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  • Russia: पुतिन की पार्टी फिर बहुमत की ओर…! ससदीय चुनाव में मिले 57.54% से अधिक वोट

    Russia: पुतिन की पार्टी फिर बहुमत की ओर…! ससदीय चुनाव में मिले 57.54% से अधिक वोट


    मास्को।
    रूस (Russia) में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (President Vladimir Putin) की पार्टी को एक बार फिर से स्पष्ट बहुमत मिलने के आसार हैं। पुतिन लंबे समय से रूस की सत्ता पर काबिज हैं। इस वर्ष कराए गए चुनाव में भी पार्टी के समर्थकों ने बंपर वोटिंग (Massive Voter turnout) की है। केंद्रीय चुनाव आयोग (Central Election Commission) की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिक पुतिन की पार्टी- यूनाइटेड रूस (Putin’s Party – United Russia) को 57 प्रतिशत से अधिक वोट मिले हैं। अंतिम आंकड़े आने पर वोट प्रतिशत में बदलाव संभव है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की नीतियों का विरोध लगभग नदारद रहा। क्रेमलिन का वर्चस्व मजबूत होने की उम्मीद है। मतदान में धांधली और इलेक्ट्रॉनिक मतदान में समस्याओं की रिपोर्ट्स भी सामने आईं।


    चुनाव नतीजों में क्या खास, किस दल का कैसा प्रदर्शन?

    रूस के केंद्रीय निर्वाचन आयोग ने रविवार देर रात (रूसी समय) जारी एक बयान में कहा, चुनाव के शुरुआती परिणाम आ गए हैं। सत्तारूढ़ दल- यूनाइटेड रूस को 57.54% से अधिक वोट मिले हैं। इन प्रारंभिक नतीजों के आधार पर माना जा रहा है कि पुतिन की सत्ता पर पकड़ और मजबूत होगी। खास बात ये भी है कि यूक्रेन के साथ वर्ष 2022 में शुरू हुए सैन्य टकराव के बाद पहली बार आम चुनाव कराए गए हैं।

    रूस के केंद्रीय चुनाव आयोग ने बताया कि मतदान शुक्रवार को 11 करोड़ 10 लाख पात्र मतदाताओं के लिए शुरू हुआ था। इसमें यूक्रेन के उन चार क्षेत्रों के निवासी भी शामिल थे, जिन्हें मॉस्को ने युद्ध के बाद अवैध रूप से अपने साथ मिलाया था, पर अभी भी उन पर पूर्ण नियंत्रण नहीं है। क्रीमिया के निवासी भी मतदान में शामिल थे, जिसे रूस ने 2014 में अवैध रूप से अपने साथ मिलाया था। कीव और यूरोपीय संघ ने रूसी-नियंत्रित क्षेत्रों में हुए मतदान को अवैध बताया। उन्होंने विदेशी सरकारों से परिणामों को मान्यता न देने का आग्रह किया। रूस और यूक्रेन के रूसी-नियंत्रित क्षेत्रों में मतदान समाप्त होने के बाद भी, पश्चिमी समय क्षेत्रों में दूतावासों और वाणिज्य दूतावासों में मतदान जारी रहा। क्रेमलिन इस संसदीय चुनाव को युद्ध के लिए जन समर्थन दिखाने और अपनी कार्रवाई को वैध बनाने के लिए इस्तेमाल करना चाहता है।


    क्रेमलिन की मुख्य पार्टी को भारी बहुमत

    प्रारंभिक परिणामों से पता चला है कि चार अन्य पार्टियां जो लगभग हमेशा क्रेमलिन के पक्ष में मतदान करती हैं, संसद के निचले सदन- स्टेट ड्यूमा में उनकी वापसी तय है। केंद्रीय चुनाव आयोग के अनुसार लगभग 58% मतदान केंद्रों की गिनती हो चुकी है। पार्टी सूचियों के आधार पर आवंटित 225 सांसदों में से यूनाइटेड रूस को लगभग 58% वोट मिले हैं।

    225 अन्य सांसदों का चुनाव एकल-सीट चुनावों में होगा, यूनाइटेड रूस उनमें भी अधिकांश सीटें जीतने की स्थिति में है। इस चुनाव में अधिकांश विपक्षी दलों को चुनाव लड़ने से रोक दिया गया, और यह चुनाव सोवियत काल के बाद से रूस में सबसे कठोर राजनीतिक दमन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के उल्लंघन के माहौल में हुआ।

    क्रेमलिन ने असंतोष को दबाकर राजनीतिक जोखिमों से बचने की कोशिश की है। एक बड़े राज्य मीडिया अभियान और वास्तविक विपक्ष की अनुपस्थिति में चुनाव पर कड़ा नियंत्रण क्रेमलिन को रूसी राजनीति पर अपनी पकड़ बनाए रखने में मदद करेगा। यह बढ़ती आर्थिक लागतों और यूक्रेनी ड्रोन हमलों के बीच हो रहा है। मतदाताओं ने दो अलग-अलग मतपत्र डाले, जिससे डूमा की आधी सीटें भरी गईं। बाकी सीटों पर एकल-सीट निर्वाचन क्षेत्रों में व्यक्तिगत उम्मीदवारों को चुना गया। मुख्य क्रेमलिन पार्टी, यूनाइटेड रूस, से निचले सदन, स्टेट डूमा पर अपना भारी नियंत्रण बनाए रखने की उम्मीद है। ‘सिस्टेमिक विपक्ष’ की छोटी पार्टियां भी अपनी उपस्थिति बनाए रखेंगी।


    क्या क्रेमलिन का नियंत्रण मजबूत होगा?

    क्रेमलिन इस संसदीय चुनाव को युद्ध के लिए जन समर्थन दिखाने का माध्यम मानता है, जो 2022 में यूक्रेन पर पूर्ण पैमाने पर आक्रमण के बाद पहला चुनाव है। यह अपनी कार्रवाई को वैध बनाने का भी प्रयास कर रहा है। उसने किसी भी असंतोष को दबाकर राजनीतिक जोखिमों से बचने की कोशिश की है। एक बड़े राज्य मीडिया अभियान और वास्तविक विपक्ष की अनुपस्थिति में चुनाव पर कड़ा नियंत्रण है। यह क्रेमलिन को रूसी राजनीति पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखने में मदद करेगा। यह बढ़ती आर्थिक लागतों और यूक्रेनी ड्रोन हमलों के बीच हो रहा है। मतदाता डूमा की 450 सीटों के लिए दो अलग-अलग मतपत्र डालते हैं; आधे सीटों के लिए राजनीतिक दल चुने जाते हैं, जबकि बाकी के लिए व्यक्तिगत उम्मीदवार। मुख्य क्रेमलिन पार्टी, यूनाइटेड रूस, से निचले सदन, स्टेट डूमा पर अपना भारी नियंत्रण बनाए रखने की उम्मीद है। ‘सिस्टेमिक विपक्ष’ की छोटी पार्टियां भी अपनी उपस्थिति बनाए रखेंगी।


    मॉस्को में इलेक्ट्रॉनिक मतदान में क्या समस्याएं आईं?

    रूस के केंद्रीय चुनाव आयोग की प्रमुख एला पामफिलोवा ने रविवार को बताया कि मॉस्को में इलेक्ट्रॉनिक मतदान प्रणाली को साइबर हमलों का निशाना बनाया गया। उन्होंने इसके लिए ‘सिस्टेमिक पार्टियों’ में से एक को दोषी ठहराया, पर किसी का नाम नहीं लिया। एक स्वतंत्र रूसी समाचार आउटलेट- सोता विजन, ने रविवार को मॉस्को के मतदान केंद्रों पर इलेक्ट्रॉनिक पंजीकरण प्रणाली में तकनीकी खराबी की सूचना दी। आउटलेट ने टेलीग्राम पर बताया कि लोगों को कागजी मतपत्र नहीं दिए गए, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक टर्मिनल से मतदान करने को कहा गया। दिवंगत रूसी विपक्षी नेता एलेक्सी नवालनी के करीबी सहयोगी लियोनिद वोल्कोव ने सुझाव दिया कि कागजी मतपत्र प्रणाली का खराब होना जानबूझकर किया गया हो सकता है। इसका उद्देश्य मतदाताओं को इलेक्ट्रॉनिक मतदान की ओर धकेलना था। उन्होंने रविवार को एक्स पर ‘कागजी मतपत्र की मांग करें!’ लिखा। कई मतदाताओं ने इलेक्ट्रॉनिक मतदान से इनकार कर दिया, जिससे मतदान केंद्रों के बाहर कतारें लग गईं। यबलोको पार्टी के नेता निकोलाई राइबाकोव ने सेंट पीटर्सबर्ग में एक मतपत्र डाला, जिस पर ‘स्वतंत्रता के लिए,’ ‘शांति के लिए,’ और ‘यबलोको’ लिखा देखा गया।


    विदेशों में रूसी विपक्ष ने कैसे विरोध किया?

    एलेक्सी नवालनी की विधवा यूलिया नवालनाया सहित रूस के निर्वासित विपक्ष ने युद्ध-विरोधी रूसियों से रविवार दोपहर मतदान करने का आह्वान किया। आर्मेनिया में रहने वाले हजारों रूसियों ने मतदान में भाग लिया। वे राजधानी येरेवन में रूसी दूतावास के बाहर कतार में खड़े थे। उनमें से कुछ ‘शांतिपूर्ण रूस के लिए दोपहर’ नामक युद्ध-विरोधी प्रदर्शन में शामिल हुए। उन्होंने युद्ध-विरोधी और पुतिन-विरोधी पोस्टर पकड़े हुए थे। पत्रकार मार्क पोडबेरेज़िन ने कहा कि येरेवन में चुनाव आयोग के सदस्यों ने ऐसी टिप्पणियां कीं जो ‘खुले तौर पर डराने-धमकाने’ वाली थीं। उन्होंने सुना था कि ‘आपको देर-सबेर रूस लौटना होगा, इसे ध्यान में रखें।’ लिडिया क्लिमेंको ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि उनके वोट का कोई वास्तविक प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने कहा कि सबसे उपयोगी काम ‘अन्य लोगों को देखना था जो युद्ध के खिलाफ हैं, एक साझा उद्देश्य में एक साथ होना।’ जर्मनी में, मतदाताओं ने बर्लिन में रूसी दूतावास में अपने मतपत्र डाले। असंतुष्ट और ओपन रूस समूह के पूर्व प्रमुख आंद्रेई पिवोवारोव ने इमारत के बाहर एकत्रित विरोध प्रदर्शन को संबोधित किया।

  • मॉनसून सत्र में अहम बिल पास कराने की तैयारी….बहुमत के लिए विपक्षी दलों से दोस्ती बढ़ा रही सरकार!

    मॉनसून सत्र में अहम बिल पास कराने की तैयारी….बहुमत के लिए विपक्षी दलों से दोस्ती बढ़ा रही सरकार!


    नई दिल्ली।
    संसद (Parliament) के मॉनसून सत्र (Monsoon Session) के पहले सरकार ने विपक्षी खेमे के कई दलों के साथ दोस्ती बढ़ा दी है। सत्र के दौरान संविधान संशोधन (Constitutional Amendment) समेत विभिन्न विधेयकों पर समर्थन की संभावना वाले इन दलों के खिलाफ भाजपा या उसके किसी घटक दल की तरफ से न तो कोई आरोप लगाया जाएगा और न ही कोई विवादित बयान दिए जाएंगे। एनडीए के सभी दलों के नेताओं को कहा गया है कि वे कांग्रेस और सपा के अलावा विपक्ष के अन्य सभी दलों के खिलाफ बयानबाजी से परहेज करें।

    सरकार को इस सत्र में महिला आरक्षण और उससे जुड़ा परिमीमन संबंधी संविधान संशोधन विधेयक लाना है। इसके लिए दो तिहाई सांसदों का समर्थन जरूरी है। सरकार ने लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत का आंकड़ा जुटा लिया है। इसके लिए उसके नेताओं ने विपक्ष के द्रमुक और एनसीपी (एसपी) जैसे दलों के नेताओं से जरूरी आश्वासन भी लिया है। सरकार ने अपने घटक दलों के सभी प्रमुख नेताओं, जिनमें केंद्रीय मंत्री भी शामिल हैं, उन्हें निर्देश दिए हैं। उन्हें कहा है कि द्रमुक और एनसीपी (एसपी) को लेकर भी कोई बयान न दें। महिला आरक्षण विधेयक पर कांग्रेस की तरह सपा से सरकार को ज्यादा उम्मीद नहीं है। सपा को लेकर सरकार के प्रबंधक अलग रणनीति को अंजाम दे सकते हैं।

    सोमवार से शुरू होने जा रहे मॉनसून सत्र के हंगामेदार होने के आसार हैं। जहां एक ओर सरकार पूर्व सत्र में पारित न हो पाए परिसीमन संबंधित संविधान संशोधन विधेयक सहित कई महत्वपूर्ण विधेयक लाने की तैयारी कर रही है, वहीं विपक्ष पेपर लीक समेत कई मुद्दों पर सरकार को घेरने की रणनीति बना रहा है। कुछ विपक्षी दलों में टूट के कारण बने नए राजनीतिक समीकरणों के बीच संसद का नया सत्र शुरू होने जा रहा है।


    सर्वदलीय बैठक आज, तृणमूल बागी गुट को न्योता

    संसद के मॉनसून सत्र से पहले सरकार ने रविवार को सर्वदलीय बैठक बुलाई है। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इस बैठक में शामिल होने के लिए तृणमूल कांग्रेस के बागी गुट को भी न्योता दिया है। सुदीप बंदोपाध्याय को लिखे पत्र में रिजिजू ने माना कि तृणमूल के बागी 20 सांसदों के इस समूह ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से एनसीपीआई के रूप में मान्यता देने का अनुरोध किया है।


    खरगे ने सिब्बल को विपक्ष की बैठक में आमंत्रित किया

    निर्दलीय राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल ने शनिवार को नई दिल्ली में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से मुलाकात की। खरगे ने सिब्बल को सोमवार को होने वाली संसद के विपक्षी नेताओं की रणनीति बैठक में शामिल होने का न्योता दिया है।

  • राज्यसभा चुनाव में NDA का दबदबा, 27 में 19 सीटें जीतकर ऊपरी सदन में बढ़ाई ताकत; INDIA गठबंधन को बड़ा राजनीतिक झटका

    राज्यसभा चुनाव में NDA का दबदबा, 27 में 19 सीटें जीतकर ऊपरी सदन में बढ़ाई ताकत; INDIA गठबंधन को बड़ा राजनीतिक झटका


    नई दिल्ली ।
    10 राज्यों की 27 राज्यसभा सीटों पर हुए चुनाव के नतीजों ने देश की संसदीय राजनीति में नया समीकरण खड़ा कर दिया है। चुनाव परिणामों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने प्रभावशाली प्रदर्शन करते हुए 19 सीटों पर जीत दर्ज की है, जबकि विपक्षी INDIA गठबंधन को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। इन नतीजों ने संसद के उच्च सदन में सत्तारूढ़ गठबंधन की स्थिति को और अधिक मजबूत कर दिया है।

    राज्यसभा चुनाव के परिणामों को राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इनके जरिए आगामी विधायी और राजनीतिक रणनीतियों की दिशा तय होने की संभावना है। चुनाव परिणामों के बाद 245 सदस्यीय राज्यसभा में NDA की संख्या बढ़कर 152 तक पहुंच गई है। यह आंकड़ा गठबंधन को पहले की तुलना में अधिक प्रभावशाली स्थिति प्रदान करता है और महत्वपूर्ण विधेयकों पर उसकी रणनीतिक क्षमता को मजबूत बनाता है।

    विपक्षी INDIA गठबंधन को इस चुनाव में केवल पांच सीटों पर सफलता मिली। चुनाव से पहले विपक्ष को कुछ राज्यों में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद थी, लेकिन अंतिम परिणाम उसके पक्ष में नहीं रहे। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह परिणाम विपक्षी एकजुटता और चुनावी प्रबंधन के लिए एक चुनौती के रूप में देखा जाएगा।

    चुनाव के सबसे चर्चित परिणामों में झारखंड का नाम प्रमुखता से सामने आया। यहां राज्यसभा की दोनों सीटों पर मुकाबला राजनीतिक हलकों में विशेष चर्चा का विषय बना रहा। एक सीट पर झारखंड मुक्ति मोर्चा के उम्मीदवार ने जीत दर्ज की, जबकि दूसरी सीट पर NDA समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार ने विपक्षी खेमे को बड़ा झटका देते हुए विजय हासिल की। इस परिणाम ने राज्य की राजनीति में नई चर्चाओं को जन्म दिया है और विपक्षी दलों के भीतर भी रणनीतिक समीक्षा की जरूरत महसूस की जा रही है।

    झारखंड का परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि विधानसभा में संख्याबल को देखते हुए विपक्षी गठबंधन को बेहतर स्थिति में माना जा रहा था। इसके बावजूद चुनावी गणित और समर्थन जुटाने की रणनीति ने अंतिम परिणाम को प्रभावित किया। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इस जीत ने यह संकेत दिया है कि राज्यसभा चुनावों में केवल संख्याबल ही नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रबंधन भी निर्णायक भूमिका निभाता है।

    मध्य प्रदेश में भी एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम देखने को मिला। यहां संभावित मुकाबले की चर्चा के बीच विपक्षी उम्मीदवार की उम्मीदवारी निरस्त हो जाने के बाद एक सीट पर सत्तारूढ़ दल को निर्विरोध लाभ मिला। इससे NDA के कुल प्रदर्शन को अतिरिक्त मजबूती मिली और राज्यसभा में उसकी संख्या बढ़ाने में सहायता मिली।

    चुनाव परिणामों के बाद अब राजनीतिक चर्चा इस बात पर केंद्रित है कि उच्च सदन में सत्तारूढ़ गठबंधन की बढ़ती ताकत का असर आगामी संसदीय सत्रों पर किस प्रकार पड़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि NDA को कुछ क्षेत्रीय और तटस्थ दलों का समर्थन मिलता रहा तो कई महत्वपूर्ण विधेयकों और नीतिगत प्रस्तावों को पारित कराने की प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक आसान हो सकती है।

    राजनीतिक दृष्टि से यह चुनाव केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आगामी राष्ट्रीय राजनीति के संकेत भी देता है। राज्यसभा में मजबूत स्थिति किसी भी सरकार के लिए विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऐसे में हालिया परिणामों को सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए रणनीतिक बढ़त के रूप में देखा जा रहा है।

    विश्लेषकों का मानना है कि इन नतीजों के बाद विपक्षी दलों को अपने संगठनात्मक ढांचे, समन्वय और चुनावी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है। वहीं NDA के लिए यह परिणाम राजनीतिक आत्मविश्वास बढ़ाने वाला साबित हुआ है, जिसने उच्च सदन में उसकी स्थिति को पहले से अधिक मजबूत कर दिया है।

  • बदलेगा संसद का स्वरूप…! लोकसभा में महिलाओं के लिए 273 सीटें बढ़ाने की तैयारी… 409 होगा बहुमत का आंकड़ा?

    बदलेगा संसद का स्वरूप…! लोकसभा में महिलाओं के लिए 273 सीटें बढ़ाने की तैयारी… 409 होगा बहुमत का आंकड़ा?


    नई दिल्ली।
    सरकार (Government) संसद (Parliament) के मौजूदा सत्र में महिला आरक्षण (Women’s Reservation) को लागू करने के लिए कम से कम दो विधेयक (Bills) (संविधान संशोधन सहित) पेश करने की तैयारी कर रही है। इसके तहत अगले लोकसभा (Lok Sabha) और उसके बाद होने वाले विधानसभा चुनावों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई (33%) सीटें आरक्षित की जाएंगी। इस कदम से देश का राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह से बदलने की उम्मीद है।


    लोकसभा की सीटों में 50% का इजाफा

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार की योजना के अनुसार लोकसभा की कुल सीटें मौजूदा 543 से बढ़ाकर 816 की जा सकती हैं। यानी 273 नई सीटें जोड़ी जाएंगी, जिनमें से अधिकांश महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इससे संसद में बहुमत का आंकड़ा भी बढ़कर 409 हो जाएगा।

    यह वृद्धि पिछले पांच दशकों में पहली बार होगी। इससे मौजूदा पुरुष सांसदों की राजनीतिक स्थिति पर कोई खतरा नहीं मंडराएगा। राज्यसभा और राज्यों की विधान परिषदों की सदस्य संख्या पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।


    परिसीमन और 2011 की जनगणना का इस्तेमाल

    2023 में पारित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ में महिला आरक्षण को नई जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन से जोड़ा गया था। अब सरकार इस प्रावधान को अलग कर रही है। नई जनगणना के आंकड़ों में समय लग सकता है, इसलिए सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर ही नया परिसीमन कराने पर विचार कर रही है ताकि 31 मार्च 2029 के बाद होने वाले चुनावों में यह कोटा लागू किया जा सके।


    राज्यों और SC/ST सीटों पर असर

    दक्षिण भारतीय राज्यों की यह चिंता थी कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन के कारण संसद में उनका प्रतिनिधित्व घट सकता है। सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि हर राज्य की सीटों में 50% की वृद्धि होगी, जिससे उनका आनुपातिक प्रतिनिधित्व बरकरार रहेगा।
    उत्तर प्रदेश: सीटें 80 से बढ़कर 120 हो जाएंगी।
    बिहार: सीटें 40 से बढ़कर 60 हो जाएंगी।
    केरल: सीटें 20 से बढ़कर 30 हो जाएंगी।

    इसी अनुपात में अनुसूचित जाति (SC) की सीटें 84 से बढ़कर 126 और अनुसूचित जनजाति (ST) की सीटें 47 से बढ़कर 70 हो जाने का अनुमान है। छोटे राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों (जहां केवल 1 या 2 सीटें हैं) में हर तीसरे चुनाव में महिलाओं के लिए रोटेशन के आधार पर सीट आरक्षित की जाएगी।


    राजनीतिक सरगर्मी और आगे की राह

    सरकार 4 अप्रैल को समाप्त हो रहे बजट सत्र में ही इन विधेयकों को पारित कराने की इच्छुक है। यदि सहमति बनाने में कुछ और दिन लगते हैं, तो बजट सत्र को बढ़ाया जा सकता है या महिलाओं के कोटे के लिए एक विशेष छोटा सत्र भी बुलाया जा सकता है।


    अमित शाह की बैठकें

    संविधान संशोधन के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, जो NDA के पास अकेले नहीं है। इसलिए गृह मंत्री अमित शाह समर्थन जुटाने के लिए बैठकें कर रहे हैं। उन्होंने NDA के सहयोगियों के साथ-साथ सपा, शिवसेना (UBT), बीजेडी और YSR कांग्रेस जैसे विपक्षी और गैर-गठबंधन दलों के साथ भी चर्चा की है।

    कांग्रेस और वामपंथी दलों ने इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने अमित शाह की बैठक से किनारा कर लिया। वहीं, कांग्रेस और सपा जैसी पार्टियां महिला कोटे के भीतर अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए अलग से आरक्षण की मांग कर रही हैं।