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  • लॉजिस्टिक्स की बढ़ती लागत के बावजूद भारत का चावल निर्यात मजबूत, वैश्विक खाद्य सुरक्षा में बढ़ रही अहमियत

    लॉजिस्टिक्स की बढ़ती लागत के बावजूद भारत का चावल निर्यात मजबूत, वैश्विक खाद्य सुरक्षा में बढ़ रही अहमियत

    नई दिल्ली ।वैश्विक बाजार में भारत की चावल निर्यात संबंधी स्थिति मजबूत बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय चावल व्यापार में लगभग 40 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ भारत दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक है। हालांकि, समुद्री मार्गों पर बढ़ते तनाव, शिपिंग समय में वृद्धि, बीमा खर्च और परिवहन शुल्क में बढ़ोतरी जैसी चुनौतियां निर्यात उद्योग को प्रभावित कर रही हैं। इसके बावजूद सरकार और उद्योग जगत निर्यात को सुचारू बनाए रखने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं।

    नई दिल्ली में आयोजित भारत अंतरराष्ट्रीय चावल सम्मेलन 2026 में कृषि क्षेत्र, निर्यात कारोबार, व्यापार नीति और खाद्य गुणवत्ता से जुड़े विशेषज्ञों ने उद्योग की स्थिति पर चर्चा की। सम्मेलन में किसानों से लेकर निर्यातकों, खरीदारों, परीक्षण प्रयोगशालाओं और अन्य सेवा प्रदाताओं तक पूरी आपूर्ति शृंखला से जुड़े प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। चर्चा का मुख्य केंद्र वैश्विक बाजार में भारत की भूमिका, निर्यात लागत और भविष्य में कारोबार की संभावनाएं रहीं।

    वाणिज्य मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण के महाप्रबंधक तरुण बजाज के अनुसार, भारत का चावल निर्यात वैश्विक बाजार में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। उन्होंने कहा कि देश की लगभग 40 प्रतिशत हिस्सेदारी को देखते हुए ऐसा मंच जरूरी है, जहां किसान, व्यापारी, निर्यातक और उपभोक्ता से जुड़ी पूरी मूल्य शृंखला के प्रतिनिधि एक साथ आकर समस्याओं और उनके समाधान पर विचार कर सकें।

    उन्होंने समुद्री परिवहन को मौजूदा समय की प्रमुख चुनौती बताया। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और रेड सी जैसे क्षेत्रों में तनाव के कारण जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। इससे माल पहुंचने में अधिक समय लग रहा है और बीमा तथा शिपिंग की लागत भी बढ़ रही है। इन परिस्थितियों में केंद्र और राज्य सरकारों तथा उद्योग जगत के समन्वय से निर्यात व्यवस्था को बनाए रखने के प्रयास किए जा रहे हैं।

    राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के कार्यकारी निदेशक डॉ. राजीव कुमार ने भी भारतीय निर्यातकों की मजबूत स्थिति का उल्लेख किया। उनके मुताबिक, भारत की वैश्विक बाजार हिस्सेदारी लंबे समय से लगभग 35 से 40 प्रतिशत के बीच बनी हुई है। उन्होंने कहा कि थाईलैंड और वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में भारत में सड़क परिवहन पर अधिक निर्भरता होने से लागत बढ़ती है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में अधिक मांग वाले चावल के उत्पादन को प्रोत्साहित करना जरूरी है, ताकि निर्यातकों को बेहतर मूल्य मिल सके।

    सम्मेलन में चावल उद्योग से जुड़ी कंपनियों और संस्थाओं ने भी अपने अनुभव साझा किए। ईवाई के पार्टनर प्रशांत रायजादा ने इसे क्षेत्र के विशेषज्ञों, निर्यातकों और नीति निर्माताओं के बीच विचार-विमर्श का उपयोगी अवसर बताया। कृभको एग्री के मुख्य प्रबंधक राजेश पहारिया जैन के अनुसार, इस बार सम्मेलन में भागीदारी और गतिविधियों का दायरा बढ़ा है। इसमें पैकेजिंग सामग्री बनाने वाली कंपनियों से लेकर सर्वेयर, कस्टम हाउस एजेंट, किसान और निर्यातक शामिल हुए।

    राजेश पहारिया जैन ने बताया कि मौसम संबंधी चुनौतियों और उत्पादन में संभावित कमी की आशंकाओं के बावजूद भारतीय खाद्य निगम के पास लगभग 5.5 से 6 करोड़ टन का बफर स्टॉक मौजूद है। उन्होंने निर्यात उद्योग को सहायता देने के लिए ब्याज संबंधी समर्थन और अतिरिक्त प्रोत्साहन उपलब्ध कराने की मांग भी रखी।

    तकनीक और बाजार संबंधी जानकारी की भूमिका पर भी चर्चा हुई। एग्रीगुरु ऑनलाइन की संस्थापक हंसा सिंह राक्या ने बताया कि उनकी कंपनी ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित बाजार सूचना मंच विकसित किया है। इसके माध्यम से खरीदारों और विक्रेताओं को कीमतों, माल ढुलाई खर्च, व्यापार नियमों और वैश्विक घटनाक्रमों की जानकारी उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है।

    यूरोफिन्स एनालिटिकल सर्विसेज इंडिया और एसजीएस फूड टेस्टिंग सर्विसेज के प्रतिनिधियों ने भी गुणवत्ता परीक्षण, शोध संस्थानों के सहयोग और खरीदार-विक्रेता संवाद के महत्व पर जोर दिया। उनके अनुसार, अंतरराष्ट्रीय मानकों और नई व्यापारिक आवश्यकताओं की जानकारी साझा करने से गुणवत्ता संबंधी अस्वीकृतियों और सीमा शुल्क से जुड़ी परेशानियों को कम करने में मदद मिल सकती है।

    विशेषज्ञों की चर्चाओं से स्पष्ट हुआ कि भारत के सामने वैश्विक चावल बाजार में अपनी मजबूत स्थिति बनाए रखने के साथ निर्यात लागत घटाने, परिवहन व्यवस्था सुधारने और गुणवत्ता मानकों के अनुरूप कारोबार बढ़ाने की चुनौती है। इन क्षेत्रों में बेहतर समन्वय से भारत की वैश्विक खाद्य सुरक्षा में भूमिका को और मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

  • दुबई में सीएम मोहन यादव ने वैश्विक उद्योगपतियों से की मुलाकात, मध्य प्रदेश में निवेश के लिए रखे कई प्रस्ताव

    दुबई में सीएम मोहन यादव ने वैश्विक उद्योगपतियों से की मुलाकात, मध्य प्रदेश में निवेश के लिए रखे कई प्रस्ताव

    मध्य प्रदेश: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दुबई में आयोजित एन्युअल इन्वेस्टमेंट मीटिंग के तीसरे दिन 8 सितंबर को संयुक्त अरब अमीरात के प्रमुख निवेशकों और उद्यमियों के साथ वन-टू-वन बैठकें कीं। इन बैठकों में मध्य प्रदेश में ऊर्जा, अधोसंरचना, लॉजिस्टिक्स, शिक्षा, तकनीक, ग्रीन एनर्जी और नगरीय विकास सहित विभिन्न क्षेत्रों में निवेश की संभावनाओं पर चर्चा हुई। मुख्यमंत्री ने उद्योग समूहों के प्रतिनिधियों को वर्ष 2027 में होने वाली ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के लिए आमंत्रित भी किया।

    मुख्यमंत्री ने निवेशकों के सामने मध्य प्रदेश की औद्योगिक संभावनाओं को रखते हुए कहा कि राज्य देश के मध्य में स्थित होने के कारण सड़क, रेल और हवाई संपर्क के लिहाज से सुविधाजनक स्थिति में है। उन्होंने प्रदेश में उपलब्ध औद्योगिक अधोसंरचना, पर्याप्त ऊर्जा और कुशल मानव संसाधन को निवेश के लिए महत्वपूर्ण आधार बताया। मुख्यमंत्री के अनुसार मध्य प्रदेश से देश के विभिन्न हिस्सों तक उत्पादों की पहुंच सुगम और त्वरित है।

    क्रेसेंट एंटरप्राइजेज के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बद्र जाफर के साथ बैठक में वेयरहाउसिंग, लॉजिस्टिक्स और प्रमुख उत्पादन क्लस्टर्स से जुड़े अवसरों पर चर्चा हुई। मुख्यमंत्री ने तकनीक आधारित उद्यमशीलता और स्टार्टअप क्षेत्र में निवेश को प्रोत्साहित करने की बात कही। जाफर ने शहरी अधोसंरचना, सूचना प्रौद्योगिकी, संसाधनों के प्रभावी उपयोग और तकनीक हस्तांतरण में दीर्घकालिक निवेश में रुचि दिखाई। ऊर्जा और तकनीक में नवाचार पर भी चर्चा हुई।

    डीपी वर्ल्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रिजवान सूमार के साथ बैठक में लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन पर बातचीत हुई। मुख्यमंत्री ने पोवारखेड़ा लॉजिस्टिक्स कंपोजिट हब को अंतरदेशीय लॉजिस्टिक्स के प्रमुख प्रवेश द्वार के रूप में विकसित करने की संभावना बताई। मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स, वेयरहाउसिंग और कोल्ड चेन सुविधाओं के माध्यम से किसानों, एफपीओ, एमएसएमई और उद्योगों को बेहतर व्यापार तथा निर्यात सहायता देने पर चर्चा हुई।

    राणा होल्डिंग्स के चेयरमैन-मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. दर्शन सिंह राणा के साथ बैठक में स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग, डेटा सेंटर, ग्रीन एनर्जी, ग्रीन हाइड्रोजन, ई-मोबिलिटी और कृषि मशीनरी में निवेश संभावनाओं पर चर्चा हुई।

    जेम्स एजुकेशन कंपनी के चेयरमैन-फाउंडर सनी वर्की के साथ बैठक में शिक्षा क्षेत्र में निवेश पर विचार हुआ। कंपनी ने मध्य प्रदेश के प्रमुख और विकासशील शहरों में अंतरराष्ट्रीय स्तर के K-12 स्कूल कैंपस स्थापित करने में रुचि दिखाई। इन संस्थानों में विद्यार्थियों के कौशल विकास के साथ स्थानीय जरूरतों और भविष्य की शिक्षा आवश्यकताओं के अनुरूप राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय पाठ्यक्रम लागू करने की योजना पर चर्चा हुई।

    ब्यूमर्क कॉर्पोरेशन के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन और सीईओ सिद्धार्थ बालाचंद्रन ने इंफ्रास्ट्रक्चर, हेल्थकेयर, तकनीक और ग्रीन एनर्जी सहित विभिन्न क्षेत्रों में निवेश की इच्छा जताई।

    शराफ ग्रुप के प्रेसिडेंट-सीईओ श्याम कपूर के साथ शिपिंग, लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन पर चर्चा हुई। इंदौर और पीथमपुर क्षेत्र में रेल-साइडिंग वाले लॉजिस्टिक्स पार्क की स्थापना के प्रस्ताव पर विचार हुआ। इसमें 30 से 50 मिलियन अमेरिकी डॉलर के निवेश और करीब 300 से 600 रोजगार अवसरों की संभावना बताई गई।

    वीएफएस ग्लोबल के वैश्विक प्रमुख अमित साइचर के साथ वीजा सेवाओं, पर्यटन, रोजगार और युवाओं के कौशल विकास पर चर्चा हुई। भोपाल और इंदौर में वीजा आवेदन सेवाओं का विस्तार करने तथा युवाओं के लिए यात्रा, पर्यटन और हॉस्पिटैलिटी से जुड़े प्रशिक्षण कार्यक्रमों पर विचार किया गया।

    चोइथराम समूह के अध्यक्ष एल.टी. पगरानी के साथ आधुनिक व्यापारिक अधोसंरचना और रिटेल क्षेत्र में निवेश पर चर्चा हुई। समूह मध्य प्रदेश के प्रमुख शहरों में सुपरमार्केट और आधुनिक किराना रिटेल केंद्र स्थापित करने का इच्छुक है। साथ ही स्थानीय किसानों और उत्पादकों से कृषि तथा प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों की खरीद, खाद्य प्रसंस्करण, पैकेजिंग और निजी लेबल विनिर्माण को बढ़ावा देने की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई।

  • अदाणी पोर्ट्स मुंद्रा में शुरू करेगी समर्पित खाली कंटेनर यार्ड, लॉजिस्टिक्स क्षमता और आपूर्ति श्रृंखला दक्षता बढ़ाने पर जोर

    अदाणी पोर्ट्स मुंद्रा में शुरू करेगी समर्पित खाली कंटेनर यार्ड, लॉजिस्टिक्स क्षमता और आपूर्ति श्रृंखला दक्षता बढ़ाने पर जोर

    नई दिल्ली । अदाणी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन लिमिटेड ने मुंद्रा में समर्पित एम्प्टी कंटेनर यार्ड यानी खाली कंटेनर यार्ड शुरू करने की घोषणा की है। इस सुविधा के साथ एकीकृत वेयरहाउसिंग व्यवस्था भी विकसित की जाएगी। कंपनी का उद्देश्य कंटेनर प्रबंधन की क्षमता बढ़ाने के साथ आयात और निर्यात से जुड़ी लॉजिस्टिक्स प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित और प्रभावी बनाना है।

    प्रस्तावित यार्ड में खाली कंटेनरों के पूरे जीवनचक्र से जुड़ी सेवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। इनमें कंटेनरों का भंडारण, रखरखाव, निरीक्षण और निर्यातकों तथा कंटेनर फ्रेट स्टेशनों तक उनकी आवाजाही शामिल होगी। कंपनी के अनुसार, एक ही व्यवस्था के तहत इन सेवाओं के उपलब्ध होने से कंटेनरों के संचालन में बेहतर समन्वय स्थापित किया जा सकेगा।

    यह पहल कंपनी की एंबिशन 2031 रणनीति का हिस्सा है। इसके तहत अदाणी पोर्ट्स अपने कंटेनर संचालन और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क का विस्तार करने की दिशा में काम कर रही है। कंपनी अगले पांच वर्षों में अपने नेटवर्क में 60 लाख टीईयू से अधिक अतिरिक्त कंटेनर हैंडलिंग क्षमता जोड़ने की योजना पर आगे बढ़ रही है। इसमें मुंद्रा पोर्ट की भूमिका महत्वपूर्ण रहने वाली है।

    कंपनी के पूर्णकालिक निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी अश्विनी गुप्ता के अनुसार, मुंद्रा में स्थापित किया जा रहा समर्पित एम्प्टी कंटेनर यार्ड कंटेनर इकोसिस्टम की दक्षता बढ़ाने में मदद करेगा। इसके संचालन में कंपनी के साथ साझेदार, कंटेनर फ्रेट स्टेशन और शिपिंग लाइनें भी भूमिका निभा सकती हैं।

    इस सुविधा से कंटेनरों के टर्नअराउंड टाइम को कम करने और उनकी अनावश्यक आवाजाही घटाने का लक्ष्य है। इसके अलावा, कंटेनरों के बेहतर प्रबंधन से लॉजिस्टिक्स लागत को अनुकूलित करने में मदद मिलने की उम्मीद है। कंपनी का मानना है कि ऐसी सुविधाएं व्यापार से जुड़े बुनियादी ढांचे को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

    मुंद्रा पोर्ट पहले से ही देश के कंटेनर कारोबार में प्रमुख स्थान रखता है। वित्त वर्ष 2025-26 तक भारत के कंटेनर बाजार में अदाणी पोर्ट्स की हिस्सेदारी 45.5 प्रतिशत बताई गई है। अकेले मुंद्रा पोर्ट देश के करीब 35 प्रतिशत कंटेनर व्यापार को संभालता है। इस वजह से इसे भारत का सबसे बड़ा कंटेनर हैंडलिंग बंदरगाह माना जाता है।

    कंपनी के मुताबिक, मुंद्रा में हर साल लगभग 16 लाख टीईयू खाली कंटेनरों का प्रबंधन किया जाता है। इस बड़े परिचालन आधार को देखते हुए समर्पित यार्ड की स्थापना से खाली कंटेनरों के भंडारण और आवाजाही के प्रबंधन को अधिक सुव्यवस्थित करने में मदद मिल सकती है।

    अदाणी पोर्ट्स ने कहा कि यह पहल प्रौद्योगिकी आधारित और अधिक कुशल लॉजिस्टिक्स व्यवस्था विकसित करने की सरकारी दिशा के अनुरूप है। कंपनी इसे ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को मजबूत करने और व्यापारिक गतिविधियों के लिए बुनियादी ढांचा बेहतर बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण मान रही है।

    वर्तमान में एपीएसईजेड 16 रणनीतिक रूप से स्थित बंदरगाहों और टर्मिनलों का संचालन करता है। कंपनी के पास 136 जहाजों का विविध समुद्री बेड़ा और एकीकृत लॉजिस्टिक्स क्षमता है। इसकी कार्गो हैंडलिंग क्षमता 653 मिलियन टन प्रतिवर्ष है और भारत के कुल बंदरगाह कार्गो वॉल्यूम में इसकी हिस्सेदारी करीब 27 प्रतिशत है। कंपनी ने वर्ष 2030 तक एक अरब टन थ्रूपुट हासिल करने का लक्ष्य रखा है।

  • विझिंजम पोर्ट से मंगलवार को शुरू होगा पूर्ण निर्यात-आयात संचालन, केरल के वैश्विक व्यापार को मिलेगी नई रफ्तार

    विझिंजम पोर्ट से मंगलवार को शुरू होगा पूर्ण निर्यात-आयात संचालन, केरल के वैश्विक व्यापार को मिलेगी नई रफ्तार

    नई दिल्ली । केरल का विझिंजम अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह मंगलवार से पूर्ण निर्यात-आयात संचालन के साथ अपने विकास के नए चरण में प्रवेश करेगा। भारत के पहले गहरे पानी वाले कंटेनर ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह के रूप में विकसित किए गए विझिंजम में अब ट्रांसशिपमेंट गतिविधियों के साथ प्रत्यक्ष वाणिज्यिक व्यापार संचालन भी शुरू होगा। इसे केरल की अर्थव्यवस्था, निर्यात क्षमता और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है।

    पूर्ण निर्यात-आयात संचालन की शुरुआत के अवसर पर सुबह 10:45 बजे पहले निर्यात कंटेनर को रवाना किया जाएगा। कार्यक्रम में केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। इस शुरुआत के साथ केरल के निर्यातकों को अपने माल को अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाने के लिए दूसरे ट्रांसशिपमेंट केंद्रों पर निर्भरता कम करने का विकल्प मिलेगा।

    अब तक विझिंजम मुख्य रूप से ट्रांसशिपमेंट हब के तौर पर विकसित किया गया है। नई व्यवस्था के बाद यहां से केरल और देश के अन्य हिस्सों के निर्यातक सीधे विदेशी बाजारों के लिए कंटेनर भेज सकेंगे। इससे कोलंबो, सिंगापुर और दुबई जैसे पारंपरिक ट्रांसशिपमेंट केंद्रों के जरिए माल भेजने की आवश्यकता कुछ मामलों में कम हो सकती है। इसका असर परिवहन समय और लॉजिस्टिक्स लागत पर भी पड़ने की उम्मीद है।

    विझिंजम की सबसे बड़ी विशेषताओं में इसकी प्राकृतिक समुद्री गहराई और रणनीतिक भौगोलिक स्थिति शामिल है। बंदरगाह में करीब 20 से 24 मीटर की प्राकृतिक गहराई है, जिससे यहां बड़े कंटेनर जहाजों को संभालने की क्षमता विकसित हुई है। यह अंतरराष्ट्रीय ईस्ट-वेस्ट शिपिंग कॉरिडोर से लगभग 10 समुद्री मील की दूरी पर स्थित है, जिससे वैश्विक समुद्री व्यापार के प्रमुख मार्गों तक इसकी पहुंच मजबूत होती है।

    परीक्षण संचालन के दौरान स्पेन के वालेंसिया भेजा गया पहला निर्यात कंटेनर इस क्षमता का प्रदर्शन कर चुका है। अब नियमित निर्यात-आयात संचालन शुरू होने के बाद कृषि उत्पाद, मसाले, काजू, समुद्री उत्पाद, हथकरघा और वस्त्र जैसे क्षेत्रों से जुड़े कारोबारियों को इसका लाभ मिलने की संभावना है। खास तौर पर छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच आसान होने की उम्मीद है।

    बंदरगाह के विस्तार का असर केवल समुद्री व्यापार तक सीमित रहने की संभावना नहीं है। वेयरहाउस, कोल्ड स्टोरेज, कंटेनर फ्रेट स्टेशन और लॉजिस्टिक्स पार्क जैसी सहायक सुविधाओं की मांग बढ़ सकती है। इससे तिरुवनंतपुरम और आसपास के क्षेत्रों में निवेश तथा रोजगार के नए अवसर बनने की संभावना है।

    राज्य सरकार इस अवसर के साथ बंदरगाह आधारित आर्थिक विकास को गति देने के लिए मिशन समुद्र शुरू कर रही है। इसके तहत विझिंजम मैरीटाइम इकोनॉमिक रीजन विकसित करने की योजना है। इसमें आठ औद्योगिक क्लस्टर और तीन नए शहरों को विकसित करने के साथ केरल की करीब 600 किलोमीटर लंबी तटरेखा को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है।

    सरकार ने इस पहल के लिए 400 करोड़ रुपये का कैटेलिटिक फंड निर्धारित किया है। इसका इस्तेमाल बंदरगाह और कनेक्टिविटी, लॉजिस्टिक्स, औद्योगिक क्लस्टर, नए शहरों, कार्यक्रम प्रबंधन और क्षमता निर्माण से जुड़ी 14 उप-योजनाओं में किया जाएगा। वर्ष 2031 तक निजी निवेश के जरिए सार्वजनिक निवेश की तुलना में कई गुना अधिक आर्थिक गतिविधि पैदा करने की उम्मीद जताई गई है।

    विझिंजम के संचालन का जिम्मा अदाणी पोर्ट्स के पास है। मजबूत सड़क और रेल संपर्क के साथ बंदरगाह के विस्तार से केरल के विनिर्माण, सेवा और निर्यात क्षेत्रों को नई संभावनाएं मिल सकती हैं। पूर्ण निर्यात-आयात संचालन शुरू होने के बाद विझिंजम केवल ट्रांसशिपमेंट केंद्र नहीं, बल्कि केरल के लिए वैश्विक व्यापार और औद्योगिक विकास का प्रमुख द्वार बनने की दिशा में आगे बढ़ेगा।

  • होर्मुज और लाल सागर में बढ़ते तनाव से भारतीय कारोबार पर खतरा, निर्यात-आयात कंपनियों की लागत बढ़ने की आशंका

    होर्मुज और लाल सागर में बढ़ते तनाव से भारतीय कारोबार पर खतरा, निर्यात-आयात कंपनियों की लागत बढ़ने की आशंका

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव का असर अब वैश्विक व्यापार के साथ-साथ भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ने की आशंका जताई जा रही है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, यदि होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में लंबे समय तक व्यवधान बना रहता है, तो भारतीय निर्यातकों और आयातकों की लागत बढ़ सकती है। इसका सबसे अधिक प्रभाव उन छोटे और मझोले कारोबारियों पर पड़ने की संभावना है, जिनके लिए बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों तक पहुंचाना आसान नहीं होता।

    रिपोर्ट के मुताबिक भारत के कच्चे तेल के आयात का बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता है। इसके अलावा एलएनजी और एलपीजी जैसी ऊर्जा आपूर्ति भी काफी हद तक इसी मार्ग पर निर्भर करती है। ऐसे में इस समुद्री रास्ते पर किसी भी तरह का व्यवधान देश की ऊर्जा सुरक्षा और आयात लागत दोनों को प्रभावित कर सकता है।

    विश्लेषण में कहा गया है कि यदि होर्मुज और लाल सागर दोनों समुद्री मार्ग एक साथ प्रभावित होते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें तेज़ी से बढ़ सकती हैं। इससे ईंधन महंगा होने के साथ-साथ परिवहन, विनिर्माण और ऊर्जा आधारित उद्योगों की लागत में भी उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। इसका सीधा असर महंगाई और औद्योगिक उत्पादन पर भी देखने को मिल सकता है।

    रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक समुद्री परिवहन पहले से ही दबाव में है। यदि जहाजों को वैकल्पिक मार्गों से होकर लंबी दूरी तय करनी पड़ी, तो सामान की डिलीवरी में दो से तीन सप्ताह तक अतिरिक्त समय लग सकता है। इससे मालभाड़ा, समुद्री बीमा प्रीमियम और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी अन्य लागतों में भी बढ़ोतरी होने की संभावना है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा क्षेत्र के अलावा ऑटोमोबाइल, रसायन, उर्वरक, धातु और विनिर्माण जैसे उद्योग भी इस स्थिति से प्रभावित हो सकते हैं। कच्चे माल की बढ़ी हुई लागत कंपनियों के परिचालन खर्च को बढ़ाएगी, जिससे उनके मुनाफे पर दबाव आएगा। साथ ही सप्लाई चेन में देरी होने से उत्पादन और वितरण की गति भी प्रभावित हो सकती है।

    रिपोर्ट के अनुसार बड़ी कंपनियां अपने विविध आपूर्ति स्रोतों, बेहतर वित्तीय क्षमता और मजबूत वैश्विक नेटवर्क के कारण ऐसे झटकों का सामना अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से कर सकती हैं। वहीं छोटे और मझोले उद्यमों के सामने कार्यशील पूंजी की जरूरत बढ़ने, नकदी प्रवाह पर दबाव और लाभप्रदता में कमी जैसी चुनौतियां अधिक गंभीर रूप से सामने आ सकती हैं।

    विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि यदि समुद्री मार्गों में व्यवधान लंबे समय तक बना रहता है, तो इसका असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक आपूर्ति शृंखला, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों पर भी दिखाई देगा। ऐसे हालात में कंपनियों को वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत, बेहतर जोखिम प्रबंधन और लॉजिस्टिक्स रणनीति अपनाने की आवश्यकता होगी, ताकि संभावित आर्थिक झटकों के प्रभाव को कम किया जा सके।

  • होर्मुज मार्ग खुलने से भारत को मिलेगा बड़ा फायदा, ईंधन से लेकर दवाइयों और खाद्य वस्तुओं तक घट सकती है महंगाई

    होर्मुज मार्ग खुलने से भारत को मिलेगा बड़ा फायदा, ईंधन से लेकर दवाइयों और खाद्य वस्तुओं तक घट सकती है महंगाई

    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव में कमी आने और शांति प्रक्रिया आगे बढ़ने की संभावना ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों में राहत का माहौल बनाया है। इस घटनाक्रम का सबसे बड़ा लाभ उन देशों को मिल सकता है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयातित कच्चे तेल पर निर्भर हैं। भारत भी ऐसे देशों में प्रमुख है, जहां ऊर्जा आयात का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है। ऐसे में क्षेत्रीय स्थिरता बढ़ने और समुद्री आपूर्ति मार्गों के सामान्य होने से भारतीय अर्थव्यवस्था को महत्वपूर्ण राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

    भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है। पश्चिम एशिया से आने वाले तेल और गैस की आपूर्ति में किसी भी प्रकार की बाधा का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ता है। हाल के महीनों में क्षेत्रीय तनाव के कारण वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता देखी गई थी, जिससे आयात लागत बढ़ी और महंगाई संबंधी चिंताएं भी बढ़ीं। अब यदि ऊर्जा आपूर्ति मार्ग पूरी तरह सामान्य होते हैं तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ सकती है, जिससे कीमतों पर दबाव कम होगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आने पर भारत में पेट्रोल और डीजल की लागत पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि खुदरा कीमतों में किसी भी बदलाव का निर्णय तेल विपणन कंपनियों और बाजार परिस्थितियों पर निर्भर करेगा, लेकिन आयात लागत कम होने से उपभोक्ताओं को राहत मिलने की संभावना मजबूत होती है। इससे परिवहन क्षेत्र की लागत भी घट सकती है, जिसका लाभ व्यापार और उद्योग दोनों को मिलेगा।

    एलपीजी क्षेत्र में भी स्थिति बेहतर होने की उम्मीद है। भारत घरेलू और व्यावसायिक उपयोग के लिए बड़ी मात्रा में एलपीजी का आयात करता है। आपूर्ति सुचारु होने से गैस की उपलब्धता बेहतर होगी और कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। इससे सरकार को सब्सिडी प्रबंधन में भी मदद मिल सकती है तथा उपभोक्ताओं को अप्रत्यक्ष राहत मिलने की संभावना बनेगी।

    कच्चे तेल और पेट्रोकेमिकल उत्पादों की कीमतों में कमी का असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहता। प्लास्टिक, पैकेजिंग सामग्री, डिटर्जेंट, साबुन, सिंथेटिक फाइबर और कई घरेलू उपयोग की वस्तुओं के उत्पादन में पेट्रोकेमिकल्स का व्यापक उपयोग होता है। लागत घटने पर विनिर्माण क्षेत्र को राहत मिल सकती है और समय के साथ उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में भी नरमी देखी जा सकती है।

    कृषि क्षेत्र को भी इससे लाभ मिलने की संभावना है। डीजल की लागत कम होने पर सिंचाई, कृषि मशीनरी संचालन और माल ढुलाई का खर्च घट सकता है। फल, सब्जियों और अन्य कृषि उत्पादों को एक राज्य से दूसरे राज्य तक पहुंचाने में परिवहन लागत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। लागत कम होने पर खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

    इसके अतिरिक्त दवा उद्योग, वस्त्र उद्योग और ऑटोमोबाइल क्षेत्र को भी राहत मिल सकती है। सिंथेटिक रसायनों और कच्चे माल की लागत घटने से उत्पादन व्यय कम होगा, जिससे कई उत्पादों की कीमतों में स्थिरता या कमी आने की संभावना बढ़ेगी। विमानन क्षेत्र के लिए भी यह सकारात्मक संकेत माना जा रहा है क्योंकि विमान ईंधन की लागत एयरलाइंस के कुल खर्च का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है।

    आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऊर्जा कीमतों में स्थिरता बनी रहती है तो महंगाई दर पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है। इससे उपभोक्ता खर्च बढ़ने, उद्योगों की लागत घटने और समग्र आर्थिक गतिविधियों को मजबूती मिलने की संभावना है। आने वाले महीनों में वैश्विक ऊर्जा बाजार की दिशा और पश्चिम एशिया की स्थिति यह तय करेगी कि भारत को इस संभावित राहत का कितना व्यापक लाभ मिल पाता है।

  • भारत के लिए यूरोप और अफ्रीका का नया आर्थिक गलियारा बन सकता है मोरक्को, निवेश और व्यापार को लेकर दिया बड़ा प्रस्ताव

    भारत के लिए यूरोप और अफ्रीका का नया आर्थिक गलियारा बन सकता है मोरक्को, निवेश और व्यापार को लेकर दिया बड़ा प्रस्ताव

    नई दिल्ली । भारत और मोरक्को के बीच आर्थिक तथा औद्योगिक सहयोग को नई दिशा देने की संभावनाएं तेजी से उभर रही हैं। उत्तर अफ्रीका में स्थित मोरक्को ने भारतीय व्यवसायों और निवेशकों को अपने यहां अवसरों का लाभ उठाने का आमंत्रण दिया है। मोरक्को का मानना है कि उसकी रणनीतिक भौगोलिक स्थिति भारत के लिए यूरोप और अफ्रीका दोनों महाद्वीपों के विशाल बाजारों तक पहुंच का प्रभावी माध्यम बन सकती है।

    मोरक्को वर्तमान समय में अफ्रीका की अग्रणी औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। हाल के वर्षों में देश ने विनिर्माण, निर्यात, लॉजिस्टिक्स और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। इसी आधार पर मोरक्को भारतीय कंपनियों को अपने औद्योगिक प्लेटफॉर्म का उपयोग कर वैश्विक विस्तार का अवसर देने की बात कर रहा है।

    मोरक्को के अनुसार भारत और उसकी अर्थव्यवस्था के बीच कई समानताएं मौजूद हैं, जो दोनों देशों के बीच सहयोग की संभावनाओं को और मजबूत बनाती हैं। विशेष रूप से ऑटोमोबाइल, एयरोस्पेस, ग्रीन टेक्नोलॉजी, ऊर्जा, विनिर्माण और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में संयुक्त परियोजनाओं की व्यापक संभावनाएं देखी जा रही हैं। दोनों देशों के उद्योगों के बीच साझेदारी से नए निवेश और रोजगार के अवसर भी पैदा हो सकते हैं।

    भारत के लिए मोरक्को का महत्व केवल औद्योगिक सहयोग तक सीमित नहीं है। खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में भी यह देश एक महत्वपूर्ण साझेदार माना जाता है। मोरक्को के पास दुनिया के सबसे बड़े फॉस्फेट भंडार मौजूद हैं और वह भारत के लिए फॉस्फेट का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। कृषि उत्पादन और उर्वरक उद्योग में फॉस्फेट की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए यह साझेदारी भारत के लिए रणनीतिक रूप से काफी अहम मानी जाती है।

    वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में बढ़ती अनिश्चितताओं और विभिन्न देशों द्वारा निर्यात प्रतिबंधों के बीच मोरक्को का प्रस्ताव भारत के लिए एक वैकल्पिक और भरोसेमंद व्यापारिक मार्ग के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि विविध आपूर्ति स्रोत विकसित करने की भारत की नीति में मोरक्को महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

    मोरक्को की एक और बड़ी ताकत उसके अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते हैं। देश के यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ मजबूत व्यापारिक संबंध हैं। इसके अलावा वह अफ्रीकी महाद्वीपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र का भी प्रमुख हिस्सा है। ऐसे में भारतीय कंपनियों को मोरक्को के माध्यम से कई बड़े बाजारों तक प्रतिस्पर्धी पहुंच मिल सकती है।

    मोरक्को का टैंजियर मेड बंदरगाह इस रणनीति का प्रमुख केंद्र माना जा रहा है। जिब्राल्टर जलडमरूमध्य के निकट स्थित यह आधुनिक बंदरगाह दुनिया के अनेक प्रमुख समुद्री मार्गों से जुड़ा हुआ है। इसकी सहायता से यूरोप और अफ्रीका के विभिन्न बाजारों तक कम समय में माल पहुंचाया जा सकता है। यही कारण है कि इसे वैश्विक व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला के महत्वपूर्ण केंद्रों में गिना जाता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और मोरक्को के बीच बढ़ता सहयोग केवल व्यापारिक संबंधों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह औद्योगिक विकास, निवेश, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और रणनीतिक साझेदारी को भी नई गति दे सकता है। बदलते वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में दोनों देशों के बीच मजबूत आर्थिक संबंध भविष्य में व्यापक लाभ देने की क्षमता रखते हैं।

  • अदाणी पोर्ट्स का बड़ा कदम, जेएएल रिजॉल्यूशन प्लान के तहत जेपी फर्टिलाइजर्स का 1,500 करोड़ में अधिग्रहण

    अदाणी पोर्ट्स का बड़ा कदम, जेएएल रिजॉल्यूशन प्लान के तहत जेपी फर्टिलाइजर्स का 1,500 करोड़ में अधिग्रहण


    नई दिल्ली । अदाणी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन लिमिटेड ने औद्योगिक और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में अपनी स्थिति को और मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। कंपनी ने जेएएल रिजॉल्यूशन प्लान के तहत जेपी फर्टिलाइजर्स एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड के अधिग्रहण के लिए 1,500 करोड़ रुपये की डील को अंतिम रूप दिया है। यह समझौता जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड के साथ किया गया है, जो राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण द्वारा मंजूर समाधान योजना का हिस्सा है। इस कदम को कॉर्पोरेट क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक विस्तार के रूप में देखा जा रहा है, जिसका उद्देश्य लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक ढांचे को अधिक मजबूत बनाना है।

    इस समझौते के तहत अदाणी पोर्ट्स जेपी फर्टिलाइजर्स की 100 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल करेगी, जिससे कंपनी को कानपुर फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स लिमिटेड पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण प्राप्त होगा। यह इकाई लगभग 243 एकड़ भूमि का स्वामित्व रखती है, जिसे भविष्य में लॉजिस्टिक्स पार्क और वेयरहाउसिंग सुविधाओं के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह भूमि उत्तर भारत में औद्योगिक विस्तार और आपूर्ति श्रृंखला के आधुनिकीकरण के लिए रणनीतिक दृष्टि से काफी अहम है।

    कंपनी का कहना है कि यह अधिग्रहण उसकी दीर्घकालिक रणनीति के अनुरूप है, जिसके तहत वह मल्टी-मोडल लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को विस्तार देने की दिशा में काम कर रही है। अदाणी पोर्ट्स का लक्ष्य वर्ष 2031 तक अपने लॉजिस्टिक्स पार्कों की संख्या बढ़ाकर 16 करना और भंडारण क्षमता को लगभग चार गुना तक विस्तारित करना है। इस अधिग्रहण को उसी रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है, जिससे कंपनी को उत्तर भारत में अपनी पकड़ मजबूत करने में मदद मिलेगी।

    यह पूरा लेनदेन कर्ज में डूबी जेएएल की परिसंपत्तियों के पुनर्गठन की प्रक्रिया का हिस्सा है। समाधान योजना को पहले ही नियामकीय मंजूरी मिल चुकी है और अब इसे लागू करने की दिशा में तेजी लाई जा रही है। इस प्रक्रिया में अदाणी पोर्ट्स एक प्रमुख कार्यान्वयन इकाई के रूप में कार्य कर रही है। कंपनी के अनुसार यह सौदा निर्धारित समय सीमा के भीतर पूरा किए जाने की उम्मीद है, जिससे समाधान योजना को प्रभावी रूप से लागू किया जा सके।

    इस डील को प्रतिस्पर्धा आयोग द्वारा पहले ही मंजूरी मिल चुकी है, जबकि संबंधित न्यायिक निकाय ने भी समाधान योजना को बरकरार रखा है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह अधिग्रहण कानूनी और नियामकीय प्रक्रियाओं के सभी आवश्यक चरणों को पूरा करने के बाद आगे बढ़ रहा है।

    इसके साथ ही अदाणी समूह की एक अन्य इकाई ने भी जेएएल से जुड़े कुछ अन्य परिसंपत्तियों के अधिग्रहण के लिए समझौते किए हैं, जिसमें पावर क्षेत्र से जुड़े हिस्सेदारी और ऊर्जा उत्पादन इकाइयाँ शामिल हैं। यह संकेत देता है कि समूह का ध्यान केवल बंदरगाह और लॉजिस्टिक्स तक सीमित नहीं है, बल्कि वह ऊर्जा और औद्योगिक अवसंरचना के क्षेत्र में भी अपने विस्तार की रणनीति पर काम कर रहा है।

    कुल मिलाकर यह अधिग्रहण न केवल अदाणी पोर्ट्स के लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को मजबूत करेगा, बल्कि उत्तर भारत में औद्योगिक और भंडारण ढांचे को भी नया आयाम देगा। यह सौदा आने वाले समय में क्षेत्रीय आपूर्ति श्रृंखला और औद्योगिक विकास पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है, जिससे देश की आर्थिक गतिविधियों को भी गति मिलने की संभावना है।

  • अदाणी पोर्ट्स का रिकॉर्ड प्रदर्शन, 50 करोड़ टन कार्गो के साथ आय और लाभ में उल्लेखनीय बढ़ोतरी

    अदाणी पोर्ट्स का रिकॉर्ड प्रदर्शन, 50 करोड़ टन कार्गो के साथ आय और लाभ में उल्लेखनीय बढ़ोतरी

    नई दिल्ली । वित्त वर्ष 2026 अदाणी पोर्ट्स के लिए मजबूत प्रदर्शन और विस्तार का वर्ष साबित हुआ है, जहां कंपनी ने अपने मुनाफे और आय दोनों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की है। इस दौरान कंपनी ने न केवल वित्तीय रूप से मजबूती दिखाई, बल्कि परिचालन स्तर पर भी कई नए रिकॉर्ड स्थापित किए।

    कंपनी का शुद्ध लाभ इस वित्त वर्ष में 16 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 12,782 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। वहीं, कुल आय में भी उल्लेखनीय उछाल देखा गया, जो 25 प्रतिशत बढ़कर 38,736 करोड़ रुपये से अधिक हो गई। यह बढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि कंपनी ने अपने विभिन्न कारोबार क्षेत्रों में संतुलित और प्रभावी रणनीति अपनाई है।

    इस दौरान परिचालन लाभ यानी एबिटा में भी 20 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो 22,851 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। यह आंकड़ा कंपनी की मजबूत कार्यप्रणाली और लागत नियंत्रण को दर्शाता है।

    परिचालन उपलब्धियों की बात करें तो कंपनी ने इस वर्ष एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर हासिल किया। एक ही वर्ष में 50 करोड़ मीट्रिक टन से अधिक कार्गो को संभालना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है, जिसने कंपनी को देश के अग्रणी एकीकृत परिवहन ऑपरेटर के रूप में स्थापित किया है।

    कंपनी के लॉजिस्टिक्स कारोबार ने इस वृद्धि में अहम भूमिका निभाई। इस सेगमेंट में 55 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो ट्रांसपोर्ट और माल ढुलाई सेवाओं के विस्तार के कारण संभव हो पाई। वहीं समुद्री कारोबार में 134 प्रतिशत की तेज वृद्धि ने कंपनी के कुल प्रदर्शन को और मजबूती दी। बेड़े में जहाजों की संख्या बढ़ने से इस क्षेत्र में तेजी आई है।

    अंतरराष्ट्रीय संचालन से भी कंपनी को सकारात्मक परिणाम मिले हैं। विदेशी बंदरगाहों से प्राप्त राजस्व में 34 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो वैश्विक स्तर पर कंपनी के विस्तार को दर्शाता है।

    वित्त वर्ष की अंतिम तिमाही में भी कंपनी का प्रदर्शन संतोषजनक रहा। इस अवधि में आय में 26 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि मुनाफा 9 प्रतिशत बढ़कर 3,308 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इससे स्पष्ट है कि वर्ष के अंत तक भी कंपनी की विकास दर बनी रही।

    भविष्य की योजनाओं को लेकर कंपनी ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि आने वाले वर्षों में वह अपनी क्षमता और दायरे को और बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करेगी। कार्गो हैंडलिंग क्षमता बढ़ाने, सेवाओं का विस्तार करने और निवेश को संतुलित बनाए रखने की रणनीति पर काम किया जा रहा है।