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  • चैत्र नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा और कथा का महत्व

    चैत्र नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा और कथा का महत्व

    नई दिल्ली । चैत्र नवरात्रि के पावन पर्व का पांचवां दिन मां दुर्गा के दिव्य स्वरूप, मां स्कंदमाता की पूजा के लिए समर्पित है। नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की आराधना की जाती है और प्रत्येक दिन का विशेष आध्यात्मिक महत्व और फल माना जाता है। पांचवे दिन मां स्कंदमाता की पूजा का विशेष महत्व है, जो मातृत्व, करुणा और शक्ति का प्रतीक हैं।

    धार्मिक मान्यता है कि मां स्कंदमाता की पूजा के समय व्रत कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए। ऐसा करने से माता प्रसन्न होती हैं और जीवन को सुख-समृद्धि और आनंद से भर देती हैं। मान्यता है कि निःसंतान दंपत्तियों को संतान सुख की प्राप्ति भी होती है। इसी लिए आज मां की पूजा करते समय इस पौराणिक कथा का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

    पौराणिक कथा के अनुसार, तारकासुर नामक एक शक्तिशाली असुर था। उसने कठोर तपस्या कर भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न किया और वरदान स्वरूप प्राप्त किया कि उसकी मृत्यु केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही संभव होगी। उस समय भगवान शिव गहन तपस्या में लीन थे और माता सती का पुनर्जन्म नहीं हुआ था। इस कारण तारकासुर को विश्वास हो गया कि वह लगभग अमर है।

    वरदान के अहंकार में आकर तारकासुर ने देवताओं और मनुष्यों पर अत्याचार शुरू कर दिया। उसके अत्याचार से परेशान होकर सभी देवता भगवान शिव के पास पहुंचे और उन्हें तपस्या से जगाने का प्रयास किया। इसी बीच माता सती का पुनर्जन्म हुआ और उन्होंने हिमालयराज के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया। माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया।

    देवताओं के प्रयास और माता पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनसे विवाह किया। इसके बाद माता पार्वती ने स्वयं अपने पुत्र भगवान कार्तिकेय (स्कंद) को जन्म दिया और उन्हें युद्ध कौशल और ज्ञान की शिक्षा दी। भगवान कार्तिकेय ने बाद में तारकासुर का वध कर देवताओं को उसके आतंक से मुक्त कराया।

    धार्मिक मान्यता है कि मां स्कंदमाता की श्रद्धा और भक्ति से पूजा करने पर संतान से जुड़ी समस्याएं दूर होती हैं। मां का आशीर्वाद प्राप्त करने से जीवन में सुख-समृद्धि, शांति और संतुलन भी आता है। इसलिए पांचवे दिन माता की पूजा करते समय कथा का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

    आज मां स्कंदमाता की पूजा करते समय भक्त कमल पुष्प, फल और मिठाइयों का भोग अर्पित करते हैं। घर और मंदिरों में भजन-कीर्तन और कथा का आयोजन किया जाता है। यह दिन केवल पूजा का अवसर नहीं है, बल्कि आस्था, भक्ति और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक भी है। व्रत कथा पढ़ने और ध्यानपूर्वक पूजा करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और सुख-समृद्धि का संचार होता है।

    इसलिए आज के दिन माता स्कंदमाता की पूजा और कथा का पाठ अवश्य करें। इससे न केवल संतान सुख की प्राप्ति होती है, बल्कि जीवन में समृद्धि, आनंद और संतुलन भी आता है। भक्तों के लिए यह अवसर अपने परिवार के लिए सुख और समृद्धि सुनिश्चित करने का भी संदेश है।

  • मां स्कंदमाता के दिव्य रूप के दर्शन से भक्तों में उमड़ी भक्ति और आस्था की लहर

    मां स्कंदमाता के दिव्य रूप के दर्शन से भक्तों में उमड़ी भक्ति और आस्था की लहर


    नई दिल्ली । चैत्र नवरात्र का पावन पर्व देशभर में भक्ति और आस्था के रंग में रंगा नजर आता है। नवरात्र के पांचवे दिन मां दुर्गा के पांचवें स्वरूप मां स्कंदमाता की पूजा का विशेष आयोजन किया जाता है। इस दिन मंदिरों और घरों में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है जो पूरे विश्वास और श्रद्धा के साथ मां का स्मरण करते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां स्कंदमाता भगवान कार्तिकेय की माता हैं जिन्हें स्कंद भी कहा जाता है। इसी कारण उन्हें स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है। उनका स्वरूप अत्यंत दिव्य और मनमोहक माना जाता है। मां सिंह पर विराजमान रहती हैं और उनके चार भुजाओं से उनका सौंदर्य और शक्ति झलकती है। उनकी एक भुजा में बाल रूप में भगवान कार्तिकेय विराजमान रहते हैं जबकि अन्य हाथों में कमल पुष्प और वरमुद्रा होती है। यह स्वरूप मातृत्व शक्ति और करुणा का अद्भुत संगम दर्शाता है।

    मां स्कंदमाता को कमल के आसन पर विराजमान होने के कारण पद्मासना देवी भी कहा जाता है। धार्मिक ग्रंथों और लोकमान्यताओं के अनुसार उनके सच्चे मन से पूजन करने पर संतान से जुड़ी समस्याएं दूर होती हैं। नि:संतान दंपतियों को संतान प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है। इसके साथ ही माता की कृपा से संतान की उन्नति और सुख समृद्धि की कामना भी पूरी होती है।

    नवरात्र के इस दिन मां स्कंदमाता की पूजा से भक्तों को ज्ञान बुद्धि और विवेक की प्राप्ति होती है। यह आशीर्वाद जीवन में सकारात्मकता और संतुलन बनाए रखने में सहायक होता है। इसलिए पांचवे दिन भक्त विशेष रूप से पीले या सफेद रंग के वस्त्र धारण करते हैं और मां के लिए कमल पुष्प फल और मिठाइयों का भोग अर्पित करते हैं। कई भक्त दुर्गा सप्तशती का पाठ भी करते हैं और भजन कीर्तन के माध्यम से मां की स्तुति करते हैं।

    मंदिरों में इस दिन विशेष आयोजन होते हैं। भजन कीर्तन धार्मिक कार्यक्रम और कथा सरिता के माध्यम से भक्तों का मन आध्यात्मिक अनुभव से भर जाता है। इस अवसर पर लोग अपने परिवार और मित्रों के साथ मां स्कंदमाता की कृपा की कामना करते हैं और एक दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं।

    मां स्कंदमाता की भक्ति से जीवन में सुख शांति और समृद्धि का संचार होता है। माता के आशीर्वाद से मानसिक शक्ति विवेक और ज्ञान की वृद्धि होती है जिससे जीवन में हर क्षेत्र में संतुलन और सफलता मिलती है। इस दिन की पूजा से भक्त यह भी विश्वास रखते हैं कि मां की कृपा से उनकी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी और संतान से जुड़ी हर चिंता दूर होगी।

    चैत्र नवरात्र के पांचवे दिन का यह पर्व न केवल धार्मिक महत्व रखता है बल्कि यह आस्था विश्वास और समाजिक एकता का भी प्रतीक है। मां स्कंदमाता के पूजन से हर भक्त अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव की आशा रखता है और मां की दिव्य कृपा को अनुभव करता है। इस पावन अवसर पर श्रद्धालु हर वर्ष की तरह इस साल भी पूरे मनोयोग और विश्वास के साथ मां स्कंदमाता के पूजन में शामिल हुए।

  • नवरात्र विशेष: यह वन तुलसी चढ़ाने से प्रसन्न होती हैं मां दुर्गा, औषधीय गुणों का खजाना

    नवरात्र विशेष: यह वन तुलसी चढ़ाने से प्रसन्न होती हैं मां दुर्गा, औषधीय गुणों का खजाना


    नई दिल्ली। चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर मां भगवती की आराधना में जहां विभिन्न फूल और पत्तियां अर्पित की जाती हैं वहीं एक खास पौधा ऐसा भी है जो देवी को अत्यंत प्रिय माना जाता है। आमतौर पर पूजा में तुलसी चढ़ाना वर्जित माना जाता है लेकिन एक विशेष प्रकार की तुलसी जिसे दौना दवना मरुआ या वन तुलसी कहा जाता है मां दुर्गा को बेहद प्रिय है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि के दौरान इस वन तुलसी की पत्तियां और फूल अर्पित करने से मां प्रसन्न होती हैं और घर में सुख समृद्धि व सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह पौधा आकार में छोटा लगभग 1 से 2 फुट ऊंचा होता है लेकिन इसकी सुगंध अत्यंत तेज और मनमोहक होती है। इसके पत्ते गुलदाउदी की तरह कटावदार होते हैं और इसकी खुशबू इतनी प्रभावशाली मानी जाती है कि महंगे परफ्यूम भी इसके सामने फीके पड़ जाते हैं।

    धार्मिक परंपराओं में दौना को भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी का भी प्रिय माना गया है लेकिन विशेष रूप से नवरात्रि में मां दुर्गा को इसे अर्पित करने की परंपरा है। वास्तुशास्त्र के अनुसार घर में इस पौधे को लगाने से वातावरण शुद्ध रहता है और लक्ष्मी कृपा बनी रहती है। यह न केवल पूजा को पूर्णता प्रदान करता है बल्कि घर को सुगंधित और सकारात्मक ऊर्जा से भर देता है।

    अगर आयुर्वेद की दृष्टि से देखें तो वन तुलसी औषधीय गुणों से भरपूर है। आयुर्वेद में इसे कफ वात और कृमि रोगों के उपचार में लाभकारी बताया गया है। यह सर्दी खांसी जुकाम बुखार जोड़ों के दर्द सूजन और पेट की समस्याओं में भी कारगर है। इसके पत्ते बीज जड़ और डंठल सभी औषधीय रूप से उपयोगी होते हैं।

    वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी तुलसी के गुणों को स्वीकार किया गया है। अमेरिका की राष्ट्रीय चिकित्सा पुस्तकालय में प्रकाशित शोधों के अनुसार तुलसी का सेवन डायबिटीज हृदय रोग तनाव और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद करता है। खास बात यह है कि इसके सेवन से गंभीर दुष्प्रभाव नहीं पाए गए हैं।

    वन तुलसी में भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट और एंटी माइक्रोबियल गुण होते हैं जो शरीर को फ्री रेडिकल्स से बचाते हैं और संक्रमण से लड़ने की क्षमता बढ़ाते हैं। यह श्वसन तंत्र को मजबूत बनाती है और अस्थमा ब्रोंकाइटिस व खांसी जैसी समस्याओं में राहत देती है। साथ ही इसकी सुगंध प्राकृतिक रूप से मच्छरों को दूर रखने और हवा को शुद्ध करने में भी सहायक होती है।

    इस तरह वन तुलसी न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी एक अमूल्य औषधि है। नवरात्रि के इस पावन अवसर पर इसे अर्पित करना जहां मां भगवती को प्रसन्न करता है वहीं इसका उपयोग शरीर और मन दोनों को स्वस्थ और संतुलित रखने में मदद करता है

  • चैत्र नवरात्रि 2026: गुरुवार से शुरुआत, माता का वाहन बनेगी डोली; जानिए शास्त्रों में कैसे तय होता है आगमन का वाहन

    चैत्र नवरात्रि 2026: गुरुवार से शुरुआत, माता का वाहन बनेगी डोली; जानिए शास्त्रों में कैसे तय होता है आगमन का वाहन


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में चैत्र नवरात्रि को अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक पर्व माना जाता है। इन नौ दिनों में भक्त मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना करते हैं और व्रत जप पाठ तथा भक्ति के माध्यम से माता रानी की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिषीय परंपराओं के अनुसार नवरात्रि में माता दुर्गा का पृथ्वी पर आगमन किस वाहन से होता है इसका विशेष महत्व माना जाता है। यह वाहन घटस्थापना के दिन के आधार पर निर्धारित होता है और इसे उस वर्ष की समग्र ऊर्जा तथा संभावित परिस्थितियों का संकेत भी माना जाता है।

    साल 2026 में चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च गुरुवार से हो रही है। ज्योतिषीय नियमों के अनुसार यदि नवरात्रि की शुरुआत गुरुवार या शुक्रवार से होती है तो माता रानी का आगमन डोली यानी पालकी पर माना जाता है। इसी कारण इस वर्ष माता का वाहन डोली निर्धारित किया गया है। शास्त्रों में यह परंपरा इस विश्वास से जुड़ी है कि देवी का वाहन उस वर्ष के सामाजिक आर्थिक प्राकृतिक और राजनीतिक हालात के बारे में संकेत देता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सप्ताह के अलग-अलग दिनों के आधार पर माता का वाहन तय होता है। यदि नवरात्रि रविवार या सोमवार से शुरू हो तो माता हाथी पर सवार होकर आती हैं जिसे अत्यंत शुभ माना जाता है। यह अच्छी वर्षा सुख-समृद्धि और शांति का प्रतीक माना जाता है। वहीं शनिवार या मंगलवार से नवरात्रि शुरू होने पर माता का वाहन घोड़ा माना जाता है जो संघर्ष युद्ध या अशांति का संकेत देता है। यदि नवरात्रि बुधवार से प्रारंभ हो तो माता नाव पर सवार होकर आती हैं जिसे अत्यंत शुभ और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। गुरुवार या शुक्रवार से नवरात्रि शुरू होने पर माता का आगमन डोली पर माना जाता है।

    डोली या पालकी को ज्योतिषीय दृष्टि से सामान्यत शुभ संकेत नहीं माना जाता। मान्यता है कि ऐसे वर्ष में सामाजिक या आर्थिक चुनौतियां स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं महामारी प्राकृतिक असंतुलन या आर्थिक उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकते हैं। हालांकि विद्वान यह भी बताते हैं कि यह भविष्यवाणी किसी निश्चित घटना का संकेत नहीं बल्कि सामूहिक ऊर्जा का प्रतीकात्मक अर्थ है।

    धार्मिक आस्था के अनुसार माता की कृपा से सभी कठिनाइयों को दूर किया जा सकता है। इसलिए नवरात्रि के दौरान श्रद्धा और नियमपूर्वक पूजा-पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है। भक्त इन दिनों में दुर्गा सप्तशती का पाठ कन्या पूजन हवन और दान-पुण्य करके माता का आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

    इस प्रकार 2026 की चैत्र नवरात्रि में माता का आगमन डोली पर माना जा रहा है जिसे सतर्कता और संयम का संकेत समझा जा सकता है। आस्था और भक्ति के साथ मनाई गई नवरात्रि न केवल आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करती है बल्कि जीवन में सकारात्मकता और संतुलन भी लाती है।

  • भक्ति और सात्विकता बनाए रखें, नवरात्रि में इन वस्तुओं से रहें दूर….

    भक्ति और सात्विकता बनाए रखें, नवरात्रि में इन वस्तुओं से रहें दूर….


    नई दिल्ली: चैत्र नवरात्रि 2026 का पर्व न केवल भक्ति और श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि यह आध्यात्मिक अनुशासन और सात्विक जीवनशैली को अपनाने का अवसर भी है। इन नौ दिनों के दौरान देवी मां दुर्गा की पूजा और आराधना के साथ-साथ जीवन में पवित्रता बनाए रखना अनिवार्य माना गया है। धार्मिक शास्त्रों और प्राचीन मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि के दौरान कुछ विशेष वस्तुओं की खरीदारी वर्जित होती है, क्योंकि इन्हें अशुभता या नकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।

    सबसे पहले चमड़े के सामान की बात करें तो नवरात्रि के दौरान बेल्ट, वॉलेट, बैग या जूते जैसी चीज़ें खरीदना अशुभ माना जाता है। चूंकि ये उत्पाद जानवरों की खाल से बनते हैं, इसलिए यह त्योहार उनके उपयोग या खरीदारी के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता। यह पर्व भक्ति, करुणा और आत्म-शुद्धि पर केंद्रित है, और चमड़े की वस्तुएं इस पवित्रता के सिद्धांत के विपरीत मानी जाती हैं।

    इसके अलावा शराब का सेवन या खरीदारी पूरी तरह वर्जित है। नवरात्रि का त्योहार आत्म-अनुशासन, भक्ति और आध्यात्मिक शुद्धि का प्रतीक है, इसलिए शराब जैसी चीज़ें घर के पवित्र माहौल को बिगाड़ सकती हैं। मांसाहारी भोजन, मछली या अंडे जैसी वस्तुओं से भी परहेज़ किया जाता है। इसके बजाय सात्विक और हल्का भोजन प्राथमिकता में रहता है, जो उपवास और प्रार्थना के दौरान शरीर को विषमुक्त करता है।

    काले रंग के कपड़े खरीदने से भी बचा जाता है, क्योंकि काला रंग नकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि के दौरान लाल, पीला, सफेद जैसे चमकीले और शुभ रंग पहनने की परंपरा है। इसी तरह, धारदार वस्तुएं जैसे चाकू, कैंची या अन्य तेज़ सामान खरीदने से भी बचा जाता है। शास्त्रों के अनुसार ये संघर्ष और नकारात्मकता का प्रतीक होती हैं, जो त्योहार के शांतिपूर्ण और आध्यात्मिक माहौल को प्रभावित कर सकती हैं।

    लोहे की वस्तुएं भी नवरात्रि के दौरान खरीदने योग्य नहीं मानी जातीं। कुछ सांस्कृतिक मान्यताओं के अनुसार लोहे की चीज़ों में भारी और कठोर ऊर्जा होती है, जो भक्ति और शुद्धि के माहौल के विपरीत होती हैं।

    प्याज और लहसुन से भी परहेज़ किया जाता है, क्योंकि इन्हें तामसिक भोजन की श्रेणी में रखा गया है। सात्विक सामग्री का सेवन न केवल स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है, बल्कि यह पूजा और प्रार्थना के दौरान मानसिक और आध्यात्मिक शांति भी प्रदान करता है।

    आख़िर में, तंबाकू, सिगरेट, गुटखा या तंबाकू युक्त पान जैसी चीज़ें भी नवरात्रि में वर्जित मानी जाती हैं। यह त्योहार शरीर और मन की शुद्धि, आत्म-अनुशासन और भक्ति की भावना को बढ़ावा देता है, और इन चीज़ों की खरीदारी इसे प्रभावित कर सकती है।

    इसलिए, चैत्र नवरात्रि के नौ पवित्र दिनों में इन वस्तुओं से दूर रहकर आप न केवल मां दुर्गा की कृपा प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि अपने जीवन में सात्विकता और आध्यात्मिक शांति भी बनाए रख सकते हैं।