Tag: Madhya Pradesh Agriculture

  • सिंहस्थ में श्रद्धालुओं की थाली से पूजा के फूलों तक का रोडमैप तैयार, 15 जिलों से उज्जैन पहुंचेगी उपज, सप्लाई चेन पर रहेगा फोकस

    सिंहस्थ में श्रद्धालुओं की थाली से पूजा के फूलों तक का रोडमैप तैयार, 15 जिलों से उज्जैन पहुंचेगी उपज, सप्लाई चेन पर रहेगा फोकस


    उज्जैन  । उज्जैन में वर्ष 2028 में होने वाले सिंहस्थ महापर्व को लेकर तैयारियां अभी से तेज होने लगी हैं। आयोजन में करीब 40 करोड़ श्रद्धालुओं के पहुंचने का अनुमान है। इतने बड़े धार्मिक आयोजन के दौरान भोजन और पूजा सामग्री की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती होगी। इसी को ध्यान में रखते हुए उद्यानिकी विभाग ने सब्जियों और फूलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए दो साल का रोडमैप तैयार किया है। योजना के तहत मध्यप्रदेश के 15 जिलों में करीब 16 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में उत्पादन क्लस्टर विकसित किए जाएंगे और लगभग 20 हजार किसानों को इससे जोड़ने की तैयारी है।

    सिंहस्थ करीब 60 दिनों तक चलेगा। इस दौरान श्रद्धालुओं की लगातार आवाजाही रहेगी और भोजन की व्यवस्था के लिए बड़ी मात्रा में सब्जियों की जरूरत पड़ेगी। उपलब्ध अनुमान के मुताबिक प्रतिदिन करीब 66 लाख से अधिक श्रद्धालुओं की आवाजाही हो सकती है। यदि प्रति व्यक्ति रोजाना दो किलोग्राम सब्जी की जरूरत का मानक माना जाए तो संभावित मांग लगभग 13 हजार टन प्रतिदिन तक पहुंच सकती है। हालांकि यह एक अनुमानित गणना है। वास्तविक खपत श्रद्धालुओं के ठहरने की अवधि भोजन व्यवस्था और सब्जियों के वास्तविक इस्तेमाल पर निर्भर करेगी। इतनी बड़ी संभावित जरूरत को देखते हुए विभाग का जोर स्थानीय उत्पादन बढ़ाने और दूसरे जिलों से नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने पर है।

    योजना के तहत करीब 16 हजार हेक्टेयर में अतिरिक्त उत्पादन का प्रस्ताव है। इसमें आठ हजार हेक्टेयर में सब्जियां और आठ हजार हेक्टेयर में फूलों की खेती विकसित करने की तैयारी की जा रही है। क्लस्टर आधारित मॉडल में एक क्षेत्र के कई किसान मांग के अनुसार योजनाबद्ध तरीके से फसल उगाएंगे। इससे विभाग को पहले से जानकारी मिल सकेगी कि किस जिले और क्षेत्र में कौन सी फसल कितने रकबे में लगाई जा रही है और उससे कितनी उपज मिलने की संभावना है। इस तरह आयोजन के समय अचानक बढ़ने वाली मांग को पूरा करने के लिए उत्पादन और आपूर्ति की बेहतर योजना बनाई जा सकेगी।

    सब्जियों के उत्पादन के लिए उज्जैन संभाग के उज्जैन आगर-मालवा शाजापुर देवास रतलाम नीमच और मंदसौर जिलों को प्रस्तावित क्लस्टर योजना में शामिल किया गया है। इन जिलों में हाइब्रिड सब्जियों का अतिरिक्त उत्पादन बढ़ाने के साथ किसानों को खेती की तकनीक और फसल चयन के संबंध में प्रशिक्षण देने की तैयारी है। जरूरत के मुताबिक अलग-अलग क्षेत्रों में आलू प्याज टमाटर और हरी सब्जियों का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। यदि किसी एक क्षेत्र में फसल खराब होती है तो दूसरे जिलों से आपूर्ति बढ़ाकर कमी को पूरा करने की कोशिश की जाएगी।

    सिंहस्थ में पूजा और धार्मिक गतिविधियों के कारण फूलों की मांग भी काफी बढ़ने की संभावना है। इसके लिए उज्जैन इंदौर देवास आगर-मालवा खंडवा छतरपुर मैहर और दतिया में फूलों के उत्पादन क्लस्टर विकसित करने का प्रस्ताव है। उज्जैन में करीब 4200 हेक्टेयर में गेंदा उत्पादन के लिए 25 क्लस्टर और 240 गांवों को जोड़ने की योजना बनाई गई है। इसके अलावा गुलाब की खेती का रकबा बढ़ाकर 250 हेक्टेयर से अधिक करने की तैयारी है। फूलों की आधुनिक खेती और बेहतर पौध सामग्री उपलब्ध कराने के लिए उज्जैन में करीब 19 एकड़ में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर फ्लोरीकल्चर विकसित करने की योजना भी है।

    हालांकि केवल उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होगा। खेत से निकली सब्जियों को समय पर उज्जैन तक पहुंचाने के लिए संग्रहण केंद्र ग्रेडिंग पैकिंग और जरूरत के अनुसार कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था भी जरूरी होगी। सब्जियां जल्दी खराब होती हैं इसलिए परिवहन में देरी होने पर उपज की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। विभाग को मांग और उपलब्धता का रिकॉर्ड तैयार कर आपूर्ति की निगरानी भी करनी होगी। इससे यह तय करने में मदद मिलेगी कि किस जिले से कितनी सब्जियां भेजनी हैं और किस क्षेत्र में उनकी जरूरत अधिक है।

    उद्यानिकी विभाग के उपसंचालक केएस मंडलाई के मुताबिक सिंहस्थ में सब्जियों और फूलों की मांग बढ़ने को देखते हुए दो साल पहले से तैयारी की जा रही है। किसानों को चिह्नित कर प्रशिक्षण देने और विशेष क्लस्टर विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है। अब इस योजना की सफलता उत्पादन बढ़ाने के साथ परिवहन भंडारण और वितरण के बीच तालमेल पर निर्भर करेगी। यदि पूरी व्यवस्था समय पर तैयार हो जाती है तो सिंहस्थ के दौरान श्रद्धालुओं की जरूरत पूरी करने के साथ किसानों को भी अपनी उपज के लिए बड़ा बाजार मिल सकता है।

  • मक्के की फसल बनी किसानों के लिए अन्नलक्ष्मी, लुकवासा और बदरवास मंडियों में उपज का मेला, कम बोवनी के बावजूद रिकॉर्ड उत्पादन

    मक्के की फसल बनी किसानों के लिए अन्नलक्ष्मी, लुकवासा और बदरवास मंडियों में उपज का मेला, कम बोवनी के बावजूद रिकॉर्ड उत्पादन


    शिवपुरी। कोलारस बदरवास और लुकवासा की मंडियों में मक्के की भारी आवक हो रही है। उपज से भरी ट्रॉलियों की लंबी कतारें मंडियों से लेकर फोरलेन हाईवे के किनारों तक दिखाई दे रही हैं। मक्के के अच्छे उत्पादन और बाजार में मिल रहे भाव से किसानों को बेहतर कमाई की उम्मीद है। मंडियों में मक्का 1800 से 2600 रुपए प्रति क्विंटल तक बिक रहा है। ऐसे में इस बार कई किसानों के लिए मक्के की फसल अन्नलक्ष्मी साबित होती नजर आ रही है।
    जिले की कृषि व्यवस्था में मक्के का महत्व लगातार बढ़ रहा है। कभी सोयाबीन की खेती के लिए पहचाने जाने वाले इस क्षेत्र में अब किसान तेजी से मक्के की ओर रुख कर रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक जिले में मक्के का रकबा पहले करीब 17 हजार हेक्टेयर था जो बढ़कर 90 हजार हेक्टेयर के पार पहुंच गया है। खेती के इस बदलाव के पीछे किसानों को मिलने वाला बेहतर लाभ और हाइब्रिड बीजों का इस्तेमाल अहम वजह माना जा रहा है। मक्के की खेती से जुड़ी संभावनाओं ने किसानों को इसे बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए प्रेरित किया है।
    इस साल तय लक्ष्य की तुलना में मक्के की बोवनी करीब 31 प्रतिशत कम रहने के बावजूद रिकॉर्ड उत्पादन होने की जानकारी सामने आई है। बेहतर बीज और फसल की उपज ने किसानों की उम्मीदों को मजबूत किया है। हालांकि वास्तविक उत्पादन और किसानों के शुद्ध मुनाफे का आकलन लागत तथा अन्य आंकड़ों के आधार पर ही किया जा सकता है। फिलहाल मंडियों में बड़ी मात्रा में मक्का पहुंचने से कृषि व्यापार में तेजी दिखाई दे रही है।
    दीपावली से पहले लुकवासा बदरवास और कोलारस मंडियों में कारोबार का माहौल काफी व्यस्त है। रिपोर्ट के मुताबिक इन तीनों मंडियों में प्रतिदिन दो हजार से अधिक ट्रॉलियों की डाक लग रही है। मंडी परिसर में जगह कम पड़ने के कारण कई ट्रॉलियां फोरलेन हाईवे के किनारे कतारों में खड़ी दिखाई दे रही हैं। किसान अपनी उपज बेचने के लिए मंडियों तक पहुंच रहे हैं। अधिक आवक के चलते खरीद और बिक्री की गतिविधियां भी तेज हो गई हैं। मंडियों में बढ़ी हलचल से स्थानीय व्यापार को भी गति मिलने की उम्मीद है।
    मक्के के भाव किसानों के लिए इस समय खास महत्व रखते हैं। मंडियों में 1800 से 2600 रुपए प्रति क्विंटल तक के दाम मिलने से किसानों को अपनी फसल का उचित मूल्य मिलने की आशा है। हालांकि हर किसान को एक जैसा भाव नहीं मिलता क्योंकि उपज की गुणवत्ता नमी और बाजार की स्थिति के आधार पर कीमतों में अंतर हो सकता है। किसानों के लिए वास्तविक मुनाफा इस बात पर भी निर्भर करेगा कि खेती में बीज खाद मजदूरी सिंचाई और परिवहन पर कितना खर्च हुआ है।
    शिवपुरी जिले में मक्के का बढ़ता रकबा खेती के बदलते रुझान को दर्शाता है। यदि किसानों को आने वाले समय में भी अच्छे बाजार भाव और खरीदार मिलते रहे तो मक्के की खेती क्षेत्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभा सकती है। फिलहाल दीपावली से पहले मंडियों में उमड़ती भीड़ और उपज से भरी ट्रॉलियां किसानों की मेहनत और बेहतर कमाई की उम्मीद की तस्वीर पेश कर रही हैं।

  • खेत में फसल तैयार, लेकिन बाजार तक पहुंचने से पहले बर्बाद: MP में स्टोरेज की कमी बनी किसानों की सबसे बड़ी मुसीबत

    खेत में फसल तैयार, लेकिन बाजार तक पहुंचने से पहले बर्बाद: MP में स्टोरेज की कमी बनी किसानों की सबसे बड़ी मुसीबत


    भोपाल । मध्य प्रदेश को देश के प्रमुख कृषि राज्यों में गिना जाता है और यहां बड़ी संख्या में किसान फल सब्जियों तथा अलग अलग बागवानी फसलों की खेती पर निर्भर हैं। सरकार की ओर से किसानों की आय बढ़ाने और खेती को लाभ का व्यवसाय बनाने के लगातार दावे किए जाते हैं लेकिन फसल तैयार होने के बाद उसकी सही तरीके से देखभाल और भंडारण की व्यवस्था आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। स्थिति यह है कि खेतों में मेहनत से तैयार की गई उपज का एक हिस्सा मंडी तक पहुंचने से पहले ही खराब हो जाता है। मध्य प्रदेश में फलों में अमरूद और सब्जियों में लौकी की बर्बादी सबसे ज्यादा सामने आई है। उपलब्ध सर्वे आंकड़ों के मुताबिक राज्य में करीब 14.93 प्रतिशत अमरूद और 7.46 प्रतिशत लौकी उचित भंडारण और रखरखाव के अभाव में खराब हो जाती है। इसका सीधा असर किसानों की आमदनी पर पड़ता है क्योंकि जिस फसल के लिए किसान महीनों मेहनत और खर्च करता है उसका एक हिस्सा बाजार तक पहुंचने से पहले ही बेकार हो जाता है।

    फसल कटने के बाद होने वाले नुकसान को कम करने के लिए वैज्ञानिक भंडारण व्यवस्था को बेहद जरूरी माना जाता है लेकिन कई इलाकों में पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज और आधुनिक सप्लाई चेन उपलब्ध नहीं है। जल्दी खराब होने वाले फल और सब्जियों के मामले में यह समस्या और गंभीर हो जाती है। अमरूद की बर्बादी का आंकड़ा इस समस्या की गंभीरता को सामने रखता है। सब्जियों में लौकी के अलावा फूलगोभी भी बड़े स्तर पर खराब हो रही है। आंकड़ों के अनुसार फूलगोभी का करीब 6.46 प्रतिशत हिस्सा उचित रखरखाव नहीं मिलने के कारण नष्ट हो जाता है। वहीं नींबू वर्गीय फलों में भी करीब 7.40 प्रतिशत तक फसलोत्तर नुकसान दर्ज किया गया है।

    नकदी फसलों और मसालों पर नजर डालें तो मिर्च में करीब 6.29 प्रतिशत और हरी मटर में 6.27 प्रतिशत तक नुकसान सामने आया है। धनिया भी इससे अछूता नहीं है और करीब 6.01 प्रतिशत फसल उचित भंडारण व्यवस्था के अभाव में खराब हो जाती है। दलहन में मध्य प्रदेश की प्रमुख फसल चना भी करीब 5.85 प्रतिशत तक नुकसान का सामना करती है। इसी तरह बाजरा में भी करीब 4.53 प्रतिशत तक फसलोत्तर नुकसान दर्ज किया गया है। ये आंकड़े बताते हैं कि समस्या केवल किसी एक फल या सब्जी तक सीमित नहीं है बल्कि खेती से बाजार तक पहुंचने वाली पूरी सप्लाई चेन को मजबूत करने की जरूरत है।

    दरअसल फल और सब्जियां लंबे समय तक सामान्य तापमान पर सुरक्षित नहीं रह पातीं। कटाई के बाद यदि उन्हें जल्द बाजार तक नहीं पहुंचाया जाए या उचित तापमान पर संग्रहित नहीं किया जाए तो उनकी गुणवत्ता तेजी से गिरने लगती है। कई बार किसानों को मजबूरी में कम कीमत पर उपज बेचनी पड़ती है और जहां खरीदार नहीं मिलते वहां फसल खेत या मंडी में ही खराब होने लगती है। इसका सबसे बड़ा नुकसान छोटे और सीमांत किसानों को उठाना पड़ता है।

    दूसरे राज्यों के आंकड़े भी फसलोत्तर नुकसान की तस्वीर को सामने रखते हैं। बिहार में अमरूद का करीब 15.36 प्रतिशत और टमाटर का 12.36 प्रतिशत तक नुकसान बताया गया है। उत्तर प्रदेश में खरबूजे का करीब 7.25 प्रतिशत और पोल्ट्री मीट का 7.24 प्रतिशत नुकसान दर्ज किया गया है। इससे साफ है कि देश के कई कृषि राज्यों में उत्पादन बढ़ाने के साथ साथ भंडारण और परिवहन की व्यवस्था को मजबूत करना भी जरूरी है।

    मध्य प्रदेश में यदि गांवों और प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों के आसपास छोटे कोल्ड स्टोरेज फूड प्रोसेसिंग यूनिट और बेहतर परिवहन सुविधाएं विकसित की जाएं तो किसानों की उपज को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इससे किसान मजबूरी में कम दाम पर फसल बेचने के बजाय बेहतर बाजार का इंतजार कर सकेंगे। साथ ही खराब होने वाली उपज को प्रोसेसिंग के जरिए भी उपयोग में लाया जा सकता है। किसानों की आय बढ़ाने के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है बल्कि खेत से बाजार तक फसल को सुरक्षित पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है।

  • MP के जम्बो सीताफल को मिला GI टैग सिवनी के किसानों के लिए खुलेंगे वैश्विक बाजार के दरवाजे

    MP के जम्बो सीताफल को मिला GI टैग सिवनी के किसानों के लिए खुलेंगे वैश्विक बाजार के दरवाजे


    नई दिल्ली । मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के किसानों के लिए बड़ी खुशखबरी सामने आई है। जिले के प्रसिद्ध जम्बो सीताफल को भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग प्राप्त हो गया है। यह उपलब्धि न केवल सिवनी की कृषि पहचान को मजबूत करेगी बल्कि यहां के हजारों किसानों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में नई संभावनाएं भी उपलब्ध कराएगी। लंबे समय से अपने अनोखे स्वाद और विशाल आकार के लिए पहचाने जाने वाले इस फल को अब आधिकारिक रूप से विशिष्ट उत्पाद का दर्जा मिल गया है।

    जीआई टैग किसी उत्पाद की विशेष भौगोलिक पहचान और उसकी विशिष्ट गुणवत्ता को प्रमाणित करता है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि उस नाम का उपयोग केवल उसी क्षेत्र में उत्पादित वस्तु के लिए किया जा सके। सिवनी के जम्बो सीताफल को यह मान्यता मिलने के बाद इसकी विशिष्ट पहचान सुरक्षित हो जाएगी और अन्य क्षेत्रों में उत्पादित फल इसके नाम का उपयोग नहीं कर सकेंगे।

    सिवनी का जम्बो सीताफल अपने बड़े आकार और उत्कृष्ट गुणवत्ता के कारण देशभर में प्रसिद्ध है। सामान्य रूप से एक सीताफल का वजन 200 से 650 ग्राम तक होता है लेकिन जिले के भूतबंधानी क्षेत्र में उत्पादित कई सीताफल 800 ग्राम से लेकर एक किलोग्राम तक वजन के पाए जाते हैं। यही विशेषता इसे सामान्य सीताफलों से अलग बनाती है।

    इसके अलावा इस फल का स्वाद भी इसकी लोकप्रियता का बड़ा कारण है। इसमें बीज अपेक्षाकृत कम होते हैं जबकि सफेद और गाढ़ा गूदा अधिक मात्रा में पाया जाता है। प्राकृतिक रूप से बेहद मीठा स्वाद इसे उपभोक्ताओं की पहली पसंद बनाता है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ समेत आसपास के राज्यों में इसकी काफी मांग रहती है।

    पोषण के लिहाज से भी यह फल बेहद लाभकारी माना जाता है। इसमें पोटैशियम मैग्नीशियम और विभिन्न आवश्यक विटामिन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह हृदय स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने और रक्तचाप को नियंत्रित करने में सहायक हो सकता है। इसी वजह से इसकी मांग लगातार बढ़ती जा रही है।

    जीआई टैग मिलने का सबसे बड़ा लाभ किसानों को मिलेगा। अब वे अपने उत्पाद को विशेष पहचान के साथ बाजार में बेच सकेंगे जिससे उन्हें बेहतर मूल्य प्राप्त होने की संभावना बढ़ जाएगी। साथ ही निर्यात के नए अवसर भी खुलेंगे और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सिवनी के जम्बो सीताफल की अलग पहचान बनेगी।

    कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यह उपलब्धि जिले की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देगी। इससे सीताफल उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा और किसानों को गुणवत्ता आधारित खेती के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। कुल मिलाकर सिवनी के जम्बो सीताफल को मिला जीआई टैग जिले की कृषि विरासत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाला महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

  • MP का ‘बंगला पान’ बना इंटरनेशनल पसंद, बढ़ी मांग, अब सरकार किसानों को देगी ₹1 करोड़ की मदद

    MP का ‘बंगला पान’ बना इंटरनेशनल पसंद, बढ़ी मांग, अब सरकार किसानों को देगी ₹1 करोड़ की मदद


    भोपाल। मध्य प्रदेश का प्रसिद्ध ‘बंगला पान’ अब देश ही नहीं, विदेशों में भी अपनी खास पहचान बना रहा है। अपनी सुगंध, कोमल बनावट और बेहतरीन स्वाद के कारण छतरपुर का बंगला पान अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। इसकी बढ़ती मांग को देखते हुए राज्य सरकार ने पान उत्पादक किसानों के लिए 1.03 करोड़ रुपये की विशेष सहायता योजना लागू की है।

    विदेशों तक पहुंचा एमपी का पान
    छतरपुर जिले में उगाया जाने वाला बंगला पान अपनी पतली बनावट, हल्की मिठास और लंबे समय तक ताजगी बनाए रखने की क्षमता के लिए जाना जाता है। यही वजह है कि इसकी मांग भारत के साथ-साथ पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देशों में भी लगातार बढ़ रही है।

    किसानों के लिए सरकार की खास योजना
    पान उत्पादन को बढ़ावा देने और किसानों की आय में वृद्धि के उद्देश्य से राज्य सरकार ने 10 प्रमुख जिलों को शामिल करते हुए विशेष कार्ययोजना तैयार की है। इसके लिए 1 करोड़ 3 लाख रुपये का वित्तीय प्रावधान किया गया है। योजना के तहत किसानों को आधुनिक खेती तकनीकों की जानकारी, उन्नत किस्म की पौध सामग्री, विशेष प्रशिक्षण, और ‘बरोज’ निर्माण के लिए आर्थिक व तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।

    इन जिलों में होती है प्रमुख खेती
    मध्य प्रदेश के छतरपुर, रीवा, मंदसौर, नरसिंहपुर और टीकमगढ़ जिले पान उत्पादन के प्रमुख केंद्र हैं। यहां वर्षों से पान की खेती किसानों की आय का महत्वपूर्ण स्रोत बनी हुई है।

    रीवा का पान भी खूब लोकप्रिय
    रीवा जिले के महसांव क्षेत्र के दो गांवों में उत्पादित पान की भी अलग पहचान है। यहां तैयार होने वाला पान उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहरों वाराणसी, प्रयागराज और लखनऊ तक भेजा जाता है। इन बाजारों में मध्य प्रदेश के पान की विशेष मांग बनी रहती है।

    क्या है ‘बरोज’ मॉडल?
    पान की खेती के लिए विशेष प्रकार का संरक्षित ढांचा तैयार किया जाता है, जिसे ‘बरोज’ कहा जाता है। इसमें तापमान और नमी को नियंत्रित रखा जाता है, जिससे पान की नाजुक बेलों का बेहतर विकास हो सके। मध्य प्रदेश में यह परंपरागत खेती मुख्य रूप से चौरसिया समाज द्वारा की जाती है, जो पीढ़ियों से इस व्यवसाय से जुड़ा हुआ है। बरोज प्रणाली की वजह से उच्च गुणवत्ता वाला पान तैयार होता है और यही मॉडल अब देशभर में चर्चा का विषय बन रहा है।

    चुनौतियों के बावजूद बनी हुई है मांग
    पारंपरिक पान व्यवसाय को पान मसाला और गुटखा जैसे उत्पादों से चुनौती मिल रही है। बदलती जीवनशैली और युवाओं की पसंद के कारण पान की खपत पर असर पड़ा है, जिससे किसानों की आय भी प्रभावित हुई है। इसके बावजूद भारतीय संस्कृति और परंपराओं में पान का महत्व आज भी बरकरार है। पूजा-पाठ, विवाह समारोह, मांगलिक आयोजनों और अतिथि सत्कार में पान का विशेष स्थान होने के कारण इसकी बाजार मांग स्थिर बनी हुई है।

    किसानों के लिए नई उम्मीद
    सरकार की नई योजना और बढ़ती निर्यात मांग के चलते पान उत्पादक किसानों को बेहतर आय की उम्मीद है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आधुनिक तकनीकों और बरोज मॉडल को व्यापक स्तर पर अपनाया जाए, तो मध्य प्रदेश का बंगला पान वैश्विक बाजार में और मजबूत पहचान बना सकता है।

  • किसान कल्याण योजना की 14वीं किस्त टली, 85 लाख किसानों को अब मई का इंतजार

    किसान कल्याण योजना की 14वीं किस्त टली, 85 लाख किसानों को अब मई का इंतजार


    मध्य प्रदेश के लाखों किसानों के लिए किसान कल्याण योजना की अगली किस्त का इंतजार और लंबा हो गया है। राज्य के करीब 85 लाख किसान इस योजना के तहत मिलने वाली 14वीं किस्त का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे, लेकिन अब यह साफ होता दिख रहा है कि भुगतान की तारीख आगे खिसक गई है।

    पहले उम्मीद की जा रही थी कि किसानों के खातों में यह राशि अप्रैल महीने में किसी विशेष अवसर या त्योहार के आसपास पहुंच जाएगी। लेकिन महीने के अंत तक भी कोई आधिकारिक संकेत न मिलने से किसानों की उम्मीदों को झटका लगा है। अब माना जा रहा है कि यह भुगतान मई महीने में किया जा सकता है।

    इस देरी के पीछे मुख्य कारण प्रशासनिक प्रक्रियाओं और डेटा सत्यापन को बताया जा रहा है। लाभार्थियों की सूची को अंतिम रूप देने और बैंकिंग प्रक्रिया को पूरा करने में अपेक्षा से अधिक समय लग रहा है। इसी वजह से किस्त जारी करने की प्रक्रिया फिलहाल स्थगित हो गई है और इसे अगले महीने तक आगे बढ़ा दिया गया है।

    किसानों के बीच अब यह भी चर्चा तेज हो गई है कि क्या इस बार दो किस्तों की राशि एक साथ जारी की जा सकती है। अगर सरकार ऐसा निर्णय लेती है, तो किसानों को 2000 रुपये की बजाय 4000 रुपये तक की राशि एक साथ मिल सकती है। खेती के महत्वपूर्ण सीजन को देखते हुए यह राशि किसानों के लिए बड़ी राहत साबित हो सकती है, क्योंकि इस समय बीज, खाद और अन्य कृषि खर्चों में तेजी से बढ़ोतरी होती है।

    इस योजना के तहत किसानों को हर साल कुल 6000 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाती है, जो तीन बराबर किस्तों में उनके बैंक खातों में सीधे भेजी जाती है। यह सहायता केंद्र की किसान सम्मान निधि योजना के अतिरिक्त होती है, जिससे किसानों को कुल मिलाकर एक निश्चित आर्थिक सहारा मिलता है।

    हालांकि इस बार की देरी ने किसानों की चिंता जरूर बढ़ा दी है, लेकिन अधिकारियों का मानना है कि प्रक्रिया पूरी होते ही भुगतान जल्द जारी कर दिया जाएगा। किसानों को सलाह दी जा रही है कि वे अपने बैंक खाते की जानकारी अपडेट रखें, ताकि किसी भी तकनीकी समस्या की वजह से भुगतान अटक न जाए।

    विशेष रूप से यह भी जरूरी बताया जा रहा है कि आधार लिंकिंग और डीबीटी सुविधा सक्रिय हो, क्योंकि इन्हीं तकनीकी प्रक्रियाओं के जरिए राशि सीधे लाभार्थियों के खाते में भेजी जाती है। कई बार मामूली गलतियों के कारण भी भुगतान में देरी हो जाती है।

    फिलहाल किसानों की नजर अब मई महीने पर टिकी हुई है, जब इस किस्त के जारी होने की उम्मीद जताई जा रही है। यह इंतजार भले ही थोड़ा लंबा हो गया हो, लेकिन किसानों को उम्मीद है कि जल्द ही उन्हें उनकी लंबित राशि प्राप्त हो जाएगी और खेती के कामों में उन्हें राहत मिलेगी।

  • समर्थन मूल्य पर गेहूँ उपार्जन के लिए 20 हजार से अधिक किसानों ने कराया पंजीयन, मंत्री राजपूत ने 7 मार्च तक अपील की

    समर्थन मूल्य पर गेहूँ उपार्जन के लिए 20 हजार से अधिक किसानों ने कराया पंजीयन, मंत्री राजपूत ने 7 मार्च तक अपील की


    इंदौर से शुक्रवार 13 फरवरी 2026 को बड़ी खबर सामने आई है। रबी विपणन वर्ष 2026-27 में समर्थन मूल्य पर गेहूँ उपार्जन के लिए अब तक 20 हजार 98 किसानों ने पंजीयन कर लिया है। खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री गोविंद सिंह राजपूत ने किसानों से अपील की है कि निर्धारित समय 7 मार्च तक पंजीयन अवश्य कराएं। उन्होंने बताया कि पंजीयन की प्रक्रिया किसानों के लिए सहज और सुगम बनाई गई है।

    मंत्री राजपूत ने पंजीयन के आंकड़े साझा करते हुए कहा कि इंदौर संभाग में 4084 किसान, उज्जैन में 9524, ग्वालियर में 476, चम्बल में 123, जबलपुर में 788, नर्मदापुरम में 900, भोपाल में 3602, रीवा में 68, शहडोल में 83 और सागर में 450 किसानों ने पंजीयन कर लिया है। उन्होंने किसानों को बताया कि कुल 3186 पंजीयन केंद्र पूरे प्रदेश में बनाए गए हैं, जिससे किसान आसानी से अपनी फसल का पंजीयन करा सकते हैं।

    केंद्र सरकार ने वर्ष 2026-27 के लिए गेहूँ का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 2585 रुपये प्रति क्विंटल घोषित किया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 160 रुपये अधिक है। यह बढ़ोतरी किसानों की आय को स्थिर रखने और फसल के उचित मूल्य सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    पंजीयन की व्यवस्था दो तरह से की गई है। नि:शुल्क पंजीयन ग्राम पंचायत और जनपद पंचायत कार्यालयों में स्थापित सुविधा केंद्रों, तहसील कार्यालयों में उपलब्ध सुविधा केंद्रों तथा सहकारी समितियों और सहकारी विपणन संस्थाओं द्वारा संचालित केंद्रों पर किया जा सकता है। वहीं सशुल्क पंजीयन एमपी ऑनलाइन कियोस्क, कॉमन सर्विस सेंटर कियोस्क, लोक सेवा केंद्र और निजी साइबर कैफे पर किया जा सकता है।

    मंत्री राजपूत ने किसानों की सुविधा के लिए कहा कि पिछले वर्ष रबी और खरीफ के पंजीयन में जिन किसानों के मोबाइल नंबर उपलब्ध हैं, उन्हें एसएमएस के माध्यम से पंजीयन की जानकारी भेजी जाएगी। इसके अलावा गांव में डोंडी पिटवाकर ग्राम पंचायतों के सूचना पटल पर पंजीयन संबंधी सूचना प्रदर्शित कराई जाएगी और समिति तथा मंडी स्तर पर बैनर लगवाने के निर्देश भी जारी किए गए हैं।

    राज्य सरकार की यह पहल किसानों की फसल की बिक्री और आय सुनिश्चित करने के लिए अहम कदम माना जा रहा है। मंत्री राजपूत ने दोहराया कि समय पर पंजीयन कराने से किसान अपने गेहूँ को समर्थन मूल्य पर बेच सकेंगे और फसल का सही मूल्य प्राप्त कर पाएंगे। उन्होंने कहा कि सरकार पूरी तैयारी के साथ किसानों के हितों की रक्षा कर रही है।

    कुल मिलाकर रबी विपणन वर्ष 2026-27 में किसानों के लिए पंजीयन प्रक्रिया सुगम, पारदर्शी और व्यापक स्तर पर उपलब्ध है। अब किसानों की जिम्मेदारी है कि वह 7 मार्च तक अपने पंजीयन को पूरा करें ताकि समर्थन मूल्य का लाभ उन्हें समय पर मिल सके।