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  • जॉइंट डायरेक्टर की संपत्तियों पर लोकायुक्त की नजर: सूदखोरी, चेक बाउंस और करोड़ों के निवेश की जांच तेज

    जॉइंट डायरेक्टर की संपत्तियों पर लोकायुक्त की नजर: सूदखोरी, चेक बाउंस और करोड़ों के निवेश की जांच तेज


    इंदौर इंदौर में महिला एवं बाल विकास विभाग के संयुक्त संचालक लक्ष्मी नारायण कंडवाल के खिलाफ चल रही आय से अधिक संपत्ति की जांच लगातार नए खुलासे कर रही है। लोकायुक्त पुलिस की छापामार कार्रवाई के बाद अब ऐसे तथ्य सामने आ रहे हैं, जिनसे जांच का दायरा और बढ़ सकता है। कंडवाल के परिवार के नाम पर करोड़ों रुपए की संपत्तियां, निवेश और व्यवसाय मिलने के साथ-साथ सूदखोरी और चेक बाउंस मामलों को लेकर भी सवाल खड़े होने लगे हैं।

    लोकायुक्त पुलिस ने हाल ही में कंडवाल के ठिकानों पर छापेमारी की थी। इस दौरान उनकी पत्नी शारदा कंडवाल, पुत्रवधु तनु और हर्षिता के नाम पर कई संपत्तियों और निवेश का पता चला। शुरुआती जांच में इन संपत्तियों का मूल्य करोड़ों रुपए में आंका गया है। जांच एजेंसियों का मानना है कि यह संपत्ति उनकी ज्ञात आय की तुलना में काफी अधिक हो सकती है।

    जांच के दौरान एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है। जानकारी के अनुसार कंडवाल के पुत्र अभिषेक के नाम से वर्ष 2022 में रमेश मलकानी के खिलाफ चेक बाउंस के छह मामले दर्ज कराए गए थे। ये मामले न्यायालय तक पहुंचे और बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया। हालांकि इन मामलों से जुड़े वित्तीय लेनदेन को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं।

    सूत्रों के अनुसार जिन चेकों को लेकर मुकदमे दर्ज हुए थे, वे केसरबाग रोड स्थित एक संपत्ति के सौदे से जुड़े बताए जाते हैं। बाद में समझौते के तहत राशि प्राप्त होने के बाद मामला समाप्त कर दिया गया था। लेकिन जांच एजेंसियां अब यह जानने का प्रयास कर सकती हैं कि उस समय पढ़ाई कर रहे अभिषेक के पास इतनी बड़ी रकम कहां से आई और संपत्ति निवेश के लिए धन का स्रोत क्या था।

    जानकारों का कहना है कि यदि जांच में यह प्रमाणित होता है कि निवेश की राशि वास्तव में लक्ष्मी नारायण कंडवाल द्वारा उपलब्ध कराई गई थी, तो बच्चों और परिवार के अन्य सदस्यों के नाम पर दर्ज संपत्तियों की भी गहन जांच हो सकती है। लोकायुक्त टीम इस बात का भी परीक्षण कर सकती है कि कहीं परिवार के नाम का उपयोग कर संपत्तियां तो नहीं बनाई गईं।

    कंडवाल ने अपने करियर की शुरुआत वर्ष 1986 में ग्राम सुनाला के माध्यमिक विद्यालय में सहायक शिक्षक के रूप में की थी। इसके बाद वे विभिन्न पदों पर पदोन्नत होते हुए महिला एवं बाल विकास विभाग में संयुक्त संचालक के पद तक पहुंचे। नौकरी के दौरान उनकी पदस्थापना नीमच, खरगोन, उज्जैन, जबलपुर, भोपाल, रीवा सहित कई जिलों में रही।

    लोकायुक्त जांच में यह भी सामने आया है कि उनके पुत्र अभिषेक और पवन के नाम पर एक सुपर मार्केट संचालित है, जिसमें लाखों रुपए का निवेश किया गया है। इसके अलावा एक आधुनिक और आलीशान जिम की जानकारी भी सामने आई है, जहां अत्याधुनिक फिटनेस उपकरण और सुविधाएं उपलब्ध हैं। इन निवेशों और व्यवसायों के वित्तीय स्रोतों की भी जांच की जा रही है।

    लोकायुक्त अधिकारियों के अनुसार जांच अभी प्रारंभिक चरण में है। सभी संपत्तियों, बैंक खातों, निवेश और वित्तीय लेनदेन का विस्तृत मूल्यांकन किया जा रहा है। जांच पूरी होने के बाद रिपोर्ट राज्य शासन को भेजी जाएगी। साथ ही विभागीय कार्रवाई के लिए संबंधित विभाग को भी पत्र भेजा जा सकता है। इस मामले ने प्रशासनिक गलियारों में चर्चा तेज कर दी है और अब सभी की नजर लोकायुक्त की अंतिम रिपोर्ट पर टिकी हुई है।

  • रिटायरमेंट से 5 महीने पहले लोकायुक्त का बड़ा एक्शन: महिला एवं बाल विकास विभाग के संयुक्त संचालक के ठिकानों पर छापा, करोड़ों की संपत्ति की जांच

    रिटायरमेंट से 5 महीने पहले लोकायुक्त का बड़ा एक्शन: महिला एवं बाल विकास विभाग के संयुक्त संचालक के ठिकानों पर छापा, करोड़ों की संपत्ति की जांच


    मध्‍य प्रदेश । इंदौर में लोकायुक्त पुलिस ने आय से अधिक संपत्ति की शिकायत के आधार पर महिला एवं बाल विकास विभाग के संयुक्त संचालक लक्ष्मी नारायण कंडवाल के विभिन्न ठिकानों पर बुधवार को छापामार कार्रवाई की। प्रारंभिक जांच में बड़ी मात्रा में चल और अचल संपत्तियों की जानकारी सामने आने का दावा किया गया है। हालांकि संपत्ति का अंतिम मूल्यांकन जांच और दस्तावेजों के सत्यापन के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

    लोकायुक्त सूत्रों के अनुसार कंडवाल के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति की शिकायत प्राप्त हुई थी। शिकायत के सत्यापन और प्रारंभिक जांच के बाद विशेष न्यायालय से आवश्यक अनुमति प्राप्त कर कार्रवाई की योजना बनाई गई। अधिकारियों के मुताबिक मंगलवार रात से ही टीमों को अलर्ट कर दिया गया था और बुधवार सुबह विभिन्न स्थानों पर एक साथ तलाशी अभियान चलाया गया।

    जांच एजेंसियों के अनुसार कार्रवाई के दौरान इंदौर स्थित आवासीय और व्यवसायिक परिसरों सहित अन्य संपत्तियों की जांच की गई। अधिकारियों ने दस्तावेजों, बैंक खातों, निवेश और संपत्ति संबंधी अभिलेखों का परीक्षण शुरू किया है। लोकायुक्त का कहना है कि उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर संपत्तियों और आय के स्रोतों का मिलान किया जा रहा है।

    पूछताछ के दौरान संबंधित अधिकारी की ओर से वेतन के अतिरिक्त कुछ अन्य आय स्रोतों की जानकारी भी जांच दल को दी गई। इनमें परिवार द्वारा संचालित व्यवसाय, किराये से होने वाली आय तथा पत्नी की आय संबंधी विवरण शामिल बताए गए हैं। जांच एजेंसियां इन दावों और उपलब्ध दस्तावेजों का परीक्षण कर रही हैं ताकि वास्तविक आय और अर्जित संपत्तियों के बीच संबंध स्थापित किया जा सके।

    कार्रवाई के दौरान एक बैंक लॉकर की भी जांच की गई, जहां से सोने के आभूषण और अन्य कीमती वस्तुएं मिलने की जानकारी सामने आई है। इसके अलावा विभिन्न बैंक खातों से संबंधित दस्तावेजों को भी जांच के दायरे में लिया गया है। अधिकारियों का कहना है कि बैंकिंग रिकॉर्ड और वित्तीय लेनदेन की विस्तृत पड़ताल की जा रही है।

    लोकायुक्त जांच में इंदौर स्थित व्यवसायिक भवन, आवासीय संपत्तियों, प्लॉट और ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि होने संबंधी जानकारी भी सामने आई है। संबंधित दस्तावेजों की वैधता, खरीद के समय की परिस्थितियों तथा भुगतान के स्रोतों की जांच की जा रही है। जांच एजेंसियां संपत्ति के बाजार मूल्य और घोषित आय के बीच अंतर का भी विश्लेषण कर रही हैं।

    लोकायुक्त अधिकारियों के अनुसार संबंधित अधिकारी लगभग तीन दशक की सेवा अवधि में प्रदेश के विभिन्न जिलों में पदस्थ रहे हैं। जांच के दौरान उनके सेवाकाल, आय विवरण, संपत्ति घोषणाओं और वित्तीय अभिलेखों का भी परीक्षण किया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि सभी दस्तावेजों के सत्यापन और मूल्यांकन के बाद विस्तृत प्रतिवेदन तैयार किया जाएगा।

    लोकायुक्त ने स्पष्ट किया है कि मामला अभी जांचाधीन है। जांच पूरी होने और सभी तथ्यों के सत्यापन के बाद ही यह तय किया जाएगा कि आय और संपत्ति के बीच कितना अंतर है तथा आगे की कानूनी कार्रवाई किस आधार पर की जाएगी। फिलहाल दस्तावेजी जांच और संपत्तियों के मूल्यांकन की प्रक्रिया जारी है।

  • जॉइंट डायरेक्टर के ठिकानों पर लोकायुक्त का छापा, 9.5 करोड़ की संपत्ति का खुलासा

    जॉइंट डायरेक्टर के ठिकानों पर लोकायुक्त का छापा, 9.5 करोड़ की संपत्ति का खुलासा


    मध्यप्रदेश। इंदौर में बुधवार सुबह लोकायुक्त संगठन ने महिला एवं बाल विकास विभाग के संयुक्त संचालक लक्ष्मी नारायण कंडवाल के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए उनके विभिन्न ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की। कार्रवाई के दौरान सामने आए शुरुआती तथ्यों ने जांच एजेंसियों को भी हैरान कर दिया। लोकायुक्त की प्राथमिक जांच में कंडवाल के पास उनकी वैध आय की तुलना में 241 प्रतिशत अधिक संपत्ति होने के संकेत मिले हैं। अब तक की जांच में करीब 9.5 करोड़ रुपए की संपत्ति का खुलासा हुआ है, जबकि उनके पूरे सेवाकाल की अनुमानित वैध आय लगभग ढाई करोड़ रुपए आंकी गई है।

    लोकायुक्त अधिकारियों के अनुसार, कंडवाल के खिलाफ भ्रष्टाचार संबंधी शिकायत प्राप्त हुई थी। शिकायत की प्रारंभिक जांच में आरोप सही पाए जाने के बाद भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत प्रकरण दर्ज किया गया। इसके बाद विशेष न्यायालय से तलाशी वारंट प्राप्त कर अलग-अलग टीमों ने सुबह करीब छह बजे एक साथ कई स्थानों पर कार्रवाई शुरू की।

    कार्रवाई इतनी गोपनीय रखी गई थी कि संयुक्त संचालक और उनके परिवार को इसकी भनक तक नहीं लग सकी। सुबह-सुबह बड़ी संख्या में लोकायुक्त अधिकारियों और कर्मचारियों के पहुंचने से संबंधित इलाकों में चर्चा का माहौल बन गया। जांच के दौरान अधिकारियों को कई ऐसे निवेश और व्यावसायिक प्रतिष्ठान मिले, जिनकी भव्यता ने टीम को भी चौंका दिया।

    सबसे अधिक चर्चा एक दो मंजिला आधुनिक जिम सेंटर को लेकर रही। जांच में सामने आया कि कंडवाल से जुड़ा यह फिटनेस सेंटर अत्याधुनिक सुविधाओं और महंगी मशीनों से सुसज्जित है। बताया जा रहा है कि यह शहर के प्रमुख निजी जिमों में शामिल है। इसके अलावा एक बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर की भी जांच की गई, जहां रोजमर्रा के उपभोक्ता सामानों का बड़े पैमाने पर कारोबार संचालित किया जा रहा था।

    लोकायुक्त टीम को अब तक पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र के आसपास 12 प्लॉट, इंदौर में एक व्यावसायिक प्लॉट और अन्य अचल संपत्तियों के दस्तावेज मिले हैं। इसके साथ ही एक बैंक लॉकर की जानकारी भी सामने आई है, जिसकी जांच और तलाशी की प्रक्रिया आगे की जाएगी। अधिकारियों का मानना है कि संपत्ति का आंकड़ा अभी और बढ़ सकता है क्योंकि दस्तावेजों और वित्तीय लेनदेन की विस्तृत पड़ताल जारी है।

    जांच में यह भी सामने आया है कि अपने सेवाकाल के दौरान कंडवाल झाबुआ, रतलाम, नीमच, रीवा, शहडोल, उज्जैन, देवास और इंदौर सहित कई जिलों में पदस्थ रहे हैं। लोकायुक्त अब उनकी आय के स्रोतों, निवेश के तरीकों और संपत्ति अर्जित करने की प्रक्रिया की विस्तृत जांच कर रही है।

    इस कार्रवाई को प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही मुहिम की बड़ी कार्रवाई माना जा रहा है। लोकायुक्त अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद संपत्ति के वास्तविक मूल्यांकन, निवेश के स्रोत और वित्तीय लेनदेन से जुड़े अन्य तथ्यों को भी सार्वजनिक किया जाएगा। फिलहाल बरामद दस्तावेजों और संपत्तियों का सत्यापन किया जा रहा है तथा मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई जारी है।

  • जमीन सीमांकन के नाम पर 80 हजार की डील, लोकायुक्त की बड़ी कार्रवाई

    जमीन सीमांकन के नाम पर 80 हजार की डील, लोकायुक्त की बड़ी कार्रवाई


    मध्य प्रदेश । जबलपुर में भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए लोकायुक्त पुलिस ने राजस्व विभाग के एक अधिकारी को रिश्वत लेते हुए पकड़ लिया। मामला Jabalpur का है, जहां राजस्व निरीक्षक करण सिंह लोधी को 80 हजार रुपये लेते हुए गिरफ्तार किया गया।

    जानकारी के अनुसार, व्यापारी रोहित जैन ने अपने साथियों के साथ शहपुरा तहसील के ग्राम क्लोन में मटर प्लांट लगाने के लिए जमीन खरीदी थी। जमीन का नामांतरण पूरा हो चुका था, लेकिन सीमांकन की प्रक्रिया लंबित थी। इसी काम के लिए उन्होंने राजस्व निरीक्षक से संपर्क किया था।

    शिकायतकर्ता का आरोप है कि सभी दस्तावेज पूरे होने के बावजूद आरोपी ने सीमांकन के बदले पहले एक लाख रुपये की मांग की। पिछले करीब दो महीने से वह लगातार कार्यालय के चक्कर लगा रहा था, लेकिन हर बार किसी न किसी बहाने से काम टाल दिया जाता था।

    परेशान होकर व्यापारी ने लोकायुक्त एसपी से लिखित शिकायत की। शिकायत की जांच में रिश्वत मांगने की पुष्टि होने के बाद टीम ने ट्रैप की योजना बनाई। तय कार्यक्रम के अनुसार मंगलवार को आरोपी ने रतन कॉलोनी स्थित अपने घर के पास शिकायतकर्ता को पैसे लेकर बुलाया।

    जैसे ही व्यापारी ने उसे 80 हजार रुपये दिए और आरोपी ने रकम स्वीकार की, पहले से मौजूद लोकायुक्त टीम ने उसे मौके पर ही रंगे हाथ पकड़ लिया। कार्रवाई के बाद आरोपी के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है।

    लोकायुक्त अधिकारियों ने बताया कि आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है और मामले की विस्तृत जांच जारी है।

  • भोपाल निगम में फर्जी बिलिंग के आरोप पर लोकायुक्त का सेंट्रल वर्कशॉप में छापा

    भोपाल निगम में फर्जी बिलिंग के आरोप पर लोकायुक्त का सेंट्रल वर्कशॉप में छापा



    भोपाल भोपाल नगर निगम में फर्जी बिलिंग और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों के चलते रविवार सुबह लोकायुक्त की टीम ने सेंट्रल वर्कशॉप स्थित नगर निगम कार्यालय में छापेमारी की। यह कार्यवाही सुबह 9 बजे शुरू हुई और अभी भी जारी है। नगर निगम की यह वर्कशॉप गाड़ियों की मरम्मत, पेंटिंग और अन्य मैकेनिकल कार्यों के लिए जानी जाती है।

    लोकायुक्त पुलिस ने शुक्रवार को निगम के फतेहगढ़ डाटा सेंटर पर कार्रवाई करते हुए पिछले 10 वर्षों के दस्तावेज और सर्वर डाटा जब्त किए थे। प्रारंभिक जांच में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताओं के सबूत मिले, जिसके आधार पर सेंट्रल वर्कशॉप में यह छापेमारी की गई। जांच टीम दस्तावेजों की जांच कर रही है और कर्मचारियों से पूछताछ कर रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि किन-किन फर्मों और व्यक्तियों की संलिप्तता रही।

    11 मार्च को अपर आयुक्त गुणवंत सेवतकर के खिलाफ भ्रष्टाचार, आपराधिक षड्यंत्र और कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर एफआईआर दर्ज की गई थी। शिकायत नवंबर 2025 में लोकायुक्त को प्राप्त हुई थी। प्रारंभिक जांच में शिकायत सही पाए जाने पर कोर्ट से सर्च वारंट लेकर कार्रवाई की गई।

    लोकायुक्त एसपी दुर्गेश राठौर के अनुसार, शिकायत में आरोप है कि SAP सॉफ्टवेयर की मदद से फर्जी बिल तैयार किए गए। इन बिलों के माध्यम से परिचितों और रिश्तेदारों की फर्मों के नाम पर करोड़ों रुपए का भुगतान किया गया, जबकि असल में संबंधित काम या तो किया ही नहीं गया या विभागों को इसकी जानकारी नहीं थी।

    जांच में यह भी सामने आया कि नगर निगम के जलकार्य विभाग, सामान्य प्रशासन और सेंट्रल वर्कशॉप के नाम पर गाड़ियों की मरम्मत, पेंटिंग और अन्य काम दिखाए गए, लेकिन कई मामलों में वास्तव में काम नहीं हुआ था। डिजिटल डाटा और दस्तावेजों की जांच से अब यह पता लगाया जाएगा कि किन कार्यों के नाम पर भुगतान किया गया और वास्तविकता क्या थी।

    अपर आयुक्त गुणवंत सेवतकर का कहना है कि लेखा शाखा में बिल सीधे पास नहीं किए जाते। बिल संबंधित विभागों से सत्यापन के बाद आते हैं और फंड की उपलब्धता के अनुसार नगर निगम आयुक्त से चर्चा के बाद भुगतान किया जाता है। उनका यह बयान यह दर्शाता है कि भुगतान प्रक्रिया में कई स्तरों पर सत्यापन होता है, लेकिन कथित फर्जी बिलिंग के मामले ने प्रणाली में संभावित गड़बड़ियों को उजागर किया है।

    लोकायुक्त टीम का कहना है कि जब्त SAP सॉफ्टवेयर का डेटा और अन्य डिजिटल दस्तावेजों की जांच पूरी होने के बाद मामले में और फर्मों और कर्मचारियों की भूमिका भी सामने आ सकती है। यह कार्रवाई भोपाल नगर निगम में वित्तीय अनुशासन और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण कदम है।