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  • सेंसेक्स नहीं, कम महंगाई ने दी सोने-चांदी को उड़ान, बनाया नया रिकॉर्ड

    सेंसेक्स नहीं, कम महंगाई ने दी सोने-चांदी को उड़ान, बनाया नया रिकॉर्ड

    नई दिल्ली। बुधवार के कारोबारी सत्र में कीमती धातुओं ने नया रिकार्ड बनाया। एमसीएक्स पर सोना 1,43,500 रुपए प्रति 10 ग्राम और चांदी 2,87,990 रुपए प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई। हालांकि दोपहर 12.16 बजे सोने ने 1,43,300 रुपए प्रति 10 ग्राम और चांदी 2,85,129 रुपए प्रति किलोग्राम पर कारोबार किया। पिछले कुछ दिनों में भी दोनों धातुओं ने अपने उच्चतम स्तर को छुआ था।

    अमेरिकी महंगाई आंकड़ों का असर

    अमेरिका में दिसंबर के कोर कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) में महीने-दर-महीने महंगाई 0.2 प्रतिशत और साल-दर-साल 2.6 प्रतिशत रही, जो उम्मीद से कम थी। यह संकेत मिला कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक भविष्य में ब्याज दरें घटा सकता है। इसी कारण निवेशक सोने-चांदी की ओर आकर्षित हुए।

    वैश्विक तनाव बढ़ा रहे खरीदारी

    राहुल कलंत्री, कमोडिटी विशेषज्ञ, मेहता इक्विटीज लिमिटेड के अनुसार, ईरान में अशांति और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण निवेशक सुरक्षित विकल्प के तौर पर सोना और चांदी खरीद रहे हैं। इसके अलावा अमेरिका की ब्याज दरों और महंगाई के आंकड़े भी इन धातुओं की कीमतों को प्रभावित कर रहे हैं।

    तकनीकी स्तर और निवेशकों के लिए संकेत

    विशेषज्ञों के अनुसार, सोने को 1,37,310–1,39,550 रुपए के स्तर पर सपोर्ट और 1,44,350–1,46,670 रुपए के बीच रेजिस्टेंस मिलता है। चांदी के लिए 2,54,170–2,69,810 रुपए सपोर्ट और 2,79,810–2,84,470 रुपए रेजिस्टेंस पर बनी हुई है।

    उद्योग में मांग और सीमित आपूर्ति

    चांदी की मजबूत कीमतों के पीछे सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, एआई और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे उद्योगों में बढ़ती मांग और सीमित आपूर्ति भी एक बड़ा कारण है। विशेषज्ञों का कहना है कि शॉर्ट और मीडियम-टर्म में चांदी की खरीदारी लगातार बनी रहेगी।

    आगे की संभावनाएं

    डॉलर की कीमतों में उतार-चढ़ाव, अमेरिका की सर्वोच्च अदालत के टैरिफ फैसले और वैश्विक तनाव की घटनाओं के चलते इस हफ्ते सोना और चांदी की कीमतों में हल्की उतार-चढ़ाव की संभावना बनी रह सकती है। निवेशक सुरक्षित निवेश और तकनीकी स्तर को ध्यान में रखते हुए ही खरीदारी करें।

  • तेज विकास, कम महंगाई-भारत को अपनानी चाहिए संतुलित और तटस्थ नीति: रिपोर्ट

    तेज विकास, कम महंगाई-भारत को अपनानी चाहिए संतुलित और तटस्थ नीति: रिपोर्ट

    नई दिल्ली। भारत इस समय आर्थिक विकास और कम महंगाई के संतुलित दौर में है, जिसे अर्थशास्त्री ‘गोल्डीलक्स फेज’ कह रहे हैं। मंगलवार को जारी एचएसबीसी ग्लोबल इन्वेस्टमेंट रिसर्च की रिपोर्ट में कहा गया कि अब नीतियों को न तो बहुत सख्त और न ही बहुत ढीला रखना चाहिए, बल्कि लगभग तटस्थ नीति अपनाई जानी चाहिए।

    नीति का संतुलित दृष्टिकोण

    रिपोर्ट में सुझाया गया है कि 2026 में अर्थव्यवस्था और बाजार को सहारा देने के लिए ऐसी नीति सबसे बेहतर होगी जिसमें सरकारी खर्च पर नियंत्रण रखा जाए और ब्याज दरें आसान बनी रहें। यदि सरकार खर्च में सावधानी रखे और रिजर्व बैंक ब्याज दरों को आसान बनाए रखे, तो इससे निवेशकों और अर्थव्यवस्था को लाभ मिलेगा।

    अंदरूनी कमजोरियों पर ध्यान

    हालांकि, रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अर्थव्यवस्था में कुछ कमजोरियां अभी भी मौजूद हैं। इनमें कंपनियों का कम निवेश और विदेशी पूंजी का सीमित प्रवाह शामिल है, जिन्हें सुधारना जरूरी होगा।

    बॉन्ड और विदेशी निवेश की उम्मीद

    बॉन्ड मार्केट्स ने 2026 की शुरुआत में राज्यों द्वारा कर्ज लेने की संभावना पहले ही ध्यान में रख ली है। आरबीआई द्वारा बॉन्ड खरीद, बजट में वित्तीय अनुशासन और भारत को ग्लोबल बॉन्ड इंडेक्स में शामिल किए जाने से विदेशी निवेश आने की उम्मीद बढ़ी है।

    शेयर बाजार और आर्थिक सुधार

    रिपोर्ट के अनुसार, हाल के आर्थिक सुधारों, सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि और शेयरों के उचित दामों के कारण शेयर बाजार को फायदा मिल सकता है। हालांकि, लंबे समय तक लाभ के लिए कंपनियों का निवेश और विदेशी निवेश बढ़ाने वाले बड़े सुधार जरूरी हैं।

    ब्याज दर और महंगाई का अनुमान

    एचएसबीसी की चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट प्रांजुल भंडारी ने कहा कि अगले साल महंगाई दर चार प्रतिशत से थोड़ी कम रहने की संभावना है। इससे आरबीआई पर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव नहीं रहेगा और विकास धीमा होने पर दरें और कम करने की गुंजाइश भी रहेगी।

    वैश्विक घटनाओं का असर

    भंडारी ने बताया कि वैश्विक स्तर पर टैरिफ से जुड़ी खबरें, ग्लोबल बॉन्ड इंडेक्स में शामिल होने की प्रक्रिया और विकसित देशों में बढ़ती ब्याज दरें भारतीय बाजार को प्रभावित कर सकती हैं।

    सरकार का वित्तीय संतुलन लक्ष्य

    केंद्र सरकार का लक्ष्य है कि 2031 तक सार्वजनिक कर्ज महामारी से पहले के स्तर पर लाया जाए। इसके लिए अगले पांच वर्षों तक वित्तीय सुधार और खर्च पर नियंत्रण जरूरी होगा। निजीकरण के जरिए यह संतुलन स्थापित किया जा सकता है ताकि आर्थिक विकास पर असर कम से कम हो।

    राज्यों का कर्ज और घाटा

    रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कई राज्यों में सार्वजनिक कर्ज बढ़ने की संभावना है, लेकिन 3 प्रतिशत की वित्तीय घाटे की सीमा के कारण यह नियंत्रित रहेगा। इस प्रकार, भारत 2026 में संतुलित विकास और तटस्थ नीतियों के जरिए आर्थिक स्थिरता बनाए रखने की स्थिति में है।