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  • भोपाल में महाशिवरात्रि पर हुई पहली किन्नर शंकराचार्य की नियुक्ति, धर्मांतरित किन्नरों की घर वापसी

    भोपाल में महाशिवरात्रि पर हुई पहली किन्नर शंकराचार्य की नियुक्ति, धर्मांतरित किन्नरों की घर वापसी


    भोपाल में महाशिवरात्रि 2026 के पावन अवसर पर एक अनूठा और विवादित धार्मिक आयोजन हुआ। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में देश की पहली किन्नर शंकराचार्य का पट्टाभिषेक संपन्न हुआ, जिसमें हिमांगी सखी को नियुक्त किया गया। इस अवसर पर जगद्गुरु और महामंडलेश्वरों की घोषणा भी की गई।

    कार्यक्रम का आयोजन उस समय सुर्खियों में आया, जब धर्मांतरित किन्नरों की घर वापसी का भी आयोजन किया गया। इस दौरान कुछ मुस्लिम किन्नर वापस हिंदू धर्म में लौटे और शुद्धिकरण के rites संपन्न हुए। इस आयोजन के लिए राजस्थान के पुष्कर पीठ को देश की पहली विवादित किन्नर शंकराचार्य के लिए चुना गया।

    कार्यक्रम में किन्नर अखाड़ा के संस्थापक ऋषि अजय दास भी मौजूद रहे और उन्होंने इस आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हिमांगी सखी के शंकराचार्य बनने के बाद भव्य पट्टाभिषेक संपन्न हुआ और मंदिर परिसर में धार्मिक अनुष्ठान और मंत्रोच्चारण का माहौल देखने को मिला।

    हालांकि इस नियुक्ति को लेकर धार्मिक समुदाय में विवाद और आलोचना भी सामने आई। साधु संत सन्यासी समिति के कार्यकारी अध्यक्ष स्वामी अनिलानंद ने कहा कि किन्नरों की सनातन धर्म में वापसी को कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन अलग से किन्नर शंकराचार्य बनाना अत्यधिक आपत्तिजनक है। उनके अनुसार, धर्मशास्त्र में केवल चार शंकराचार्य ही मान्य हैं।

    स्वामी अनिलानंद ने आगे कहा कि ऋषि अजय दास इस मामले में पाखंड कर रहे हैं और धर्म का मजाक बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि किन्नरों और उनके नाम पर आर्थिक लाभ लेने का प्रयास किया गया है। इस पर शिकायत दर्ज कराई गई है और धर्म विरोधी कृत्यों और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के मामलों में वैधानिक कार्रवाई और गिरफ्तारी की मांग की गई है।

    इस आयोजन को लेकर सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों में भी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आई हैं। कुछ लोग इसे समावेशी धार्मिक पहल मान रहे हैं, जबकि कई धार्मिक विद्वान और समाजिक संगठन इसे धार्मिक परंपरा का उल्लंघन मान रहे हैं।

    भोपाल में आयोजित इस कार्यक्रम ने न केवल धार्मिक दृष्टि से चर्चाओं को जन्म दिया, बल्कि किन्नर समुदाय की धार्मिक पहचान और अधिकारों पर भी ध्यान आकर्षित किया। हिमांगी सखी के शंकराचार्य बनने की प्रक्रिया और धर्मांतरित किन्नरों की वापसी ने समाज में धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक बहस को एक नई दिशा दी है।

    साथ ही, यह मामला यह सवाल उठाता है कि परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए और धर्म के अधिकार और मर्यादा के बीच किस तरह की संवेदनशीलता बरती जाए।

  • महाशिवरात्रि पर CM डॉ. मोहन यादव ने भोपाल के बड़वाले महादेव में की विशेष पूजा, प्रदेश की खुशहाली की कामना

    महाशिवरात्रि पर CM डॉ. मोहन यादव ने भोपाल के बड़वाले महादेव में की विशेष पूजा, प्रदेश की खुशहाली की कामना


    भोपाल में महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपनी आस्था और भक्ति के प्रति गहरी श्रद्धा दिखाई। सुबह के समय मुख्यमंत्री भोपाल के प्राचीन और प्रसिद्ध बड़वाले महादेव मंदिर पहुंचे। यह मंदिर अपने प्राचीन ज्योतिर्लिंग के लिए जाना जाता है और महाशिवरात्रि के दिन यहाँ श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है।

    मुख्यमंत्री ने मंदिर में पहुँचते ही भगवान शिव के दर्शन किए और जलाभिषेक कर आराधना में लीन हो गए। उन्होंने प्रदेश की सुख-समृद्धि और खुशहाली के लिए विशेष प्रार्थना की। इस दौरान वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ रुद्राभिषेक और अन्य अनुष्ठान संपन्न हुए। मंदिर परिसर में मुख्यमंत्री की उपस्थिति ने श्रद्धालुओं के बीच उत्साह और भक्ति का माहौल और बढ़ा दिया।

    पूजा-अर्चना के दौरान CM डॉ. मोहन यादव ने भक्तों के साथ मिलकर ‘हर हर महादेव’ के जयकारे लगाए और सभी को महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं दी। उन्होंने कहा कि महाशिवरात्रि भगवान शिव की भक्ति, समर्पण और आत्मिक शक्ति का महापर्व है। मुख्यमंत्री ने भोलेनाथ से प्रार्थना की कि वे पूरे मध्य प्रदेश पर अपनी कृपा बनाए रखें और राज्य में शांति, समृद्धि एवं विकास का मार्ग प्रशस्त करें।

    महाशिवरात्रि के दिन प्रदेश भर में शिव मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखी गई। उज्जैन के महाकालेश्वर, ओंकारेश्वर और अन्य प्रमुख मंदिरों में भी लाखों श्रद्धालु दर्शन करने के लिए पहुंचे। भोपाल के बड़वाले महादेव मंदिर में सुबह से ही भक्तों की कतार लगी रही, और मुख्यमंत्री की उपस्थिति से मंदिर परिसर में विशेष धार्मिक उत्साह देखने को मिला।

    मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर कहा कि भगवान शिव की भक्ति में जीवन को सरल और सकारात्मक बनाने की शक्ति है। उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि वे अपने जीवन में संयम, धर्म और परस्पर सहयोग की भावना बनाए रखें। उन्होंने यह भी कहा कि महाशिवरात्रि केवल पूजा का पर्व नहीं है, बल्कि यह आध्यात्मिक जागरूकता और समाज में भाईचारे को बढ़ावा देने का अवसर भी है।

    प्रदेश में सरकार भी धार्मिक स्थलों के सुचारु संचालन और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए तैयारियों में लगी रही। बड़वाले महादेव मंदिर में सुरक्षा और व्यवस्थाओं का विशेष ध्यान रखा गया ताकि श्रद्धालुओं को बिना किसी परेशानी के दर्शन और पूजा का अवसर मिल सके।

    इस तरह महाशिवरात्रि 2026 पर CM डॉ. मोहन यादव की भक्ति, प्रदेश की खुशहाली की कामना और जनता के बीच सामूहिक उत्साह का अद्भुत नजारा देखने को मिला। यह पर्व न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि समाज में सकारात्मक ऊर्जा और आस्था का संदेश भी देता है।

  • महाशिवरात्रि पर बना दुर्लभ संयोग: 15 फरवरी को सर्वार्थ सिद्धि योग में करें रुद्राभिषेक, पूरी होगी हर मनोकामना!

    महाशिवरात्रि पर बना दुर्लभ संयोग: 15 फरवरी को सर्वार्थ सिद्धि योग में करें रुद्राभिषेक, पूरी होगी हर मनोकामना!


    नई दिल्ली। देवों के देव महादेव की आराधना का सबसे बड़ा पर्व ‘महाशिवरात्रि’ इस वर्ष 15 फरवरी 2026 को बेहद खास संयोगों के बीच मनाया जाएगा। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर आने वाला यह पर्व इस बार ‘सर्वार्थ सिद्धि योग’ और ‘श्रवण नक्षत्र’ के दुर्लभ मेल के साथ आ रहा है, जो आध्यात्मिक साधना और मनोकामना पूर्ति के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना जा रहा है।

    तिथि और निशीथ काल का महत्व

    पंचांग गणना के अनुसार, चतुर्दशी तिथि का आरंभ 15 फरवरी की शाम 5 बजकर 5 मिनट पर होगा और इसका समापन 16 फरवरी को शाम 5 बजकर 35 मिनट पर होगा। शास्त्रों के अनुसार, महाशिवरात्रि का व्रत उस दिन किया जाता है जिस दिन रात्रि के ‘निशीथ काल’ (मध्यरात्रि) में चतुर्दशी तिथि व्याप्त हो। इस आधार पर 15 फरवरी को ही मुख्य पर्व और उपवास रखा जाएगा।

    ज्योतिषीय संयोग: सर्वार्थ सिद्धि और श्रवण नक्षत्र

    इस वर्ष महाशिवरात्रि पर ज्योतिषीय गणनाएं विशेष फलदायी हैं। 15 फरवरी की रात 7 बजकर 48 मिनट तक उत्तराषाढ़ा नक्षत्र रहेगा, जिसके उपरांत ‘श्रवण नक्षत्र’ प्रारंभ होगा। श्रवण नक्षत्र को शिव उपासना के लिए शास्त्रों में ‘सिद्ध नक्षत्र’ माना गया है। इसके साथ ही सर्वार्थ सिद्धि योग का होना इस दिन किए गए दान, तप और अभिषेक के फल को अनंत गुना बढ़ा देता है।

    पूजन विधि और अभिषेक का विधान
    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महाशिवरात्रि भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह का उत्सव है। इस दिन श्रद्धालु प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर व्रत का संकल्प लेते हैं। पूजन की मुख्य विधि में शिवलिंग का पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल) से अभिषेक करना अनिवार्य माना गया है। भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी पत्र और आक के पुष्प अर्पित किए जाते हैं। विवाहित महिलाएं माता पार्वती को श्रृंगार की सामग्री अर्पित कर अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं।

    चार प्रहर की पूजा और रात्रि जागरण
    महाशिवरात्रि पर रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। बहुत से श्रद्धालु रात भर जागकर चार प्रहर की पूजा संपन्न करते हैं। माना जाता है कि इस रात शिव तत्व पृथ्वी के अत्यंत निकट होता है, इसलिए की गई साधना सीधे महादेव तक पहुँचती है। देश के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों और शिवालयों में सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के लिए अभी से तैयारियां तेज कर दी गई हैं। प्रशासन को उम्मीद है कि इस विशेष योग के कारण मंदिरों में श्रद्धालुओं की संख्या पिछले वर्षों की तुलना में अधिक हो सकती है।