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  • TET में फेल हुए तो जाएगी नौकरी? 2028 तक मिला मौका, जानिए किन शिक्षकों को परीक्षा देना जरूरी और प्रमोशन पर क्या होगा

    TET में फेल हुए तो जाएगी नौकरी? 2028 तक मिला मौका, जानिए किन शिक्षकों को परीक्षा देना जरूरी और प्रमोशन पर क्या होगा


    भोपाल । मध्य प्रदेश में लंबे समय से सरकारी स्कूलों में पढ़ा रहे शिक्षकों के सामने अब TET यानी शिक्षक पात्रता परीक्षा की नई चुनौती खड़ी हो गई है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सेवारत शिक्षकों के लिए भी TET पास करना जरूरी किया गया है। यही वजह है कि 15 से 20 साल से नौकरी कर रहे शिक्षक भी अब परीक्षा की तैयारी को लेकर असमंजस में हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर किन शिक्षकों को TET देना होगा और अगर तय समय में परीक्षा पास नहीं की तो क्या नौकरी चली जाएगी।

    दरअसल TET की अनिवार्यता पहले मुख्य रूप से नई शिक्षक भर्ती से जुड़ी शर्त मानी जाती थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सितंबर 2025 के फैसले के बाद इसका दायरा पहले से सेवा में मौजूद शिक्षकों तक पहुंच गया। शिक्षक संगठनों ने इस फैसले पर पुनर्विचार की मांग भी उठाई और तर्क दिया कि जिन शिक्षकों की नियुक्ति TET अनिवार्य होने से पहले हो चुकी थी उन्हें बाद में इस नियम के दायरे में नहीं लाया जाना चाहिए। हालांकि कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने शिक्षा के अधिकार कानून को बच्चों की शिक्षा और उनके भविष्य से जोड़ते हुए शिक्षक की योग्यता को महत्वपूर्ण माना।

    अब सबसे अहम बात यह है कि हर सेवारत शिक्षक को TET देना जरूरी नहीं है। जिन शिक्षकों की सेवा में पांच साल से कम समय बचा है उन्हें TET की अनिवार्यता से राहत दी गई है। वहीं जिनकी सेवा में पांच साल से ज्यादा समय बाकी है उन्हें TET पास करना होगा। इसके लिए 31 अगस्त 2028 तक का समय दिया गया है। हालांकि जो शिक्षक प्रमोशन चाहते हैं उनके लिए TET की शर्त अलग है। सेवा में कितने भी साल बाकी हों प्रमोशन के लिए TET पास करना जरूरी होगा।

    यही वजह है कि 2028 तक समय मिलने के बावजूद शिक्षक अभी से चिंतित हैं। सबसे बड़ी परेशानी नियमों की स्पष्टता को लेकर है। अलग-अलग समय पर नियुक्त हुए शिक्षकों को लेकर अभी भी कई सवाल बने हुए हैं। 2005 से 2009 के बीच भर्ती हुए करीब 70 हजार शिक्षकों की स्थिति को लेकर राज्य सरकार भी राहत की मांग कर रही है। इसके अलावा पुराने पात्रता परीक्षणों को TET के बराबर माना जाएगा या नहीं इस पर भी स्पष्टता का इंतजार है। इसी तरह पहले से TET या CTET पास कर चुके शिक्षकों को दोबारा परीक्षा देनी होगी या उनका पुराना प्रमाणपत्र मान्य होगा इसको लेकर भी शिक्षकों में असमंजस है।

    नौकरी जाने का सवाल भी शिक्षकों की चिंता बढ़ा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक पात्र शिक्षकों को तय अवधि में TET पास करना होगा। निर्धारित समय तक योग्यता हासिल नहीं करने पर सेवा संबंधी कार्रवाई की स्थिति बन सकती है। वहीं प्रमोशन के लिए TET अनिवार्य रहेगा। कोर्ट ने 31 अगस्त 2028 तक परीक्षा पास करने का मौका दिया है और राज्यों को नियमित रूप से परीक्षा आयोजित करने के निर्देश दिए हैं। इसके बाद अतिरिक्त मोहलत नहीं दिए जाने की बात भी कही गई है।

    शिक्षकों की दूसरी बड़ी चिंता परीक्षा के सिलेबस और कठिनाई स्तर को लेकर है। लंबे समय से कक्षा में पढ़ाने वाले शिक्षकों का कहना है कि परीक्षा की तैयारी और नियमित शिक्षण कार्य दोनों को साथ संभालना आसान नहीं होगा। कुछ विषयों का स्तर ग्रेजुएशन तक होने की बात सामने आने से भी शिक्षक संगठनों ने आपत्ति जताई है। ऑनलाइन परीक्षा भी कई वरिष्ठ शिक्षकों के लिए चुनौती बन सकती है क्योंकि उन्हें कंप्यूटर आधारित परीक्षा देने का पर्याप्त अभ्यास नहीं है।

    फीस और परीक्षा व्यवस्था को लेकर भी मांगें उठ रही हैं। शिक्षक संगठन फीस माफ करने ऑफलाइन परीक्षा आयोजित करने परीक्षा के दिन अवकाश देने और जरूरत पड़ने पर यात्रा भत्ता उपलब्ध कराने की मांग कर रहे हैं। फिलहाल सबसे जरूरी बात यह है कि शिक्षक अपनी नियुक्ति की तारीख सेवा अवधि पुराने TET या CTET प्रमाणपत्र और प्रमोशन की स्थिति के आधार पर अपनी पात्रता को स्पष्ट करें। 2028 तक मिला समय राहत जरूर है लेकिन नियमों की अस्पष्टता के बीच शिक्षकों के लिए यह परीक्षा अब नौकरी और करियर दोनों से जुड़ा महत्वपूर्ण पड़ाव बन गई है।

  • ई-अटेंडेंस पर सरकार और शिक्षकों में बढ़ा टकराव वेतन कटौती के आदेश पर मचा बवाल सरकार बोली फैसला वापस नहीं होगा

    ई-अटेंडेंस पर सरकार और शिक्षकों में बढ़ा टकराव वेतन कटौती के आदेश पर मचा बवाल सरकार बोली फैसला वापस नहीं होगा


    मध्यप्रदेश। मध्यप्रदेश में ई-अटेंडेंस व्यवस्था को लेकर सरकार और शिक्षक संगठनों के बीच विवाद गहराता जा रहा है। सरकार व्यवस्था को हर हाल में लागू करने पर अड़ी है जबकि शिक्षक संगठन तकनीकी समस्याओं और वेतन कटौती जैसे प्रावधानों को अन्यायपूर्ण बताते हुए आदेश वापस लेने की मांग कर रहे हैं।

    मध्यप्रदेश में स्कूल शिक्षा विभाग की ई-अटेंडेंस व्यवस्था को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। राज्य सरकार ने साफ कर दिया है कि डिजिटल उपस्थिति प्रणाली को किसी भी कीमत पर वापस नहीं लिया जाएगा और इसे पूरी तरह लागू किया जाएगा। दूसरी ओर शिक्षक संगठन इस व्यवस्था के उद्देश्य का विरोध नहीं कर रहे हैं बल्कि इसके लागू करने के तरीके और दंडात्मक प्रावधानों पर गंभीर आपत्ति जता रहे हैं। दोनों पक्षों के बीच जारी यह विवाद अब प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था का बड़ा मुद्दा बन चुका है।

    स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह ने हाल ही में बैतूल दौरे के दौरान स्पष्ट कहा कि जब शिक्षक पूरे दिन मोबाइल फोन का उपयोग कर सकते हैं तो ई-अटेंडेंस दर्ज करने में किसी प्रकार की परेशानी नहीं होनी चाहिए। उनका कहना है कि सरकार का उद्देश्य केवल स्कूलों में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि जिन क्षेत्रों में नेटवर्क की समस्या है वहां सरकार लगातार तकनीकी सुधार कर रही है और ऐसे स्थानों पर पदस्थ शिक्षकों के साथ किसी प्रकार का अन्याय नहीं होने दिया जाएगा।

    सरकार के अनुसार प्रदेश में अधिकांश विद्यालयों में ई-अटेंडेंस व्यवस्था सफलतापूर्वक संचालित हो रही है और जहां तकनीकी बाधाएं सामने आई हैं वहां वेतन कटौती जैसी कार्रवाई नहीं की गई है। सरकार का दावा है कि हजारों विद्यालयों में व्यवस्था सुचारु रूप से चल रही है और केवल सीमित स्थानों पर नेटवर्क संबंधी दिक्कतें सामने आई हैं जिनका समाधान किया जा रहा है।

    उधर मध्यप्रदेश शिक्षक संघ ने सरकार के हालिया आदेशों पर गंभीर आपत्ति जताई है। संगठन का कहना है कि ई-अटेंडेंस का विरोध नहीं है लेकिन यदि किसी तकनीकी कारण से उपस्थिति दर्ज नहीं हो पाती तो उसका खामियाजा शिक्षक को नहीं भुगतना चाहिए। संघ ने मांग की है कि ई-अटेंडेंस दर्ज नहीं होने पर वेतन काटने और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के आदेश तत्काल वापस लिए जाएं।

    शिक्षक नेताओं का कहना है कि विभाग स्वयं स्वीकार कर चुका है कि प्रदेश के अधिकांश विद्यालयों में ई-अटेंडेंस सफलतापूर्वक दर्ज हो रही है। ऐसे में कुछ प्रतिशत तकनीकी समस्याओं के कारण पूरे शिक्षक वर्ग को संदेह की नजर से देखना उचित नहीं है। उनका कहना है कि शिक्षकों को निजी मोबाइल इंटरनेट और सिम कार्ड का उपयोग करने के लिए बाध्य किया जा रहा है जबकि इस संबंध में सरकार की कोई स्पष्ट नीति सामने नहीं आई है।

    ट्राइबल वेलफेयर टीचर्स एसोसिएशन ने भी इस व्यवस्था के कई व्यावहारिक पक्षों की ओर ध्यान दिलाया है। संगठन का कहना है कि शिक्षक केवल कक्षा में पढ़ाने का काम नहीं करते बल्कि उन्हें प्रशिक्षण चुनाव सर्वेक्षण परीक्षाओं और अन्य प्रशासनिक दायित्व भी निभाने पड़ते हैं। कई बार सरकारी कार्यों के कारण उन्हें विद्यालय से बाहर रहना पड़ता है। ऐसे में केवल मशीन के आधार पर अनुपस्थित मान लेना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

    विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा व्यवस्था में तकनीक का उपयोग समय की आवश्यकता है लेकिन इसके साथ मानवीय परिस्थितियों और तकनीकी सीमाओं का संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है। यदि सरकार और शिक्षक संगठन आपसी संवाद के माध्यम से व्यवहारिक समाधान निकालते हैं तो डिजिटल व्यवस्था अधिक प्रभावी और विवाद मुक्त बन सकती है। फिलहाल दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर कायम हैं और आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर आगे की रणनीति पूरे प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।

  • MP के 70 हजार शिक्षकों को TET से राहत दिलाने सुप्रीम कोर्ट जाएगी सरकार, स्कूल शिक्षा विभाग की नई कानूनी तैयारी

    MP के 70 हजार शिक्षकों को TET से राहत दिलाने सुप्रीम कोर्ट जाएगी सरकार, स्कूल शिक्षा विभाग की नई कानूनी तैयारी


    भोपाल । मध्यप्रदेश सरकार प्रदेश के करीब 70 हजार शिक्षकों को शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी टीईटी से राहत दिलाने के लिए एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रही है। स्कूल शिक्षा विभाग का मानना है कि वर्ष 2005 से 2009 के बीच नियुक्त हुए शिक्षकों ने पहले ही सरकारी चयन परीक्षा पास कर अपनी नियुक्ति हासिल की थी। ऐसे में उन्हें दोबारा शिक्षक पात्रता परीक्षा देने के लिए बाध्य करना न्यायसंगत नहीं होगा। इसी आधार पर राज्य सरकार जल्द ही सुप्रीम कोर्ट में नई याचिका दायर करने की तैयारी कर रही है।

    सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2025 के फैसले के बाद प्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग और जनजातीय कार्य विभाग के वर्ष 1998 से 2009 के बीच नियुक्त लगभग डेढ़ लाख शिक्षकों के लिए टीईटी पास करना अनिवार्य कर दिया गया था। इसके बाद लोक शिक्षण संचालनालय ने अप्रैल में निर्देश जारी करते हुए जुलाई और अगस्त में पात्रता परीक्षा आयोजित कराने की प्रक्रिया शुरू की। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जिन शिक्षकों की सेवा अवधि पांच वर्ष से कम बची है उन्हें परीक्षा से छूट मिलेगी जबकि अन्य सभी शिक्षकों के लिए टीईटी उत्तीर्ण करना अनिवार्य रहेगा। परीक्षा पास नहीं करने वाले शिक्षकों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि अदालत ने राहत देते हुए परीक्षा पास करने की अंतिम समय सीमा 31 अगस्त 2028 तक बढ़ा दी है।

    अब स्कूल शिक्षा विभाग का पूरा जोर वर्ष 2005 से 2009 के बीच नियुक्त हुए करीब 70 हजार शिक्षकों को राहत दिलाने पर है। विभाग का तर्क है कि इन शिक्षकों की भर्ती व्यापम के माध्यम से आयोजित प्रतियोगी परीक्षा के आधार पर हुई थी और चयन प्रक्रिया पूरी तरह सरकारी नियमों के अनुसार संपन्न हुई थी। इसलिए उन्हें दोबारा पात्रता परीक्षा देना आवश्यक नहीं माना जाना चाहिए।

    सूत्रों के अनुसार विधि विभाग और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ताओं से कानूनी सलाह लेने के बाद एक सप्ताह के भीतर नई याचिका दाखिल की जा सकती है। इसमें अदालत से अनुरोध किया जाएगा कि इन शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से छूट दी जाए क्योंकि वे पहले ही चयन प्रक्रिया पूरी कर नियमित नियुक्ति प्राप्त कर चुके हैं।

    हालांकि विभागीय अधिकारियों का यह भी मानना है कि सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने की संभावना बहुत अधिक नहीं है क्योंकि अदालत पहले ही इस विषय पर अपना स्पष्ट रुख जाहिर कर चुकी है। इसके बावजूद शिक्षकों के हितों को ध्यान में रखते हुए सरकार यह कानूनी प्रयास कर रही है। यदि अदालत राहत देती है तो पात्रता परीक्षा के दायरे में आने वाले लगभग आधे शिक्षकों को इसका सीधा लाभ मिलेगा।

    गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही टीईटी को लेकर 65 से अधिक पुनर्विचार याचिकाएं खारिज कर चुका है। अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी शिक्षकों का न्यूनतम शैक्षणिक मानकों को पूरा करना आवश्यक है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि शिक्षा का अधिकार कानून और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद के मानकों के अनुसार शिक्षक पात्रता परीक्षा शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता बनाए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

    अब सभी की निगाहें राज्य सरकार की नई याचिका और सुप्रीम कोर्ट के अगले फैसले पर टिकी हैं। यदि अदालत सरकार की दलीलों से सहमत होती है तो हजारों शिक्षकों को बड़ी राहत मिल सकती है। वहीं यदि याचिका खारिज होती है तो वर्ष 2005 से 2009 के बीच नियुक्त शिक्षकों को भी निर्धारित समय सीमा के भीतर टीईटी उत्तीर्ण करना अनिवार्य होगा।