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  • बंगाल में TMC की अंदरूनी कलह के बीच मुस्लिम विधायक की घर वापसी, ममता के नेतृत्व में फिर जताया भरोसा

    बंगाल में TMC की अंदरूनी कलह के बीच मुस्लिम विधायक की घर वापसी, ममता के नेतृत्व में फिर जताया भरोसा

    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही खींचतान के बीच पार्टी को एक महत्वपूर्ण राजनीतिक बढ़त मिली है। उत्तर 24 परगना जिले की आमडांगा विधानसभा सीट से विधायक कासेम सिद्दीकी ने बागी गुट छोड़कर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले खेमे में वापस लौटने की घोषणा की है। वापसी के बाद सिद्दीकी ने ममता बनर्जी के प्रति अपनी राजनीतिक निष्ठा दोहराते हुए कहा कि उनके लिए दीदी ही सब कुछ हैं।

    कासेम सिद्दीकी की वापसी ऐसे समय हुई है जब विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस में आंतरिक मतभेद सामने आए हैं। पार्टी के कई विधायकों ने ममता बनर्जी के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए अलग गुट का रुख किया था। इस गुट के साथ बड़ी संख्या में विधायक जुड़े थे और पार्टी नेतृत्व के खिलाफ राजनीतिक मोर्चा खोलने की कोशिश हुई थी।

    सिद्दीकी भी कुछ समय के लिए इसी बागी गुट के साथ थे। हालांकि अब उन्होंने वहां से अलग होकर ममता बनर्जी के साथ बने रहने का फैसला किया है। उन्होंने अपने निर्णय के पीछे की वजह बताते हुए कहा कि उन्हें बागी गुट के उद्देश्य को लेकर अलग जानकारी दी गई थी।

    सिद्दीकी के अनुसार, उन्हें बताया गया था कि कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर लिए जा रहे हैं और ये दस्तावेज ममता बनर्जी तक पहुंचाए जाएंगे। उन्हें यह भी बताया गया था कि बागी गुट ममता बनर्जी के नेतृत्व में ही काम करेगा। लेकिन बाद में जब उन्होंने गुट की गतिविधियों को देखा तो उन्हें वहां तृणमूल कांग्रेस प्रमुख के नेतृत्व या भूमिका का स्पष्ट उल्लेख दिखाई नहीं दिया।

    इसके बाद उन्होंने बागी गुट से अलग होने का फैसला किया। सिद्दीकी ने कहा कि उन्हें ममता बनर्जी ने टिकट दिया और उनके नेतृत्व में ही वह विधानसभा तक पहुंचे। उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव के दौरान उन्होंने ममता बनर्जी की तस्वीर के साथ लोगों के बीच जाकर समर्थन मांगा था और मतदाताओं ने भी उनके नेतृत्व को ध्यान में रखते हुए उन्हें समर्थन दिया।

    कासेम सिद्दीकी का राजनीतिक प्रभाव केवल उनके विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं माना जाता। उनका संबंध हुगली जिले के फुरफुरा शरीफ से जुड़े धार्मिक और सामाजिक प्रभाव वाले समुदाय से है। मुस्लिम समुदाय के बीच उनकी पकड़ को देखते हुए उनकी राजनीतिक स्थिति तृणमूल कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। पिछले साल पार्टी में शामिल होने के बाद उन्हें संगठन में राज्य महासचिव की जिम्मेदारी भी दी गई थी।

    इसके बाद विधानसभा चुनाव में उन्हें आमडांगा सीट से उम्मीदवार बनाया गया और उन्होंने जीत दर्ज की। अब उनका ममता बनर्जी के खेमे में लौटना पार्टी के भीतर चल रही गुटबाजी के बीच महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।

    हालांकि कासेम सिद्दीकी की वापसी के बावजूद तृणमूल कांग्रेस में अंदरूनी विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। पार्टी के दोनों पक्षों के बीच संगठनात्मक गतिविधियों को लेकर मतभेद बने हुए हैं। तृणमूल छात्र परिषद के स्थापना दिवस को लेकर भी दोनों गुटों की ओर से अलग-अलग तैयारियां की जा रही हैं।

    28 अगस्त को मेयो रोड पर गांधी प्रतिमा के पास छात्र परिषद का स्थापना दिवस मनाने को लेकर विवाद सामने आया है। दोनों पक्षों ने कार्यक्रम की अनुमति के लिए अदालत का रुख किया है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला खेमे पारंपरिक स्थान पर कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति चाहता है।

    ऐसे समय में कासेम सिद्दीकी की वापसी को पार्टी नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनकी वापसी यह संकेत देती है कि बागी खेमे के भीतर भी सभी विधायक एकजुट नहीं हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही गुटबाजी किस दिशा में जाती है और कितने अन्य नेता या विधायक ममता बनर्जी के नेतृत्व में वापस आते हैं।

  • अमित शाह ने सीमा सुरक्षा पर जवानों से की चर्चा, बंगाल में BSF के लिए जमीन उपलब्ध कराने का दावा किया

    अमित शाह ने सीमा सुरक्षा पर जवानों से की चर्चा, बंगाल में BSF के लिए जमीन उपलब्ध कराने का दावा किया


    नई दिल्ली । 
    केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह शुक्रवार को पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी पहुंचे, जहां उन्होंने दो दिवसीय दौरे के दौरान सीमा सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर सुरक्षा बलों के अधिकारियों और जवानों से चर्चा की। बागडोगरा एयरपोर्ट पहुंचने के बाद उनका स्वागत राज्य के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने किया। इसके बाद अमित शाह एसएसबी कैंप पहुंचे और जवानों से मुलाकात की।

    एसएसबी कैंप में गृह मंत्री ने सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था, ऑपरेशनल तैयारियों और बॉर्डर मैनेजमेंट से संबंधित विभिन्न विषयों की जानकारी ली। उन्होंने सीमा क्षेत्रों में तैनात जवानों की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि देश की सीमाओं की सुरक्षा में सुरक्षा बलों का योगदान महत्वपूर्ण है। उन्होंने जवानों के साथ संवाद करते हुए सीमा पर आने वाली चुनौतियों और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया।

    इसी दौरान अमित शाह ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर भी राजनीतिक निशाना साधा। उन्होंने कहा कि जब वह पहले गृह मंत्री के तौर पर जिम्मेदारी संभाल रहे थे, तब ममता बनर्जी को सशस्त्र सीमा बल के कार्यक्रमों में आमंत्रित किया जाता था, लेकिन वह इन कार्यक्रमों में शामिल नहीं हुईं। शाह ने सुरक्षा बलों के साथ राज्य सरकार के समन्वय को महत्वपूर्ण बताते हुए अपनी बात रखी।

    अमित शाह ने पश्चिम बंगाल में सीमा सुरक्षा के लिए जमीन उपलब्ध कराने के मुद्दे को भी प्रमुखता से उठाया। उन्होंने दावा किया कि राज्य में सीमा सुरक्षा बल के लिए 1,129 एकड़ जमीन उपलब्ध कराई गई है। उनके मुताबिक, सीमा सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए 29 एकड़ अतिरिक्त जमीन भी जल्द उपलब्ध कराई जाएगी।

    गृह मंत्री ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार अंतरराष्ट्रीय सीमा के संवेदनशील हिस्सों में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने और बाड़ लगाने की दिशा में लगातार काम करना चाहती थी, लेकिन राज्य स्तर पर जमीन उपलब्ध नहीं होने के कारण कुछ स्थानों पर काम प्रभावित हुआ। उन्होंने मौजूदा सरकार द्वारा जमीन उपलब्ध कराने को सीमा सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण कदम बताया।

    अमित शाह के सिलीगुड़ी दौरे का राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर महत्व माना जा रहा है। उत्तर बंगाल का यह क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय सीमाओं और रणनीतिक दृष्टि से संवेदनशील इलाकों के नजदीक है। ऐसे में गृह मंत्री के दौरे के दौरान सीमा प्रबंधन, घुसपैठ और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े विषयों पर चर्चा होना महत्वपूर्ण रहा।

    दौरे के दौरान अमित शाह सिलीगुड़ी के कावाखाली मैदान में आयोजित कार्यक्रम में भी शामिल होंगे। यहां वह आपराधिक प्रक्रिया से संबंधित प्रदर्शनी का उद्घाटन करेंगे। इसके बाद उनकी पार्टी की बैठक में शामिल होने की भी योजना है। शुक्रवार रात उनके सुकना स्थित एक होटल में ठहरने का कार्यक्रम है।

    शनिवार को गृह मंत्री पहाड़ी जिलों से जुड़े विभिन्न मुद्दों को लेकर बैठक करेंगे। इसके बाद उनका दिल्ली लौटने का कार्यक्रम है। उनके दौरे में सुरक्षा व्यवस्था के साथ उत्तर बंगाल के पहाड़ी क्षेत्रों से जुड़े विषयों को भी प्रमुखता मिलने की संभावना है।

    पश्चिम बंगाल में सीमा सुरक्षा और घुसपैठ लंबे समय से राजनीतिक बहस के प्रमुख मुद्दे रहे हैं। अमित शाह के ताजा दौरे में इन विषयों के साथ राज्य सरकार और केंद्र के बीच समन्वय का मुद्दा भी सामने आया। सिलीगुड़ी में उनकी गतिविधियों के बाद आने वाले समय में सीमा सुरक्षा और उत्तर बंगाल से जुड़े राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा और तेज होने की संभावना है।

  • टीएमसी कार्यकर्ता के परिवार से मिलने पहुंचीं ममता, विरोध के बीच बीजेपी पर लगाए गंभीर आरोप

    टीएमसी कार्यकर्ता के परिवार से मिलने पहुंचीं ममता, विरोध के बीच बीजेपी पर लगाए गंभीर आरोप

    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल के हलीसहर में रविवार को पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को विरोध का सामना करना पड़ा। वह कथित पुलिस हिरासत में जान गंवाने वाले तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ता के परिवार से मिलने पहुंची थीं। इसी दौरान स्थानीय लोगों के एक समूह ने उनके काफिले को रोक दिया। विरोध के दौरान उनकी कार पर कीचड़ लगाने, जूते-चप्पल फेंकने और पत्थरबाजी किए जाने के आरोप सामने आए हैं।

    घटना के दौरान प्रदर्शनकारियों ने ममता बनर्जी के खिलाफ नारेबाजी भी की। उनके खिलाफ ‘चोर-चोर’ जैसे नारे लगाए जाने की बात सामने आई है। जब तक उनका वाहन मौके पर रुका रहा, विरोध प्रदर्शन जारी रहा। इस घटनाक्रम के बाद इलाके में राजनीतिक तनाव की स्थिति बन गई।

    ममता बनर्जी ने घटना के लिए भारतीय जनता पार्टी को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शन स्थानीय ग्रामीणों की ओर से नहीं किया गया, बल्कि बाहर से लोगों को लाकर विरोध कराया गया। उनके अनुसार प्रदर्शनकारियों ने उनकी कार पर बड़े पत्थर और ईंटें फेंकीं तथा अपशब्दों का इस्तेमाल किया।

    ममता ने कहा कि वह उस परिवार से मिलने गई थीं, जिसके सदस्य की पुलिस हिरासत में मौत हुई है। उनका आरोप है कि परिवार के सदस्यों को भी डराने और धमकाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि परिवार से मिलने का उन्होंने वादा किया था और उसी के तहत वह वहां पहुंची थीं।

    पूर्व मुख्यमंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस की मौजूदगी में उनकी गाड़ी पर पत्थर फेंके गए। उन्होंने कहा कि सुरक्षा व्यवस्था की स्थिति चिंताजनक रही और पुलिस के सामने ही प्रदर्शनकारियों ने पथराव किया। ममता ने दावा किया कि इस घटना में बाहरी लोगों की भूमिका थी।

    उन्होंने पुलिस प्रशासन पर भी गंभीर आरोप लगाए। ममता के मुताबिक पुलिस अपनी कथित विफलताओं को छिपाने के लिए ऐसे लोगों का सहारा ले रही है। उन्होंने राज्य में हिरासत में होने वाली मौतों का मुद्दा उठाते हुए कहा कि बंगाल में कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब हो रही है।

    ममता ने दावा किया कि उन्होंने मृतक कार्यकर्ता के परिवार से मिलने का आश्वासन पहले ही दिया था। उनके अनुसार उन्होंने परिवार की महिला सदस्य से एक दिन पहले दो बार फोन पर बातचीत भी की थी। उन्होंने यह भी कहा कि एक विधायक के माध्यम से परिवार को घर से बाहर नहीं निकलने की चेतावनी दिए जाने की बात सामने आई थी।

    उन्होंने कहा कि घटना के संबंध में मामला दर्ज कराया जाएगा। ममता ने पुलिस के प्रति व्यक्तिगत नाराजगी से इनकार करते हुए आरोप लगाया कि राजनीतिक स्तर पर तनाव को बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने राज्य के गृह विभाग की भूमिका पर भी सवाल उठाए और आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष से जुड़े लोग हालात को बिगाड़ने में भूमिका निभा रहे हैं।

    दूसरी ओर, स्थानीय लोगों की ओर से ममता बनर्जी के दौरे को लेकर अलग प्रतिक्रिया सामने आई। कुछ लोगों का आरोप है कि वह शांत इलाके में राजनीतिक गतिविधि के लिए पहुंची थीं, जिससे वहां तनाव बढ़ गया। स्थानीय स्तर पर ममता के दौरे और विरोध को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं।

    घटना के बाद हलीसहर में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। एक ओर ममता बनर्जी ने इसे बीजेपी समर्थित विरोध और बाहरी लोगों की कार्रवाई बताया है, जबकि दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर उनके दौरे को लेकर सवाल उठाए गए हैं। फिलहाल पत्थरबाजी और विरोध की घटना के बाद इलाके की स्थिति पर प्रशासन की नजर बनी हुई है।

  • टीएमसी में बढ़ते असंतोष ने खड़े किए बड़े सवाल, कभी कांग्रेस से अलग होकर बनी पार्टी अब खुद संगठनात्मक संकट से घिरी

    टीएमसी में बढ़ते असंतोष ने खड़े किए बड़े सवाल, कभी कांग्रेस से अलग होकर बनी पार्टी अब खुद संगठनात्मक संकट से घिरी

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर उभरते संगठनात्मक संकट ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस को जन्म दे दिया है। लंबे समय तक राज्य की प्रमुख राजनीतिक शक्ति बनी रही पार्टी अब अंदरूनी असंतोष और नेतृत्व को चुनौती देने वाली गतिविधियों के कारण चर्चा के केंद्र में है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान घटनाक्रम केवल एक दल के आंतरिक विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बंगाल की राजनीति में संभावित पुनर्संरचना के संकेत भी दे सकता है।

    हाल के दिनों में पार्टी के भीतर अलग-अलग स्तरों पर असहमति की खबरें सामने आई हैं। कुछ नेताओं और जनप्रतिनिधियों द्वारा संगठन की कार्यप्रणाली, नेतृत्व शैली और निर्णय प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए हैं। इन घटनाओं ने राजनीतिक पर्यवेक्षकों का ध्यान आकर्षित किया है, क्योंकि तृणमूल कांग्रेस का इतिहास स्वयं एक राजनीतिक विभाजन और वैचारिक संघर्ष से जुड़ा रहा है।

    राजनीतिक जानकारों का कहना है कि किसी भी बड़े राजनीतिक दल में लंबे समय तक सत्ता में बने रहने के बाद संगठनात्मक चुनौतियां उभरना असामान्य नहीं होता। समय के साथ नेतृत्व, कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों के बीच अपेक्षाओं का अंतर बढ़ सकता है, जो कभी-कभी असंतोष के रूप में सामने आता है। तृणमूल कांग्रेस के मौजूदा हालात को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है।

    पार्टी के गठन के इतिहास को देखें तो यह एक ऐसे दौर में अस्तित्व में आई थी, जब पश्चिम बंगाल की राजनीति में वैचारिक संघर्ष और नेतृत्व संबंधी मतभेद प्रमुख मुद्दे बने हुए थे। उस समय एक नए राजनीतिक विकल्प के रूप में उभरी पार्टी ने धीरे-धीरे अपनी अलग पहचान बनाई और राज्य की राजनीति में निर्णायक शक्ति बन गई। इसके बाद पार्टी ने लगातार चुनावी सफलता हासिल की और लंबे समय तक सत्ता में अपनी स्थिति मजबूत रखी।

    मौजूदा घटनाक्रम के बाद विपक्षी दलों ने भी राजनीतिक प्रतिक्रिया दी है। विभिन्न दलों के नेताओं ने इसे लोकतांत्रिक राजनीति में स्वाभाविक प्रक्रिया बताते हुए अपने-अपने राजनीतिक तर्क प्रस्तुत किए हैं। वहीं तृणमूल कांग्रेस के समर्थक और कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बड़े संगठनों में समय-समय पर मतभेद सामने आते हैं और उन्हें संगठनात्मक स्तर पर सुलझाया जा सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी राजनीतिक दल की वास्तविक मजबूती संकट के समय सामने आती है। यदि नेतृत्व संवाद और संगठनात्मक संतुलन बनाए रखने में सफल रहता है तो ऐसे संकटों को अवसर में बदला जा सकता है। दूसरी ओर यदि असंतोष लगातार बढ़ता है तो इसका असर चुनावी राजनीति और संगठन की दीर्घकालिक रणनीति पर पड़ सकता है।

    पश्चिम बंगाल की राजनीति का इतिहास भी दलों के पुनर्गठन, नए राजनीतिक गठबंधनों और नेतृत्व परिवर्तन की अनेक घटनाओं का साक्षी रहा है। यही कारण है कि मौजूदा स्थिति को केवल एक अस्थायी राजनीतिक विवाद के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे भविष्य की राजनीति के संभावित संकेतक के रूप में भी समझा जा रहा है।

    फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या पार्टी नेतृत्व संगठन के भीतर उभर रहे असंतोष को नियंत्रित कर पाएगा या यह घटनाक्रम आगे चलकर किसी बड़े राजनीतिक बदलाव का रूप लेगा। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार आने वाले महीनों में लिए जाने वाले संगठनात्मक फैसले और नेतृत्व की रणनीति ही इस प्रश्न का उत्तर तय करेंगे।

    बंगाल की राजनीति में यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसका प्रभाव केवल एक दल तक सीमित नहीं रहेगा। यदि संगठनात्मक समीकरण बदलते हैं तो राज्य की व्यापक राजनीतिक तस्वीर पर भी उसका असर दिखाई दे सकता है। इसलिए सभी राजनीतिक दल और पर्यवेक्षक आगामी घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए हैं।

  • बंगाल में ममता का अभेद्य दुर्ग ढहाया….BJP की इस प्रचंड जीत का UP पर क्या होगा असर?

    बंगाल में ममता का अभेद्य दुर्ग ढहाया….BJP की इस प्रचंड जीत का UP पर क्या होगा असर?


    नई दिल्ली।
    बंगाल और असम (Bengal and Assam) में बीजेपी (BJP) की यह प्रचंड जीत 2026 की राजनीति का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट (Turning point) है. 4 मई 2026 के ये नतीजे न केवल पूर्वी भारत का भूगोल बदल रहे हैं, बल्कि इनका सीधा असर उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के सियासी समीकरणों पर पड़ना तय है. पश्चिम बंगाल (West Bengal.) में ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) के अभेद्य दुर्ग को ढहाने के बाद ‘भगवा’ खेमे में जो उत्साह है, उसकी गूंज अब लखनऊ के सियासी गलियारों तक भी सुनाई दे रही है?

    पश्चिम बंगाल में बीजेपी की यह ‘ऐतिहासिक’ जीत महज एक राज्य की जीत नहीं है बल्कि यह 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए एक ‘लॉन्चपैड’ तैयार कर दिया है. बीजेपी ने जिस तरह बंगाल में ममता बनर्जी को मात दी है, उससे अखिलेश यादव के चैलेंज से निपटने में नई ऊर्जा मिलेगी।

    उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव ने 2024 के लोकसभा चुनाव में पीडीए फॉर्मूले से बीजेपी को तगड़ा झटका दिया था. बीजेपी ने दो साल में कमबैक किया है. ऐसे में बंगाल में ममता की हार विपक्ष के लिए बड़ा झटका है तो बीजेपी के लिए यूपी में ‘बुस्टर डोज’ की तरह है, जो सपा-कांग्रेस के लिए किसी सियासी टेंशन से कम नहीं है?


    बंगाल में ममता का सियासी किला ध्वस्त

    बंगाल चुनाव में अखिलेश यादव की पूरी तरह ममता बनर्जी के पक्ष में खड़े थे. यही वजह है कि बंगाल चुनाव के नतीजों को यूपी की सियासत से जोड़कर देखा जा रहा है. क्योंकि अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने हैं. बंगाल जैसे कठिन राज्य में जीत ने बीजेपी कैडर को यह संदेश दिया है कि ‘अजेय’ कुछ भी नहीं है।

    सियासत में कॉन्फिडेंस जरूरी है, लेकिन ओवर-कॉन्फिडेंस अक्सर घातक साबित होते हैं. अखिलेश यादव के लिए संकेत है कि उन्हें चुनावी आकलन में अधिक संतुलन और सतर्कता बरतनी होगी. 2024 के लोकसभा चुनाव में 37 लोकसभा सीटें जीतने के बाद अखिलेश यादव, उत्साह और आत्मविश्वास से लबरेज हैं, लेकिन कई बार उनका आत्मविश्वास, अतिआत्मविश्वास में बदलता दिखता है. बंगाल में ममता बनर्जी का ओवर-कॉन्फिडेंस ही महंगा पड़ा है।


    बंगाल चुनाव का यूपी की सियासत पर असर?

    बंगाल में मिली सफलता के बाद योगी आदित्यनाथ अब 2027 के लिए और भी अधिक आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरेंगे. बंगाल के नतीजों ने साबित कर दिया कि बीजेपी का ‘हिंदुत्व कार्ड’ ने विपक्ष के सारे समीकरण को ध्वस्त कर दिया है।

    बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में मुस्लिम बहुल सीटों पर सेंधमारी ने ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ वाले नैरेटिव को धार देने के लिए ‘धार्मिक ध्रुवीकरण’ की बिसात बिछाई. इसका नतीजा था कि 30 फीसदी मुस्लिम बंगाल में होने के बाद भी बीजेपी जीतने में सफल रही है. बीजेपी अब सपा के ‘सामाजिक न्याय’ के जवाब में ‘सांस्कृतिक एकीकरण’ को और मजबूती से पेश करेगी।

    सपा प्रमुख अखिलेश यादव, जो अक्सर ममता बनर्जी को अपनी ‘बड़ी बहन’ और आदर्श मानते रहे हैं, उनके लिए बंगाल में टीएमसी की हार यह बड़ा झटका है. उत्तर प्रदेश में भाजपा उसी सियासी मॉडल को और आक्रामक तरीके से 2027 के विधानसभा चुनाव मैदान में उतर सकती है।

    सपा का पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) फार्मूला से 2024 में बीजेपी को मात देने में सफल रहे थे. बंगाल चुनाव के बाद बीजेपी यूपी में सपा के पीडीए फॉर्मूले को काउंटर करने के लिए धार्मिक ध्रुवीकरण के लिए बंगाल मॉडल को आजमाने का दांव चल सकती है।


    धार्मिक ध्रवीकरण के दांव से पीडीए को मात

    बीजेपी उत्तर प्रदेश में 2014 के बाद से लेकर लगातार जीतती आ रही थी, लेकिन उसे 2024 में अखिलेश ने बड़ा झटका दिया था. ऐसे में बीजेपी के लिए सत्ता की हैट्रिक लगाना एक बड़ी चुनौती है, लेकिन पीएम मोदी की अगुवाई में जिस तरह पार्टी कमबैक कर रही है, उससे यूपी में भी पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को सियासी हौसला मिला है। बंगाल में बीजेपी ने जिस तरह घुसपैठ के मुद्दे को हिंदुत्व के साथ जोड़ा, वो सियासी संजीवनी बना. अब वही फॉर्मूला यूपी में 2027 के लिए ‘ब्लूप्रिंट’ बनेगा।

  • शुभेन्दु 1 सीट से लड़ना चाहते थे….अमित शाह ने दिया 2 सीटों का फॉर्मूला… ममता को दिखाया 2021 का रीकैप

    शुभेन्दु 1 सीट से लड़ना चाहते थे….अमित शाह ने दिया 2 सीटों का फॉर्मूला… ममता को दिखाया 2021 का रीकैप


    कोलकाता।
    भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) ने तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी (Trinamool Congress supremo Mamata Banerjee) को 2021 का रीकैप दिखा दिया। सोमवार को जब नतीजे घोषित हुए तो एक बार फिर भाजपा हैवी वेट शुभेंदु अधिकारी (Shubhendu Adhikari) ने उन्हें हरा दिया, लेकिन इस बार मैदान भवानीपुर का रहा। इसके अलावा अधिकारी ने नंदीग्राम से भी जीत दर्ज कर ली है। अब खबर है कि अधिकारी सिर्फ एक ही सीट से लड़ना चाहते थे, लेकिन उन्हें दो सीटों से लड़ाने का फॉर्मूला केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह (Amit Shah) ने दिया था।


    जब अमित शाह ने बताई भवानीपुर की इनसाइड स्टोरी

    भवानीपुर सीट ममता बनर्जी का गढ़ माना जाता था। इस बार भी वह इस सीट से चुनाव लड़ रहीं थीं। 2 अप्रैल को गृह मंत्री शाह भवानीपुर में जनसभा को संबोधित कर रहे थे। तब उन्होंने कहा था, ‘शुभेंदु दा हमारे नंदीग्राम से लड़ना चाहते थे। मैंने शुभेंदु दा को कहा था कि सिर्फ नंदीग्राम नहीं, ममता के घर में जाकर उसको हराना है।’

    भवानीपुर सीट पर जीत के बाद अधिकारी ने बताया कि मतगणना के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री शाह लगातार उनके संपर्क में थे और इस हाई-प्रोफाइल मुकाबले को लेकर चिंता जताई थी।


    शुभेंदु अधिकारी ने 17 हजार का अंतर कवर किया

    भाजपा नेता और टीएमसी प्रमुख के बीच भवानीपुर में रोमांचक मुकाबला देखने को मिला था। यहां शुरुआती दौर में अधिकारी ने लीड हासिल कर ली थी, लेकिन कुछ राउंड काउंटिंग के बाद बनर्जी आगे आ गईं थीं। यहां तक कि एक समय पर वह करीब 17 हजार मतों से आगे भी चल रही थीं, लेकिन जैसे-जैसे राउंड बढ़े और अंतर कम होता गया।

    अंतिम नतीजा आया कि अधिकारी ने 20 राउंड की काउंटिंग के बाद बनर्जी को 15 हजार से ज्यादा वोटों से हराया। उन्हें कुल 73 हजार 917 वोट मिले थे। जबकि, बनर्जी को 58 हजार 812 वोट मिले। इस सीट पर तीसरे स्थान पर लेफ्ट नेता श्रीजीब बिस्वास रहे और चौथे पर महज 1257 वोट पाने वाले कांग्रेस नेता प्रदीप प्रसाद थे।


    डबल धमाका

    ऐसा ही नतीजा नंदीग्राम से भी देखने को मिला, जहां अधिकारी ने अपने पूर्व करीबी और टीएमसी प्रत्याशी पवित्र कर को 9 हजार से ज्यादा वोटों से हराया। यहां उन्होंने 1 लाख 27 हजार 301 वोट पाकर जीत दर्ज की। सीट पर कांग्रेस पांचवें स्थान पर रही और महज 794 वोट ही हासिल कर सकी।


    जीत के क्या बोले अधिकारी

    अधिकारी ने इसे निर्णायक राजनीतिक क्षण बताया है। चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद, जीत का प्रमाणपत्र दिखाते हुए राज्य विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अधिकारी ने सोमवार को कहा कि बनर्जी को उनके गढ़ में हराना प्रतीकात्मक और रणनीतिक, दोनों ही दृष्टि से अहम है। उन्होंने कहा, ‘यह बहुत महत्वपूर्ण है। ममता बनर्जी को हराना काफी मायने रखता है।’

    अधिकारी ने दावा किया कि यह चुनाव परिणाम ममता के राजनीतिक करियर के अंत का संकेत है। उन्होंने कहा, ‘यह जीत हिंदुत्व की जीत है।’ उन्होंने दावा किया कि विभिन्न वर्गों, यहां तक कि अन्य दलों के पारंपरिक समर्थकों ने भी उनका समर्थन किया। उन्होंने दावा किया कि निर्वाचन क्षेत्र में वामपंथी मतदाताओं के एक वर्ग ने उनका समर्थन किया, जिससे तृणमूल कांग्रेस विरोधी वोटों को एकजुट करने में मदद मिली।