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  • लोकसभा में राहुल गांधी के संबोधन पर हंगामा, किरेन रिजिजू ने असंसदीय भाषा के इस्तेमाल पर जताई कड़ी आपत्ति

    लोकसभा में राहुल गांधी के संबोधन पर हंगामा, किरेन रिजिजू ने असंसदीय भाषा के इस्तेमाल पर जताई कड़ी आपत्ति

    नई दिल्ली । लोकसभा में एंटी पेपर लीक विषय पर चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के संबोधन पर बुधवार को सदन में जोरदार हंगामा देखने को मिला। भाषण के दौरान इस्तेमाल किए गए कुछ शब्दों पर सत्तापक्ष ने कड़ी आपत्ति जताई, जिसके बाद सदन का माहौल कुछ समय के लिए तनावपूर्ण हो गया। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने आरोप लगाया कि नेता प्रतिपक्ष ने अपने संबोधन में असंसदीय भाषा का प्रयोग किया, जो संसदीय परंपराओं और नियमों के अनुरूप नहीं है।

    राहुल गांधी अपने संबोधन के दौरान एंटी पेपर लीक से जुड़े मुद्दों पर सरकार को घेर रहे थे। इसी दौरान उन्होंने कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग किया, जिन पर सत्तापक्ष के सांसदों ने आपत्ति दर्ज कराई। विरोध बढ़ने के साथ ही सदन में शोर-शराबा शुरू हो गया और कई सदस्य अपनी सीटों से खड़े होकर विरोध जताने लगे।

    स्थिति को देखते हुए संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने कहा कि संसदीय नियमों के अनुसार किसी भी सदस्य को मर्यादित भाषा का प्रयोग करना चाहिए। उनका कहना था कि सरकार विपक्ष की बात सुनने के लिए पूरी तरह तैयार है, लेकिन चर्चा के दौरान असंसदीय शब्दों का प्रयोग स्वीकार्य नहीं हो सकता। उन्होंने यह भी कहा कि सदन की गरिमा बनाए रखना सभी सदस्यों की सामूहिक जिम्मेदारी है।

    रिजिजू ने नेता प्रतिपक्ष से आग्रह किया कि वे अपनी बात पूरी मजबूती से रखें, लेकिन संसदीय परंपराओं का पालन भी करें। उन्होंने कहा कि नियम सरकार ने नहीं बनाए हैं, बल्कि संसद की स्थापित प्रक्रियाओं के तहत सभी सदस्यों पर समान रूप से लागू होते हैं। उनके अनुसार किसी भी सदस्य को ऐसे शब्दों से बचना चाहिए, जिनसे सदन की कार्यवाही प्रभावित हो।

    इस दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी लोकसभा अध्यक्ष से अनुरोध किया कि राहुल गांधी द्वारा इस्तेमाल किए गए कथित असंसदीय शब्दों को कार्यवाही के रिकॉर्ड से हटाया जाए। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ने स्थिति पर संज्ञान लिया और सदन में व्यवस्था बनाए रखने की अपील की। हंगामे के शांत होने के बाद अध्यक्ष ने राहुल गांधी को अपना भाषण आगे जारी रखने का अवसर भी दिया।

    चर्चा के दौरान किरेन रिजिजू ने यह भी कहा कि पहले भी कई अवसरों पर विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री और अन्य मंत्रियों के संबोधन के दौरान व्यवधान उत्पन्न किया गया था। उन्होंने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के समय हुई घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि संसद में स्वस्थ और सार्थक बहस लोकतंत्र की पहचान है, लेकिन इसके लिए सभी पक्षों को संसदीय मर्यादाओं का सम्मान करना आवश्यक है।

    दूसरी ओर, विपक्ष एंटी पेपर लीक के मुद्दे पर सरकार को लगातार घेरता रहा और परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही तथा युवाओं के हितों से जुड़े सवाल उठाता रहा। इस विषय पर सदन में पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली।

    लोकसभा की कार्यवाही के दौरान हुए इस घटनाक्रम ने एक बार फिर संसदीय भाषा, सदन की गरिमा और बहस के स्तर को लेकर चर्चा तेज कर दी है। अब आगे की कार्यवाही में अध्यक्ष के निर्णय और संसदीय नियमों के तहत उठाए जाने वाले कदमों पर सभी की नजर बनी रहेगी।

  • लोकसभा में परीक्षा संशोधन विधेयक पर गरजे गौरव गोगोई, छात्रों पर कार्रवाई को लेकर गृह मंत्री से मांगा जवाब

    लोकसभा में परीक्षा संशोधन विधेयक पर गरजे गौरव गोगोई, छात्रों पर कार्रवाई को लेकर गृह मंत्री से मांगा जवाब

    नई दिल्ली । लोकसभा में ‘लोक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) संशोधन विधेयक, 2026’ पर चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने केंद्र सरकार को कई मुद्दों पर घेरते हुए परीक्षा व्यवस्था, पेपर लीक मामलों और हालिया छात्र प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सरकार को केवल कानून में संशोधन करने के बजाय शिक्षा व्यवस्था की मूल समस्याओं के समाधान पर ध्यान देना चाहिए। साथ ही उन्होंने गृह मंत्री से सदन में उपस्थित होकर छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई के संबंध में जवाब देने की मांग की।

    विधेयक पर चर्चा की शुरुआत करते हुए गौरव गोगोई ने दावा किया कि वर्ष 2024 में लागू किया गया कानून अपने उद्देश्य को पूरा करने में सफल नहीं रहा। उनका कहना था कि उस समय सरकार ने इसे ऐतिहासिक कदम बताया था और पेपर लीक की घटनाओं पर रोक लगाने का दावा किया था, लेकिन बाद में सामने आए मामलों ने उन दावों पर सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने आरोप लगाया कि नया संशोधन विधेयक भी उसी दिशा में एक औपचारिक कदम बनकर रह जाएगा और इससे मूल समस्याओं का समाधान नहीं होगा।

    कांग्रेस सांसद ने कहा कि परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए केवल दंडात्मक प्रावधानों को कड़ा करना पर्याप्त नहीं है। उनके अनुसार, यदि परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं की कार्यप्रणाली में सुधार नहीं किया गया तो कानून में बदलाव का अपेक्षित प्रभाव दिखाई नहीं देगा। उन्होंने सरकार से परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाने की मांग की।

    गोगोई ने राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट-यूजी) से जुड़े पेपर लीक प्रकरण का उल्लेख करते हुए कहा कि इस मामले में कई लोगों को आरोपी बनाया गया था और अनेक आरोपियों को जमानत भी मिल चुकी है। उन्होंने इसे उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हुए दावा किया कि मौजूदा व्यवस्था पेपर लीक जैसी घटनाओं को रोकने में प्रभावी साबित नहीं हुई। उन्होंने कहा कि सरकार को इस विषय पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए।

    उन्होंने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि यदि संस्था में सुधार की आवश्यकता महसूस की गई और उसके शीर्ष अधिकारियों में बदलाव किए गए, तो अन्य जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारियों की भूमिका की भी समीक्षा होनी चाहिए। उन्होंने सरकार से एनटीए से जुड़े प्रशासनिक निर्णयों पर स्पष्टीकरण देने की मांग की।

    चर्चा के दौरान गौरव गोगोई ने जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में युवा अपने भविष्य और परीक्षा प्रणाली को लेकर चिंता व्यक्त करने के लिए सड़कों पर उतरे थे। उनके अनुसार, लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों को अपनी बात शांतिपूर्ण तरीके से रखने का अधिकार है और उनकी मांगों को गंभीरता से सुना जाना चाहिए।

    कांग्रेस सांसद ने हालिया प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई का मुद्दा उठाते हुए कहा कि गृह मंत्री को सदन में आकर यह स्पष्ट करना चाहिए कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग के निर्णय किस स्तर पर लिए गए। उन्होंने आरोप लगाया कि छात्रों पर की गई कार्रवाई को लेकर सरकार को विस्तृत जानकारी संसद के समक्ष रखनी चाहिए, ताकि पूरे घटनाक्रम पर पारदर्शिता बनी रहे।

    इसके अलावा गोगोई ने असम में बाढ़ की स्थिति का भी उल्लेख किया और प्रभावित क्षेत्रों के लिए विशेष सहायता पैकेज की मांग की। उनका कहना था कि शिक्षा, युवाओं और प्राकृतिक आपदाओं जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार को संवेदनशीलता के साथ निर्णय लेने चाहिए। अब परीक्षा संशोधन विधेयक पर आगे की संसदीय चर्चा और सरकार की ओर से दिए जाने वाले जवाब पर राजनीतिक दलों और छात्रों की निगाहें टिकी हुई हैं।

  • लोक परीक्षा संशोधन बिल पर लोकसभा में गतिरोध, छात्रों के मुद्दे पर चर्चा की मांग से कार्यवाही बार-बार बाधित

    लोक परीक्षा संशोधन बिल पर लोकसभा में गतिरोध, छात्रों के मुद्दे पर चर्चा की मांग से कार्यवाही बार-बार बाधित

    नई दिल्ली । सार्वजनिक परीक्षाओं में पारदर्शिता और पेपर लीक जैसी घटनाओं पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से लाए गए लोक परीक्षा संशोधन बिल पर सोमवार को लोकसभा में चर्चा शुरू नहीं हो सकी। विपक्षी दलों के लगातार हंगामे और छात्रों की कथित पिटाई के मुद्दे पर तत्काल चर्चा की मांग के कारण सदन की कार्यवाही कई बार बाधित हुई। स्थिति को सामान्य बनाने के लिए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सरकार और विपक्ष दोनों से आपसी सहमति बनाकर सदन की कार्यवाही सुचारु रूप से चलाने की अपील की।

    दोपहर दो बजे जैसे ही लोकसभा की कार्यवाही दोबारा शुरू हुई, विपक्षी सांसद सदन के वेल में पहुंच गए और छात्रों से जुड़े मामले पर चर्चा की मांग करते हुए नारेबाजी करने लगे। लगातार शोर-शराबे के बीच सदन में निर्धारित कार्यवाही आगे नहीं बढ़ सकी। इस दौरान लोकसभा अध्यक्ष ने विपक्ष से कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि वे विधेयक पर चर्चा नहीं करना चाहते। लगभग पांच मिनट तक गतिरोध बने रहने के बाद उन्होंने शाम पांच बजे तक सभी पक्षों को सहमति बनाने का समय देने की घोषणा की।

    इससे पहले भी दिन के दौरान लोकसभा की कार्यवाही दोपहर बारह बजे और उसके बाद दो बजे तक स्थगित करनी पड़ी थी। इसी तरह राज्यसभा में भी हंगामे के कारण कार्यवाही प्रभावित रही और वहां भी सदन को दो बार स्थगित करना पड़ा। संसद के दोनों सदनों में बने गतिरोध के कारण दिनभर निर्धारित विधायी कार्य प्रभावित रहा।

    सुबह केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में लोक परीक्षा संशोधन बिल पेश किया। यह विधेयक सार्वजनिक परीक्षाओं में अनियमितताओं, पेपर लीक और परीक्षा प्रक्रिया की सुरक्षा को मजबूत बनाने के उद्देश्य से लाया गया है। सरकार का कहना है कि प्रस्तावित संशोधन परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और विश्वसनीय बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।

    संसद की कार्यवाही के दौरान एक अन्य राजनीतिक घटनाक्रम भी चर्चा में रहा। पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अपने इस्तीफे के बाद पहली बार संसद पहुंचे, जहां राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सांसदों ने उनका स्वागत किया। उन्हें शॉल और मिथिला पाग पहनाकर सम्मानित किया गया तथा कई सांसद उनके साथ संसद भवन के भीतर तक गए। इस दौरान समर्थन में नारे भी लगाए गए। धर्मेंद्र प्रधान ने नीट पेपर लीक विवाद के बाद 25 जुलाई को अपने पद से इस्तीफा दिया था।

    संसद में जारी गतिरोध समाप्त करने के लिए राजनीतिक स्तर पर भी प्रयास तेज किए गए। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्षी नेताओं से मुलाकात कर सदन की कार्यवाही सामान्य बनाने पर चर्चा की। बैठक में विभिन्न दलों के वरिष्ठ नेताओं ने हिस्सा लिया और गतिरोध समाप्त करने के संभावित विकल्पों पर विचार-विमर्श किया गया।

    इसी बीच संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष से अपील की कि लोक परीक्षा संशोधन बिल देश के करोड़ों विद्यार्थियों और सार्वजनिक परीक्षा व्यवस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण विधेयक है, इसलिए इसे सदन में चर्चा का अवसर मिलना चाहिए। दूसरी ओर विपक्ष का कहना है कि छात्रों से जुड़े हालिया घटनाक्रम पर पहले विस्तृत चर्चा कराई जाए। अब सभी की निगाहें आगामी संसदीय बैठकों पर हैं, जहां यह स्पष्ट होगा कि सहमति बनने के बाद विधेयक पर चर्चा आगे बढ़ पाती है या नहीं।

  • छात्रों के मुद्दे पर लोकसभा में बढ़ा राजनीतिक टकराव, अखिलेश यादव ने उठाए सवाल, स्पीकर ओम बिरला ने नियमों का दिया हवाला

    छात्रों के मुद्दे पर लोकसभा में बढ़ा राजनीतिक टकराव, अखिलेश यादव ने उठाए सवाल, स्पीकर ओम बिरला ने नियमों का दिया हवाला

    नई दिल्ली । लोकसभा के मानसून सत्र के दौरान छात्रों से जुड़े मुद्दों और विरोध प्रदर्शनों पर चर्चा को लेकर सदन में राजनीतिक माहौल गर्म हो गया। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और सांसद अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि चर्चा के दौरान केवल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को बोलने का अवसर दिया गया, जबकि अन्य विपक्षी दलों को अपनी बात रखने का पर्याप्त मौका नहीं मिला। इस मुद्दे को लेकर उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के समक्ष कड़ी आपत्ति दर्ज कराई, जिसके बाद सदन में कुछ समय के लिए तीखी बहस देखने को मिली।

    अखिलेश यादव ने सदन में कहा कि छात्रों और युवाओं से जुड़े मुद्दे किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं हैं। उनके अनुसार यह पूरे देश के युवाओं का विषय है और सभी राजनीतिक दलों को इस पर अपनी बात रखने का समान अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि कांग्रेस और भाजपा को बोलने का मौका दिया गया तो अन्य विपक्षी दलों को क्यों नहीं सुना गया। उन्होंने इसे संसदीय प्रक्रिया में समान अवसर के सिद्धांत से जुड़ा मुद्दा बताया।

    सपा प्रमुख ने छात्रों के विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई पर भी सरकार को घेरा। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शन कर रहे छात्रों के साथ अत्यधिक बल प्रयोग किया गया और उनकी आवाज दबाने का प्रयास हुआ। उन्होंने कहा कि यदि छात्रों की समस्याओं को गंभीरता से नहीं सुना गया तो विपक्ष लोकतांत्रिक तरीके से उनके समर्थन में सड़क से लेकर संसद तक संघर्ष जारी रखेगा। उन्होंने यह भी कहा कि युवाओं के भविष्य से जुड़े विषयों पर सरकार को संवेदनशील रवैया अपनाना चाहिए।

    अखिलेश यादव ने कहा कि छात्रों की मांगों को लेकर सरकार को सदन के भीतर विस्तृत चर्चा करनी चाहिए। उनके अनुसार यदि संसद में सभी पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर मिलता और सरकार खुलकर जवाब देती तो विपक्ष को अलग से विरोध प्रदर्शन करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष का उद्देश्य केवल छात्रों की समस्याओं को सरकार के सामने प्रभावी ढंग से रखना है।

    इस दौरान लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन में व्यवस्था बनाए रखने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि विभिन्न दलों ने चर्चा की इच्छा जताई है और सरकार भी इस विषय पर चर्चा के लिए तैयार है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि संसदीय नियमों के तहत व्यवस्थित तरीके से ही चर्चा कराई जा सकती है और सदन की कार्यवाही निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही चलेगी। उन्होंने यह भी कहा कि राजनीतिक दलों के आपसी मतभेदों का समाधान अध्यक्ष के स्तर पर नहीं किया जा सकता।

    सदन में जारी बहस के बीच कुछ समय के लिए हंगामे जैसी स्थिति भी बनी। इसके बाद कार्यवाही को स्थगित कर दिया गया। संसदीय कार्यवाही के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने अपने-अपने तर्क रखे। सरकार की ओर से यह दोहराया गया कि वह छात्रों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के लिए तैयार है, जबकि विपक्ष ने मांग की कि चर्चा सभी दलों की भागीदारी के साथ कराई जाए।

    संसद के बाहर मीडिया से बातचीत के दौरान भी अखिलेश यादव ने अपने रुख को दोहराया। उन्होंने कहा कि यदि सरकार संसद के भीतर छात्रों की समस्याओं पर गंभीर चर्चा करती तो विपक्ष को अलग से प्रदर्शन करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। उन्होंने युवाओं और छात्रों से जुड़े विषयों को राष्ट्रीय महत्व का बताते हुए कहा कि इन मुद्दों पर राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर समाधान खोजा जाना चाहिए।

    लोकसभा में हुई इस बहस के बाद छात्रों के मुद्दे, संसदीय प्रक्रिया और विपक्ष की भूमिका को लेकर राजनीतिक चर्चाएं और तेज हो गई हैं। आने वाले दिनों में मानसून सत्र के दौरान इस विषय पर सरकार और विपक्ष के बीच विस्तृत बहस होने की संभावना बनी हुई है, क्योंकि दोनों पक्ष इस मुद्दे को महत्वपूर्ण बताते हुए अपने-अपने पक्ष पर कायम हैं।

  • राहुल गांधी ने संसद को बनाया बंधक, लोकसभा में BJP सांसद निशिकांत दुबे का तीखा हमला

    राहुल गांधी ने संसद को बनाया बंधक, लोकसभा में BJP सांसद निशिकांत दुबे का तीखा हमला


    नई दिल्‍ली । लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी को लेकर भारतीय जनता पार्टी के सांसद निशिकांत दुबे ने एक बड़ा और तीखा बयान दिया है। संसद के भीतर जारी गतिरोध और हंगामे के बीच निशिकांत दुबे ने राहुल गांधी पर सीधा आरोप लगाते हुए कहा कि बीते कई दिनों से संसद का कामकाज पूरी तरह ठप है और इसके लिए सीधे तौर पर राहुल गांधी जिम्मेदार हैं। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी ने संसद को बंधक बना लिया है, जिसकी वजह से देश से जुड़े अहम मुद्दों पर चर्चा नहीं हो पा रही है।

    निशिकांत दुबे ने लोकसभा में बोलते हुए कहा कि राहुल गांधी ऐसे विषय उठा रहे हैं जिनका न तो कोई ठोस आधार है और न ही कोई स्पष्ट संदर्भ। उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी ने सदन में जिस किताब का हवाला दिया है, वह आज तक प्रकाशित ही नहीं हुई है। भाजपा सांसद के मुताबिक, “जो किताब छपी ही नहीं, उसका संसद में जिक्र करना दर्शाता है कि उनकी बातें बे सिर-पैर की हैं और उनका कोई वास्तविक मतलब नहीं निकलता।”

    छपी ही नहीं किताब, फिर भी संसद में हंगामा

    निशिकांत दुबे ने कहा कि राहुल गांधी का रवैया गैर-जिम्मेदाराना है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि एक तरफ राहुल गांधी ऐसी किताबों का हवाला दे रहे हैं जो अस्तित्व में ही नहीं हैं, वहीं दूसरी ओर वे खुद ऐसी किताबें लेकर आए हैं जो वास्तव में प्रकाशित हो चुकी हैं, लेकिन भारत में प्रतिबंधित हैं या जिन पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। उनका कहना था कि अगर किताबों के आधार पर ही चर्चा करनी है, तो इन पुस्तकों पर भी बात होनी चाहिए।

    इन विवादित किताबों का किया जिक्र

    BJP सांसद निशिकांत दुबे ने इस दौरान कई चर्चित और विवादास्पद किताबों का नाम लिया। इनमें इंडिया इंडिपेंडेंट, एडवीना एंड नेहरू, द लाइफ ऑफ़ इंदिरा एंड नेहरू, नेहरू ए पॉलिटिकल बायोग्राफी, सीजफायर, द हर्ट ऑफ़ इंडिया नेपाल जैसी किताबें शामिल हैं। इसके अलावा उन्होंने कुछ अन्य पुस्तकों का भी उल्लेख किया, जिनमें रेड साड़ी, बोफोर्स गेट, एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर और इमरजेंसी रिटोल्ड प्रमुख हैं।

    निशिकांत दुबे का कहना था कि इन किताबों में इतिहास, राजनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई संवेदनशील विषयों का जिक्र है, लेकिन इन पर संसद में कभी विस्तार से चर्चा नहीं की गई। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर राहुल गांधी किताबों के हवाले से सरकार को घेरना चाहते हैं, तो इन पुस्तकों के तथ्यों पर भी खुली बहस होनी चाहिए।

    सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा

    निशिकांत दुबे ने अपने बयान में आर्मी एक्ट का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सेना से जुड़े किसी भी विषय पर किताब लिखने से पहले रक्षा मंत्रालय की अनुमति लेना अनिवार्य होता है। उन्होंने पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे के बयान का हवाला देते हुए कहा कि “जनरल नरवणे खुद साफ कह चुके हैं कि भारत की एक इंच जमीन भी नहीं गई। इसके बावजूद एक “छोटी सी बात” को लेकर संसद को ठप कर दिया गया है, जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उनका कहना था कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों पर राजनीति करना देशहित में नहीं है। इसी वजह से वे चाहते हैं कि जिन किताबों में सेना, युद्ध और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संदर्भ हैं, उन पर भी गंभीरता से चर्चा हो।

    सोशल मीडिया पर भी राहुल गांधी पर निशाना

    निशिकांत दुबे ने एक दिन पहले राहुल गांधी को लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पूर्व में ट्विटर पर भी एक पोस्ट साझा की थी। इस पोस्ट में उन्होंने राहुल गांधी को संबोधित करते हुए लिखा था कि वे अपने नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू के तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल करियप्पा के बारे में दिए गए विचार जरूर पढ़ें। इसके साथ ही उन्होंने जनरल थिमय्या का पत्र, फील्ड मार्शल मानेकशॉ का पत्र और मथाई जी की किताब का भी जिक्र किया।उन्होंने पोस्ट में लिखा कि ये सभी दस्तावेज और किताबें बेहद खतरनाक हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से इन्हें हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। उन्होंने राहुल गांधी से अपील की कि वे कम से कम राष्ट्रीय सुरक्षा का तो लिहाज करें।

    सियासी माहौल और तेज होता टकराव

    निशिकांत दुबे के इस बयान के बाद संसद के भीतर और बाहर सियासी माहौल और गरमा गया है। एक तरफ BJP राहुल गांधी पर संसद को बाधित करने का आरोप लगा रही है, तो दूसरी ओर विपक्ष सरकार पर सवाल उठाने की अपनी रणनीति पर अड़ा हुआ है। फिलहाल, यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में संसद का गतिरोध कैसे खत्म होता है और क्या इन आरोप-प्रत्यारोप के बीच सदन का कामकाज पटरी पर लौट पाता है या नहीं।

  • शशि थरूर का बदला रुख, कांग्रेस का खुला समर्थन, मनरेगा पर राहुल गांधी के संदेश को किया साझा

    शशि थरूर का बदला रुख, कांग्रेस का खुला समर्थन, मनरेगा पर राहुल गांधी के संदेश को किया साझा


    नई दिल्ली। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने हाल के दिनों में अपने राजनीतिक रुख में बदलाव दिखाया है और पार्टी नेतृत्व के साथ अपने संबंधों में सुधार के संकेत दिए हैं। बीते कुछ समय से थरूर और कांग्रेस नेतृत्व के बीच मतभेद की अटकलें आम रही हैं। विशेष रूप से ऑपरेशन सिंदूर के बाद थरूर ने कई मौकों पर मोदी सरकार की तारीफ की थी जिससे राजनीतिक गलियारों में उनकी नाराजगी और पार्टी से दूरी की चर्चाएं शुरू हो गई थीं।
    हालांकि अब शशि थरूर ने अपने रुख में बदलाव किया है। उन्होंने पार्टी का खुलकर समर्थन करना शुरू कर दिया है और हाल ही में राहुल गांधी द्वारा मनरेगा योजना पर पोस्ट साझा किया है। थरूर ने इसे री-शेयर करते हुए लिखा कि मनरेगा देश की सबसे सफल विकास योजनाओं में शामिल रही है और ग्रामीण गरीबों के लिए यह एक अहम सामाजिक सुरक्षा कवच का काम करती है। उन्होंने यह भी कहा कि इस योजना को खत्म करना पीछे की ओर उठाया गया कदम होगा जिसे तुरंत वापस लिया जाना चाहिए। मनरेगा योजना को लेकर सियासी घमासान भी तेज हो गया है।
    मोदी सरकार ने मनरेगा की जगह VB-GRAM G बिल संसद में लाकर पारित किया जिसे विपक्षी दल ग्रामीण हितों के खिलाफ मान रहे हैं। राहुल गांधी ने अपने पोस्ट में कहा कि यह नया कानून मनरेगा की अधिकार और मांग पर आधारित गारंटी व्यवस्था को समाप्त करता है और इसे केंद्र से संचालित राशन-आधारित योजना में बदल देता है। शशि थरूर ने राहुल गांधी के इस संदेश को साझा कर इसे समर्थन दिया।राहुल गांधी ने पोस्ट में मनरेगा के ग्रामीण मजदूरों और महिलाओं पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभावों का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि इस योजना ने ग्रामीणों को अपने काम का सही मूल्य दिलाने में मदद की मजदूरी में सुधार किया पलायन को कम किया और ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण किया। उन्होंने चेतावनी दी कि VB-GRAM G इन उपलब्धियों को कमजोर करता है और कोविड काल में मनरेगा की उपयोगिता का उदाहरण देते हुए कहा कि इसने लाखों लोगों को भूख और कर्ज से बचाया।
    थरूर का रुख पहले मोदी सरकार की सराहना करने वाला था लेकिन अब वे पार्टी के समर्थन में खुलकर सामने आ रहे हैं। हाल ही में केरल निकाय चुनावों के दौरान उन्होंने भाजपा की तारीफ की थी लेकिन उसके बाद कई मौकों पर कांग्रेस का समर्थन किया। लोकसभा में भारत के रुपांतरण के लिए नाभिकीय ऊर्जा का संधारणीय दोहन और अभिवर्द्धन शांति विधेयक 2025 पर चर्चा में उन्होंने इसके खामियों को उजागर किया और कहा कि यह रेडियोधर्मी पदार्थों और परमाणु अपशिष्ट से जुड़े जोखिमों को नजरअंदाज करता है। इसके अलावा थरूर ने केरल अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव IFFK में 19 फिल्मों के प्रदर्शन के लिए केंद्र सरकार द्वारा मंजूरी न देने की आलोचना की। उन्होंने इसे सिनेमाई अशिक्षा और नौकरशाही की अत्यधिक सतर्कता करार दिया। थरूर ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर और केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव से अनुमति देने का अनुरोध भी किया। साथ ही उन्होंने फिल्म अभिनेता देव आनंद की फिल्म हरे रामा हरे
  • कांग्रेस में अनबन की अटकलों पर शशि थरूर का विराम  बोले मेरी तरफ से सब कुछ बिल्कुल ठीक है

    कांग्रेस में अनबन की अटकलों पर शशि थरूर का विराम बोले मेरी तरफ से सब कुछ बिल्कुल ठीक है


    नई दिल्ली । कांग्रेस पार्टी के भीतर मतभेद और आंतरिक खींचतान को लेकर चल रही अटकलों के बीच वरिष्ठ नेता और तिरुवनंतपुरम से लोकसभा सांसद शशि थरूर ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि पार्टी के साथ उनके रिश्ते पूरी तरह सामान्य हैं। हाल ही में दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित ‘वोट चोरी के मुद्दे पर कांग्रेस की रैली में उनकी गैरमौजूदगी और कुछ अहम बैठकों में शामिल न होने के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई थी कि क्या कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।

    इन अटकलों पर प्रतिक्रिया देते हुए शशि थरूर ने चर्चित समाचार एजेंसी  से बातचीत में साफ कहा कि उनकी तरफ से किसी भी तरह की नाराजगी या असंतोष नहीं है। रैली में शामिल न हो पाने के सवाल पर उन्होंने कहा मैं जरूर अटेंड करता क्यों नहीं करता? लेकिन उस दिन मैं विदेश में था। यह कार्यक्रम मैंने करीब छह महीने पहले तय किया था। थरूर ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी गैरहाजिरी को पार्टी से दूरी या असहमति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

    जब उनसे सीधे तौर पर पूछा गया कि क्या कांग्रेस में सब कुछ ठीक है तो थरूर ने दो टूक जवाब दिया बिल्कुल ठीक है। मुझे यह कहने की जरूरत क्यों पड़े? मेरी तरफ से सब कुछ ठीक है। उनके इस बयान को कांग्रेस नेतृत्व के प्रति भरोसे और प्रतिबद्धता के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

    इस बीच सोशल मीडिया मंच ‘एक्स पर एक यूजर द्वारा किए गए विश्लेषण ने भी राजनीतिक हलकों में चर्चा बटोरी। यूजर ने अपने लंबे पोस्ट में शशि थरूर और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के बीच कथित वैचारिक विरोधाभास की बात कही थी। पोस्ट में यह तर्क दिया गया था कि यह विरोधाभास दरअसल कांग्रेस पार्टी के भीतर मौजूद दो अलग-अलग वैचारिक प्रवृत्तियों को दर्शाता है।

    यूजर के अनुसार समस्या थरूर और राहुल गांधी के सह-अस्तित्व में नहीं है बल्कि कांग्रेस की उस अक्षमता में है जिसमें पार्टी अलग-अलग विचारधाराओं को चुनने एकजुट करने और उन्हें व्यवस्थित तरीके से लागू करने में सफल नहीं हो पा रही है। इस पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए शशि थरूर ने इसे विचारशील विश्लेषण करार दिया।

    थरूर ने लिखा इस विचारशील विश्लेषण के लिए धन्यवाद। कांग्रेस पार्टी में हमेशा एक से अधिक प्रवृत्तियां रही हैं। आपका आकलन निष्पक्ष है और वर्तमान वास्तविकता की एक निश्चित धारणा को प्रतिबिंबित करता है। उनके इस बयान से यह संकेत मिलता है कि वे पार्टी के भीतर वैचारिक विविधता को एक स्वाभाविक और ऐतिहासिक प्रक्रिया मानते हैं न कि टकराव का कारण।

    गौरतलब है कि इससे पहले राहुल गांधी की अध्यक्षता में हुई कांग्रेस सांसदों की एक अहम बैठक में भी शशि थरूर शामिल नहीं हुए थे। इस पर भी सवाल उठे थे। हालांकि चर्चित सूत्रों के हवाले से बताया कि थरूर ने बैठक में शामिल न हो पाने की जानकारी पहले ही पार्टी को दे दी थी। सोशल मीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार उस समय वह कोलकाता में प्रभा खैतान फाउंडेशन द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में मौजूद थे।

    कुल मिलाकर शशि थरूर के हालिया बयानों और स्पष्टीकरण से यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस में उनके और पार्टी नेतृत्व के बीच किसी बड़े टकराव की बात फिलहाल केवल अटकलों तक सीमित है। थरूर ने न सिर्फ अपनी गैरहाजिरी के कारण गिनाए बल्कि यह भी जताया कि पार्टी के भीतर विभिन्न विचारधाराओं का होना कांग्रेस की परंपरा का हिस्सा रहा है। ऐसे में उनके बयान कांग्रेस के भीतर एकता और संवाद के महत्व को रेखांकित करते हैं।