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  • एयर फ्रेशनर और खुशबूदार क्लीनर से सावधान ओजोन के संपर्क में बन रहे नैनोपार्टिकल फेफड़ों तक पहुंचने का खतरा

    एयर फ्रेशनर और खुशबूदार क्लीनर से सावधान ओजोन के संपर्क में बन रहे नैनोपार्टिकल फेफड़ों तक पहुंचने का खतरा


    नई दिल्ली । घर को साफ सुथरा और खुशबूदार रखने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले घरेलू सफाई उत्पाद और एयर फ्रेशनर्स अब स्वास्थ्य को लेकर चिंता बढ़ा रहे हैं। स्विट्जरलैंड की ईपीएफएल यूनिवर्सिटी और अमेरिका की पर्ड्यू यूनिवर्सिटी से जुड़े शोध में ऐसे उत्पादों से घर के भीतर बेहद छोटे नैनोपार्टिकल बनने की बात सामने आई है। शोध के मुताबिक खुशबूदार उत्पादों से निकलने वाले कुछ रासायनिक यौगिक जब हवा में मौजूद ओजोन के संपर्क में आते हैं तो रासायनिक प्रतिक्रिया शुरू होती है। इसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में अल्ट्राफाइन पार्टिकल्स बन सकते हैं जो सांस के साथ फेफड़ों के गहरे हिस्सों तक पहुंचने में सक्षम होते हैं।

    इस शोध में नींबू और चीड़ जैसी खुशबू वाले उत्पादों पर खास ध्यान दिया गया है। ऐसे कई उत्पादों में लिमोनेन और पाइनीन जैसे रासायनिक यौगिक पाए जाते हैं। ये यौगिक हवा में मौजूद ओजोन के साथ प्रतिक्रिया करके बेहद छोटे कण बना सकते हैं। इनका आकार पीएम10 और पीएम2.5 जैसे सामान्य प्रदूषक कणों से भी छोटा हो सकता है। यही वजह है कि सामान्य आंखों से इन्हें देखना संभव नहीं होता लेकिन सांस लेने के दौरान ये शरीर के अंदर जा सकते हैं।

    शोध से जुड़े निष्कर्ष घर के अंदर की हवा की गुणवत्ता को लेकर महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। जब किसी बंद कमरे में खुशबूदार क्लीनर या एयर फ्रेशनर का इस्तेमाल किया जाता है और वहां पर्याप्त वेंटिलेशन नहीं होता है तो रासायनिक पदार्थों की मौजूदगी बढ़ सकती है। ऐसे वातावरण में बनने वाले सूक्ष्म कण सांस के प्राकृतिक सुरक्षा तंत्र को पार कर सकते हैं। नाक के बाल और बलगम आमतौर पर बाहरी कणों को रोकने में मदद करते हैं लेकिन बेहद छोटे नैनोपार्टिकल्स इन फिल्टर से आगे निकल सकते हैं।

    लगातार ऐसे कणों के संपर्क को लेकर श्वसन स्वास्थ्य पर चिंता जताई गई है। उपलब्ध शोध में अस्थमा ब्रोंकाइटिस सांस फूलने और फेफड़ों में सूजन जैसी समस्याओं से संभावित संबंध की चर्चा की गई है। खासतौर पर बच्चों बुजुर्गों और पहले से सांस संबंधी परेशानी वाले लोगों के लिए घर के अंदर की हवा की गुणवत्ता पर ध्यान देना जरूरी माना जाता है।

    शोध में सामने आए खतरे को देखते हुए घरेलू सफाई के दौरान कुछ सावधानियां अपनाई जा सकती हैं। विशेषज्ञ सलाह के मुताबिक कम सुगंध वाले या सुगंध रहित क्लीनर का इस्तेमाल करना बेहतर हो सकता है। एक साथ कई खुशबूदार उत्पादों का प्रयोग करने से बचना चाहिए। सफाई के दौरान एग्जास्ट फैन चलाने के साथ खिड़कियां खोलकर पर्याप्त वेंटिलेशन रखना भी उपयोगी हो सकता है।

    इसके अलावा रासायनिक स्प्रे का इस्तेमाल कम करने और जरूरत के अनुसार सफेद सिरका बेकिंग सोडा तथा पानी जैसे पारंपरिक विकल्पों पर विचार किया जा सकता है। वहीं ऐसे एयर प्यूरीफायर या उपकरणों के इस्तेमाल से बचने की सलाह दी गई है जो ओजोन गैस छोड़ते हैं। घर को साफ और खुशबूदार रखना जरूरी है लेकिन इसके साथ घर के अंदर की हवा की गुणवत्ता और सांसों की सुरक्षा पर भी ध्यान देना उतना ही महत्वपूर्ण है।

  • सिगरेट नहीं पी फिर भी खतरे में 44.4 करोड़ भारतीय पैसिव स्मोकिंग का चौंकाने वाला आंकड़ा

    सिगरेट नहीं पी फिर भी खतरे में 44.4 करोड़ भारतीय पैसिव स्मोकिंग का चौंकाने वाला आंकड़ा


    नई दिल्ली। सिगरेट और तंबाकू का धुआं सिर्फ धूम्रपान करने वाले व्यक्ति के लिए ही नुकसानदायक नहीं होता बल्कि उसके आसपास मौजूद लोगों की सेहत पर भी गंभीर असर डाल सकता है। इसे सेकेंड हैंड स्मोक या पैसिव स्मोकिंग कहा जाता है। एक नई स्टडी के मुताबिक 2023 में भारत में करीब 44.4 करोड़ लोग सेकेंड हैंड स्मोक के संपर्क में आए। यह आंकड़ा इसलिए भी चिंता बढ़ाता है क्योंकि इन लोगों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिन्होंने खुद धूम्रपान नहीं किया है।

    दुनियाभर की स्थिति देखें तो 2023 में करीब 271 करोड़ लोग सेकेंड हैंड स्मोक के संपर्क में थे। भारत में प्रभावित लोगों की संख्या चीन के बाद दुनिया में सबसे ज्यादा बताई गई है। चीन में यह आंकड़ा करीब 66.4 करोड़ और इंडोनेशिया में करीब 14.2 करोड़ रहा। भारत चीन और इंडोनेशिया को मिलाकर दुनिया में सेकेंड हैंड स्मोक के संपर्क में आने वाली आबादी का बड़ा हिस्सा सामने आता है।

    भारत के आंकड़ों में एक महत्वपूर्ण बदलाव भी देखने को मिला है। 1990 में देश में करीब 37.5 करोड़ लोग सेकेंड हैंड स्मोक के संपर्क में थे जबकि 2023 में यह संख्या बढ़कर 44.4 करोड़ हो गई। हालांकि इसी अवधि में आबादी के अनुपात के हिसाब से सेकेंड हैंड स्मोक के संपर्क में आने की दर कम हुई है। यानी प्रतिशत में कमी के बावजूद देश की बड़ी आबादी के कारण प्रभावित लोगों की वास्तविक संख्या काफी अधिक बनी हुई है।

    इस धुएं का असर केवल सांस लेने में परेशानी तक सीमित नहीं माना जाता। स्टडी में सेकेंड हैंड स्मोक के संपर्क को कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जोड़ा गया है। इनमें हृदय रोग फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां स्ट्रोक अस्थमा और कुछ तरह के कैंसर शामिल हैं। लंबे समय तक तंबाकू के धुएं के संपर्क में रहना शरीर पर लगातार हानिकारक प्रभाव डाल सकता है।

    सबसे चिंता वाली बात इससे जुड़ी मौतों का आंकड़ा है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार 2023 में भारत में करीब 3.26 लाख मौतें सेकेंड हैंड स्मोक से जुड़ी थीं। 1990 में यह आंकड़ा करीब 2.17 लाख था। यानी तीन दशक से ज्यादा समय में सेकेंड हैंड स्मोक से जुड़ी अनुमानित मौतों में काफी बढ़ोतरी हुई है। इसी तरह 2023 में इससे जुड़े स्वास्थ्य नुकसान का अनुमान करीब 9.28 मिलियन DALYs लगाया गया है। यह आंकड़ा समय से पहले होने वाली मौत और बीमारी या विकलांगता के कारण खोए स्वस्थ जीवन वर्षों को दर्शाता है।

    बच्चों के लिए सेकेंड हैंड स्मोक विशेष रूप से चिंता का विषय माना जाता है क्योंकि उनके फेफड़े अभी विकसित हो रहे होते हैं। धुएं में मौजूद हानिकारक पदार्थ उनके श्वसन तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं और सांस से जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ा सकते हैं। घर में कोई व्यक्ति नियमित रूप से धूम्रपान करता है तो परिवार के दूसरे सदस्यों के लिए भी धुएं के संपर्क से बचना मुश्किल हो सकता है।

    दुनिया में सेकेंड हैंड स्मोक के संपर्क का अनुपात घटने के बावजूद आबादी बढ़ने के कारण प्रभावित लोगों की कुल संख्या अभी भी बहुत बड़ी है। यही वजह है कि केवल धूम्रपान करने वाले व्यक्ति को ही नहीं बल्कि उसके आसपास रहने वाले लोगों को भी इसके खतरे को समझना जरूरी है। घर ऑफिस और सार्वजनिक स्थानों पर धुएं के संपर्क को कम करना पैसिव स्मोकिंग से बचाव का महत्वपूर्ण तरीका है।