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  • ‘रेडी वॉटर’ से ‘सरबरी’ तक: बोलचाल की भाषा में छिपी सृजनात्मकता को अमिताभ बच्चन ने बताया भारतीय समाज की बड़ी ताकत

    ‘रेडी वॉटर’ से ‘सरबरी’ तक: बोलचाल की भाषा में छिपी सृजनात्मकता को अमिताभ बच्चन ने बताया भारतीय समाज की बड़ी ताकत

    नई दिल्ली । भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की सोच, संस्कृति और रचनात्मकता का प्रतिबिंब भी होती है। यही संदेश वरिष्ठ अभिनेता अमिताभ बच्चन ने अपने हालिया ब्लॉग के माध्यम से साझा किया है। उन्होंने आम लोगों की बोलचाल में दिखाई देने वाली भाषाई सृजनात्मकता की सराहना करते हुए कहा कि लोग अक्सर विदेशी शब्दों को अपनी सुविधा, समझ और स्थानीय प्रभाव के अनुरूप नया रूप दे देते हैं, जिससे वे शब्द और भी आत्मीय तथा रोचक बन जाते हैं।

    अमिताभ बच्चन ने अपने प्रशंसकों को संबोधित करते हुए ब्लॉग की शुरुआत हल्के-फुल्के अंदाज में की। उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्लॉग लिखने में हुई देरी का कारण आलस्य नहीं, बल्कि कार्य व्यस्तता थी। उन्होंने कहा कि दिनभर के कार्यों के बाद अपने प्रशंसकों से संवाद करना उनके लिए एक विशेष अनुभव होता है और यही उनके दैनिक कार्यों की पूर्णता का एहसास भी कराता है।

    अपने विचारों को समझाने के लिए उन्होंने अपने आवास ‘जलसा’ से जुड़ा एक रोचक प्रसंग साझा किया। उन्होंने बताया कि उनके यहां काम करने वाले एक माली को अंग्रेजी शब्दों का उच्चारण करने में कठिनाई होती थी। विशेष रूप से एक शब्द को वह सही ढंग से नहीं बोल पाता था, इसलिए उसने उसे अपनी सुविधा के अनुसार बदलकर नया रूप दे दिया। अभिनेता के अनुसार, यह नया उच्चारण इतना सहज और आत्मीय लगा कि कई बार वह मूल शब्द की तुलना में अधिक प्रभावशाली प्रतीत हुआ।

    उन्होंने एक अन्य उदाहरण का उल्लेख करते हुए बताया कि कुछ लोग ‘रेडिएटर’ शब्द को अपने तरीके से ‘रेडी वॉटर’ कहने लगे। इसके पीछे उनका अपना तर्क भी था कि जिस उपकरण में पानी भरा जाता है, उसके लिए ऐसा नाम अधिक उपयुक्त लगता है। अमिताभ बच्चन ने कहा कि यद्यपि यह तकनीकी रूप से सही शब्द नहीं है, लेकिन यह लोगों की सोचने और भाषा को अपने अनुरूप ढालने की क्षमता को दर्शाता है।

    अभिनेता का मानना है कि भाषा का वास्तविक सौंदर्य उसकी लचीलापन और स्वीकार्यता में निहित होता है। समाज के विभिन्न वर्ग, क्षेत्र और भाषाई पृष्ठभूमि वाले लोग जब किसी शब्द को अपनाते हैं, तो उसमें अपनी संस्कृति और अनुभवों का रंग भी जोड़ देते हैं। यही प्रक्रिया भाषा को स्थिर नहीं रहने देती, बल्कि उसे समय के साथ विकसित और समृद्ध बनाती है।

    उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति के लिए किसी विदेशी भाषा या उसके जटिल शब्दों का शुद्ध उच्चारण करना आसान नहीं होता। ऐसे में लोग अपनी समझ और सुविधा के अनुसार नए शब्द गढ़ लेते हैं। यह केवल उच्चारण की त्रुटि नहीं, बल्कि भाषा के प्रति मानवीय अनुकूलन क्षमता का उदाहरण है। इसी वजह से ऐसे शब्द लंबे समय तक लोगों की स्मृतियों और दैनिक जीवन का हिस्सा बने रहते हैं।

    अमिताभ बच्चन ने यह भी कहा कि भाषा की यही सहजता उसे आम लोगों से जोड़ती है। जब कोई शब्द स्थानीय संदर्भों और बोलचाल में ढल जाता है तो वह केवल शब्द नहीं रह जाता, बल्कि सामाजिक अनुभव का हिस्सा बन जाता है। उन्होंने अपने प्रशंसकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि वर्षों से मिलने वाला उनका स्नेह और समर्थन उनके जीवन को निरंतर ऊर्जा प्रदान करता है।

    भाषा और समाज के संबंध पर व्यक्त किए गए उनके विचार यह संकेत देते हैं कि रचनात्मकता केवल साहित्य या कला तक सीमित नहीं है, बल्कि सामान्य बातचीत और दैनिक जीवन में भी उतनी ही प्रभावशाली रूप से दिखाई देती है। यही विशेषता भाषा को जीवंत, प्रासंगिक और समय के साथ विकसित होने योग्य बनाती है।