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  • Gen Z में बढ़ा Buy Now Pay Later का चलन, शौक और लाइफस्टाइल के लिए बढ़ती उधारी बना रही आर्थिक दबाव का नया कारण

    Gen Z में बढ़ा Buy Now Pay Later का चलन, शौक और लाइफस्टाइल के लिए बढ़ती उधारी बना रही आर्थिक दबाव का नया कारण

    नई दिल्ली । बदलती डिजिटल लाइफस्टाइल के साथ युवाओं के खर्च करने और भुगतान करने के तौर-तरीकों में बड़ा बदलाव आया है। खासकर Gen Z के बीच Buy Now Pay Later यानी अभी खरीदें और बाद में भुगतान करें जैसी सुविधाओं का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। महंगे मोबाइल फोन, ब्रांडेड कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट, यात्रा, खान-पान और मनोरंजन जैसी जरूरतों या इच्छाओं को पूरा करने के लिए अब हमेशा खाते में पर्याप्त रकम होने का इंतजार नहीं किया जाता। आसान किस्त और तत्काल क्रेडिट की सुविधा ने खरीदारी को पहले की तुलना में काफी सरल बना दिया है।

    पहले कर्ज को मुख्य रूप से घर खरीदने, शिक्षा, कारोबार या किसी बड़ी आपात जरूरत से जोड़कर देखा जाता था। अब डिजिटल भुगतान व्यवस्था और ऑनलाइन शॉपिंग के विस्तार के साथ छोटे और रोजमर्रा के खर्चों के लिए भी क्रेडिट का इस्तेमाल बढ़ा है। क्रेडिट कार्ड, Buy Now Pay Later और छोटे व्यक्तिगत ऋण युवाओं को तत्काल खर्च करने की सुविधा देते हैं। खरीदारी के समय पूरी रकम चुकाने के बजाय कम मासिक किस्त दिखाई देती है, जिससे महंगा सामान भी आसानी से खरीदने योग्य नजर आने लगता है।

    क्रेडिट व्यवहार से जुड़े आंकड़ों और विश्लेषणों से यह संकेत मिलता है कि अलग-अलग पीढ़ियों में पहली बार उधार लेने की उम्र कम हुई है। युवा वर्ग कम उम्र में ही क्रेडिट सिस्टम से जुड़ रहा है। इसका एक बड़ा कारण डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कुछ ही चरणों में उपलब्ध होने वाली ऋण और किस्त की सुविधा है। कई बार खरीदारी करते समय ही ग्राहक को EMI या Pay Later का विकल्प मिल जाता है। इससे खरीदारी का फैसला बचत और आय के आधार पर करने के बजाय तत्काल उपलब्ध किस्त के आधार पर होने लगता है।

    इस बदलाव का सबसे बड़ा जोखिम तब सामने आता है, जब एक व्यक्ति एक साथ कई क्रेडिट सुविधाओं का इस्तेमाल करने लगता है। उदाहरण के लिए किसी युवा की मासिक आय 40 हजार रुपये है और वह मोबाइल, कपड़े, यात्रा तथा अन्य खर्चों के लिए अलग-अलग किस्त ले लेता है। प्रत्येक खरीदारी की EMI अकेले देखने पर छोटी लग सकती है, लेकिन महीने के अंत में सभी किस्तों का कुल भुगतान काफी बड़ा हो सकता है। इसके बाद जरूरी घरेलू खर्चों और बचत के लिए उपलब्ध रकम कम हो जाती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार क्रेडिट सुविधा अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन इसे अतिरिक्त आय समझना वित्तीय गलती हो सकती है। किसी बैंक या वित्तीय संस्था की ओर से दी गई क्रेडिट लिमिट का अर्थ यह नहीं है कि उतनी पूरी राशि खर्च करना सुरक्षित है। खर्च करने से पहले अपनी आय, मौजूदा कर्ज, मासिक किस्तों और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखना जरूरी है।

    समय पर भुगतान नहीं होने की स्थिति में ब्याज, लेट फीस और अन्य शुल्क आर्थिक बोझ बढ़ा सकते हैं। लगातार भुगतान में देरी से क्रेडिट रिकॉर्ड पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए युवाओं के लिए जरूरी है कि केवल कम EMI देखकर खरीदारी का फैसला न करें। कुल भुगतान राशि, ब्याज, प्रोसेसिंग फीस और अन्य शुल्कों को समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

    बढ़ती डिजिटल क्रेडिट सुविधाओं के बीच वित्तीय अनुशासन ही सबसे बड़ा बचाव है। शौक और लाइफस्टाइल को पूरा करने के लिए लिया गया छोटा कर्ज अगर लगातार बढ़ता जाए तो वह भविष्य की बचत और आर्थिक स्वतंत्रता पर असर डाल सकता है। जरूरत और इच्छा के बीच अंतर समझकर खर्च करना तथा आय के अनुरूप ही उधारी लेना युवाओं को इस बढ़ते कर्ज के दबाव से बचा सकता है।

  • चित्रकूट में पीएम स्वनिधि योजना की समीक्षा, एडीएम ने बैंकों और निकायों को लक्ष्य पूरा करने के दिए सख्त निर्देश

    चित्रकूट में पीएम स्वनिधि योजना की समीक्षा, एडीएम ने बैंकों और निकायों को लक्ष्य पूरा करने के दिए सख्त निर्देश

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना के प्रभावी क्रियान्वयन और अधिक से अधिक स्ट्रीट वेंडरों तक इसका लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से चित्रकूट में समीक्षा बैठक आयोजित की गई। बैठक में अधिकारियों और बैंक प्रतिनिधियों को निर्देश दिए गए कि वे समन्वय बनाकर पात्र वेंडरों की पहचान करें तथा विशेष शिविर लगाकर उन्हें शीघ्र ऋण उपलब्ध कराने की प्रक्रिया पूरी करें। प्रशासन का उद्देश्य योजना के निर्धारित लक्ष्यों को समयबद्ध तरीके से हासिल करना और छोटे कारोबारियों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है।

    जिला प्रशासन के निर्देश पर आयोजित बैठक की अध्यक्षता एडीएम न्यायिक एवं परियोजना निदेशक डूडा अरुण कुमार ने की। बैठक में सभी नगर निकायों के अधिशासी अधिकारियों, विभिन्न बैंक शाखाओं के प्रबंधकों तथा संबंधित विभागों के अधिकारियों ने भाग लिया। बैठक के दौरान पीएम स्वनिधि योजना की प्रगति की समीक्षा करते हुए लंबित मामलों का भी आकलन किया गया और आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए गए।

    बैठक में अधिकारियों को निर्देशित किया गया कि नगर निकाय अपने सीमा विस्तारित क्षेत्रों के साथ-साथ सब्जी और फल मंडियों में विशेष कैंप आयोजित करें। इन शिविरों के माध्यम से अधिक से अधिक पात्र स्ट्रीट वेंडरों की पहचान कर उनका ऑनलाइन आवेदन कराया जाए, ताकि प्रथम चरण के ऋण का लाभ जल्द से जल्द उपलब्ध कराया जा सके। प्रशासन का मानना है कि मौके पर ही आवेदन प्रक्रिया पूरी होने से लाभार्थियों को अनावश्यक परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ेगा और योजना का दायरा तेजी से बढ़ेगा।

    बैंक शाखा प्रबंधकों को भी स्पष्ट निर्देश दिए गए कि नगर निकायों की ओर से भेजे गए ऑनलाइन आवेदनों का शीघ्र परीक्षण कर समय पर ऋण स्वीकृत किया जाए। इसके साथ ही स्वीकृत मामलों में जल्द ऋण वितरण सुनिश्चित करने पर भी विशेष जोर दिया गया। अधिकारियों ने कहा कि बैंक और नगर निकायों के बीच बेहतर समन्वय से योजना के लक्ष्य आसानी से पूरे किए जा सकते हैं।

    बैठक के दौरान योजना की वर्तमान प्रगति पर भी चर्चा हुई और उन क्षेत्रों की पहचान की गई, जहां अभी अपेक्षित संख्या में आवेदन नहीं हो पाए हैं। अधिकारियों ने ऐसे इलाकों में विशेष अभियान चलाने तथा पात्र लाभार्थियों को योजना की जानकारी देकर उन्हें आवेदन के लिए प्रेरित करने पर बल दिया। इसके अलावा आवेदन प्रक्रिया में आने वाली तकनीकी और प्रशासनिक समस्याओं के त्वरित समाधान के भी निर्देश दिए गए।

    प्रशासन ने कहा कि प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना छोटे व्यापारियों और रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं के लिए स्वरोजगार को मजबूत करने की एक महत्वपूर्ण पहल है। इस योजना के माध्यम से बिना किसी बड़ी औपचारिकता के कार्यशील पूंजी के रूप में ऋण उपलब्ध कराया जाता है, जिससे छोटे कारोबारी अपने व्यवसाय का विस्तार कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकते हैं। समय पर ऋण चुकाने वाले लाभार्थियों को आगे के चरणों में अधिक राशि का ऋण प्राप्त करने की सुविधा भी मिलती है।

    बैठक में यह भी तय किया गया कि सभी संबंधित विभाग नियमित रूप से योजना की प्रगति की निगरानी करेंगे और लंबित मामलों का शीघ्र निस्तारण सुनिश्चित करेंगे। प्रशासन ने अधिकारियों और बैंक प्रतिनिधियों से अपेक्षा जताई कि वे संयुक्त प्रयासों के माध्यम से अधिक से अधिक पात्र स्ट्रीट वेंडरों को योजना से जोड़ते हुए उन्हें समय पर वित्तीय सहायता उपलब्ध कराएं, ताकि उनका रोजगार मजबूत हो और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति मिल सके।

  • UAE ने मांगा अरबों का कर्ज, पाकिस्तान पर बढ़ा दबाव; सऊदी अरब से बढ़ी उम्मीदें

    UAE ने मांगा अरबों का कर्ज, पाकिस्तान पर बढ़ा दबाव; सऊदी अरब से बढ़ी उम्मीदें

    इस्लामाबाद। आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए नया संकट खड़ा हो गया है। संयुक्त अरब अमीरात द्वारा अरबों डॉलर का कर्ज वापस मांगे जाने के बीच अब सऊदी अरब एक बार फिर उसके लिए ‘संकटमोचक’ के रूप में उभरता नजर आ रहा है।

    इसी कड़ी में सऊदी वित्त मंत्री मोहम्मद अल-जदान का इस्लामाबाद दौरा काफी अहम माना जा रहा है। इसे पाकिस्तान को संभावित आर्थिक राहत के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

    पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सऊदी नेतृत्व के प्रति आभार जताते हुए कहा कि सऊदी सहयोग ने देश की आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    UAE का कर्ज लौटाने से बढ़ेगी मुश्किलें
    जानकारी के मुताबिक, पाकिस्तान 2018 में लिए गए 3 अरब डॉलर से अधिक के कर्ज को UAE को लौटाने की प्रक्रिया में है। यह राशि उसके विदेशी मुद्रा भंडार का करीब 18 प्रतिशत है। ऐसे में भुगतान से देश की आर्थिक स्थिति पर सीधा दबाव पड़ना तय माना जा रहा है।

    स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान के अनुसार, मार्च के अंत तक देश के पास करीब 16.4 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार था, जो लगभग तीन महीने के आयात के लिए पर्याप्त माना जाता है।

    खाड़ी देशों के बदलते समीकरण
    विशेषज्ञों का मानना है कि UAE द्वारा कर्ज रोलओवर से इनकार केवल आर्थिक नहीं, बल्कि बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों का भी संकेत हो सकता है। खासकर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान से जुड़े हालात के बीच यह कदम अहम माना जा रहा है। हालांकि पाकिस्तान ने इसे सामान्य वित्तीय प्रक्रिया बताया है।

    सऊदी-पाकिस्तान रक्षा सहयोग भी मजबूत
    इस बीच सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच रणनीतिक साझेदारी भी गहरी होती दिख रही है। सऊदी रक्षा मंत्रालय के अनुसार, पाकिस्तानी वायुसेना का एक दल पूर्वी क्षेत्र स्थित किंग अब्दुलअजीज एयर बेस पर तैनात किया गया है। इसमें लड़ाकू और सहायक विमान शामिल हैं, जिनका उद्देश्य सैन्य समन्वय और ऑपरेशनल तैयारियों को मजबूत करना है।

    IMF और कर्ज भुगतान की दोहरी चुनौती
    पाकिस्तान पर इस महीने अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को 1.3 अरब डॉलर के बॉन्ड का भुगतान भी करना है। साथ ही वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 1.2 अरब डॉलर की अगली किस्त का इंतजार कर रहा है।

    आर्थिक जानकारों का कहना है कि UAE के अचानक रुख ने पाकिस्तान की वित्तीय योजना को झटका दिया है। अब देश को विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट से बचने और आर्थिक संतुलन बनाए रखने के लिए सऊदी अरब सहित अन्य सहयोगी देशों पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है।

    कुल मिलाकर, मौजूदा हालात में पाकिस्तान के लिए आर्थिक मोर्चे पर चुनौतियां बढ़ती दिख रही हैं, और उसकी नजरें एक बार फिर सऊदी समर्थन पर टिकी हैं।

  • ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने की हामी भरकर संकट में फंसा पाकिस्तान…. फीस के लिए भी लेना पड़ेगा कर्ज

    ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने की हामी भरकर संकट में फंसा पाकिस्तान…. फीस के लिए भी लेना पड़ेगा कर्ज


    इस्लामाबाद।
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने अपनी नई वैश्विक नीतियों (New Global Policies) से पिछले एक साल में हालात को काफी बदल दिया है। यूरोपीय देशों समेत दुनिया के तमाम मुल्क अब अमेरिका का विकल्प खोज रहे हैं। इसमें सबसे बड़ी परेशानी पाकिस्तान के लिए खड़ी हो गई है। एक तरफ वह ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (Trump’s ‘Board of Peace’) में शामिल होने के लिए हामी भर चुका है, लेकिन इसकी फीस चुकाने के लिए शायद उसे एक बार फिर से कर्ज का सहारा लेना पड़े। दावोस में ट्रंप द्वारा घोषित किए गए इस बोर्ड में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ (Pakistan’s Prime Minister Shahbaz Sharif) भी शामिल हुए। इस बोर्ड का मुख्य उद्देश्य मध्य-पूर्व में शांति को स्थापित करके गाजा के पुननिर्माण का है। लेकिन पाकिस्तान के लिए एक परेशानी का सबब बन गया है। एक तरफ तो पैसे वाली बात है, दूसरी तरफ घरेलू स्तर पर भी शहबाज सरकार को विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

    पाकिस्तान में इसका विरोध होने का सबसे बड़ा कारण इस बोर्ड की संरचना पर है। इस बोर्ड के अध्यक्ष ट्रंप होंगे और सदस्यता और इसकी दिशा तय करने का पूरा हक उनके पास ही होगा। इस बोर्ड को संयुक्त राष्ट्र संघ के एक विकल्प के तौर पर भी देखा जा रहा है। हालांकि, पाकिस्तानी विपक्ष का कहना है कि आखिर ट्रंप के कार्यकाल के बाद इस बोर्ड का क्या होगा इस पर बहुत बड़ा संशय है। क्योंकि यह बोर्ड मुख्य तौर पर ट्रंप के भरोसेमंद देशों का एक समूह नजर आता है।


    ट्रंप के भरोसेमंद पिछलग्गू देश बोर्ड ऑफ पीस में शामिल

    इस बोर्ड में अब तक दो दर्जन से ज्यादा देशों ने शामिल होने की पेशकश की है। हालांकि ट्रंप ने लगभग 100 से ज्यादा देशों को इसके लिए बुलाया था, लेकिन भारत समेत ज्यादातर देशों ने इससे दूरी ही बनाए रखी। वर्तमान में इसमें हंगरी, बुल्गारिया, इजराइल, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र, तुर्की, बेलारूस, बहरीन, जॉर्डन, कतर, आर्मेनिया, अजरबैजान, मोरक्को, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, कोसोवो, उज्बेकिस्तान, कजाखस्तान, पैराग्वे और वियतनाम शामिल हैं।


    नाटो ने किया किनारा

    सबसे बड़ी और दिलचस्प बात है कि इसमें अमेरिका के अलावा संयुक्त राष्ट्र स्थायी सुरक्षा समिति का कोई और देश शामिल नहीं है और न ही नाटो सदस्य देशों ने इसमें शामिल होने का उत्साह दिखाया है। यहां तक की यूरोप में ट्रंप समर्थक मानी जाने वाली इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी ने भी इससे दूरी बनाकर रखी है। इसके अलावा अमेरिका से सीमा साझा करने वाले कनाडा ने भी इसको नकार दिया है और तो और पीएम कार्नी की बातों से ट्रंप इतने नाराज हुए कि उन्होंने उनको दिया हुआ निमंत्रण भी कैंसिल कर दिया।

    दरअसल, इस बोर्ड में शामिल होने को लेकर देशों के बीच असमंजस की स्थिति है। इसमें ट्रंप अमेरिका का भी नहीं, बल्कि स्वयं का एकाधिकार चाहते हैं। विदेशी मामलों के जानकारों की मानें तो ट्रंप इसके जरिए सीधे-सीधे संयुक्त राष्ट्र संघ के वर्चस्व को चुनौती देना चाहते हैं। एक बार यह प्रयास गाजा में सफल हुआ तो उसके बाद इसे दुनिया के दूसरे युद्धों और मसलों की तरफ भी आगे बढ़ाने की कोशिश है।


    एक अरब डॉलर है फीस

    इस बोर्ड के लिए ट्रंप का सीधा प्रयास है कि 1 अरब डॉलर दीजिए और अपने लिए एक सीट ले लीजिए। उनके मुताबिक इस पैसे का इस्तेमाल गाजा के पुनर्निर्माण के लिए होगा। बोर्ड के चार्टर के मसौदे के मुताबिक प्रत्येक सदस्य देश अधिकतम तीन वर्षों के लिए कार्यकाल निभाएगा, जिसे अध्यक्ष द्वारा नवीनीकृत किया जा सकता है। हालांकि, जो देश पहले वर्ष के भीतर 1 अरब डॉलर से अधिक नकद योगदान देते हैं, उन पर यह तीन साल की सीमा लागू नहीं होगी।”

    पाकिस्तान इस बोर्ड में शामिल होने की पुष्टि कर चुका है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा है कि संघीय कैबिनेट ने इस फैसले को मंजूरी दे दी है। उन्होंने लंदन में पाकिस्तान हाई कमीशन के बाहर बताया कि दावोस में उन्हें ट्रंप के निमंत्रण पर चर्चा में बुलाया गया था और वहीं उनसे बोर्ड में शामिल होने को कहा गया। लेकिन पाकिस्तान के लिए पैसा भी एक परेशानी है। बाकी जो इस्लामिक देश इसमें शामिल हुए हैं, वह पैसा चुकाने की स्थिति में हैं, लेकिन पाकिस्तान के साथ ऐसा नहीं है।


    विदेशी कर्ज से बेहाल है पाकिस्तान

    पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लगातार दबाव में है, छोटी-छोटी चीजों के लिए भी वह विदेशी कर्ज पर निर्भर है। हाल ही में आईएमएफ ने पाकिस्तान के लिए 1.2 अरब डॉलर के फंड की मंजूरी दी है। आईएमएफ की इस कार्यक्रम के तहत कुल मिलाकर पाकिस्तान को 3.3 अरब डॉलर दिए जाने हैं। अभी तक पाकिस्तान के ऊपर आईएमएफ का 7.35 अरब डॉलर से अधिक का कर्ज है।

    पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की हालात इस कदर पतली है कि अभी उसके ऊपर जीडीपी का 70 फीसदी से अधिक सार्वजनिक कर्ज है। यूएई और चीन से मिले कई कर्जों को पाकिस्तान चुकाने की स्थिति में नहीं होने की वजह से उन्हें रोल ओवर करने की मांग कर रहा है। 1958 से लेकर अब तक आईएमएफ करीब 12 बार पाकिस्तान की बिगड़ती अर्थव्यवस्था को संभालने की मदद कर चुका है। 2023 में जब पाकिस्तान पूरी तरह से डिफॉल्ट होने की स्थिति में आ गया था, तब भी आईएमएफ ने ही उसे अरबों डॉलर की मदद दी थी। इसके बाद पिछले साल भी कुछ शर्तों पर पाकिस्तान को 7 अरब डॉलर मिले थे।

    पाकिस्तान अपनी वैश्विक राजनीति को चमकाने के लिए भले ही बड़े-बड़े दांव खेलने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इतना साफ है कि उसकी अर्थव्यवस्था इसके लिए तैयार नहीं है। हालांकि, भारत के साथ ईयू और रूस के रिश्तों को देखते हुए और इन सभी देशों की बोर्ड ऑफ पीस से दूरी अमेरिका को पाकिस्तान के करीब रखने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर भी लगातार अपने चाटुकारिता से ट्रंप को खुश करने में लगे रहते हैं। अब पाकिस्तान इसके पैसे चुकाएगा या ट्रंप से उधार की बात करेगा यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इतना तय है कि अगर वह पाकिस्तानी जनता के पैसे को इसमें खर्च करता है, तो इस्लामाबाद में इससे विरोध की लहर तो जरूर उठेगी।