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  • महंगा हुआ कच्चा तेल, नहीं बढ़े खुदरा दाम; पेट्रोल-डीजल की बिक्री पर सरकारी तेल कंपनियों को प्रति लीटर हो रहा नुकसान

    महंगा हुआ कच्चा तेल, नहीं बढ़े खुदरा दाम; पेट्रोल-डीजल की बिक्री पर सरकारी तेल कंपनियों को प्रति लीटर हो रहा नुकसान

    नई दिल्ली । अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और घरेलू स्तर पर पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों में सीमित बदलाव के कारण सरकारी तेल विपणन कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ गया है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में कंपनियों का रिटेल मार्जिन सकारात्मक रहने के बजाय नुकसान में पहुंच गया। इससे स्पष्ट है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव का सीधा असर घरेलू ईंधन कारोबार पर पड़ रहा है।

    उपलब्ध वित्तीय आकलनों के अनुसार अप्रैल से जून 2026 की तिमाही के दौरान सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को पेट्रोल की खुदरा बिक्री पर प्रति लीटर लगभग 6 रुपये और डीजल पर करीब 18.9 रुपये का नुकसान हुआ। इसके विपरीत पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यही कंपनियां पेट्रोल और डीजल दोनों पर प्रति लीटर लाभ दर्ज कर रही थीं। एक वर्ष के भीतर रिटेल मार्जिन का मुनाफे से नुकसान में बदल जाना ऊर्जा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और परिष्कृत ईंधन की कीमतों में तेज वृद्धि रही। हालांकि वैश्विक बाजार में लागत बढ़ने के बावजूद घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल के दाम उसी अनुपात में नहीं बढ़ाए गए। परिणामस्वरूप कंपनियों की लागत और बिक्री मूल्य के बीच का अंतर बढ़ गया, जिससे रिटेल मार्जिन नकारात्मक हो गया।

    सरकारी तेल कंपनियां रिफाइनरी से तैयार ईंधन की कीमतें अंतरराष्ट्रीय मानकों और आयात लागत के आधार पर तय करती हैं। इसके बाद परिवहन, भंडारण, विपणन, वितरण, डीलर कमीशन और अन्य परिचालन खर्च जोड़कर अंतिम खुदरा मूल्य निर्धारित किया जाता है। जब वैश्विक कीमतें तेजी से बढ़ती हैं और घरेलू खुदरा कीमतें स्थिर रहती हैं, तब कंपनियों को प्रति लीटर नुकसान उठाना पड़ता है।

    ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों के अनुसार अप्रैल-जून तिमाही के दौरान पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और विमान ईंधन की बिक्री में भी कंपनियों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव बना रहा। बाजार मूल्य की तुलना में कम दरों पर आपूर्ति करने के कारण सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को कुल मिलाकर भारी राजस्व प्रभाव का सामना करना पड़ा। इससे कंपनियों की परिचालन आय और लाभप्रदता दोनों प्रभावित हुई हैं।

    विश्लेषकों का मानना है कि वर्ष 2022 में वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों और यूक्रेन संघर्ष के बाद अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ी थी। इसके बाद घरेलू ईंधन मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक संतुलित और नियंत्रित तरीके से अपनाई गई। इस नीति का लाभ तब मिलता है जब वैश्विक बाजार में तेल सस्ता होता है और घरेलू कीमतें स्थिर रहती हैं, लेकिन कीमतों में तेजी आने पर यही स्थिति कंपनियों के लिए नुकसान का कारण बन जाती है।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें, विनिमय दर और घरेलू मूल्य निर्धारण नीति तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। यदि वैश्विक बाजार में कीमतों का दबाव लंबे समय तक बना रहता है और खुदरा कीमतों में समानुपातिक संशोधन नहीं होता, तो सरकारी तेल कंपनियों के रिटेल मार्जिन पर दबाव जारी रह सकता है। वहीं कीमतों में नरमी आने की स्थिति में कंपनियों की लाभप्रदता में दोबारा सुधार की संभावना भी बनी रहेगी।

  • Air India को घाटे से उबारने की कवायद….. एयरलाइंस पार्टनर से मिले टाटा के चेयरमैन चंद्रशेखरन

    Air India को घाटे से उबारने की कवायद….. एयरलाइंस पार्टनर से मिले टाटा के चेयरमैन चंद्रशेखरन


    नई दिल्ली।
    घाटे में चल रही एयर इंडिया (Air India) को लेकर टाटा समूह (Tata Group) एक्शन मोड में है। इसी कड़ी में सिंगापुर एयरलाइंस (Singapore Airlines.) के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) गोह चून फोंग और टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन के बीच मुलाकात भी हुई है। माना जा रहा है कि दोनों पक्षों ने घाटे में चल रही एयर इंडिया के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की। फोंग सुबह टाटा समूह के मुख्यालय बॉम्बे हाउस पहुंचे और शाम को रवाना हो गए।

    एक सूत्र ने बताया कि उन्होंने एयर इंडिया के चेयरमैन चंद्रशेखरन और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की। टाटा समूह के अधिकारियों के साथ हुई बैठकों के बारे में फिलहाल कोई विस्तृत जानकारी नहीं मिल सकी है। बता दें कि टाटा समूह ने जनवरी, 2022 में भारत सरकार से एयर इंडिया का अधिग्रहण किया था और बाद में सिंगापुर एयरलाइंस ने विमानन कंपनी में 25.1 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदी थी।


    प्रतिबंधों से पड़ा असर

    यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब एयर इंडिया कई चुनौतियों का सामना कर रही है जिनमें पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण हवाई क्षेत्र पर प्रतिबंध से बढ़ती परिचालन लागत और करीब एक वर्ष से पाकिस्तान के हवाई क्षेत्र के बंद रहने का प्रभाव शामिल है। इन प्रतिबंधों के कारण महत्वाकांक्षी बदलाव योजना के तहत काम कर रही विमानन कंपनी को लंबी दूरी की अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए लंबा मार्ग अपनाना पड़ रहा है जिससे ईंधन खपत एवं खर्च बढ़ गया है।


    सीईओ का इस्तीफा

    इस महीने की शुरुआत में एयर इंडिया ने घोषणा की थी कि उसके सीईओ एवं प्रबंध निदेशक कैंपबेल विल्सन पद छोड़ेंगे। एयरलाइन ने उनके उत्तराधिकारी की तलाश के लिए एक समिति का गठन किया है। न्यूजीलैंड मूल के विल्सन पिछले चार वर्ष से टाटा समूह के स्वामित्व वाली एयर इंडिया के सीईओ एवं प्रबंध निदेशक के रूप में कार्य कर रहे हैं। बता दें कि एयरलाइन की लंदन जाने वाली उड़ान के पिछले साल अहमदाबाद में दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद विल्सन की आलोचना भी हुई थी। इस हादसे में 250 से अधिक लोगों की जान गई थी। इसके अलावा कई मौकों पर सुरक्षा मानकों के कथित उल्लंघन को लेकर भी उन पर सवाल उठे थे।

    31 मार्च, 2026 को समाप्त वित्त वर्ष में एयर इंडिया को 22,000 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान होने का अनुमान है। एयर इंडिया का प्रदर्शन सिंगापुर एयरलाइंस के लिए भी वित्तीय दबाव का कारण बन रहा है। ऐसे में यह मुलाकात काफी अहम माना जा रहा है। माना जा रहा है कि इस मुलाकात में एयर इंडिय को घाटे से उबारने के मुद्दे पर जोर दिया गया है।

  • इस्राइल के हमले से खोंडाब हेवी वाटर प्लांट बुरी तरह से क्षतिग्रस्त, ईरान को भारी नुकसान

    इस्राइल के हमले से खोंडाब हेवी वाटर प्लांट बुरी तरह से क्षतिग्रस्त, ईरान को भारी नुकसान


    विएना।
    पश्चिम एशिया (West Asia War) में बढ़ते तनाव के बीच इस्राइल (Israel) ने ईरान (Iran) के खोंडाब (अराक) हेवी वाटर प्लांट पर हवाई हमला किया। अब अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी (आईएईए) (International Atomic Energy Agency – IAEA) ने पुष्टि की है कि यह प्लांट बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है और अब काम नहीं कर रहा है। आईएईए के अनुसार, यह जानकारी सैटेलाइट तस्वीरों और तकनीकी विश्लेषण के आधार पर दी गई है।


    खोंडाब प्लांट क्यों है इतना अहम?

    यह प्लांट ईरान के अराक शहर के पास स्थित है और इसे अराक न्यूक्लियर कॉम्प्लेक्स भी कहा जाता है। यहां ‘हेवी वाटर’ बनाया जाता है, जो खास तरह के परमाणु रिएक्टर में इस्तेमाल होता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसे रिएक्टर से प्लूटोनियम भी बनाया जा सकता है, जिसका उपयोग परमाणु हथियारों में किया जा सकता है। यही वजह है कि यह प्लांट लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय रहा है।


    IAEA की रिपोर्ट में क्या कहा गया?

    आईएईए ने साफ कहा है कि प्लांट को गंभीर नुकसान हुआ है, यह अब ऑपरेशनल नहीं है और यहां कोई घोषित परमाणु सामग्री मौजूद नहीं थी। इसका मतलब है कि रेडिएशन या तत्काल परमाणु खतरे की संभावना नहीं बताई गई है।

    इस्राइल ने क्यों किया हमला?
    इस्राइली सेना (आईडीएफ) ने दावा किया कि यह हमला खुफिया जानकारी के आधार पर किया गया। उनका कहना है कि यह प्लांट ईरान के परमाणु कार्यक्रम का अहम हिस्सा था। ईरान ने अंतरराष्ट्रीय समझौतों के बावजूद इसे पूरी तरह सुरक्षित नहीं बनाया और यहां से भविष्य में हथियार-ग्रेड प्लूटोनियम बनने का खतरा था। इस्राइल सेना ने इस ऑपरेशन को ‘राइजिंग लॉयन’ नाम दिया है।

    बढ़ता तनाव और आगे का खतरा
    इस हमले के बाद पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ गया है। ईरान और इस्राइल के बीच पहले से ही तनाव चरम पर है, और अब इस तरह की कार्रवाई से हालात और बिगड़ सकते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय दबाव और कूटनीतिक हलचल तेज हो सकती है।