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  • Gen-Z से मातृशक्ति और बुजुर्गों तक… PM मोदी का संवाद कैसे बदलता रहा, हर पीढ़ी के लिए है अलग अंदाज

    Gen-Z से मातृशक्ति और बुजुर्गों तक… PM मोदी का संवाद कैसे बदलता रहा, हर पीढ़ी के लिए है अलग अंदाज


    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आज 76वां जन्मदिन है। 7 सितंबर 1950 को जन्मे मोदी इस वर्ष 76 वर्ष के हो रहे हैं और 2024 में लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। करीब 12 साल के प्रधानमंत्री कार्यकाल में उनकी राजनीति के साथ उनके संवाद का तरीका भी लगातार बदलता दिखाई देता है। युवाओं के लिए सोशल मीडिया और डिजिटल क्रिएटर, छात्रों के लिए ‘परीक्षा पे चर्चा’, महिलाओं के लिए ‘माताओं-बहनों-बेटियों’ का संबोधन और बुजुर्गों-परिवारों तक पहुंचने के लिए ‘मन की बात’ जैसे अलग-अलग माध्यम उनके सार्वजनिक संवाद का हिस्सा रहे हैं।

    मोदी के संचार की खासियत पर चर्चा करते समय एक बात बार-बार सामने आती है—वे अलग-अलग वर्गों से बातचीत में अलग भाषा, माध्यम और संदर्भ इस्तेमाल करते हैं। ‘सबका साथ, सबका विकास’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ जैसे नारों से लेकर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर युवाओं से संवाद तक, उनके सार्वजनिक संचार का दायरा पारंपरिक राजनीतिक भाषणों से आगे बढ़ा है।

    Gen-Z के लिए सोशल मीडिया और डिजिटल दुनिया
    आज की Gen-Z पीढ़ी के संवाद के तरीके को पारंपरिक राजनीतिक भाषणों से अलग माना जाता है। इसी बदलाव के बीच प्रधानमंत्री मोदी गेमिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्टार्टअप और डिजिटल क्रिएटर इकोसिस्टम जैसे विषयों पर युवाओं से बातचीत करते रहे हैं।

    2024 में पहली बार आयोजित नेशनल क्रिएटर्स अवॉर्ड इसी डिजिटल इकोसिस्टम को औपचारिक पहचान देने वाली पहल के तौर पर सामने आया। इसमें कहानी कहने, सामाजिक बदलाव, शिक्षा, गेमिंग, तकनीक और दूसरे डिजिटल क्षेत्रों में काम करने वाले क्रिएटर्स को शामिल किया गया था।

    जुलाई 2026 में इंस्टाग्राम की एक रील पर 24 घंटे में 300 मिलियन यानी 30 करोड़ से ज्यादा व्यूज मिलने का दावा भी सोशल मीडिया पर मोदी की डिजिटल मौजूदगी को लेकर चर्चा में रहा। इससे यह संकेत मिलता है कि प्रधानमंत्री का सार्वजनिक संवाद अब केवल टीवी, अखबार और रैलियों तक सीमित नहीं है।

    ‘परीक्षा पे चर्चा’ में प्रधानमंत्री नहीं, मेंटर की भूमिका
    बोर्ड परीक्षाओं के समय प्रधानमंत्री का संवाद एक अलग रूप लेता है। ‘परीक्षा पे चर्चा’ में वे छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों से परीक्षा के तनाव, आत्मविश्वास और पढ़ाई से जुड़े सवालों पर बातचीत करते हैं।

    2026 के संस्करण में 4.5 करोड़ से ज्यादा पंजीकरण हुए। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री छात्रों के सवाल लेते हैं, रोजमर्रा के उदाहरणों के जरिए जवाब देते हैं और पढ़ाई के साथ खेल, आराम, कौशल तथा रुचियों के संतुलन पर बात करते हैं।

    यही वजह है कि ‘परीक्षा पे चर्चा’ की भाषा सामान्य राजनीतिक भाषणों से अलग दिखाई देती है। यहां विषय सत्ता या राजनीति नहीं, बल्कि छात्र की रोजमर्रा की जिंदगी होती है। ‘एग्जाम वारियर्स’ जैसे संबोधन के जरिए परीक्षा के दबाव को कम करने और आत्मविश्वास बढ़ाने का संदेश देने की कोशिश की जाती है।

    महिलाओं से संवाद में योजनाओं के साथ पहचान
    महिलाओं को संबोधित करते समय प्रधानमंत्री के भाषणों में ‘माताओं, बहनों और बेटियों’ जैसे शब्द नियमित रूप से सुनाई देते हैं। लाल किले की प्राचीर से सैनिटरी पैड, पीरियड पॉवर्टी और घर में शौचालय जैसे विषयों का उल्लेख भी उनके सार्वजनिक भाषणों का हिस्सा रहा है।

    सरकार की महिला-केंद्रित योजनाओं को भी इसी संवाद के साथ जोड़ा गया। उज्ज्वला योजना के जरिए रसोई के धुएं से राहत, लखपति दीदी के जरिए आर्थिक मजबूती और ड्रोन दीदी के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को आधुनिक तकनीक से जोड़ने की पहल को भाषणों में जगह मिली।

    इन योजनाओं के नाम और उनसे जुड़े संबोधन ऐसे रखे गए हैं, जिन्हें महिलाओं के रोजमर्रा के जीवन और अनुभवों से जोड़कर पेश किया जा सके।

    बुजुर्गों और परिवारों तक ‘मन की बात’
    डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सक्रिय रहने के बावजूद प्रधानमंत्री ने रेडियो जैसे पारंपरिक माध्यम को भी लगातार इस्तेमाल किया है। ‘मन की बात’ के जरिए वे हर महीने देशवासियों से संवाद करते हैं। इस कार्यक्रम में अक्सर गुमनाम नायकों, ग्रामीण नवाचारों, स्थानीय उपलब्धियों और सामाजिक पहलों की चर्चा होती है।

    इस माध्यम की पहुंच रेडियो सुनने वाले परिवारों और गांवों तक है। इसलिए मोदी के संचार में एक तरफ इंस्टाग्राम और डिजिटल क्रिएटर्स हैं तो दूसरी तरफ रेडियो और चौपाल जैसी पारंपरिक पहुंच भी बनी हुई है।

    स्थानीय भाषा और संस्कृति का इस्तेमाल
    मोदी के सार्वजनिक भाषणों में स्थानीय संदर्भों का इस्तेमाल भी दिखाई देता है। किसी राज्य में पहुंचने पर वहां के त्योहार, परंपरा, खान-पान, स्थानीय व्यक्तित्व और क्षेत्रीय भाषा का उल्लेख उनके संबोधन का हिस्सा रहा है।

    सांस्कृतिक विषयों को लेकर काशी विश्वनाथ धाम, अयोध्या में राम मंदिर और अंतरराष्ट्रीय योग दिवस जैसे संदर्भ भी उनके भाषणों में दिखाई देते हैं। इन विषयों के जरिए वे भारतीय संस्कृति, परंपरा और स्थानीय पहचान से जुड़े मुद्दों को अपने संवाद में जगह देते हैं।

    ‘मित्रों’ से ‘मेरे परिवारजनों’ तक
    मोदी के संबोधन समय के साथ बदलते रहे हैं। ‘मित्रों’ और ‘भाइयों-बहनों’ जैसे संबोधनों के साथ अब ‘मेरे परिवारजनों’ जैसे शब्द भी उनके भाषणों में सुनाई देते हैं। इसके साथ ही वे कई बार जटिल नीतिगत विषयों को आंकड़ों के बजाय छोटी घटनाओं और प्रेरक कहानियों के माध्यम से समझाने की कोशिश करते हैं।

    किसी राज्य में भाषण की शुरुआत वहां की क्षेत्रीय भाषा में करना भी उनके संवाद का एक हिस्सा रहा है। इससे भाषण के शुरुआती क्षणों में ही स्थानीय संदर्भ जुड़ जाता है।

    कुल मिलाकर मोदी के सार्वजनिक संवाद में माध्यम और भाषा दोनों का विस्तार दिखाई देता है—एक ओर सोशल मीडिया पर Gen-Z और डिजिटल क्रिएटर्स हैं, तो दूसरी ओर ‘मन की बात’ के जरिए रेडियो सुनने वाले परिवार और स्थानीय भाषाओं-सांस्कृतिक संदर्भों के जरिए अलग-अलग क्षेत्रों के लोग। यही बहुस्तरीय संचार शैली उनके करीब 12 वर्ष के प्रधानमंत्री कार्यकाल में लगातार दिखाई देती रही है।

  • महुआ और तेंदू पत्ते बेचने से इको-टूरिज्म तक का सफर, मैथिली भुए की कहानी ने जीता पीएम मोदी का ध्यान; 50 महिलाओं को ट्रेनिंग

    महुआ और तेंदू पत्ते बेचने से इको-टूरिज्म तक का सफर, मैथिली भुए की कहानी ने जीता पीएम मोदी का ध्यान; 50 महिलाओं को ट्रेनिंग


    नई दिल्ली। ओडिशा के संबलपुर जिले के देबरीगढ़ की रहने वाली मैथिली भुए की मेहनत और हौसले को अब देशभर में पहचान मिल रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम मन की बात के 137वें एपिसोड में मैथिली भुए के काम का जिक्र करते हुए उनकी सराहना की। इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने जंगलों के संरक्षण में योगदान देने और स्थानीय महिलाओं को रोजगार से जोड़ने वाली मैथिली के लिए यह पल बेहद खास रहा। प्रधानमंत्री की ओर से अपने काम की तारीफ किए जाने पर उन्होंने खुशी जाहिर की और इसे उनके जैसे ग्रामीण क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए बड़ी प्रेरणा बताया।

    मैथिली भुए की कहानी आसान नहीं रही है। वह आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से आती हैं और लंबे समय तक जंगल से मिलने वाले उत्पादों पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर रही हैं। तेंदू के पत्ते बांस महुआ कराडी और जलाऊ लकड़ी जैसे वन उत्पादों को इकट्ठा कर उन्हें बेचकर वह अपने परिवार का गुजारा करती थीं। सीमित संसाधनों के बीच जीवन आगे बढ़ रहा था लेकिन 2023 में देबरीगढ़ इको-टूरिज्म से जुड़ने के बाद उनकी जिंदगी को एक नई दिशा मिली।

    इको-टूरिज्म ने न केवल मैथिली को रोजगार का नया जरिया दिया बल्कि उन्हें अपने आसपास की दूसरी महिलाओं के लिए भी अवसर पैदा करने की प्रेरणा दी। धीरे धीरे क्षेत्र की महिलाएं इस पहल से जुड़ने लगीं और अब मैथिली करीब 40 से 50 महिलाओं को इको-टूरिज्म तथा हॉस्पिटैलिटी से जुड़े अलग अलग कामों की ट्रेनिंग दे रही हैं। उनका उद्देश्य सिर्फ महिलाओं को नौकरी दिलाना नहीं बल्कि उन्हें इतना सक्षम बनाना है कि वे अपने दम पर बेहतर आजीविका हासिल कर सकें और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकें।

    मैथिली के मार्गदर्शन में महिलाएं पर्यटकों के साथ व्यवहार करने उनकी जरूरतों को समझने और उन्हें बेहतर सेवाएं देने की ट्रेनिंग ले रही हैं। देबरीगढ़ में इको-टूरिज्म से जुड़े कई क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। इनमें स्मारिका की दुकानें चाय की दुकानें रेस्तरां नेचर कैंप और होमस्टे जैसे काम शामिल हैं। महिलाओं को उनकी जिम्मेदारी और काम की प्रकृति के अनुसार अलग अलग प्रशिक्षण दिया जाता है ताकि वे पर्यटकों को बेहतर अनुभव दे सकें।

    मैथिली का मानना है कि पर्यटन के साथ स्थानीय समुदाय को जोड़ना क्षेत्र के विकास का मजबूत माध्यम बन सकता है। जब स्थानीय लोगों को अपने ही क्षेत्र में रोजगार मिलता है तो उन्हें बेहतर आय का अवसर मिलता है और साथ ही प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की भावना भी मजबूत होती है। खास तौर पर महिलाओं के लिए इको-टूरिज्म आत्मनिर्भर बनने का प्रभावी रास्ता साबित हो सकता है।

    मन की बात में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा नाम लिए जाने के बाद मैथिली की कहानी को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है। उन्होंने प्रधानमंत्री का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके प्रयासों को पहचान मिलना बेहद खुशी की बात है। मैथिली चाहती हैं कि आने वाले समय में और अधिक महिलाएं इको-टूरिज्म से जुड़ें और अपनी आजीविका का मजबूत आधार तैयार करें।

    उनकी कहानी इस बात की मिसाल है कि बदलाव के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती। स्थानीय अवसरों की पहचान मेहनत और दूसरों को साथ लेकर आगे बढ़ने की इच्छा किसी भी व्यक्ति की जिंदगी बदल सकती है। जंगल से मिलने वाले उत्पादों पर निर्भर रहने वाली मैथिली भुए आज उसी प्राकृतिक विरासत को बचाने और उसके जरिए महिलाओं को रोजगार देने की मुहिम का हिस्सा बन चुकी हैं। मन की बात में मिली पहचान उनके इस सफर को नई ऊर्जा देने के साथ देबरीगढ़ के इको-टूरिज्म मॉडल को भी देश के सामने एक प्रेरक उदाहरण के रूप में पेश करती है।

  • गुजरात का माधवपुर मेला, पूर्व और पश्चिम की संस्कृतियों का संगम: प्रधानमंत्री मोदी की अपील..

    गुजरात का माधवपुर मेला, पूर्व और पश्चिम की संस्कृतियों का संगम: प्रधानमंत्री मोदी की अपील..


    नई दिल्ली:प्रधानमंत्री मोदी ने गुजरात के पोरबंदर में आयोजित माधवपुर मेले के लिए सभी देशवासियों को शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने कहा कि यह मेला केवल एक उत्सव नहीं बल्कि भारत की विविध संस्कृति और परंपराओं का प्रतीक है। माधवपुर मेला पूर्व और पश्चिम की सांस्कृतिक धरोहरों को एक साथ लाता है और ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को जीवंत करता है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, गुजरात के पोरबंदर में चल रहे माधवपुर मेले के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएं। यह जीवंत उत्सव हमारी गौरवशाली संस्कृति को उजागर करता है और गुजरात और पूर्वोत्तर के बीच शाश्वत सांस्कृतिक बंधन को और मजबूत बनाता है। यह मेला विविध परंपराओं को एक साथ लाता है, जो ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की सच्ची भावना को दर्शाता है। मैं सभी से आग्रह करता हूं कि इस मेले में पधारें।

    इस अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने 27 मार्च 2022 के ‘मन की बात’ कार्यक्रम का एक वीडियो भी साझा किया, जिसमें उन्होंने माधवपुर मेले का महत्व और इसकी सांस्कृतिक भूमिका पर प्रकाश डाला था। उन्होंने कहा कि इस मेले के जरिए भारत की विविधता और सांस्कृतिक एकता को सीधे तौर पर महसूस किया जा सकता है।

    प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में बताया कि माधवपुर मेला पोरबंदर के माधवपुर गांव में समुद्र के किनारे लगता है, लेकिन इसका संबंध भारत के पूर्वी छोर से भी जुड़ा है। इसका कारण एक पौराणिक कथा है। कहा जाता है कि हजारों वर्ष पहले भगवान श्री कृष्ण का विवाह नार्थ ईस्ट की राजकुमारी रुक्मणि से हुआ था और यह विवाह पोरबंदर के माधवपुर में संपन्न हुआ। यही कारण है कि आज भी माधवपुर मेला वहां मनाया जाता है और यह पूर्व और पश्चिम के सांस्कृतिक बंधन का प्रतीक बन गया है।

    प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि समय के साथ इस मेले में नई चीजें भी जुड़ रही हैं। खासतौर पर कन्या पक्ष और नार्थ ईस्ट से आने वाले कलाकार अब मेले की शोभा बढ़ाते हैं। एक सप्ताह तक चलने वाले इस मेले में नार्थ ईस्ट के आर्टिस्ट, हेंडीक्राफ्ट से जुड़े कलाकार और सांस्कृतिक कलाकार शामिल होते हैं। यह मेले की रौनक को चार चांद लगाते हैं और भारत के पूरब और पश्चिम की संस्कृतियों का अद्भुत मेल प्रस्तुत करते हैं।

    प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों से आग्रह किया कि वे इस मेले के बारे में पढ़ें, जानें और भारत की सांस्कृतिक विविधता का अनुभव करें। उनका कहना था कि इस तरह के उत्सव न केवल हमारी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखते हैं बल्कि समाज में एकता और भाईचारे की भावना को भी मजबूत करते हैं।

    बता दें कि भगवान कृष्ण और रुक्मिणी जी के विवाह की स्मृति में आयोजित माधवपुर मेले का उद्घाटन 27 मार्च को हुआ था और यह पांच दिन तक चलता है। यह मेला गुजरात और नार्थ ईस्ट के बीच शाश्वत सांस्कृतिक संबंधों का प्रतीक बनकर ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ का सजीव उदाहरण प्रस्तुत करता है।

  • देशवासियों को पीएम मोदी का संदेश, संकट में संयम, सतर्कता और एकजुटता बनाए रखें

    देशवासियों को पीएम मोदी का संदेश, संकट में संयम, सतर्कता और एकजुटता बनाए रखें

    नई दिल्ली:प्रधानमंत्री मोदी ने देशवासियों से बार-बार अपील की है कि वह जागरूक रहें और अफवाहों के बहकावे में ना आएं। नई दिल्ली में पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण भारत के सामने उत्पन्न चुनौतियों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को संदेश दिया कि कठिन परिस्थितियों में भी संयम और सतर्कता बनाए रखना आवश्यक है। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि हम सब मिलकर इन संकटों से अच्छी तरह बाहर निकलेंगे।

    प्रधानमंत्री मोदी ने रविवार को रेडियो कार्यक्रम “मन की बात” के 132वें एपिसोड के जरिए राष्ट्र से संवाद किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि देशवासियों को चाहिए कि वह सरकारी स्रोतों से मिलने वाली जानकारी पर भरोसा करें और उसी के आधार पर किसी भी कदम को आगे बढ़ाएं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अफवाहों और झूठी खबरों के कारण समाज में अस्थिरता पैदा हो सकती है।

    उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि जैसा कि देश ने पहले भी कठिन परिस्थितियों में अपनी 140 करोड़ जनता की सामर्थ्य से संकटों का सामना किया है, वैसे ही इस बार भी हम सब मिलकर इस कठिनाई से बाहर निकलेंगे। प्रधानमंत्री ने मार्च महीने की वैश्विक घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि पूरी दुनिया कोविड के कारण लंबी समस्याओं से गुजर रही थी और सभी को उम्मीद थी कि महामारी के बाद दुनिया नई प्रगति की ओर बढ़ेगी। लेकिन दुर्भाग्य से अलग-अलग क्षेत्रों में युद्ध और संघर्ष की परिस्थितियां लगातार बनी रहीं, जिससे वैश्विक स्थिरता प्रभावित हुई।

    प्रधानमंत्री मोदी ने विशेष रूप से खाड़ी देशों का आभार व्यक्त किया, जहां भारतीय नागरिक बड़ी संख्या में कार्यरत हैं। उन्होंने बताया कि पड़ोसी देशों में वर्तमान में भीषण युद्ध चल रहा है, और हमारे लाखों परिवारों के सदस्य वहां रहकर रोज़मर्रा की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। खाड़ी देशों ने भारतीय नागरिकों को हर प्रकार की मदद मुहैया कराई है और उनके प्रयासों के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें धन्यवाद दिया।

    प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि हमें इस समय संयम और धैर्य के साथ काम करने की आवश्यकता है। उन्होंने देशवासियों से यह अपील की कि वे किसी भी अफवाह या सोशल मीडिया की झूठी खबर पर विश्वास न करें और हमेशा सत्यापित जानकारी ही स्वीकार करें। उनका संदेश स्पष्ट था कि संकट चाहे जितना बड़ा क्यों न हो, जब देशवासियों का सामूहिक सामर्थ्य और एकता सामने आती है तो हर मुश्किल परिस्थिति का सामना किया जा सकता है।

    प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश में आशा और विश्वास के भाव व्यक्त किए और कहा कि भारत की जनता हर चुनौती का सामना करने में सक्षम है। उन्होंने नागरिकों से यह भी आग्रह किया कि वे अपने पड़ोसियों, परिवार और समाज के लोगों को भी सतर्क रहने और अफवाहों से बचने की सीख दें। उनका यह संदेश न केवल सतर्कता का था बल्कि यह लोगों में एकजुटता और देशभक्ति की भावना को भी प्रोत्साहित करता है।

  • राज्यपाल पटेल: मन की बात जन भावनाओं का सम्मान करने और पुलिस सेवा की संवेदनशीलता की सीख देती है

    राज्यपाल पटेल: मन की बात जन भावनाओं का सम्मान करने और पुलिस सेवा की संवेदनशीलता की सीख देती है


    भोपाल । भोपाल में रविवार को मंगुभाई पटेल ने मन की बात कार्यक्रम को केवल एक रेडियो प्रसारण न मानने की अपील की और उसे जन‑भावनाओं की जीवंत गाथा बताया। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम देश के कोने‑कोने में हो रहे सकारात्मक बदलाव और आम नागरिकों की भागीदारी की प्रेरणादायक कहानियों को सामने लाता है, जिससे समाज की नब्ज को समझने और जन‑भावनाओं का सम्मान करने की सीख मिलती है। राज्यपाल ने यह बात प्रशिक्षणाधीन पुलिस अधिकारियों और नव आरक्षकों को संबोधित करते हुए कही।

    उन्होंने कहा कि पुलिस का जनता से सीधा जुड़ाव होता है, इसलिए मन की बात जैसे कार्यक्रम को केवल औपचारिकता न मानकर नियमित रूप से सुनना चाहिए, क्योंकि इससे लोक‑कल्याण की भावना, संवेदनशीलता और कर्तव्यनिष्ठा जैसे गुण विकसित होते हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस कार्यक्रम के माध्यम से विपरीत परिस्थितियों में भी समाज के लिए उदाहरण पैदा करने वाले गुमनाम नायकों की कहानियों को साझा करते हैं, जो पुलिस बल को भी अपनी सेवा‑परिवार के प्रति और अधिक संवेदनशील बनाने में मदद करती हैं।

    राज्यपाल पटेल ने कहा कि प्रशिक्षण का समय भविष्य की नींव है और इस दौरान सीखी गई बातें और प्रधानमंत्री के विचार पुलिस अधिकारियों के करियर में मार्गदर्शक की भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि पुलिस सेवा में शालीनता और तत्परता होना चाहिए, ताकि पीड़ित व्यक्ति पुलिस के पास आते समय सुरक्षित महसूस करे। साथ ही पुलिस में अनुशासन के साथ सहानुभूति का होना आवश्यक है, और मन की बात कार्यक्रम हमें मानवीय दृष्टिकोण प्रदान करता है, जो वर्दी को केवल सत्ता का प्रतीक नहीं बल्कि समाज सेवा का संकल्प बनाता है।

    राज्यपाल ने अधिकारियों से अपेक्षा जताई कि वे देश‑भक्ति और जन‑सेवा की गौरवशाली परंपरा को सशक्त, अनुशासित और मानवीय पुलिस बल के रूप में आगे बढ़ाएंगे। उन्होंने कहा कि मन की बात में प्रधानमंत्री द्वारा स्वच्छता, जल संरक्षण और डिजिटल साक्षरता जैसे विषयों पर दिया गया मार्गदर्शन उन्हें अपने कार्यक्षेत्र में लागू करना चाहिए। यह कार्यक्रम आज के सामाजिक और तकनीकी युग में पुलिस सेवा को लोक‑कल्याण की भावना से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम है।

    राज्यपाल ने प्रशिक्षणाधीन अधिकारियों को कहा कि वे अपने आप को केवल ड्यूटी तक सीमित न रखें, बल्कि समाज में चेंज मेकर के रूप में अपनी पहचान बनाने का प्रयास करें। उन्होंने बताया कि मन की बात में देश के अलग‑अलग हिस्सों से आने वाली सफल कहानियों से यह स्पष्ट होता है कि व्यक्ति का छोटा सा प्रयास भी बड़े परिवर्तन ला सकता है। इस संदेश को अपनाकर पुलिस विभाग समाज में मित्र और रक्षक की छवि को और मजबूत कर सकता है।

    कार्यक्रम की शुरुआत में विशेष पुलिस महानिदेशक और मध्यप्रदेश पुलिस अकादमी के निदेशक ने राज्यपाल का स्वागत किया तथा प्रशिक्षण के अनुभवों को नव आरक्षकों ने साझा किया। इसके अलावा पुलिस अधीक्षक और अकादमी के सहायक निदेशक सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने भी उपस्थित रही।

  • प्रधानमंत्री मोदी ने 'ओडिशा की मदर टेरेसा' पार्वती गिरि को दी श्रद्धांजलि; स्वतंत्रता संग्राम और समाज सेवा में उनके योगदान को सराहा

    प्रधानमंत्री मोदी ने 'ओडिशा की मदर टेरेसा' पार्वती गिरि को दी श्रद्धांजलि; स्वतंत्रता संग्राम और समाज सेवा में उनके योगदान को सराहा


    नई दिल्ली/भुवनेश्वर। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक पार्वती गिरि जी की जन्म शताब्दी के अवसर पर उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की। प्रधानमंत्री ने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनकी अदम्य साहसपूर्ण भूमिका और आजादी के बाद समाज के वंचित वर्गों के उत्थान के लिए किए गए उनके कार्यों को याद किया। स्वतंत्रता संग्राम की प्रखर नायिका प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पूर्व में ट्विटर पर साझा किए गए अपने संदेश में कहा कि पार्वती गिरि जी ने विदेशी शासन के खिलाफ आंदोलन में बेहद सराहनीय भूमिका निभाई थी। मात्र 16 वर्ष की आयु में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में सक्रिय भागीदारी करने वाली पार्वती गिरि अपनी अटूट देशभक्ति के लिए जानी जाती हैं। उन्हें उनके सेवा भाव के कारण ‘ओडिशा की मदर टेरेसा’ के नाम से भी जाना जाता है।

    महिला सशक्तिकरण और स्वास्थ्य सेवा में उल्लेखनीय कार्य प्रधानमंत्री ने पार्वती गिरि के सामुदायिक सेवा के प्रति समर्पण की सराहना करते हुए कहा कि स्वास्थ्य सेवा, महिला सशक्तिकरण और संस्कृति के संरक्षण जैसे क्षेत्रों में उनके कार्य आज भी प्रेरणा देते हैं। उन्होंने समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की सेवा को ही अपना धर्म माना। प्रधानमंत्री ने यह भी साझा किया कि उन्होंने पिछले महीने अपने प्रसिद्ध रेडियो कार्यक्रम मन की बात में भी पार्वती गिरि जी के जीवन संघर्ष और उनकी महानता का विशेष उल्लेख किया था।   एक प्रेरणादायी व्यक्तित्व पार्वती गिरि जी का जन्म 19 जनवरी 1926 को हुआ था। उन्होंने अपना पूरा जीवन अनाथों की सेवा और जेल सुधार जैसे रचनात्मक कार्यों में समर्पित कर दिया। प्रधानमंत्री ने विश्वास जताया कि उनकी जन्म शताब्दी पर देशवासी उनके आदर्शों को अपनाकर एक समावेशी समाज के निर्माण का संकल्प लेंगे।