Tag: Madhya Pradesh High Court

  • मप्र हाईकोर्ट को मिलेंगे 12 नए जज, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 7 वकीलों और 5 न्यायिक अधिकारियों के नाम सुझाए

    मप्र हाईकोर्ट को मिलेंगे 12 नए जज, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 7 वकीलों और 5 न्यायिक अधिकारियों के नाम सुझाए


    जबलपुर । मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की कमी दूर करने और लंबित मुकदमों के बढ़ते बोझ को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में 12 नए न्यायाधीशों की नियुक्ति की सिफारिश की है। प्रस्तावित नामों में सात वकील और पांच न्यायिक अधिकारी शामिल हैं। यदि सभी नियुक्तियों को मंजूरी मिल जाती है तो हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की कुल संख्या बढ़कर 50 हो जाएगी। इससे जबलपुर स्थित मुख्य पीठ के साथ इंदौर और ग्वालियर खंडपीठ में भी न्यायिक कामकाज को गति मिलने की उम्मीद है।

    सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की ओर से की गई इस सिफारिश को मध्यप्रदेश की न्याय व्यवस्था के लिहाज से अहम माना जा रहा है। लंबे समय से अदालतों में लंबित मामलों और न्यायाधीशों की कमी का मुद्दा सामने आता रहा है। ऐसे में 12 नए न्यायाधीशों की नियुक्ति से मुकदमों की सुनवाई के लिए उपलब्ध न्यायिक क्षमता बढ़ सकती है। इससे मामलों की सुनवाई और उनके निपटारे की प्रक्रिया को बेहतर बनाने में मदद मिलने की संभावना है।

    पांच न्यायिक अधिकारियों के नाम शामिल

    कॉलेजियम ने न्यायिक सेवा कोटे से पांच वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों को हाईकोर्ट का न्यायाधीश बनाने की अनुशंसा की है। इनमें रेणुका कंचन कृष्णमूर्ति मिश्रा वीरेंद्र सिंह राजपूत ममता जैन और अशिता श्रीवास्तव के नाम शामिल हैं। ये सभी न्यायिक सेवा से जुड़े अधिकारी हैं और अब इनके नामों पर नियुक्ति की आगे की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

    बार कोटे से सात वकीलों की सिफारिश

    वकीलों के कोटे से जिन सात नामों की सिफारिश की गई है उनमें डॉ. विवेक शरण राजेश कुमार शुक्ला कनकलता सिंह भक्ति व्यास श्रेयस पंडित मृणाल केलकर और अविनाश जरगर शामिल हैं। इन नामों को कॉलेजियम की अनुशंसा के बाद नियुक्ति की प्रक्रिया के अगले चरण में भेजा जाएगा। इस तरह न्यायिक सेवा और बार दोनों वर्गों से नए न्यायाधीशों के चयन का प्रस्ताव तैयार किया गया है।

    राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद होगी नियुक्ति

    कॉलेजियम की सिफारिश के बाद अब नियुक्ति की संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। प्रस्ताव केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्रालय को भेजा जाएगा। मंत्रालय में जरूरी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद नियुक्ति से जुड़ी फाइल राष्ट्रपति के पास भेजी जाएगी। राष्ट्रपति की मंजूरी और नियुक्ति वारंट जारी होने के बाद केंद्र सरकार की ओर से अधिसूचना जारी की जाएगी।

    इसके बाद मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश नवनियुक्त न्यायाधीशों को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाएंगे। शपथ ग्रहण और कार्यभार संभालने के बाद हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़कर 50 हो जाएगी।

    नई नियुक्तियों का असर केवल जबलपुर की मुख्य पीठ तक सीमित नहीं रहेगा। इंदौर और ग्वालियर खंडपीठ में भी न्यायिक कामकाज को इससे मदद मिलने की उम्मीद है। हालांकि लंबित मुकदमों की संख्या कम होने और सुनवाई की गति बढ़ने का वास्तविक असर नए न्यायाधीशों के कार्यभार संभालने के बाद ही सामने आएगा। फिलहाल कॉलेजियम की सिफारिश के बाद अब सभी की नजर नियुक्ति की अगली प्रक्रिया पर टिकी है।

  • अवैध खनन के आरोपों से जुड़े मामले में संजय पाठक की फर्म की याचिका खारिज, अब कलेक्टर के सामने रखना होगा पक्ष

    अवैध खनन के आरोपों से जुड़े मामले में संजय पाठक की फर्म की याचिका खारिज, अब कलेक्टर के सामने रखना होगा पक्ष


    जबलपुर। मध्यप्रदेश में कथित अवैध लौह अयस्क खनन से जुड़े मामले में भाजपा विधायक संजय पाठक से संबंधित एक और फर्म को हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली है। जबलपुर हाईकोर्ट ने शुक्रवार को पैसिफिक एक्सपोर्ट की ओर से दायर याचिका खारिज कर दी। इस याचिका के जरिए फर्म ने जबलपुर कलेक्टर की ओर से जारी 81.73 करोड़ रुपये के रिकवरी नोटिस को चुनौती दी थी। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि इस मामले में कार्रवाई करने का अधिकार कलेक्टर के पास है। साथ ही फर्म को अपना पक्ष कलेक्टर के समक्ष रखने की छूट दी गई है। कोर्ट ने कलेक्टर को निर्देश दिया है कि वह चार महीने के भीतर मामले का निराकरण करें।
    यह मामला संजय पाठक से संबंधित फर्मों के खिलाफ की जा रही करीब 443 करोड़ रुपये की रिकवरी कार्रवाई से जुड़ा है। इसके अतिरिक्त देय जीएसटी की वसूली का मामला भी इसमें शामिल बताया गया है। अधिवक्ता पंकज कुमार दुबे के मुताबिक अदालत ने इस स्तर पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। मामला वर्ष 2004 से 2017 के बीच का है। आरोप है कि इस अवधि में संबंधित फर्मों ने निर्धारित सीमा से अधिक लौह अयस्क का खनन किया था। इसी कथित अतिरिक्त खनन को लेकर प्रशासन की ओर से रिकवरी की कार्रवाई की जा रही है। फिलहाल यह मामला जबलपुर कलेक्टर के समक्ष विचाराधीन है।
    पैसिफिक एक्सपोर्ट के खिलाफ करीब 81.73 करोड़ रुपये की रिकवरी का मामला है। फर्म के डायरेक्टर सुमित अग्रवाल बताए गए हैं। रिकवरी नोटिस को चुनौती देते हुए फर्म ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि अदालत ने याचिका खारिज करते हुए फर्म को संबंधित प्रशासनिक प्राधिकारी के सामने अपना पक्ष रखने का विकल्प दिया है। इसका अर्थ है कि अब फर्म को कलेक्टर के समक्ष अपने दस्तावेज और दलीलें प्रस्तुत करनी होंगी। इसके बाद कलेक्टर को निर्धारित समय सीमा के भीतर मामले पर निर्णय लेना होगा।
    इस प्रकरण में इससे पहले भी संजय पाठक से संबंधित एक अन्य फर्म आनंद माइनिंग कॉर्पोरेशन को हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली थी। 8 सितंबर 2026 को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने आनंद माइनिंग कॉर्पोरेशन की याचिका खारिज कर दी थी। उस बेंच में जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बीपी शर्मा शामिल थे। अब पैसिफिक एक्सपोर्ट की याचिका खारिज होने के बाद इसी मामले से संबंधित एक और फर्म को प्रशासनिक स्तर पर अपना पक्ष रखना होगा। मामले से जुड़े पांच प्रकरणों में अलग-अलग याचिकाओं पर कार्रवाई की जा रही है।
    सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह बात भी रखी गई कि पैसिफिक एक्सपोर्ट को वर्ष 2025 से नोटिस जारी किए जा रहे थे और जवाब देने के लिए कई बार समय दिया गया था। इसके बावजूद फर्म की ओर से अब तक जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया और न ही कलेक्टर के समक्ष उपस्थिति दर्ज कराई गई। अदालत ने इसी संदर्भ में फर्म को कलेक्टर के सामने अपना पक्ष रखने का अवसर दिया और चार महीने में निर्णय लेने के निर्देश जारी किए।
    अधिवक्ता पंकज कुमार दुबे के अनुसार मामला पिछले छह से आठ महीने से लंबित है। उन्होंने कहा कि हस्तक्षेप आवेदन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शासकीय राजस्व से जुड़े बड़े मामले में अनावश्यक देरी न हो और कानून के अनुसार निष्पक्ष कार्रवाई की जाए। अब इस पूरे प्रकरण में कलेक्टर की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी। चार महीने के भीतर होने वाले निर्णय से यह स्पष्ट होगा कि रिकवरी संबंधी दावों और फर्म के पक्ष पर प्रशासन क्या निष्कर्ष निकालता है।

  • इंदौर बायपास की बदहाली पर 27 अक्टूबर को फिर सुनवाई, NHAI ने पेश की तस्वीरें, हाईकोर्ट ने मांगी जमीनी हकीकत

    इंदौर बायपास की बदहाली पर 27 अक्टूबर को फिर सुनवाई, NHAI ने पेश की तस्वीरें, हाईकोर्ट ने मांगी जमीनी हकीकत


    इंदौर। इंदौर-देवास बायपास की खराब हालत और सड़क सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानी NHAI ने अदालत में तस्वीरें पेश करते हुए दावा किया कि बायपास पर मौजूद गड्ढों को भर दिया गया है और अब वहां पहले जैसी समस्या नहीं है। हालांकि सड़क की मौजूदा स्थिति को लेकर याचिकाकर्ता की ओर से पहले भी सवाल उठाए गए थे। इस पर हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को मौके पर जाकर सड़क का निरीक्षण करने और वास्तविक स्थिति से अदालत को अवगत कराने के निर्देश दिए हैं। मामले में अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को होगी। सुनवाई जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की डबल बेंच में हुई। अदालत ने पिछली सुनवाई के दौरान NHAI से यह बताने को कहा था कि वर्ष 2023 में हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश और सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के बाद बायपास की स्थिति सुधारने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।
    इंदौर-देवास बायपास की बदहाली को लेकर मातृ फाउंडेशन की ओर से वर्ष 2021 में जनहित याचिका दायर की गई थी। एडवोकेट अमेय बजाज के माध्यम से दायर इस याचिका में सड़क की खराब स्थिति और वाहन चालकों की सुरक्षा से जुड़े कई मुद्दे उठाए गए हैं। याचिका के अनुसार बायपास पर बड़े-बड़े गड्ढे और खराब सर्विस रोड लोगों के लिए परेशानी का कारण बने हुए हैं। इसके अलावा खुले ड्रेनेज और जलभराव की समस्या भी सामने रखी गई है। कुछ स्थानों पर स्ट्रीट लाइट खराब या बंद होने का मुद्दा उठाते हुए कहा गया है कि इससे रात के समय वाहन चालकों को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। याचिका में दुर्घटना संभावित स्थानों और अव्यवस्थित यातायात व्यवस्था को लेकर भी चिंता जताई गई है।
    तीन दिन पहले हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया था कि बायपास की स्थिति अब भी संतोषजनक नहीं है। याचिकाकर्ता की ओर से यह आरोप भी लगाया गया कि गड्ढे में गिरने से एक महिला की मौत हुई थी। उनका कहना था कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का प्रभावी ढंग से पालन नहीं होने के कारण सड़क पर हादसों का खतरा बना हुआ है। हालांकि NHAI ने शुक्रवार को तस्वीरें पेश कर दावा किया कि गड्ढों को भरने का काम पूरा कर लिया गया है और समस्या दूर हो चुकी है। अब अदालत के निर्देश के बाद याचिकाकर्ता मौके पर जाकर सड़क की वास्तविक स्थिति देखेंगे। उनका निरीक्षण और उसके आधार पर अदालत में दी जाने वाली जानकारी अगली सुनवाई के लिहाज से महत्वपूर्ण होगी।
    इस मामले में सड़क सुरक्षा से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन भी प्रमुख मुद्दा है। याचिका में राष्ट्रीय राजमार्गों पर अवैध पार्किंग और अवैध ढाबों के साथ व्यावसायिक अतिक्रमण पर नियंत्रण की मांग की गई है। इसके अलावा दुर्घटना संभावित क्षेत्रों की पहचान करने और वहां चेतावनी संकेतक लगाने जैसे उपायों पर जोर दिया गया है। प्रकाश व्यवस्था बेहतर बनाने और यातायात की निगरानी मजबूत करने की जरूरत भी उठाई गई है। आपातकालीन सेवाओं की उपलब्धता और जल निकासी की व्यवस्था को दुरुस्त करना भी याचिका में उठाए गए मुद्दों में शामिल है।
    अब 27 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई में बायपास की मौजूदा हालत और सुधार कार्यों को लेकर आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकती है। NHAI के दावे और याचिकाकर्ता के मौके पर किए जाने वाले निरीक्षण के बाद अदालत के सामने सड़क की वास्तविक स्थिति से जुड़ी जानकारी आएगी। ऐसे में इंदौर-देवास बायपास से गुजरने वाले वाहन चालकों की नजर अब अगली सुनवाई पर रहेगी।

  • भोपाल के ट्विशा शर्मा केस में जमानत पर टिकी नजरें, CBI के नए आरोपों के आधार पर हाईकोर्ट में होगी सुनवाई

    भोपाल के ट्विशा शर्मा केस में जमानत पर टिकी नजरें, CBI के नए आरोपों के आधार पर हाईकोर्ट में होगी सुनवाई


    भोपाल । भोपाल के चर्चित ट्विशा शर्मा मौत मामले में पूर्व जिला एवं सत्र न्यायाधीश गिरिबाला सिंह की नियमित जमानत याचिका पर शुक्रवार को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में सुनवाई होगी। इस मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी CBI की चार्जशीट में आरोपों में बदलाव के बाद जमानत याचिका पर नए कानूनी आधारों के साथ विचार किया जाएगा। पहले मामले में दहेज मृत्यु से संबंधित धारा लगाई गई थी लेकिन जांच के बाद आरोपपत्र में इसे हटाकर आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप शामिल किया गया है। ऐसे में अब अदालत बदली हुई कानूनी स्थिति और उपलब्ध तथ्यों को ध्यान में रखकर जमानत आवेदन पर सुनवाई करेगी।
    इससे पहले जस्टिस अजय कुमार निरंकारी की एकलपीठ ने गिरिबाला सिंह को जमानत आवेदन में संशोधन करने की अनुमति दी थी। पिछली सुनवाई के दौरान उनकी ओर से आवेदन में दहेज मृत्यु से संबंधित आरोप को हटाने और नए आरोप के अनुरूप जरूरी बदलाव करने की मांग की गई थी। हाईकोर्ट ने इस संशोधन की अनुमति देते हुए कहा था कि बदली हुई परिस्थितियों के आधार पर जमानत पर बहस करने से पहले आवेदन में आवश्यक सुधार किया जाए। CBI की चार्जशीट में भारतीय न्याय संहिता की धारा 80(2) के तहत दहेज मृत्यु का आरोप हटाकर धारा 108 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप जोड़ा गया है।
    ट्विशा शर्मा की मौत 12 मई 2026 को भोपाल स्थित उनकी ससुराल में हुई थी। 33 वर्षीय ट्विशा फंदे पर मिली थीं। उनकी शादी 9 दिसंबर 2025 को समर्थ सिंह से हुई थी। मौत के बाद उनके परिजनों ने ससुराल पक्ष पर दहेज की मांग और मानसिक प्रताड़ना के आरोप लगाए थे। शुरुआती मामले में पति समर्थ सिंह और सास गिरिबाला सिंह के खिलाफ दहेज मृत्यु और क्रूरता सहित विभिन्न कानूनी प्रावधानों के तहत केस दर्ज किया गया था। हालांकि ये आरोप जांच और न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं और इन्हें अदालत द्वारा साबित तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।
    मामले में भोपाल की जिला अदालत ने 15 मई को गिरिबाला सिंह को अग्रिम जमानत दी थी। इस आदेश को मृतका के परिजनों और राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। 27 मई को हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत का आदेश निरस्त कर दिया था। उस समय अदालत ने केस डायरी में दर्ज बयानों और पोस्टमार्टम से जुड़े तथ्यों सहित कई पहलुओं पर विचार किया था। इसके बाद गिरिबाला सिंह और उनके बेटे समर्थ सिंह को जांच के दौरान हिरासत में लिया गया।
    ट्विशा के परिजनों ने शुरुआती पोस्टमार्टम और जांच को लेकर सवाल उठाए थे और दोबारा पोस्टमार्टम कराने की मांग की थी। हाईकोर्ट के निर्देश पर 24 मई को दिल्ली स्थित एम्स के डॉक्टरों के मेडिकल बोर्ड ने भोपाल में दोबारा पोस्टमार्टम किया। CBI की चार्जशीट में शामिल रिपोर्ट के अनुसार मौत का कारण फंदे से दम घुटना बताया गया और मृत्यु को आत्महत्या माना गया। रिपोर्ट में ऐसी महत्वपूर्ण चोटों के नहीं मिलने की बात भी कही गई जो हमले या संघर्ष का संकेत देती हों।
    CBI ने जांच के दौरान डिजिटल और फोरेंसिक साक्ष्यों की भी पड़ताल की। जांच से संबंधित रिपोर्टों में चैट और कॉल रिकॉर्ड सहित ऑडियो रिकॉर्डिंग जैसे साक्ष्यों का उल्लेख किया गया है। एजेंसी ने आरोपपत्र में कथित मानसिक प्रताड़ना और आत्महत्या के लिए उकसाने से जुड़े आरोप रखे हैं। अब गिरिबाला सिंह की नियमित जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट बदले हुए आरोपों और मामले की परिस्थितियों पर विचार करेगा। वहीं ट्विशा शर्मा केस की सुनवाई भोपाल से दिल्ली स्थानांतरित करने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई संभावित बताई गई है। जमानत पर अंतिम निर्णय अदालत के आदेश के बाद ही स्पष्ट होगा।

  • अनूपपुर को मिलेगी आधुनिक जिला अदालत की सौगात, ₹44.85 करोड़ स्वीकृत, हाईकोर्ट ने निर्माण में तेजी लाने के दिए निर्देश

    अनूपपुर को मिलेगी आधुनिक जिला अदालत की सौगात, ₹44.85 करोड़ स्वीकृत, हाईकोर्ट ने निर्माण में तेजी लाने के दिए निर्देश


    अनूपपुर । मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में लंबे समय से किराए के भवन में संचालित हो रही जिला अदालत के लिए बड़ी राहत की खबर सामने आई है। राज्य सरकार ने जिला अदालत के नए भवन के निर्माण के लिए 44.85 करोड़ रुपये की वित्तीय स्वीकृति दे दी है। इस मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर होने के बाद सरकार ने यह कदम उठाया है। हाईकोर्ट ने स्वीकृति की जानकारी मिलने के बाद भवन निर्माण का काम जल्द शुरू करने के निर्देश दिए हैं। इससे जिला अदालत के लिए स्थायी भवन उपलब्ध कराने की दिशा में प्रक्रिया आगे बढ़ने की उम्मीद है।
    अनूपपुर जिला अदालत के भवन निर्माण का मामला गुरुवार को जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सामने आया। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ के समक्ष मामले से जुड़ी जानकारी रखी गई। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि राज्य सरकार ने भवन निर्माण के लिए 44.85 करोड़ रुपये की वित्तीय मंजूरी दे दी है। इसके बाद हाईकोर्ट ने निर्माण कार्य जल्द शुरू कराने के निर्देश जारी किए। लंबे समय से किराए के भवन में संचालित हो रही अदालत के लिए यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
    इस मामले में शहडोल निवासी अधिवक्ता वासुदेव चटर्जी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में बताया गया था कि अनूपपुर की जिला अदालत लंबे समय से किराए के भवन में चल रही है। अदालत के लिए स्थायी भवन की आवश्यकता को देखते हुए यह मामला हाईकोर्ट के सामने उठाया गया। इसके बाद हाईकोर्ट ने महाधिवक्ता को मुख्यमंत्री से व्यक्तिगत रूप से चर्चा करने के निर्देश दिए थे। मुख्यमंत्री से चर्चा के बाद राज्य सरकार की ओर से अदालत को वित्तीय स्वीकृति की जानकारी दी गई। सरकार के इस कदम के बाद हाईकोर्ट ने निर्माण कार्य में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं।
    सुनवाई के दौरान प्रदेश की अन्य जिला अदालतों के भवन निर्माण से जुड़े मामलों को लेकर भी महत्वपूर्ण निर्देश दिए गए। खंडपीठ ने कहा कि मध्य प्रदेश में जिला अदालतों के लंबित निर्माण कार्यों से संबंधित याचिकाएं मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली बेंच के समक्ष प्रस्तुत की जाएं। इन निर्माण कार्यों से जुड़ी याचिकाओं पर पहले से ही मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली बेंच में सुनवाई चल रही है। ऐसे में संबंधित याचिकाओं को उसी बेंच के समक्ष रखने का निर्देश दिया गया है ताकि मामलों की सुनवाई निर्धारित व्यवस्था के तहत हो सके।
    अनूपपुर जिला अदालत के भवन के लिए वित्तीय मंजूरी मिलने और हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद अब निर्माण कार्य शुरू होने की प्रक्रिया पर नजर रहेगी। स्थायी भवन उपलब्ध होने से अदालत के संचालन के लिए बेहतर व्यवस्था विकसित करने में मदद मिल सकती है। हालांकि निर्माण कार्य शुरू होने की वास्तविक तारीख और परियोजना पूरी होने की समयसीमा को लेकर अभी विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है। फिलहाल हाईकोर्ट ने सरकार को जल्द निर्माण शुरू करने के निर्देश दिए हैं और जिला अदालतों के लंबित भवन निर्माण से जुड़े मामलों की सुनवाई को लेकर भी व्यवस्था स्पष्ट कर दी है।

  • आवारा कुत्तों की बढ़ती समस्या पर हाईकोर्ट की सख्ती, सरकार ने बताया 6 महीने में 15 हजार का आंकड़ा, 3 नवंबर को होगी अगली सुनवाई

    आवारा कुत्तों की बढ़ती समस्या पर हाईकोर्ट की सख्ती, सरकार ने बताया 6 महीने में 15 हजार का आंकड़ा, 3 नवंबर को होगी अगली सुनवाई


    जबलपुर। मध्यप्रदेश में आवारा कुत्तों की बढ़ती समस्या और सार्वजनिक स्थानों पर लोगों की सुरक्षा को लेकर हाईकोर्ट ने सरकार से अब तक की गई कार्रवाई का ब्यौरा मांगा है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका दर्ज की है। सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत के सामने सरकार की ओर से उठाए गए कदमों की जानकारी रखी गई। अब इस मामले में 3 नवंबर को दोपहर 2:30 बजे फिर सुनवाई होगी। इसके बाद हाईकोर्ट की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को भेजी जाएगी जहां मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को प्रस्तावित है।

    मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस अल्पेश यशवंत कोगजे और जस्टिस विवेक जैन की डिवीजन बेंच कर रही है। सुनवाई के दौरान अदालत मित्र वरिष्ठ अधिवक्ता ब्रायन डिसिल्वा ने सरकार की ओर से पेश की गई कार्रवाई और इंतजामों को संतोषजनक बताया। इसके बाद अदालत ने स्पष्ट किया कि 3 नवंबर को सरकार की रिपोर्ट पर विस्तार से विचार किया जाएगा और जरूरत के अनुसार आगे के निर्देश जारी किए जाएंगे।

    दरअसल आवारा कुत्तों की समस्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई निर्देश जारी कर चुका है। 22 अगस्त 2025 और 7 नवंबर 2025 को शीर्ष अदालत ने इस मुद्दे से जुड़े दिशा निर्देश दिए थे। इसके बाद 19 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी हाईकोर्ट को इस विषय पर स्वतः संज्ञान लेकर जनहित याचिका दर्ज करने को कहा था। शीर्ष अदालत ने इस समस्या के समाधान तक मामले की लगातार निगरानी करने के निर्देश भी दिए थे। इसी क्रम में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने भी मामले को संज्ञान में लेकर राज्य सरकार से जवाब मांगा।

    हाईकोर्ट के सामने सरकार की ओर से पेश जवाब में बताया गया कि प्रदेश में आवारा कुत्तों की संख्या और उनसे जुड़ी समस्याओं को नियंत्रित करने के लिए नसबंदी और टीकाकरण का अभियान चलाया जा रहा है। सरकार के अनुसार पिछले छह महीनों के दौरान 15 हजार से अधिक आवारा कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण किया गया है। सरकार ने सार्वजनिक स्थलों की सुरक्षा और कुत्तों के नियंत्रण से जुड़े दूसरे उपायों की जानकारी भी अदालत के सामने रखी।

    सरकार ने कचरा प्रबंधन और आवारा कुत्तों को सार्वजनिक स्थानों पर भोजन मिलने की समस्या को लेकर भी कदम उठाने की बात कही है। खाद्य सामग्री बेचने वाले वेंडरों को खाद्य अपशिष्ट का उचित निपटान करने के लिए जागरूक किया जा रहा है। उन्हें कचरा बंद डस्टबिन में रखने की सलाह दी जा रही है। इसके साथ ही खान-पान के स्टॉल के आसपास आवारा कुत्तों को भोजन नहीं कराने के लिए भी कहा जा रहा है।

    अब हाईकोर्ट 3 नवंबर को सरकार की ओर से पेश आंकड़ों और उठाए गए कदमों की समीक्षा करेगा। इसके बाद अदालत की ओर से जरूरी निर्देश जारी किए जा सकते हैं। हाईकोर्ट की रिपोर्ट आगे सुप्रीम कोर्ट को भेजी जाएगी और 17 नवंबर को शीर्ष अदालत में इस मामले पर आगे की सुनवाई होगी।

  • MP हाईकोर्ट के जज अवनिंद्र सिंह की अनोखी मिसाल: GPF के पूरे 1.1 करोड़ रुपये PM CARES Fund को देंगे

    MP हाईकोर्ट के जज अवनिंद्र सिंह की अनोखी मिसाल: GPF के पूरे 1.1 करोड़ रुपये PM CARES Fund को देंगे


    नई दिल्ली। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जज जस्टिस अवनिंद्र कुमार सिंह ने अपने रिटायरमेंट के मौके पर ऐसा संकल्प लिया है जिसकी चर्चा हो रही है। 18 सितंबर 2026 को सेवानिवृत्त हुए जस्टिस सिंह ने 17 सितंबर को आयोजित अपने विदाई समारोह में घोषणा की कि उन्हें रिटायरमेंट के बाद जनरल प्रोविडेंट फंड यानी GPF से मिलने वाली पूरी राशि करीब 1.1 करोड़ रुपये वह PM CARES Fund में दान करेंगे। उन्होंने कहा कि यह राशि राष्ट्र निर्माण के काम में उपयोग हो सके इसलिए वह इसे अपने पास रखने के बजाय दान करने का फैसला कर रहे हैं।

    जस्टिस अवनिंद्र कुमार सिंह ने विदाई समारोह में अपने जीवन और न्यायिक सेवा के अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि रिटायरमेंट उनके लिए जीवन का अंत नहीं बल्कि एक नए अध्याय की शुरुआत है। उनके मुताबिक व्यक्ति केवल पूजा करके ही ईश्वर की सेवा नहीं करता बल्कि समाज और धरती पर मौजूद जीवन तथा अन्य संसाधनों की देखभाल करके भी अपनी जिम्मेदारी निभा सकता है। इसी सोच के तहत उन्होंने अपनी पत्नी के साथ एक और महत्वपूर्ण संकल्प लिया है।

    जस्टिस सिंह और उनकी पत्नी ने मृत्यु के बाद अपने शरीर को मेडिकल स्टडी और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए दान करने का फैसला किया है। उन्होंने बताया कि इसके लिए दोनों ने मेडिकल कॉलेज में संकल्प लिया है। उनका कहना है कि मृत्यु के बाद भी शरीर का उपयोग अगर चिकित्सा शिक्षा और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए हो सके तो इससे आने वाली पीढ़ियों को लाभ मिल सकता है। उनके इस निर्णय को विदाई समारोह में मौजूद लोगों ने भी महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा।

    अपने भाषण के दौरान जस्टिस सिंह ने अपने बचपन की यादों को भी साझा किया। उन्होंने बताया कि उनकी मां के निधन के बाद उनकी मौसी ने उन्हें अपने बेटे की तरह पाला। उन्होंने अपने पिता अपनी मौसी और मौसी के पति के प्रभाव का भी उल्लेख किया। जस्टिस सिंह ने बताया कि उनकी मौसी हमेशा उन्हें मेहनत और ईमानदार प्रयास के महत्व की सीख देती थीं। उनके अनुसार जीवन में सफलता का कोई आसान रास्ता नहीं होता और मेहनत तथा सच्ची कोशिश के बिना हासिल की गई सफलता लंबे समय तक कायम नहीं रहती।

    जस्टिस अवनिंद्र कुमार सिंह का न्यायिक करियर भी लंबा रहा है। उन्होंने 31 मई 1990 को सिविल जज क्लास-2 के तौर पर न्यायिक सेवा में प्रवेश किया था। इसके बाद उन्होंने न्यायिक सेवा में अलग अलग जिम्मेदारियां संभालीं। वर्ष 2018 में उन्हें छतरपुर में प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज के पद पर नियुक्त किया गया। इसके बाद 2022 में उन्होंने धार में प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज के तौर पर जिम्मेदारी संभाली।

    इसके बाद 1 मई 2023 को जस्टिस अवनिंद्र कुमार सिंह ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जज के रूप में शपथ ली। करीब तीन साल तक हाईकोर्ट में न्यायिक जिम्मेदारी निभाने के बाद वह 18 सितंबर 2026 को सेवानिवृत्त हुए। अपने विदाई भाषण के अंत में उन्होंने रिटायरमेंट को किसी यात्रा का अंतिम पड़ाव मानने के बजाय एक नए मंच से समाज के लिए काम करने की शुरुआत बताया।

    करीब 1.1 करोड़ रुपये की GPF राशि दान करने और पत्नी के साथ देहदान का संकल्प लेने की घोषणा ने उनके विदाई समारोह को खास बना दिया। उनका यह फैसला न्यायिक सेवा से विदाई के साथ समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को आगे भी जारी रखने की उनकी सोच को सामने रखता है।

  • हाईकोर्ट से विदाई के साथ समाजसेवा का संकल्प: पूर्व जस्टिस अवनीन्द्र कुमार सिंह PM राहत कोष में देंगे एक करोड़ रुपए

    हाईकोर्ट से विदाई के साथ समाजसेवा का संकल्प: पूर्व जस्टिस अवनीन्द्र कुमार सिंह PM राहत कोष में देंगे एक करोड़ रुपए


    जबलपुर । मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस अवनीन्द्र कुमार सिंह ने रिटायरमेंट के मौके पर समाजसेवा से जुड़ा बड़ा संकल्प लिया है। उन्होंने प्रधानमंत्री राहत कोष में एक करोड़ एक लाख रुपए देने की घोषणा की है। यह रकम उन्हें अपने जनरल प्रोविडेंट फंड यानी GPF से प्राप्त होगी। इसके साथ ही उन्होंने अपनी पत्नी इंदिरा के साथ देहदान करने का भी संकल्प लिया है। जस्टिस सिंह ने यह घोषणा गुरुवार को जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में आयोजित फुल कोर्ट फेयरवेल कार्यक्रम के दौरान की। इसी दिन वह न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्त हुए।

    फेयरवेल कार्यक्रम में जस्टिस सिंह ने अपने इस फैसले के पीछे पत्नी इंदिरा की इच्छा को प्रमुख वजह बताया। उन्होंने कहा कि उनकी पत्नी चाहती थीं कि रिटायरमेंट के बाद समाज के लिए कुछ किया जाए। इसी भावना का सम्मान करते हुए दोनों ने यह संकल्प लिया है। उन्होंने बताया कि GPF की राशि उनके बैंक खाते में आते ही उसे प्रधानमंत्री राहत कोष में ट्रांसफर कर दिया जाएगा। उनका यह फैसला कार्यक्रम में मौजूद लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया।

    जस्टिस सिंह ने अपने जीवन से जुड़ा एक भावुक प्रसंग भी साझा किया। उन्होंने बताया कि जब वह सिर्फ छह महीने के थे तभी उनकी मां का निधन हो गया था। इसके बाद उनके पिता के साथ उनकी मौसी स्वर्गीय निर्मला बुच और मौसा स्वर्गीय महेश नीलकंठ बुच ने उन्हें बेटे की तरह पाला। निर्मला बुच मध्य प्रदेश की मुख्य सचिव भी रह चुकी थीं। जस्टिस सिंह ने अपने पालन पोषण और जीवन निर्माण में परिवार की भूमिका को याद करते हुए अपनी बात रखी।

    फेयरवेल के दौरान उन्होंने न्याय व्यवस्था में आए बदलावों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पहले अदालतों में मुकदमों की सुनवाई मुख्य रूप से फिजिकल मोड में होती थी लेकिन अब वर्चुअल सुनवाई ने न्यायिक प्रक्रिया को कई स्तर पर आसान बनाया है। तकनीक के इस्तेमाल से अदालतों की कार्यप्रणाली में बदलाव आया है और न्यायिक प्रक्रिया के सामने मौजूद कई व्यावहारिक चुनौतियों को कम करने में मदद मिली है।

    कार्यक्रम के दौरान पत्नी इंदिरा का जिक्र करते हुए जस्टिस सिंह ने कहा कि उन्होंने अपने पूरे कार्यकाल में पत्नी की बातों का सम्मान किया है। अब रिटायरमेंट के बाद समाज के लिए देहदान करने का उनका संकल्प है और वह इस इच्छा को भी पूरा करेंगे। जैसे ही उन्होंने यह बात कही पूरा कोर्ट रूम तालियों से गूंज उठा।

    फेयरवेल कार्यक्रम को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस अल्पेश यशवंत कोगजे ने भी संबोधित किया। उन्होंने जस्टिस सिंह के कार्यकाल की सराहना करते हुए कहा कि उन्हें जो भी जिम्मेदारियां दी गईं उन्होंने उन्हें पूरी जिम्मेदारी के साथ निभाया। जस्टिस सिंह ने हाईकोर्ट के जज के रूप में करीब तीन साल काम किया और इस दौरान कुल 8788 मुकदमों का निपटारा किया।

    चीफ जस्टिस ने यह भी कहा कि किसी जज के काम का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उन्होंने कितने मामलों का निपटारा किया बल्कि उनके फैसलों की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण होती है। इस तरह जस्टिस अवनीन्द्र कुमार सिंह की विदाई उनके न्यायिक कार्यकाल के आंकड़ों के साथ समाजसेवा और देहदान के संकल्प के लिए भी याद की जाएगी।

  • कर्मचारियों के पूरे वेतन पर बढ़ा कानूनी पेच हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सरकार ने SC में लगाई याचिका

    कर्मचारियों के पूरे वेतन पर बढ़ा कानूनी पेच हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सरकार ने SC में लगाई याचिका


    भोपाल । मध्यप्रदेश में सीधी भर्ती से नियुक्त तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के प्रोबेशन पीरियड में वेतन को लेकर विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है जिसमें प्रोबेशन के दौरान लागू 70 80 और 90 प्रतिशत वेतन की व्यवस्था को निरस्त करते हुए कर्मचारियों को नियुक्ति की तारीख से 100 प्रतिशत वेतन देने का निर्देश दिया गया था। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने की मांग की है। मामले में अगली सुनवाई की तारीख अभी तय नहीं हुई है।

    राज्य सरकार ने अपनी याचिका में कई आधार रखते हुए कहा है कि सरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति और सेवा शर्तों से जुड़े नियम निर्धारित करने का अधिकार राज्य सरकार के पास है। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 309 का हवाला दिया गया है। सरकार का कहना है कि प्रोबेशन के दौरान चरणबद्ध वेतन की व्यवस्था किसी मनमाने फैसले के तहत लागू नहीं की गई थी बल्कि वित्त विभाग और सामान्य प्रशासन विभाग में प्रक्रिया और विचार विमर्श के बाद सक्षम स्तर की मंजूरी से इसे लागू किया गया था।

    सरकार ने यह भी तर्क दिया है कि प्रोबेशन की अवधि केवल नौकरी की शुरुआती अवधि नहीं बल्कि प्रशिक्षण और कर्मचारी की दक्षता के आकलन से जुड़ी प्रक्रिया है। राज्य ने 1966 के सेवा नियमों और वित्तीय नियमों का उल्लेख करते हुए कहा है कि नियुक्ति के शुरुआती दौर में कर्मचारियों को निर्धारित प्रक्रियाओं से गुजरना होता है। इसी व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए चरणबद्ध भुगतान का प्रावधान किया गया था। सरकार का कहना है कि नीतिगत और सेवा शर्तों से जुड़े मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा सीमित होना चाहिए जब तक किसी स्पष्ट कानूनी प्रावधान का उल्लंघन सामने न आए।

    मामले का एक अहम पहलू वित्तीय भार भी है। सरकार के मुताबिक यदि 2019 से अब तक प्रोबेशन पर रहे कर्मचारियों को नियुक्ति की तारीख से 100 प्रतिशत वेतन के आधार पर अंतर की राशि का भुगतान करना पड़ा तो राज्य के खजाने पर बड़ा अतिरिक्त वित्तीय भार आएगा। इसके अलावा पुराने कर्मचारियों के एरियर के भुगतान के बाद बढ़े हुए वेतन का असर भविष्य में होने वाली सरकारी भर्तियों के बजट प्रबंधन पर भी पड़ सकता है।

    सरकार ने अपनी याचिका में पुलिस पटवारी और शिक्षक जैसी बड़ी भर्तियों का भी उल्लेख किया है। राज्य का तर्क है कि पुराने एरियर और वेतन संबंधी अतिरिक्त वित्तीय दायित्व का प्रभाव पूंजीगत कार्यों और विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए निर्धारित बजट पर पड़ सकता है। सरकार ने दूसरे राज्यों की व्यवस्था का उदाहरण भी दिया है। इसमें छत्तीसगढ़ में प्रोबेशन के दौरान स्टाइपेंड या कम वेतन की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है। हालांकि वहां 2023 में यह व्यवस्था समाप्त कर 100 प्रतिशत वेतन लागू किया गया था लेकिन पुराने समय का एरियर नहीं दिया गया।

    इस विवाद में हाईकोर्ट पहले भी कर्मचारियों के पक्ष में फैसला दे चुका है। 6 जनवरी 2026 को हाईकोर्ट ने सीधी भर्ती से नियुक्त कर्मचारियों को नियुक्ति की तारीख से पूरा वेतन देने और बकाया राशि का 6 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ भुगतान करने का निर्देश दिया था। इसके बाद डबल बेंच ने 12 दिसंबर 2019 से लागू 70 80 और 90 प्रतिशत वेतन की व्यवस्था को निरस्त करते हुए नियुक्ति की तारीख से 100 प्रतिशत वेतन देने का निर्देश दिया।

    अब राज्य सरकार ने इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। ऐसे में आगे की स्थिति सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और आदेश पर निर्भर करेगी। फिलहाल मामला न्यायिक विचाराधीन है और कर्मचारियों के पूरे वेतन तथा पुराने एरियर को लेकर अंतिम स्थिति शीर्ष अदालत के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगी।

  • परिवार के विरोध के बावजूद जैन दीक्षा लेना चाहती है 20 साल की युवती हाई कोर्ट ने कहा फैसला लेने के लिए स्वतंत्र

    परिवार के विरोध के बावजूद जैन दीक्षा लेना चाहती है 20 साल की युवती हाई कोर्ट ने कहा फैसला लेने के लिए स्वतंत्र


    इंदौर । मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने 20 वर्षीय युवती के जैन दीक्षा लेने के फैसले को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। युवती सांसारिक जीवन छोड़कर जैन साध्वी के रूप में दीक्षा लेना चाहती है लेकिन उसके परिवार के लोग उसके इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बालिग व्यक्ति अपने जीवन से जुड़े फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है। उसे अपनी पसंद के धर्म का पालन करने और धार्मिक जीवन अपनाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

    मामला इंदौर से जुड़ा है जहां युवती ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर अपनी सुरक्षा की मांग की थी। युवती ने बताया कि वह श्वेतांबर जैन धर्म से प्रभावित है और लंबे समय से धार्मिक जीवन अपनाने की इच्छा रखती है। उसका उद्देश्य सांसारिक जीवन से अलग होकर जैन साध्वी के रूप में दीक्षा लेना है। हालांकि उसके माता पिता और अन्य रिश्तेदार इस निर्णय से सहमत नहीं हैं।

    युवती को आशंका थी कि परिवार के सामाजिक प्रभाव के कारण उसके फैसले में बाधा डाली जा सकती है। इसी आशंका को लेकर उसने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और अपनी स्वतंत्रता तथा सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की।

    मामले की सुनवाई जस्टिस संदीप एन भट्ट की एकल पीठ ने की। कोर्ट ने युवती के माता पिता की भावनाओं को भी समझा और उनके दुख तथा चिंता के प्रति सहानुभूति जताई। हालांकि न्यायालय ने यह भी साफ किया कि युवती बालिग है और अपने जीवन की दिशा तय करने का उसे अधिकार है।

    कोर्ट ने कहा कि किसी बालिग नागरिक को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी धर्म या जीवन पद्धति को अपनाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इसी तरह यदि कोई बालिग व्यक्ति अपनी इच्छा से धार्मिक जीवन अपनाना चाहता है तो उसके इस अधिकार का सम्मान किया जाना चाहिए। न्यायालय ने युवती के मौलिक अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता को महत्वपूर्ण माना।

    हाई कोर्ट ने युवती को अपनी सुरक्षा के लिए संबंधित थाना प्रभारी के समक्ष आवेदन देने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि आवेदन मिलने के बाद पुलिस को उसकी सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने होंगे। इस आदेश के जरिए न्यायालय ने युवती के दीक्षा लेने के व्यक्तिगत फैसले पर सीधे हस्तक्षेप करने के बजाय उसकी स्वतंत्रता और सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर दिया।

    मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें एक बालिग युवती की व्यक्तिगत पसंद और धार्मिक स्वतंत्रता का सवाल सामने आया है। परिवार की भावनाओं का सम्मान करते हुए भी कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि वयस्क व्यक्ति को अपने जीवन और आस्था से जुड़े फैसले लेने की स्वतंत्रता हासिल है। अब युवती अपनी इच्छा के अनुसार आगे की धार्मिक प्रक्रिया अपना सकती है और पुलिस उसकी सुरक्षा को लेकर आवश्यक कदम उठाएगी।