Tag: Lord Shiva

  • शिव पूजा का महत्व: आखिर क्यों प्रिय हैं भगवान भोलेनाथ को जल और बेलपत्र

    शिव पूजा का महत्व: आखिर क्यों प्रिय हैं भगवान भोलेनाथ को जल और बेलपत्र


    नई दिल्ली । भगवान शिव को देवों के देव महादेव कहा जाता है। मान्यता है कि शिवजी अपने भक्तों की सच्ची भक्ति से जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। उन्हें प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या की जरूरत नहीं होती, बल्कि केवल जल और बेलपत्र अर्पित करने से भी भोलेनाथ कृपा बरसाते हैं। यही कारण है कि हर सोमवार और विशेष रूप से सावन माह में शिव मंदिरों में जलाभिषेक और बेलपत्र चढ़ाने की परंपरा निभाई जाती है।लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर भगवान शिव पर जल और बेलपत्र ही क्यों चढ़ाया जाता है? इसके पीछे एक बेहद रोचक और पौराणिक कथा जुड़ी हुई है।

    समुद्र मंथन से जुड़ी है यह पौराणिक कथा
    पुराणों के अनुसार, एक समय देवताओं और दानवों के बीच समुद्र मंथन हुआ। इस मंथन से अमृत सहित कई दिव्य वस्तुएं निकलीं, लेकिन सबसे पहले एक भयंकर विष निकला, जिसे “हलाहल विष” कहा गया। यह विष इतना घातक था कि उसके प्रभाव से पूरा संसार संकट में पड़ गया। देवता और दानव दोनों ही उसके प्रभाव को रोकने में असमर्थ थे। तब सृष्टि को बचाने के लिए भगवान शिव ने उस विष का पान कर लिया। भगवान शिव ने विष को अपने कंठ में ही रोक लिया, जिससे उनका गला नीला पड़ गया और तभी से उन्हें “नीलकंठ” कहा जाने लगा।

     जल और बेलपत्र से शांत हुई महादेव की तपन
    हलाहल विष का प्रभाव इतना तीव्र था कि भगवान शिव का शरीर अत्यधिक गर्म हो गया। उनके शरीर की तपन से वातावरण भी प्रभावित होने लगा। मान्यता है कि उस समय देवताओं ने भगवान शिव को शीतलता प्रदान करने के लिए उन पर जल अर्पित किया। वहीं बेलपत्र को विषनाशक और शीतल माना जाता है, इसलिए शिवजी को बेलपत्र भी चढ़ाया गया। जल और बेलपत्र से भगवान शिव को राहत मिली और तभी से शिवलिंग पर जलाभिषेक और बेलपत्र अर्पित करने की परंपरा शुरू हो गई, जो आज भी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।

     जलाभिषेक करते समय रखें इन नियमों का ध्यान
    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय कुछ विशेष नियमों का पालन करना जरूरी माना गया है-

    जलाभिषेक हमेशा शिवलिंग का ही करें
    जल में तुलसी पत्र न डालें, क्योंकि शिव पूजा में तुलसी वर्जित मानी जाती है
    शिवलिंग की पूरी परिक्रमा नहीं करनी चाहिए
    जलाभिषेक के दौरान शिवलिंग को बार-बार स्पर्श करने से बचें
    पूजा के समय शांत और श्रद्धापूर्ण वातावरण बनाए रखें
    मान्यता है कि उचित विधि और मंत्रोच्चार के साथ किया गया जलाभिषेक विशेष फलदायी होता है।

     बेलपत्र चढ़ाने का धार्मिक महत्व
    बेलपत्र को भगवान शिव का सबसे प्रिय पत्र माना गया है। इसकी तीन पत्तियों को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक माना जाता है। बेलपत्र चढ़ाने से मन की शांति, सकारात्मक ऊर्जा और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है।

    आस्था और श्रद्धा से जुड़ी सनातन परंपरा
    भगवान शिव पर जल और बेलपत्र चढ़ाने की परंपरा केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि पौराणिक मान्यताओं और आध्यात्मिक भावनाओं से भी जुड़ी हुई है। यह परंपरा हमें त्याग, संरक्षण और श्रद्धा का संदेश देती है। मान्यता है कि सच्चे मन से किए गए जलाभिषेक से भगवान भोलेनाथ अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करते हैं।

  • वास्तु टिप्स: सोमवार को इन कामों से बचें, नहीं तो घर में बढ़ सकती है नकारात्मकता

    वास्तु टिप्स: सोमवार को इन कामों से बचें, नहीं तो घर में बढ़ सकती है नकारात्मकता


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित माना जाता है। यह दिन मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और पारिवारिक सुख-समृद्धि से जुड़ा हुआ माना जाता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार, सोमवार को किए गए कुछ कार्य घर के वातावरण और व्यक्ति की मानसिक स्थिति पर गहरा प्रभाव डालते हैं। यदि इस दिन कुछ खास बातों का ध्यान न रखा जाए, तो घर में वास्तु दोष बढ़ सकता है, जिससे तनाव, आर्थिक परेशानियां और नकारात्मकता बढ़ने लगती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, सोमवार के दिन घर की दिशा, साफ-सफाई और पूजा-पाठ से जुड़े नियमों का पालन करने से सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और परिवार में सुख-शांति का वातावरण कायम रहता है।

    सोमवार को इन बातों का रखें विशेष ध्यान
    घर का मुख्य द्वार रखें साफ और व्यवस्थित
    वास्तु शास्त्र में घर के मुख्य दरवाजे को ऊर्जा का प्रवेश द्वार माना गया है। सोमवार के दिन मुख्य द्वार के आसपास गंदगी, जूते-चप्पल या टूटा सामान नहीं रखना चाहिए। ऐसा करने से नकारात्मक ऊर्जा घर में प्रवेश कर सकती है।मुख्य दरवाजे पर जल छिड़ककर और साफ-सफाई करके सकारात्मक वातावरण बनाया जा सकता है।

    उत्तर दिशा में रखें पानी का पात्र

    सोमवार का संबंध चंद्र ग्रह और जल तत्व से माना जाता है। वास्तु के अनुसार, घर की उत्तर दिशा में पानी से भरा पात्र या छोटा कलश रखना शुभ माना जाता है। इससे मानसिक शांति और आर्थिक स्थिरता बनी रहती है।

     भगवान शिव की पूजा से दूर होता है वास्तु दोष

    सोमवार को भगवान शिव की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है। शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र अर्पित करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा कम होती है और वास्तु दोष शांत होने लगते हैं। अगर संभव हो तो शाम के समय घर में कपूर या घी का दीपक जलाना भी शुभ माना जाता है।

     सोमवार को न करें ये गलतियां

    वास्तु शास्त्र के अनुसार सोमवार के दिन कुछ गलतियां करने से बचना चाहिए-

    घर में बेवजह झगड़ा या विवाद न करें
    रसोईघर में गंदगी न छोड़ें
    टूटी हुई वस्तुएं घर में न रखें
    देर तक सोने और आलस्य से बचें
    घर के उत्तर-पूर्व कोने को गंदा न रखें
    इन आदतों से घर में नकारात्मक ऊर्जा बढ़ सकती है और मानसिक तनाव भी बढ़ने लगता है।


    सफेद चीजों का प्रयोग माना जाता है शुभ

    सोमवार को सफेद रंग का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन सफेद वस्त्र पहनना, दूध, चावल या सफेद मिठाई का दान करना शुभ फल देता है। इससे चंद्र ग्रह मजबूत होता है और मन शांत रहता है।

     छोटी सावधानियां बदल सकती हैं घर की ऊर्जा

    वास्तु शास्त्र में सोमवार को बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। इस दिन की गई छोटी-छोटी सावधानियां घर में सकारात्मक ऊर्जा, मानसिक शांति और सुख-समृद्धि लाने में मदद कर सकती हैं। यदि नियमित रूप से इन वास्तु नियमों का पालन किया जाए, तो जीवन में संतुलन और खुशहाली बनी रह सकती है।

  • रविवार की भस्म आरती में Mahakaleshwar Jyotirlinga का अलौकिक रूप: रजत मुकुट और भस्म से हुआ भव्य श्रृंगार

    रविवार की भस्म आरती में Mahakaleshwar Jyotirlinga का अलौकिक रूप: रजत मुकुट और भस्म से हुआ भव्य श्रृंगार


    नई दिल्ली । विश्व प्रसिद्ध Shri Mahakaleshwar Jyotirlinga Temple में रविवार तड़के भस्म आरती के दौरान अद्भुत आध्यात्मिक दृश्य देखने को मिला। सुबह करीब 4 बजे जैसे ही मंदिर के पट खुले, पंडे-पुजारियों ने गर्भगृह में स्थापित सभी देव प्रतिमाओं का विधिवत पूजन किया और भगवान महाकाल का जलाभिषेक संपन्न कराया।
    इसके बाद दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस से बने पंचामृत से भगवान का अभिषेक किया गया। इस दौरान त्रिशूल, त्रिपुंड और डमरू के साथ भांग अर्पित कर विशेष श्रृंगार किया गया, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा।
    भस्म अर्पण के साथ हुआ दिव्य श्रृंगार
    कपूर आरती के बाद हरिओम जल अर्पित किया गया और फिर भगवान महाकाल के ज्योतिर्लिंग को वस्त्र से ढंककर भस्म अर्पित की गई। भस्म अर्पण के बाद भगवान का दिव्य श्रृंगार और भी भव्य रूप में सामने आया।
    शेषनाग का रजत मुकुट, रजत मुंडमाल और रुद्राक्ष की माला के साथ सुगंधित पुष्पों की मालाएं बाबा महाकाल को अर्पित की गईं। मोगरे और गुलाब के फूलों से सजे भगवान महाकाल का स्वरूप श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा।
    भोग और आरती के बाद भक्तों को मिला दर्शन
    श्रृंगार पूर्ण होने के बाद भगवान को फल और मिष्ठान का भोग लगाया गया। भस्म आरती के दौरान महा निर्वाणी अखाड़े की ओर से भस्म अर्पित की गई। मान्यता है कि भस्म अर्पित होने के बाद भगवान निराकार से साकार स्वरूप में भक्तों को दर्शन देते हैं।
    आरती में बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं ने बाबा महाकाल के दिव्य स्वरूप के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। पूरा मंदिर परिसर “हर हर महादेव” के जयघोष से गूंज उठा।
  • “महादेव सबसे शक्तिशाली किरदार”-तरुण खन्ना ने तोड़ी टाइपकास्ट की धारणा

    “महादेव सबसे शक्तिशाली किरदार”-तरुण खन्ना ने तोड़ी टाइपकास्ट की धारणा


    नई दिल्ली। टीवी इंडस्ट्री में तरुण खन्ना को ‘महादेव’ के रूप में खास पहचान मिली है। उन्होंने अब तक 400 से ज्यादा बार भगवान भगवान शिव का किरदार निभाया है। ‘कर्म फल दाता शनि’, ‘राधा कृष्ण’, ‘जय कन्हैया लाल की’, ‘देवी आदि पराशक्ति’ और ‘परम अवतार श्री कृष्ण’ जैसे कई लोकप्रिय पौराणिक शोज में उनकी मौजूदगी ने दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई है।

     टाइपकास्ट या सोच-समझकर लिया फैसला?
    लगातार एक ही तरह के किरदार निभाने पर अक्सर कलाकारों को ‘टाइपकास्ट’ कहा जाता है, लेकिन तरुण खन्ना इस धारणा से अलग सोच रखते हैं। उनका कहना है कि वह जानबूझकर इस भूमिका को चुनते हैं क्योंकि यह बेहद प्रभावशाली और शक्तिशाली किरदार है। उनके अनुसार, “एक अभिनेता के लिए किरदार की ताकत समझना जरूरी है और महादेव से ज्यादा शक्तिशाली रोल मिलना मुश्किल है। इसलिए यह मेरा सोचा-समझा निर्णय है।”

     किरदार ने बदली जिंदगी
    तरुण खन्ना मानते हैं कि भगवान शिव का किरदार निभाने से उनके व्यक्तित्व में बड़ा बदलाव आया है। इस भूमिका ने उन्हें अधिक धैर्यवान बनाया और उनके भीतर की विनम्रता को फिर से जागृत किया।

     टीवी से फिल्मों और थिएटर तक का सफर
    तरुण खन्ना ने सिर्फ टीवी ही नहीं, बल्कि फिल्मों और थिएटर में भी महादेव का किरदार निभाया है। तेलुगु फिल्म ‘अखंडा 2’ और नाटक ‘हमारे राम’ में भी उन्होंने इसी रूप में दर्शकों को प्रभावित किया।

    सिर्फ VFX नहीं, भावनाएं जरूरी
    पौराणिक शोज पर अपनी राय रखते हुए तरुण खन्ना ने कहा कि केवल VFX और भव्य कॉस्ट्यूम से शो सफल नहीं होता। उनका मानना है कि अगर कहानी में भावनाओं की गहराई नहीं होगी, तो दर्शकों से जुड़ाव नहीं बन पाएगा। उन्होंने साफ कहा, “महादेव सिर्फ एक लुक नहीं, बल्कि एक दिव्य अनुभूति है, जिसे निभाने के लिए सच्ची श्रद्धा और समर्पण चाहिए।”

     किरदार नहीं, आस्था का प्रतीक
    तरुण खन्ना के लिए ‘महादेव’ का किरदार सिर्फ एक रोल नहीं, बल्कि आस्था और समर्पण का प्रतीक है। यही वजह है कि वह इसे बार-बार निभाने के बावजूद इसे अपनी ताकत मानते हैं, कमजोरी नहीं।

  • उज्जैन में महाकाल की भस्म आरती: दिव्य श्रृंगार में सजे बाबा, श्रद्धालुओं का उमड़ा सैलाब

    उज्जैन में महाकाल की भस्म आरती: दिव्य श्रृंगार में सजे बाबा, श्रद्धालुओं का उमड़ा सैलाब


    नई दिल्ली। उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में सोमवार तड़के भस्म आरती के दौरान दिव्य और भव्य दृश्य देखने को मिला। भगवान महाकाल का विधि-विधान से पंचामृत पूजन कर आकर्षक श्रृंगार किया गया, जिसमें भांग, चंदन, बिल्वपत्र और रजत आभूषणों से बाबा को राजा स्वरूप में सजाया गया।

    भोर की पहली आरती के साथ ही मंदिर परिसर “हरिओम” के जयघोष और मंत्रोच्चार से गूंज उठा। पंडे-पुजारियों ने गर्भगृह में स्थापित ज्योतिर्लिंग का जलाभिषेक किया, जिसके बाद दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस से बने पंचामृत से अभिषेक किया गया। इसके बाद पारंपरिक रूप से भस्म अर्पित की गई, जिसे महाकाल पूजा का सबसे विशेष और पवित्र क्षण माना जाता है।

    भस्म अर्पण के दौरान महानिर्वाणी अखाड़ा की ओर से विशेष भस्म चढ़ाई गई। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी क्षण भगवान महाकाल अपने निराकार स्वरूप से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। 

    नई दिल्ली। उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में सोमवार तड़के भस्म आरती के दौरान दिव्य और भव्य दृश्य देखने को मिला। भगवान महाकाल का विधि-विधान से पंचामृत पूजन कर आकर्षक श्रृंगार किया गया, जिसमें भांग, चंदन, बिल्वपत्र और रजत आभूषणों से बाबा को राजा स्वरूप में सजाया गया।

    भोर की पहली आरती के साथ ही मंदिर परिसर “हरिओम” के जयघोष और मंत्रोच्चार से गूंज उठा। पंडे-पुजारियों ने गर्भगृह में स्थापित ज्योतिर्लिंग का जलाभिषेक किया, जिसके बाद दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस से बने पंचामृत से अभिषेक किया गया। इसके बाद पारंपरिक रूप से भस्म अर्पित की गई, जिसे महाकाल पूजा का सबसे विशेष और पवित्र क्षण माना जाता है।
    भस्म अर्पण के दौरान महानिर्वाणी अखाड़ा की ओर से विशेष भस्म चढ़ाई गई। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी क्षण भगवान महाकाल अपने निराकार स्वरूप से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। इसके बाद शेषनाग का रजत मुकुट, रुद्राक्ष की माला, रजत मुण्डमाल और सुगंधित पुष्पों से बाबा का दिव्य श्रृंगार किया गया।
    मोगरा और गुलाब के फूलों से सजे महाकाल का स्वरूप अत्यंत मनमोहक दिखाई दिया। आरती के दौरान भगवान को फल और मिष्ठान का भोग अर्पित किया गया, जिसे श्रद्धालुओं ने बड़े श्रद्धा भाव से देखा।
    इस पावन अवसर पर देशभर से आए हजारों श्रद्धालुओं ने भस्म आरती के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। मंदिर परिसर में भक्ति, आस्था और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत संगम देखने को मिला।
    भगवान महाकाल की भस्म आरती केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था और ऊर्जा का अद्वितीय अनुभव है, जो हर भक्त के मन को भक्ति से भर देता है।

  • सोमवार व्रत कथा: भोलेनाथ की कृपा से पूरी होती हैं हर मनोकामनाएं

    सोमवार व्रत कथा: भोलेनाथ की कृपा से पूरी होती हैं हर मनोकामनाएं


    नई दिल्ली। हिंदू धर्म में सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित माना जाता है। इस दिन व्रत रखकर विधि-विधान से पूजा करने और सोमवार व्रत कथा सुनने का विशेष महत्व है। मान्यता है कि सच्चे मन से किए गए इस व्रत से भोलेनाथ जल्दी प्रसन्न होते हैं और भक्तों की सभी इच्छाएं पूरी करते हैं।

    सोमवार व्रत कथा

    प्राचीन समय में एक नगर में एक साहूकार रहता था। उसके पास धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी, लेकिन संतान न होने के कारण वह बेहद दुखी रहता था। संतान प्राप्ति की इच्छा से वह हर सोमवार व्रत रखता और माता पार्वती के साथ शिवजी की पूजा करता था।

    उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर माता पार्वती ने भगवान शिव से उसकी मनोकामना पूर्ण करने का आग्रह किया। पहले तो शिवजी ने कर्म और भाग्य का तर्क दिया, लेकिन माता पार्वती के आग्रह पर उन्होंने साहूकार को पुत्र-प्राप्ति का वरदान दिया। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि वह पुत्र केवल 12 वर्ष तक ही जीवित रहेगा।

    समय बीता और साहूकार के घर पुत्र का जन्म हुआ। जब वह 11 वर्ष का हुआ तो उसे शिक्षा के लिए काशी भेजा गया। रास्ते में एक नगर में राजकुमारी का विवाह हो रहा था। परिस्थितियों के कारण साहूकार के पुत्र का विवाह राजकुमारी से करा दिया गया, लेकिन वह आगे पढ़ाई के लिए काशी चला गया।

    काशी में जब वह बालक 12 वर्ष का हुआ, तभी उसकी मृत्यु हो गई। उसके मामा का रो-रोकर बुरा हाल था। तभी वहां से भगवान शिव और माता पार्वती गुजरे। माता पार्वती ने करुणा वश शिवजी से उस बालक को जीवित करने का आग्रह किया। अंततः शिवजी ने प्रसन्न होकर उसे पुनः जीवनदान दे दिया।

    बालक शिक्षा पूरी कर जब वापस लौटा, तो उसका परिवार उसे जीवित देखकर अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसी रात भगवान शिव ने साहूकार को स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि उसके सोमवार व्रत और कथा के प्रभाव से ही उसके पुत्र को लंबी आयु प्राप्त हुई है।

    व्रत का महत्व

    सोमवार व्रत और कथा का पाठ करने से-

    जीवन के कष्ट दूर होते हैं
    संतान सुख की प्राप्ति होती है
    वैवाहिक जीवन सुखमय बनता है
    मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं

    सच्चे मन, श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया सोमवार व्रत व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाता है। भगवान शिव अपने भक्तों पर हमेशा कृपा बनाए रखते हैं और उनकी हर इच्छा पूर्ण करते हैं।

  • तू मस्त-ए-कैलाश…. युद्ध के बीच ईरानी भाषा में शिवजी का भवन हुआ वायरल…

    तू मस्त-ए-कैलाश…. युद्ध के बीच ईरानी भाषा में शिवजी का भवन हुआ वायरल…


    तेहरान।
    मिडिल ईस्ट (Middle East) में वॉर के बीच ईरानी भाषा (Iranian language) के कुछ गाने चर्चा में है। यहां हम जिस गाने का जिक्र कर रहे हैं वो शंकरजी का भजन (Shankarji’s hymn) है। इसका टाइटल है, ‘मस्त-ए-कैलाश’। इस गाने में ईरान के कुछ लोग शिव मंदिर में पूजा करते दिख रहे हैं। कई पुरानी तस्वीरें दिख रही हैं। गायिका ने बहुत प्यारी आवाज में इसे गाया है। इसे यूट्यूब पर बियॉन्ड कॉन्शियस (Beyond Conscious on YouTube) पर देखा जा कता है। इसमें चैतन्य शर्मा को क्रेडिट दिया गया है। भजन ईरानी भाषा में है और इसमें शंकरजी की तारीफ की गई है।


    गाने में कई पुरानी तस्वीरें

    गाने की शुरुआत में एक स्टिल इमेज दिखती है जिसमें एक परिवार एक मंदिर में शिवलिंग की पूजा कर रहा है। इसके बाद कई शिवलिंग, पुराने मंदिर, नंदी की आकृति दिखती है। गाने के बोल हैं, तू जोगी ये कैलाश, तू मस्त ए कैलाश, ऐ शंकरा, ऐ शंकरा। यहां देखें गाना


    गाने की लिरिक्स

    तू जोगी-ये कैलाश, तू मस्त-ए-कैलाश
    ऐ शंकरा, ऐ शंकरा
    आतिश-ए-हक, ऐ शंकरा
    तू जोगी-ये कैलाश, तू मस्त-ए-कैलाश
    जहर-ए-जहां नुशीदी, फिदा-ये-जहां
    खाक-ए-भसम पुशीदी, ऐ जान-ए-जहां
    माह-ए-शब बर सर-ए-तू मी-दरखशद
    सदा-ये डमरू दर आसमां मी-रक्सद
    ऐ नीलकंठ, ऐ शंकरा
    आतिश-ए-हक, ऐ शंकरा
    तू जोगी-ए कैलाश, तू मस्त-ए-कैलाश
    मार-ए-सियाह दर गरदनात ख्वाबिदा
    चश्म-ए-सेव्वम, रोशन ओ बीदारिदा
    अज सिंधु ता पार्स, येक ही खुदा
    ओम नमः शिवाय, या महादेवा
    तू मस्त-ए-कैलाश…
    ऐ शंकरा…
    हक शिवा, हक शिवा
    मस्त-ए-मस्त-ए-मस्त-ए-शिवा
    हक शिवा, हक शिवा
    आतिश दर जां, आतिश दर रूह
    तू कोह-ए-कैलाश, तू अजीम कोह
    रक्स-ए-तांडव, दर इन आलम
    भसम-ए-पाक, ऐ महादेवाम
    ऐ नीलकंठ, ऐ शंकरा
    ओम नमः शिवाय, या शंकरा
    तू जोगी-ये कैलाश, तू मस्त-ए-कैलाश
    या महादेव…


    समझें गाने का हिंदी मतलब

    आप कैलाश के योगी हैं, आप कैलाश के मस्त प्रभु हैं।
    हे शंकर, हे शंकर
    सत्य की अग्नि हैं आप, हे शंकर
    आप कैलाश के योगी हैं, आप कैलाश के आनंदमय प्रभु हैं।
    आपने संसार के विष को पी लिया, संसार के लिए एक महान बलिदान।
    आपने पवित्र भस्म धारण की, हे जगत की आत्मा।
    रात का चांद आपके मस्तक पर चमकता है,
    डमरू की ध्वनि आकाश में नृत्य करती है।
    हे नीलकंठ! हे शंकर!
    सत्य की अग्नि हैं आप, हे शंकर!
    आप कैलाश के योगी हैं, आप कैलाश के आनंदमय प्रभु हैं।
    काला नाग आपकी गर्दन पर विश्राम करता है,
    तीसरी आंख जागृत और प्रकाशमान है।
    सिंध से लेकर पर्शिया (ईरान का पुराना नाम) तक एक ही दिव्यता है,ओम नमः शिवाय! हे महादेव!
    आप कैलाश के आनंदमय प्रभु हैं…
    हे शंकर…
    सत्य ही शिव है! सत्य ही शिव है!
    आनंदमय, आनंदमय, आनंदमय हैं शिव!
    सत्य ही शिव है! सत्य ही शिव है!
    आत्मा में अग्नि! चेतना में अग्नि!
    आप ही कैलाश हैं, आप ही महान पर्वत हैं!
    इस जगत में तांडव का नृत्य!
    हे मेरे महादेव, पवित्र भस्म के स्वामी!
    हे नीलकंठ! हे शंकर!
    ओम नमः शिवाय! हे शंकर!
    आप कैलाश के योगी हैं, आप कैलाश के आनंदमय प्रभु हैं।
    हे महादेव…

    यूट्यूब पर यह गाना Beyond Conscious चैनल पर है। इस पर शिवजी के कई और भी भजन हैं।

  • अनोखा शिव धाम: कच्छ के कल्याणेश्वर महादेव मंदिर में सदियों से टूटे शिवलिंग की होती है पूजा

    अनोखा शिव धाम: कच्छ के कल्याणेश्वर महादेव मंदिर में सदियों से टूटे शिवलिंग की होती है पूजा


    नई दिल्ली । गुजरात के कच्छ जिला में भुज के पास स्थित माधापार गांव का कल्याणेश्वर महादेव मंदिर आस्था और रहस्य का अनोखा संगम माना जाता है। इस मंदिर की सबसे खास बात यहां स्थापित शिवलिंग है जो सदियों से टूटी अवस्था में होने के बावजूद पूरी श्रद्धा और विधि विधान से पूजित हो रहा है।

    मान्यता है कि यह शिवलिंग मंदिर निर्माण से पहले से ही इसी स्वरूप में मौजूद था। समय के साथ जहां अन्य शिवलिंगों में परिवर्तन देखने को मिलता है वहीं यहां का शिवलिंग प्रारंभ से ही खंडित अवस्था में बताया जाता है। इसके बावजूद श्रद्धालु इसे भगवान शिव का साक्षात रूप मानकर जल दूध और बेलपत्र अर्पित करते हैं।

    खंडित होने पर भी पूजनीय

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शिवलिंग किसी भी अवस्था में पूजनीय होता है। यही कारण है कि यहां टूटा हुआ शिवलिंग भी उतनी ही आस्था के साथ पूजित है। जबकि अन्य देवी देवताओं की मूर्तियों के लिए खंडित होने पर पूजा के अलग नियम बताए जाते हैं।

    रहस्यमयी मान्यताएं
    मंदिर से जुड़ी कई रहस्यमयी बातें भी श्रद्धालुओं के बीच प्रचलित हैं। कहा जाता है कि शिवलिंग पर चढ़ाया गया जल या दूध कहां जाता है यह स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता। इसके अलावा मंदिर परिसर में सांप दिखाई देने की भी स्थानीय लोगों द्वारा चर्चा की जाती है जिसे शिव की उपस्थिति का प्रतीक माना जाता है।

    पौराणिक जुड़ाव
    इस मंदिर का संबंध पौराणिक कथाओं से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि पांडव ने अपने अज्ञातवास के दौरान यहां तपस्या की थी और शिवलिंग की स्थापना की थी। कुछ लोककथाओं में कर्ण और छत्रपति शिवाजी महाराज के यहां पूजा करने का भी उल्लेख मिलता है। आज भी दूर दूर से श्रद्धालु इस अद्भुत शिवधाम के दर्शन के लिए पहुंचते हैं और अपनी मनोकामनाएं लेकर भगवान शिव की शरण में आते हैं।

  • रंगपंचमी पर सबसे पहले महाकाल को चढ़ा रंग, भस्म आरती में केसर जल अर्पित, शिव परिवार को लगाया हर्बल गुलाल

    रंगपंचमी पर सबसे पहले महाकाल को चढ़ा रंग, भस्म आरती में केसर जल अर्पित, शिव परिवार को लगाया हर्बल गुलाल


    उज्जैन। रंगपंचमी के अवसर पर रविवार तड़के विश्व प्रसिद्ध उज्‍जैन स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर में परंपरा के अनुसार भगवान महाकाल को सबसे पहले रंग अर्पित कर पर्व की शुरुआत की गई। सुबह 4 बजे मंदिर के पट खुलने के बाद भस्म आरती के दौरान भगवान महाकालेश्वर का विशेष पूजन किया गया और उन्हें एक लोटा केसर युक्त जल अर्पित किया गया। इसके बाद भगवान का त्रिपुंड, मुंडमाल और रजत आभूषणों से राजा स्वरूप में भव्य श्रृंगार किया गया।
    शिव परिवार को लगाया हर्बल रंग

    रंगपंचमी के मौके पर भस्म आरती के साथ विशेष पूजा-अर्चना की गई। पुजारियों ने गर्भगृह में विराजित सभी देवी-देवताओं का पूजन कर सबसे पहले भगवान महाकाल को रंग अर्पित किया। इस दौरान भगवान महाकाल के साथ माता पार्वती, भगवान गणेश, कार्तिकेय और नंदी को भी हर्बल रंग चढ़ाया गया।

    पूजन के दौरान प्रथम घंटाल बजाकर मंत्रोच्चार के साथ हरिओम का जल अर्पित किया गया। इसके बाद भगवान का जलाभिषेक कर दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस से बने पंचामृत से अभिषेक किया गया। कपूर आरती के बाद भगवान के मस्तक पर भांग, चंदन और त्रिपुंड लगाकर विशेष श्रृंगार किया गया।

    श्रृंगार पूर्ण होने के बाद ज्योतिर्लिंग को वस्त्र से ढंककर भस्म अर्पित की गई। इसके बाद भगवान को रजत मुकुट, रुद्राक्ष की माला और सुगंधित पुष्पों की मालाएं अर्पित कर फल और मिष्ठान का भोग लगाया गया।

    सुरक्षा के चलते रंग लाने पर रोक

    दो साल पहले धुलेंडी के दिन गर्भगृह में आग लगने की घटना को देखते हुए इस बार भी मंदिर में श्रद्धालुओं, पंडे-पुजारियों को रंग लाने की अनुमति नहीं दी गई। दर्शन के लिए आने वाले भक्तों को सख्त जांच के बाद ही मंदिर में प्रवेश दिया गया।

    पहले हर साल श्रद्धालु रंग-गुलाल लेकर मंदिर पहुंचते थे, जिससे पूरा माहौल ब्रज की होली जैसा दिखाई देता था। इस बार भगवान को अर्पित किया जाने वाला केसर युक्त जल भी मंदिर की कोठार शाखा से ही पुजारियों को उपलब्ध कराया गया।

    मंदिर प्रशासन ने गर्भगृह, नंदी मंडपम, गणेश मंडपम, कार्तिकेय मंडपम और पूरे मंदिर परिसर में रंग या गुलाल ले जाने, उड़ाने या लगाने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया है। साथ ही किसी भी उपकरण से रंग उड़ाने की भी अनुमति नहीं दी गई है।

    शाम की आरती में भी चढ़ेगा रंग

    संध्या आरती के दौरान भगवान महाकाल को एक लोटा केसर युक्त जल और लगभग 500 ग्राम गुलाल अर्पित किया जाएगा। यह सामग्री मंदिर की कोठार शाखा द्वारा भस्म आरती और शासकीय पुजारियों को उपलब्ध कराई जाएगी।

  • मार्च 2026 में महादेव की विशेष कृपा पाने का मौका, इस महीने 3 बार पड़ेगा प्रदोष व्रत, जानें तिथि और शुभ मुहूर्त

    मार्च 2026 में महादेव की विशेष कृपा पाने का मौका, इस महीने 3 बार पड़ेगा प्रदोष व्रत, जानें तिथि और शुभ मुहूर्त

    नई दिल्ली। हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत को विशेष महत्व प्राप्त है। यह व्रत हर महीने दोनो पक्ष की त्रयोदशी तिथि को किया जाता है और इसे करने से भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष कृपा प्राप्त होती है। साल 2026 का मार्च महीना इस लिहाज से खास है, क्योंकि इस महीने तीन प्रदोष व्रत पड़ रहे हैं। इस महीने व्रत रखने वालों को तीन अलग-अलग अवसरों में शिव-पार्वती की कृपा प्राप्त करने का मौका मिलेगा। प्रदोष व्रत शाम के प्रदोष काल में किया जाता है, जिससे जीवन के कष्ट, बीमारियां दूर होती हैं और सुख-समृद्धि बढ़ती है।

    मार्च 2026 में 3 प्रदोष व्रत और उनके शुभ मुहूर्त

    1. पहला प्रदोष व्रत रवि प्रदोष 1 मार्च 2026
    तिथि: फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी
    समय: 28 फरवरी रात 08:43 बजे से 1 मार्च सुबह 09:11 बजे तक
    प्रदोष काल: शाम 06:21 बजे से 07:08 बजे तक
    विशेष: रविवार होने के कारण इसे रवि प्रदोष कहा जाएगा।

    दूसरा प्रदोष व्रत सोम प्रदोष 16 मार्च 2026

    तिथि: चैत्र कृष्ण त्रयोदशी
    समय: 16 मार्च सुबह 09:41 बजे से 17 मार्च सुबह 09:24 बजे तक
    प्रदोष काल: शाम 06:31 बजे से रात 08:54 बजे तक
    विशेष: सोमवार होने के कारण इसे सोम प्रदोष कहा जाएगा और व्रत का फल दोगुना माना जाता है।

     तीसरा प्रदोष व्रत सोम प्रदोष 30 मार्च 2026

    तिथि: चैत्र शुक्ल त्रयोदशी
    समय: 30 मार्च सुबह 07:08 बजे से 31 मार्च सुबह 06:56 बजे तक
    प्रदोष काल: शाम 06:38 बजे से 08:57 बजे तक
    विशेष: सोमवार होने के कारण इसे भी सोम प्रदोष कहा जाएगा।
     यह जानकारी केवल जागरूकता के उद्देश्य से दी गई है। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।