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  • मंदिर की छत से सीधे शिवलिंग पर गिरता है बारिश का पानी, माउंट आबू के शंकर मठ की अनोखी बनावट खींचती है भक्तों का ध्यान

    मंदिर की छत से सीधे शिवलिंग पर गिरता है बारिश का पानी, माउंट आबू के शंकर मठ की अनोखी बनावट खींचती है भक्तों का ध्यान


    नई दिल्ली । राजस्थान का नाम आते ही लोगों के मन में रेगिस्तान महल और ऐतिहासिक किलों की तस्वीर उभरने लगती है लेकिन इस प्रदेश में कई ऐसे धार्मिक स्थल भी मौजूद हैं जो अपनी अनोखी बनावट और आध्यात्मिक वातावरण के कारण देशभर में पहचान रखते हैं। इन्हीं में से एक है माउंट आबू की अरावली पहाड़ियों के बीच स्थित प्रसिद्ध शंकर मठ। यह मठ भगवान शिव के भक्तों के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र होने के साथ ही अपनी अद्भुत वास्तुकला के लिए भी जाना जाता है। यहां की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि मंदिर का शिखर किसी सामान्य गुंबद की तरह नहीं बल्कि विशाल शिवलिंग के आकार में बनाया गया है। इसके अलावा गर्भगृह में स्थापित 27 टन वजनी विशाल काले संगमरमर का शिवलिंग श्रद्धालुओं और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना रहता है।

    शंकर मठ का निर्माण और स्थापना भी अपने आप में एक लंबी आध्यात्मिक यात्रा से जुड़ी हुई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस मठ की नींव वर्ष 1960 से 1962 के बीच संत स्वामी महेशानंद गिरि महाराज ने रखी थी। इसके बाद वर्ष 1965 से यहां संतों और संन्यासियों का निवास शुरू हुआ। मंदिर परिसर के निर्माण की प्रक्रिया वर्ष 1975 में शुरू की गई। वर्तमान में मठ की देखरेख स्वामी पुण्यानंद गिरि महाराज के मार्गदर्शन में की जा रही है। अरावली की पहाड़ियों और हरियाली से घिरा होने के कारण यहां पहुंचने वाले लोगों को एक अलग तरह की शांति का अनुभव होता है।

    इस मठ की सबसे बड़ी पहचान गर्भगृह में स्थापित विशाल शिवलिंग है। यह शिवलिंग करीब 9.5 फीट ऊंचा और 7.5 फीट चौड़ा बताया जाता है। इसका वजन लगभग 27 टन है। इसे काले संगमरमर के एक ही विशाल पत्थर को तराशकर तैयार किया गया है। इसकी बनावट को लेकर भी कई रोचक बातें बताई जाती हैं। मान्यता के अनुसार पत्थर को तराशते समय उस पर भगवान शिव की तीसरी आंख और जटाओं जैसी आकृतियां उभर आई थीं। यही वजह है कि श्रद्धालु इस शिवलिंग को बेहद विशेष मानते हैं।

    मंदिर की एक और खास बात यहां होने वाला प्राकृतिक जलाभिषेक है। बारिश के मौसम में मंदिर की छत से पानी सीधे शिवलिंग पर गिरता है। श्रद्धालु इस दृश्य को बेहद पवित्र मानते हैं और इसे भगवान शिव का प्राकृतिक जलाभिषेक कहते हैं। मंदिर का निर्माण लाल पत्थरों से किया गया है और इसकी वास्तुकला इसे दूसरे शिव मंदिरों से अलग पहचान देती है। यहां पारंपरिक गुंबद की जगह शिवलिंग जैसी विशाल संरचना बनाई गई है।

    मंदिर परिसर में कमल का सुंदर तालाब और रुद्राक्ष के पेड़ भी मौजूद हैं। इनकी वजह से पूरे परिसर का वातावरण बेहद शांत और आकर्षक दिखाई देता है। यहां रुकने वाले श्रद्धालुओं के लिए शंकर धाम नाम से ठहरने की व्यवस्था भी बताई गई है। मठ में प्रतिदिन सुबह और शाम वेदांत तथा उपनिषदों का पाठ किया जाता है। भगवान शिव की दिन में तीन बार आरती होती है जबकि सोमवार को विशेष भस्म आरती का आयोजन किया जाता है। इसमें शामिल होने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं।

    अगर आप माउंट आबू घूमने का कार्यक्रम बना रहे हैं तो शंकर मठ को अपनी यात्रा में शामिल कर सकते हैं। हालांकि दर्शन के लिए जाने से पहले मंदिर के समय का ध्यान रखना जरूरी है। दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे तक मुख्य मंदिर के कपाट बंद रहते हैं। अपनी अनोखी वास्तुकला विशाल शिवलिंग और शांत आध्यात्मिक वातावरण के कारण शंकर मठ माउंट आबू के प्रमुख दर्शनीय धार्मिक स्थलों में शामिल है।

  • अद्भुत जटोली धाम: दक्षिण-द्रविड़ शैली का वह चमत्कार, जहाँ स्फटिक शिवलिंग के दर्शन मात्र से बदल जाती है किस्मत!

    अद्भुत जटोली धाम: दक्षिण-द्रविड़ शैली का वह चमत्कार, जहाँ स्फटिक शिवलिंग के दर्शन मात्र से बदल जाती है किस्मत!


    नई दिल्‍ली । हिमाचल प्रदेश की देवभूमि अपनी दिव्यता और अलौकिक शक्ति के लिए विश्वविख्यात है, लेकिन सोलन जिले में स्थित जटोली शिव मंदिरकी आभा कुछ अलग ही है। इसे न केवल उत्तर भारत, बल्कि एशिया का सबसे ऊँचा शिव मंदिरहोने का गौरव प्राप्त है। लगभग 122 फुट ऊँचे इस मंदिर की भव्यता ऐसी है कि बादलों के बीच घिरा इसका शिखर किसी अलौकिक लोक का आभास कराता है। मान्यता है कि पौराणिक काल में स्वयं भगवान शिव ने यहाँ प्रवास किया था और उनके चरण पड़ने से यह भूमि आज भी आध्यात्मिक ऊर्जा से लबरेज है।

    इस मंदिर का निर्माण किसी चमत्कार से कम नहीं है। दक्षिण-द्रविड़ शैलीमें निर्मित इस मंदिर का कार्य वर्ष 1974 में शुरू हुआ था और इसे पूर्ण होने में लगभग 39 सालका लंबा समय लगा। मंदिर की वास्तुकला में तीन पिरामिड नुमा संरचनाएं हैं, जो इसकी भव्यता में चार चाँद लगाती हैं। मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित स्फटिक मणि का शिवलिंगश्रद्धालुओं के आकर्षण का मुख्य केंद्र है। कहा जाता है कि इस पवित्र शिवलिंग के दर्शन मात्र से ही भक्त के जीवन के सारे कष्ट मिट जाते हैं और उसे नई दिशा प्राप्त होती है।

    महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर जटोली मंदिर का सौंदर्य और भी निखर जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, आज ही के दिन महादेव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था। वहीं, एक अन्य कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है, जिसमें सृष्टि को बचाने के लिए शिवजी ने हलाहल विषका पान किया था। विष के प्रभाव को शांत करने के लिए देवताओं ने जिस रात जागरण और भक्ति की, वही परंपरा आज महाशिवरात्रिके रूप में मनाई जाती है। जटोली में इस रात का जागरण विशेष फलदायी माना जाता है, क्योंकि यहाँ की शांत वादियाँ और शुद्ध वातावरण भक्त को सीधे शिव तत्व से जोड़ देते हैं।

    यहाँ आने वाले श्रद्धालु केवल आस्था के वशीभूत होकर ही नहीं आते, बल्कि मंदिर की बेमिसाल नक्काशी और शांत प्राकृतिक परिवेश उन्हें मंत्रमुग्ध कर देता है। जटोली मंदिर केवल पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि भक्तों की श्रद्धा और शिल्पकारों के अथक परिश्रम का प्रतीक है। महाशिवरात्रि पर यहाँ हजारों की संख्या में पहुँचने वाले श्रद्धालु जलाभिषेक कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। यदि आप भी महादेव के अनन्य भक्त हैं, तो बादलों की गोद में बसे इस दिव्य शिवालय के दर्शन आपके जीवन का एक अविस्मरणीय अनुभव साबित हो सकते हैं।