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  • भोजशाला की अनोखी प्रतिमा: 26 कलाकारों ने 35 दिन में तैयार की थी मां वाग्देवी

    भोजशाला की अनोखी प्रतिमा: 26 कलाकारों ने 35 दिन में तैयार की थी मां वाग्देवी


    मध्य प्रदेश । मध्यप्रदेश के ग्वालियर में एक बेहद ऐतिहासिक और संवेदनशील धार्मिक धरोहर पिछले 15 वर्षों से कड़ी सुरक्षा के बीच संरक्षित रखी हुई है। यह प्रतिमा धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला के गर्भगृह के लिए तैयार की गई मां वाग्देवी (मां सरस्वती) की अष्टधातु मूर्ति है, जिसे वर्ष 2011 में स्थापित किया जाना था, लेकिन उस समय उत्पन्न हुए विवाद और प्रशासनिक परिस्थितियों के चलते इसे ग्वालियर में ही रोक दिया गया था।

    हाल ही में भोजशाला को लेकर अदालत के फैसले के बाद एक बार फिर इस प्रतिमा को लेकर चर्चा तेज हो गई है। कोर्ट ने भोजशाला परिसर को मंदिर मानते हुए सालभर बिना रोक-टोक पूजा-अर्चना की अनुमति दी है, जिसके बाद इस प्रतिमा के भविष्य को लेकर नए सिरे से उम्मीदें जागी हैं।

    जानकारी के अनुसार, इस दिव्य अष्टधातु प्रतिमा को ग्वालियर के मूर्तिकार प्रभात राय और उनकी टीम ने तैयार किया था। मूर्तिकार के बेटे अनुज राय ने बताया कि वर्ष 2011 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वरिष्ठ नेता नवल किशोर जी के आदेश पर यह प्रतिमा तैयार की गई थी। इसे केवल 35 दिनों में 26 कुशल कलाकारों की मेहनत से गढ़ा गया था। प्रतिमा को भोजशाला में स्थापित करने की पूरी तैयारी हो चुकी थी, लेकिन अंतिम समय में विवाद बढ़ने के कारण इसे ग्वालियर में ही रोक दिया गया।

    परिवार के अनुसार, उस समय स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई थी कि कई दिनों तक पुलिस सुरक्षा में प्रतिमा को घर में रखा गया। वर्षों तक बसंत पंचमी जैसे अवसरों पर भी सीमित समय के लिए पुलिस सुरक्षा के बीच ही प्रतिमा को बाहर निकाला जाता था और फिर सुरक्षित रख दिया जाता था।

    मूर्तिकार परिवार आज भी इस प्रतिमा को अपने लिए एक गौरव और ऐतिहासिक धरोहर मानता है। अनुज राय ने भावुक होकर कहा कि यदि भविष्य में यह प्रतिमा स्थापित नहीं भी होती है, तो भी वे इसे गर्व के साथ अपने पास सुरक्षित रखेंगे, क्योंकि यह भारतीय संस्कृति और इतिहास का महत्वपूर्ण प्रतीक है।

    इधर, आरएसएस से जुड़े स्थानीय पदाधिकारियों के अनुसार उस समय प्रतिमा के संरक्षक रहे नवल किशोर अब आध्यात्मिक जीवन अपनाकर मौन धारण कर चुके हैं, जिससे इस प्रतिमा के भविष्य को लेकर कई सवाल अनुत्तरित हैं।

    इस बीच, हिंदू पक्ष से जुड़े संगठन भोज उत्सव समिति ने भी इस मुद्दे को फिर से उठाया है। समिति का कहना है कि लंदन स्थित ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मूल मां वाग्देवी प्रतिमा को भारत लाकर भोजशाला में स्थापित करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। संगठन का दावा है कि यह प्रतिमा ऐतिहासिक और धार्मिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

    हालांकि, ग्वालियर में सुरक्षित रखी गई प्रतिमा को भोजशाला में स्थापित करने को लेकर अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है और यह विषय फिलहाल विचाराधीन है। संगठन के अनुसार, आगे की सभी प्रक्रियाएं न्यायालय के निर्देशों और कानूनी प्रावधानों के अनुसार ही पूरी की जाएंगी।

    भोजशाला विवाद का यह अध्याय अब एक बार फिर नए मोड़ पर पहुंच गया है, जहां एक ओर न्यायालय के फैसले ने आस्था से जुड़े पक्ष को राहत दी है, वहीं ग्वालियर में सुरक्षित रखी प्रतिमा का भविष्य भी चर्चा का विषय बना हुआ है।

  • भोजशाला की प्रतिमा की कहानी: 26 कलाकारों ने 35 दिन में तैयार की थी वाग्देवी मूर्ति

    भोजशाला की प्रतिमा की कहानी: 26 कलाकारों ने 35 दिन में तैयार की थी वाग्देवी मूर्ति


    नई दिल्ली । मध्यप्रदेश के ग्वालियर में एक ऐसी ऐतिहासिक और भावनात्मक कहानी छिपी है, जो धार की भोजशाला से जुड़ी है। यहां रखी हुई मां वाग्देवी (सरस्वती) की अष्टधातु प्रतिमा पिछले 15 वर्षों से एक घर में सुरक्षित रखी गई है, जिसका निर्माण 2011 में मात्र 35 से 40 दिनों में 26 कलाकारों ने मिलकर किया था।

    यह प्रतिमा मूल रूप से धार स्थित भोजशाला के गर्भगृह में स्थापित की जानी थी, लेकिन उस समय उपजे धार्मिक और प्रशासनिक विवाद के कारण इसे वहां नहीं ले जाया जा सका और ग्वालियर में ही रोक दिया गया।

    लंदन म्यूजियम वाली प्रतिमा की हूबहू कॉपी
    इस प्रतिमा की सबसे खास बात यह है कि इसे लंदन म्यूजियम में रखी मूल मां वाग्देवी की मूर्ति के समान आकार और डिज़ाइन में बनाया गया है।
    यह प्रतिमा अष्टधातु (आठ धातुओं के मिश्रण) से बनी है
    ऊंचाई लगभग साढ़े 3 फीट और वजन 250 किलो से अधिक है
    2011 में इसकी लागत लगभग 2.5 से 3 लाख रुपये आई थी
    इसे पूरी तरह पारंपरिक शिल्प और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तैयार किया गया

    विवाद के कारण रुक गई प्राण-प्रतिष्ठा
    मूर्तिकार प्रभात राय के परिवार के अनुसार, जब 2011 में बसंत पंचमी पर प्रतिमा की स्थापना की तैयारी थी, तभी भोजशाला को लेकर विवाद भड़क गया। सुरक्षा कारणों से प्रशासन ने प्रतिमा को धार भेजने की अनुमति नहीं दी। इसके बाद कई वर्षों तक हर बसंत पंचमी पर पुलिस सुरक्षा में प्रतिमा को कुछ दिनों के लिए प्रदर्शित किया जाता रहा, लेकिन स्थायी स्थापना कभी नहीं हो सकी।

    15 साल से ग्वालियर में सुरक्षा के साये में
    इस प्रतिमा को लेकर स्थिति बेहद संवेदनशील रही। शुरुआती वर्षों में मूर्तिकार के घर पर पुलिस सुरक्षा तक तैनात रही। प्रतिमा को आज भी ग्वालियर में सुरक्षित रखा गया है और इसकी देखरेख परिवार कर रहा है। मूर्तिकार परिवार का कहना है कि यह केवल एक मूर्ति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक है।

    कोर्ट फैसले के बाद फिर जगी उम्मीद
    हाल ही में भोजशाला को लेकर आए कोर्ट के फैसले के बाद इस प्रतिमा को लेकर फिर चर्चा तेज हो गई है। हिंदू पक्ष का कहना है कि मूल प्रतिमा को वापस लाकर भोजशाला में स्थापित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। हालांकि, फिलहाल इस पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है और प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया का इंतजार किया जा रहा है।

    “अगर कोई नहीं ले गया तो मैं इसे रखूंगा” – मूर्तिकार का बयान
    मूर्तिकार प्रभात राय के बेटे अनुज राय ने भावुक होकर कहा कि यदि भविष्य में प्रतिमा को भोजशाला ले जाने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती, तो वे इसे अपने पास ही गर्व से सुरक्षित रखेंगे। उनके अनुसार, यह प्रतिमा केवल एक कलाकृति नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है।

    लंदन में रखी मूल प्रतिमा पर भी चर्चा
    इधर, धार की मूल मां वाग्देवी प्रतिमा के लंदन म्यूजियम में होने को लेकर भी मांगें उठ रही हैं कि उसे भारत लाकर भोजशाला में पुनः स्थापित किया जाए। हिंदू पक्ष का दावा है कि यह प्रतिमा खंडित अवस्था में है, लेकिन धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।