी प्रस्तुत किया गया। हालांकि अब तक यह पहल कानून का रूप नहीं ले सकी है। संसदीय प्रक्रिया में निजी सदस्य विधेयकों का कानून बनना अत्यंत दुर्लभ माना जाता है और इस विषय पर सरकार की ओर से भी अब तक कोई आधिकारिक विधेयक पेश नहीं किया गया है।

    इस मुद्दे पर सबसे बड़ी बहस यह है कि क्या पुरुष आयोग की स्थापना से मौजूदा महिला आयोग या महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने कानूनों पर कोई प्रभाव पड़ेगा। आयोग के समर्थकों का कहना है कि उनका उद्देश्य महिला आयोग का विकल्प तैयार करना नहीं, बल्कि पुरुषों से जुड़े मामलों के लिए एक अतिरिक्त संस्थागत व्यवस्था बनाना है। उनका तर्क है कि दोनों आयोग समानांतर रूप से काम कर सकते हैं और किसी भी वर्ग के अधिकारों को कमजोर किए बिना न्याय व्यवस्था को अधिक संतुलित बनाया जा सकता है।

    वहीं दूसरी ओर कई सामाजिक संगठनों और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि भारत में महिलाओं के खिलाफ हिंसा, भेदभाव और असमानता अब भी गंभीर चुनौती बनी हुई है। उनका कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों को मजबूत करना प्राथमिकता होनी चाहिए। कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि यदि पुरुष आयोग का गठन किया जाता है तो उसकी भूमिका, अधिकार और दायरे को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना आवश्यक होगा, ताकि किसी प्रकार का कानूनी टकराव उत्पन्न न हो।

    विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि पुरुषों से जुड़े मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक विवाद, सामाजिक दबाव और आत्महत्या जैसे विषयों पर अधिक शोध और विश्वसनीय आंकड़ों की आवश्यकता है। यदि भविष्य में इस दिशा में कोई संस्थागत व्यवस्था बनती है तो वह नीति निर्माण, शोध, परामर्श सेवाओं और जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से उपयोगी भूमिका निभा सकती है। साथ ही यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक होगा कि सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा समान रूप से हो और किसी भी वर्ग के हित प्रभावित न हों।

    फिलहाल राष्ट्रीय पुरुष आयोग का गठन केवल प्रस्ताव और बहस के स्तर पर है। इसके कानून बनने के लिए सरकार की पहल, व्यापक राजनीतिक सहमति और संसद की मंजूरी आवश्यक होगी। ऐसे में आने वाले समय में यह मुद्दा किस दिशा में आगे बढ़ता है, यह सरकार के रुख, संसदीय प्रक्रिया और समाज में बनने वाली व्यापक सहमति पर निर्भर करेगा।