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  • भारत की कारोबारी गतिविधियां अक्टूबर में चार महीने के उच्च स्तर पर पहुंचीं, घरेलू मांग और निर्यात से मिली मजबूती

    भारत की कारोबारी गतिविधियां अक्टूबर में चार महीने के उच्च स्तर पर पहुंचीं, घरेलू मांग और निर्यात से मिली मजबूती

    नई दिल्ली । भारत के निजी क्षेत्र की कारोबारी गतिविधियों में अक्टूबर 2026 के दौरान तेजी दर्ज की गई है। विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में नए ऑर्डरों की बढ़ोतरी, घरेलू मांग में मजबूती और विदेशी बाजारों से मिले बेहतर कारोबार के कारण गतिविधियां चार महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गईं। अक्टूबर के शुरुआती सर्वेक्षण आंकड़ों के अनुसार, कंपनियों को बाजार की परिस्थितियों में सुधार का लाभ मिला। इसके साथ ही उत्पादन लागत और बिक्री कीमतों पर पड़ने वाले दबाव में भी नरमी दर्ज की गई, जबकि रोजगार वृद्धि की रफ्तार कुछ धीमी रही।

    अक्टूबर में एचएसबीसी फ्लैश इंडिया कंपोजिट आउटपुट इंडेक्स बढ़कर 56.7 पर पहुंच गया, जबकि सितंबर में यह 55.9 था। यह सूचकांक विनिर्माण और सेवा क्षेत्र की संयुक्त कारोबारी गतिविधियों का आकलन करता है। पीएमआई में 50 से ऊपर का स्तर गतिविधियों में विस्तार का संकेत देता है, जबकि इससे नीचे का स्तर संकुचन को दर्शाता है। अक्टूबर का आंकड़ा जून के बाद कारोबारी गतिविधियों में सबसे तेज वृद्धि का संकेत देता है।

    सर्वेक्षण के मुताबिक, विनिर्माण और सेवा क्षेत्र की कंपनियों ने नए ऑर्डरों में बढ़ोतरी और कारोबारी परिस्थितियों में सुधार की जानकारी दी। घरेलू बाजार से मिलने वाली मांग के साथ विदेशी ग्राहकों की ओर से भी ऑर्डर बढ़े। विशेष रूप से निर्यात ऑर्डरों में पिछले छह महीनों की सबसे तेज वृद्धि दर्ज की गई। इससे भारतीय कंपनियों को उत्पादन और सेवाओं से जुड़ी गतिविधियों में तेजी बनाए रखने में मदद मिली।

    विनिर्माण क्षेत्र में उत्पादन और नए ऑर्डरों की वृद्धि सितंबर के आसपास बनी रही, लेकिन निर्यात मांग में तेजी अक्टूबर की प्रमुख विशेषता रही। भारत की मुख्य अर्थशास्त्री प्रांजुल भंडारी के अनुसार, जून 2025 के बाद पहली बार निर्यात ऑर्डरों में इतनी मजबूत बढ़ोतरी देखी गई है। विदेशी बाजारों से मिले बेहतर संकेतों के बीच निर्माताओं ने कच्चे माल और तैयार उत्पादों का भंडार भी बढ़ाया। कंपनियों की यह गतिविधि बढ़ती मांग को पूरा करने की तैयारी के रूप में देखी जा सकती है।

    महंगाई के मोर्चे पर भी आंकड़ों में राहत के संकेत मिले हैं। उत्पादन लागत और बिक्री कीमतों पर दबाव लगातार कम होने की जानकारी सामने आई। लागत संबंधी दबाव में नरमी कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे उत्पादन और बिक्री से जुड़े फैसलों पर असर पड़ सकता है। हालांकि, उपलब्ध आंकड़े यह नहीं बताते कि आने वाले महीनों में महंगाई किस स्तर पर रहेगी। फिलहाल सर्वेक्षण अक्टूबर के दौरान लागत और कीमतों से जुड़े दबावों में कमी का संकेत देता है।

    रोजगार के मामले में स्थिति अपेक्षाकृत मिश्रित रही। निजी क्षेत्र में कर्मचारियों की संख्या बढ़ने की गति धीमी हुई। सेवा क्षेत्र की कंपनियों ने लगातार नौ महीनों तक भर्ती बढ़ाने के बाद अक्टूबर में नई नियुक्तियों को लगभग रोक दिया। कंपनियों का मानना था कि मौजूदा कर्मचारियों की संख्या से कामकाज की जरूरतें पूरी हो रही हैं। वहीं, विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार बढ़ा, लेकिन इसकी रफ्तार सीमित रही। इससे स्पष्ट होता है कि कारोबारी गतिविधियों में तेजी के बावजूद भर्ती में समान स्तर का विस्तार नहीं हुआ।

    सर्वेक्षण में लंबित कार्यभार में भी गिरावट दर्ज की गई। कंपनियों के पास पहले से जमा काम का स्तर लगातार तीसरी बार घटा और यह संयुक्त रूप से पिछले साढ़े छह वर्षों की सबसे तेज गिरावट रही। इससे संकेत मिलता है कि कंपनियां लंबित काम को अपेक्षाकृत तेजी से पूरा कर पा रही हैं। अक्टूबर में विनिर्माण पीएमआई 54.9 दर्ज किया गया, जो इस क्षेत्र में लगातार विस्तार को दर्शाता है।

    कुल मिलाकर, अक्टूबर के शुरुआती पीएमआई आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था के निजी क्षेत्र में मजबूत कारोबारी गति का संकेत देते हैं। घरेलू मांग, निर्यात ऑर्डरों और विनिर्माण गतिविधियों से विस्तार को सहारा मिला है। हालांकि, रोजगार वृद्धि की धीमी रफ्तार यह बताती है कि कारोबार में तेजी का लाभ सभी क्षेत्रों में नई नियुक्तियों के रूप में समान रूप से दिखाई नहीं दिया है।

  • पीयूष गोयल ने जर्मन कंपनियों को भारत में निवेश का दिया न्योता, विनिर्माण और नवाचार में बताए बड़े अवसर

    पीयूष गोयल ने जर्मन कंपनियों को भारत में निवेश का दिया न्योता, विनिर्माण और नवाचार में बताए बड़े अवसर


    नई दिल्ली ।
    केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जर्मनी की राजधानी बर्लिन में प्रमुख उद्योगपतियों और कारोबारी नेताओं के साथ बैठकों के दौरान भारत में निवेश, विनिर्माण और नवाचार की संभावनाओं को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारत जर्मन कंपनियों के लिए बड़े अवसर उपलब्ध कराता है। भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच विश्वास, प्रतिस्पर्धात्मकता और एक-दूसरे की पूरक क्षमताओं के आधार पर मजबूत आर्थिक साझेदारी विकसित करने की भी व्यापक संभावनाएं हैं। गोयल ने दोनों देशों के उद्योग जगत से सहयोग बढ़ाने और नए कारोबारी अवसर तलाशने का आह्वान किया।

    बर्लिन दौरे के दौरान गोयल ने फ्रेसेनियस ग्रुप के मुख्य कार्यकारी अधिकारी माइकल सेन के साथ बैठक की। इसमें भारत के तेजी से बढ़ते स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र, गुणवत्तापूर्ण और किफायती चिकित्सा सेवाओं की बढ़ती मांग तथा मजबूत विनिर्माण क्षमताओं पर चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने विचार किया कि इन क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाकर भारतीय बाजार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय जरूरतों को भी पूरा किया जा सकता है।

    गोयल ने भारत की कुशल प्रतिभा और उत्पादन क्षमता को जर्मन कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण अवसर बताया। उनके अनुसार, कंपनियां भारत में उपलब्ध योग्य कर्मचारियों और विश्वस्तरीय विनिर्माण सुविधाओं का लाभ उठाकर घरेलू तथा वैश्विक बाजारों में अपनी पहुंच मजबूत कर सकती हैं। स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में बढ़ती मांग के कारण चिकित्सा उत्पादों और सेवाओं के विकास में भी सहयोग की संभावनाएं हैं।

    केंद्रीय मंत्री ने बेयर के फार्मास्यूटिकल्स प्रभाग के अध्यक्ष स्टीफन ओएलरिख के साथ भी चर्चा की। इस बैठक में भारत में बेयर की विस्तार योजनाओं और देश के विकसित होते स्वास्थ्य क्षेत्र में अधिक निवेश की संभावनाओं पर विचार किया गया। बातचीत में नवाचार और सहयोग को बढ़ावा देने से जुड़े अवसर भी शामिल रहे। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए इस क्षेत्र में निवेश और तकनीकी सहयोग को महत्वपूर्ण माना गया।

    गोयल ने बर्लिन में नॉफ ग्रुप के ग्लोबल जनरल पार्टनर मुरात अकयिलदिज के साथ बैठक में भी भाग लिया। इसमें भारत में कंपनी के विनिर्माण विस्तार, टिकाऊ निर्माण सामग्री और बुनियादी ढांचे के विकास से जुड़े विषयों पर चर्चा हुई। भारत में तेजी से हो रहे शहरीकरण और आर्थिक बदलावों के बीच निर्माण क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं पर जोर दिया गया। टिकाऊ निर्माण सामग्री और उत्पादन क्षमता बढ़ाने से जुड़े अवसर इस बातचीत के प्रमुख विषय रहे।

    इससे पहले गोयल ने जर्मन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (डीजीएपी) के इंडिया सेंटर के उद्घाटन समारोह में हिस्सा लिया। कार्यक्रम में जर्मनी की संघीय आर्थिक मामलों और ऊर्जा मंत्री कैथरीना रीचे भी मौजूद थीं। गोयल ने कहा कि यह केंद्र भारत-जर्मनी संबंधों की बढ़ती मजबूती और आपसी सहयोग को गहरा करने की प्रतिबद्धता का प्रतीक है।

    अपने संबोधन में गोयल ने दोनों देशों की पूरक क्षमताओं को महत्वाकांक्षी आर्थिक लक्ष्यों के लिए मजबूत आधार बताया। उन्होंने कहा कि भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता आर्थिक साझेदारी को नई गति दे सकता है। उनके अनुसार, भारत और जर्मनी मिलकर वैश्विक स्तर पर मजबूत और लचीली मूल्य शृंखलाएं विकसित कर सकते हैं। इसके लिए दोनों देशों के उद्योगों और निवेशकों को पारस्परिक लाभ वाले क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की जरूरत है।

    बर्लिन स्थित ईएसएमटी बर्लिन की ओर से आयोजित बिजनेस लीडर्स राउंडटेबल में भी गोयल ने प्रमुख कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों और उद्योग प्रतिनिधियों के साथ बातचीत की। उन्होंने भारत और जर्मनी के बीच व्यापारिक तथा आर्थिक संबंधों के भविष्य को लेकर विश्वास जताया। इन बैठकों के जरिए निवेश, उत्पादन, स्वास्थ्य सेवा, निर्माण सामग्री और नवाचार जैसे क्षेत्रों में कारोबारी सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं को सामने रखा गया।

  • भारत के सेमीकंडक्टर उद्योग को मजबूत बनाने के लिए जरूरी मटेरियल इकोसिस्टम विकसित करना होगा, अश्विनी वैष्णव ने बताई चुनौती

    भारत के सेमीकंडक्टर उद्योग को मजबूत बनाने के लिए जरूरी मटेरियल इकोसिस्टम विकसित करना होगा, अश्विनी वैष्णव ने बताई चुनौती

    नई दिल्ली ।केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा है कि भारत के लिए तकनीकी संप्रभुता हासिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण सामग्रियों का मजबूत घरेलू इकोसिस्टम विकसित करना बड़ी चुनौती है। सेमीकंडक्टर और अन्य उन्नत तकनीकों के लिए आवश्यक सामग्रियों की आपूर्ति कुछ सीमित देशों में केंद्रित होने के कारण भारत को अपनी विनिर्माण क्षमता और विशेषज्ञता तेजी से बढ़ाने की जरूरत है।

    ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में अपने विचार रखते हुए वैष्णव ने कहा कि भारत को सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए जरूरी केमिकल्स, गैसों, सब्सट्रेट्स और अन्य इनपुट्स के उत्पादन में घरेलू क्षमताएं मजबूत करनी होंगी। उनके मुताबिक, इन सामग्रियों की वैश्विक आपूर्ति शृंखला पर कुछ देशों का अधिक नियंत्रण भारत की एक प्रमुख प्रौद्योगिकी और विनिर्माण केंद्र बनने की महत्वाकांक्षा के सामने चुनौती है।
    मंत्री ने बताया कि जिन देशों ने महत्वपूर्ण सामग्रियों के क्षेत्र में मजबूत स्थिति बनाई है, उन्होंने इसके लिए कई दशकों तक काम किया है। हालांकि, भारत के पास इतनी लंबी अवधि तक इंतजार करने का विकल्प नहीं है। इसलिए देश को महत्वपूर्ण सामग्रियों के विनिर्माण, प्रसंस्करण, भंडारण और प्रबंधन से जुड़ी विशेषज्ञता विकसित करने की गति बढ़ानी होगी।
    उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत का सेमीकंडक्टर मिशन अब केवल चिप बनाने और उनकी असेंबली तक सीमित नहीं है। इसका दायरा बढ़ाकर उन सामग्रियों और औद्योगिक क्षमताओं को भी शामिल किया जा रहा है, जिनकी जरूरत चिप निर्माण के विभिन्न चरणों में होती है। इस व्यापक दृष्टिकोण में केमिकल्स, गैसों, सब्सट्रेट्स और अन्य आवश्यक इनपुट्स का इकोसिस्टम तैयार करना शामिल है।
    वैष्णव के अनुसार, देश के सेमीकंडक्टर कार्यक्रम के दूसरे चरण में इन क्षेत्रों पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है। सरकार की रणनीति तैयार उत्पादों की असेंबली से आगे बढ़कर मॉड्यूल और कंपोनेंट्स के निर्माण तक पहुंचने की है। इसके बाद मटेरियल्स और अंततः पूंजीगत उपकरणों के उत्पादन की क्षमता विकसित करना भी इस दिशा का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि विनिर्माण क्षेत्र में टिकाऊ विकास के लिए केवल अंतिम उत्पाद तैयार करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उससे जुड़े पूरे औद्योगिक इकोसिस्टम को मजबूत करना आवश्यक है।
    तकनीकी संप्रभुता के अर्थ को स्पष्ट करते हुए मंत्री ने कहा कि भारत का उद्देश्य दूसरे देशों पर हर तरह की निर्भरता को पूरी तरह समाप्त करना नहीं है। इसके बजाय रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपनी कमजोरियों को दूर करना और जरूरत के समय देश की क्षमता तथा लचीलेपन को मजबूत बनाना प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि यह तय करना जरूरी है कि किन उत्पादों और क्षेत्रों में भारत के भीतर डिजाइन, विनिर्माण और संपूर्ण उत्पाद विकास की क्षमताएं होनी चाहिए और किन क्षेत्रों में दूसरे देशों के साथ सहयोग जारी रखा जा सकता है। प्रौद्योगिकी को उन्होंने वैश्विक वैल्यू चेन का हिस्सा बताया।
    उन्होंने कहा कि भारत जिन क्षेत्रों में प्रवेश करना चाहता है, वहां एक विश्वसनीय भागीदार के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहता है। उदाहरण देते हुए उन्होंने 28 नैनोमीटर से 90 नैनोमीटर के लेगेसी नोड्स का उल्लेख किया। उनके मुताबिक, इस श्रेणी में एक मिलियन डॉलर की मशीन का उत्पादन केवल एक डॉलर की चिप की कमी के कारण भी रुक सकता है। ऐसे में डिजाइन, विनिर्माण और अंतिम उत्पाद के संपूर्ण मूल्यांकन की क्षमता विकसित करना महत्वपूर्ण है। इसी सोच के आधार पर भारत अपनी तकनीकी और औद्योगिक रणनीति को आगे बढ़ा रहा है।
  • चंद्रशेखरन बोले- भारत की अर्थव्यवस्था स्थिर, विकसित भारत 2047 के लिए बुनियादी ढांचे और मानव पूंजी में निवेश जरूरी

    चंद्रशेखरन बोले- भारत की अर्थव्यवस्था स्थिर, विकसित भारत 2047 के लिए बुनियादी ढांचे और मानव पूंजी में निवेश जरूरी

    नई दिल्ली ।टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने सोमवार को कहा कि वैश्विक स्तर पर अनिश्चित माहौल के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत और स्थिर बनी हुई है। उन्होंने इसके पीछे मजबूत घरेलू मांग, सेवा निर्यात और अनुकूल नीतिगत माहौल को प्रमुख कारण बताया। चंद्रशेखरन ने कहा कि भारत ने हाल के वर्षों में लगातार उम्मीदों से बेहतर प्रदर्शन किया है और मजबूत विकास के रास्ते पर बना हुआ है।

    इंडियन फाउंडेशन फॉर क्वालिटी मैनेजमेंट सिम्पोजियम 2026 में बोलते हुए चंद्रशेखरन ने भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन को अच्छा बताया। उन्होंने कहा कि कई आर्थिक संकेतक देश की स्थिर और मजबूत स्थिति की ओर इशारा करते हैं। उनके अनुसार, ऑटोमोबाइल बिक्री, क्रेडिट ग्रोथ, बिजली और सीमेंट जैसे क्षेत्रों में बनी मजबूत मांग अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत है।

    चंद्रशेखरन ने चालू खाते की स्थिति को भी सकारात्मक आर्थिक संकेतकों में शामिल किया। उन्होंने कहा कि चालू खाता घाटा लगातार जीडीपी के एक प्रतिशत से नीचे बना हुआ है। इसके अलावा सेवा निर्यात जीडीपी के करीब 11 प्रतिशत के बराबर है। मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों यानी एनपीए की बेहतर स्थिति भी देश के आर्थिक परिदृश्य को समर्थन देने वाले महत्वपूर्ण संकेतक हैं।

    उन्होंने कहा कि भारत के विकसित भारत 2047 के विजन को हासिल करने के लिए समावेशी और टिकाऊ विकास पर ध्यान देना होगा। इसके लिए विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचे, मजबूत संस्थानों और बौद्धिक संपदा का समर्थन जरूरी होगा। चंद्रशेखरन ने लंबे समय तक आर्थिक विकास को बनाए रखने के लिए ऊर्जा सुरक्षा, उन्नत और सटीक विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार तथा मानव पूंजी में निवेश को महत्वपूर्ण बताया।

    चंद्रशेखरन ने भारत के विनिर्माण क्षेत्र में बदलाव की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने गुणवत्ता, नवाचार, उत्पादकता और प्रतिस्पर्धात्मकता पर अधिक ध्यान देने की बात कही। उनके अनुसार, भारत जर्मनी जैसे देशों से सीख सकता है, जहां इंजीनियरिंग, मानकों और सटीकता के साथ मजबूत आपूर्तिकर्ता तथा छोटे एवं मध्यम उद्यमों के इकोसिस्टम ने प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त को मजबूत करने में भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि भारत में भी इसी तरह के बदलाव की जरूरत है।

    उन्होंने भारत की व्यापक विनिर्माण महत्वाकांक्षाओं में टिकाऊ विनिर्माण को शामिल करने की आवश्यकता भी बताई। चंद्रशेखरन के मुताबिक, ऐसा बदलाव केवल बड़ी कंपनियों के स्तर तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि मध्यम स्तर के कारोबारी इकोसिस्टम में भी मजबूत नेतृत्व विकसित करने में मदद करनी चाहिए। इससे ऐसे विशेषज्ञ तैयार करने में भी सहायता मिलेगी, जो वैश्विक विनिर्माण मानकों और प्रथाओं में योगदान देने में सक्षम हों। उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया को भारत के दीर्घकालिक आर्थिक विकास और विनिर्माण क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता से जोड़ा।

  • आत्मनिर्भर बैटरी इकोसिस्टम के लिए सेकंड-लाइफ तकनीक जरूरी, पुन: उपयोग और रीसाइक्लिंग पर विशेषज्ञों ने दिया जोर

    आत्मनिर्भर बैटरी इकोसिस्टम के लिए सेकंड-लाइफ तकनीक जरूरी, पुन: उपयोग और रीसाइक्लिंग पर विशेषज्ञों ने दिया जोर

    नई दिल्ली । भारत में मजबूत, आत्मनिर्भर और सर्कुलर बैटरी इकोसिस्टम विकसित करने के लिए केवल बैटरी निर्माण क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं ने बैटरियों के निर्माण से लेकर उनके उपयोग, सेकंड-लाइफ एप्लिकेशन और जीवनचक्र समाप्त होने के बाद प्रबंधन तक पूरी व्यवस्था को एक साथ विकसित करने की जरूरत बताई है।

    राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलन में बैटरी क्षेत्र से जुड़े अवसरों और चुनौतियों पर चर्चा हुई। इसमें नीति निर्माताओं, उद्योग प्रतिनिधियों, शोधकर्ताओं और अन्य हितधारकों ने भारत में तेजी से विकसित हो रहे बैटरी इकोसिस्टम को लेकर विचार साझा किए।

    द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट की महानिदेशक डॉ. विभा धवन ने कहा कि बैटरी क्षेत्र पर चर्चा केवल इलेक्ट्रिक मोबिलिटी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इलेक्ट्रिक वाहनों में इस्तेमाल के बाद भी जिन बैटरियों में पर्याप्त क्षमता बची रहती है, उनके सेकंड-लाइफ एप्लिकेशन की संभावनाओं पर ध्यान देना जरूरी है। इससे बैटरियों के उपयोगी जीवन को बढ़ाया जा सकता है और उनकी आर्थिक उपयोगिता का बेहतर इस्तेमाल संभव होगा।

    भारी उद्योग मंत्रालय के संयुक्त सचिव विजय मित्तल ने घरेलू विनिर्माण और सप्लाई चेन को मजबूत करने के साथ सेकंड-लाइफ बैटरियों, ट्रेसबिलिटी, मानकों और रीसाइक्लिंग से जुड़े ढांचे के विकास की जरूरत बताई। उनके अनुसार ऐसे प्रयास भारत में प्रतिस्पर्धी और सर्कुलर बैटरी अर्थव्यवस्था विकसित करने में मदद कर सकते हैं।

    नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के वैज्ञानिक कुलदीप राणा ने कहा कि सेकंड-लाइफ बैटरियों का इस्तेमाल केवल इलेक्ट्रिक वाहनों से जुड़े क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। इनका उपयोग घरेलू उपकरणों, रूफटॉप सोलर पीवी सिस्टम और यूपीएस सिस्टम जैसे क्षेत्रों में भी किया जा सकता है।

    सम्मेलन के दौरान बैटरी वैल्यू चेन के कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा हुई। इनमें घरेलू एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल निर्माण क्षमता का विस्तार, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का विकास और इस्तेमाल की जा चुकी बैटरियों के पुन: उपयोग, पुनर्प्रयोजन तथा रीसाइक्लिंग की बढ़ती जरूरत शामिल रही।

    वरिष्ठ निदेशक ए.के. सक्सेना ने कहा कि बैटरी क्षेत्र में केवल उत्पादन की मात्रा बढ़ाने के बजाय मूल्य सृजन को स्थानीय स्तर पर बढ़ावा देने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने बैटरियों को शुरुआती डिजाइन चरण से ही सर्कुलर दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर तैयार करने की आवश्यकता बताई।

    उन्होंने यह भी कहा कि सेकंड-लाइफ बैटरियों की बची हुई क्षमता और प्रदर्शन का सही आकलन जरूरी है। इससे इन बैटरियों के इस्तेमाल को लेकर उपभोक्ताओं का भरोसा बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

    इंडिया एनर्जी स्टोरेज एलायंस के प्रबंध निदेशक विनायक वालिम्बे ने भारत में मजबूत और प्रतिस्पर्धी बैटरी उद्योग के निर्माण के लिए घरेलू मूल्य संवर्धन बढ़ाने पर जोर दिया।

    वहीं, बीएसईएस राजधानी पावर लिमिटेड की वरिष्ठ प्रबंधक सुगंधिता वाधेरा ने भविष्य में बढ़ने वाली बिजली मांग के प्रभावी प्रबंधन पर बात रखी। उन्होंने राज्यों के लिए क्षमता नियोजन, मजबूत भुगतान सुरक्षा व्यवस्था और वितरण क्षेत्र में अधिक लचीले ऊर्जा संसाधनों की जरूरत बताई। उनके अनुसार इससे ऊर्जा तंत्र को अधिक मजबूत बनाने और बदलती जरूरतों के अनुसार तेजी से प्रतिक्रिया देने में मदद मिल सकती है।

  • केंद्र की पीएलआई योजनाओं से फार्मा और मेडटेक विनिर्माण को बढ़ावा, निवेश और घरेलू उत्पादन में बड़ी बढ़ोतरी

    केंद्र की पीएलआई योजनाओं से फार्मा और मेडटेक विनिर्माण को बढ़ावा, निवेश और घरेलू उत्पादन में बड़ी बढ़ोतरी


    नई दिल्ली ।केंद्र सरकार की उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन यानी पीएलआई योजनाओं के जरिए देश में फार्मास्युटिकल, बल्क ड्रग्स और मेडिकल डिवाइस के घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा मिला है। सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, इन योजनाओं के माध्यम से निवेश बढ़ाने, उत्पादन क्षमता विकसित करने और महत्वपूर्ण उत्पादों के लिए आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में काम हुआ है। इसके साथ ही फार्मा और मेडटेक क्षेत्र में नई तकनीकों को अपनाने और उन्नत विनिर्माण क्षमता विकसित करने पर भी जोर दिया गया है।

    बल्क ड्रग्स के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 2020 में पीएलआई योजना को मंजूरी दी गई थी। इसके लिए 6,940 करोड़ रुपये का वित्तीय प्रावधान किया गया। योजना के तहत 41 महत्वपूर्ण उत्पादों के घरेलू निर्माण को मजबूत करने और एपीआई यानी एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स तथा अन्य जरूरी कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भरता घटाने का लक्ष्य रखा गया।

    जून 2026 तक इस योजना के तहत 5,210.74 करोड़ रुपये का निवेश हो चुका है। यह निर्धारित 4,330 करोड़ रुपये के निवेश लक्ष्य से अधिक है। योजना के तहत 28 एपीआई के विनिर्माण के लिए 39 परियोजनाएं शुरू हो चुकी हैं। इसके चलते पेनिसिलिन-जी, क्लैवुलैनिक एसिड और रिफैम्पिसिन जैसे महत्वपूर्ण फर्मेंटेशन आधारित उत्पादों का घरेलू उत्पादन भी संभव हुआ है।

    फार्मास्युटिकल क्षेत्र के लिए अलग पीएलआई योजना को 2021 में मंजूरी दी गई थी। इस योजना के लिए 15,000 करोड़ रुपये का वित्तीय प्रावधान रखा गया। इसका उद्देश्य देश की विनिर्माण क्षमता बढ़ाने के साथ निवेश और उत्पादन को प्रोत्साहित करना तथा उच्च मूल्य वाले फार्मास्युटिकल उत्पादों के निर्माण को बढ़ावा देना है।

    इस योजना में बायोफार्मास्युटिकल्स, कॉम्प्लेक्स जेनेरिक्स, पेटेंटेड और पेटेंट-मुक्त दवाएं, ऑर्फन ड्रग्स, ऑटो-इम्यून दवाएं तथा अन्य उच्च मूल्य वाले फार्मास्युटिकल उत्पाद शामिल हैं। योजना के तहत 55 आवेदकों का चयन किया गया है, जिनमें 20 एमएसएमई हैं। जून 2026 तक 46,744 करोड़ रुपये का वास्तविक निवेश आकर्षित हुआ, जबकि निर्धारित लक्ष्य 17,275 करोड़ रुपये था।

    फार्मा क्षेत्र की कई कंपनियों ने योजना के तहत कॉम्प्लेक्स जेनेरिक्स, बायोसिमिलर, ऑटो-इम्यून दवाओं और अन्य उच्च मूल्य वाले उत्पादों के निर्माण के लिए अपनी क्षमता बढ़ाई है।

    मेडिकल डिवाइस क्षेत्र के लिए वर्ष 2020 में पीएलआई योजना को मंजूरी दी गई थी। इसके लिए 3,420 करोड़ रुपये का वित्तीय प्रावधान किया गया। योजना के तहत भारत में निर्मित पात्र मेडिकल डिवाइस की अतिरिक्त बिक्री पर पांच साल तक पांच प्रतिशत प्रोत्साहन देने का प्रावधान है।

    इस योजना के जरिए कई ऐसे उच्च तकनीक वाले मेडिकल डिवाइस का घरेलू उत्पादन शुरू हुआ है, जिनके लिए पहले बड़े स्तर पर आयात पर निर्भरता थी। अब 57 अलग-अलग मेडिकल डिवाइस का उत्पादन शुरू हो चुका है। इनमें एमआरआई मशीन, सीटी स्कैनर, कैथ लैब, लीनियर एक्सेलरेटर, सी-आर्म, मैमोग्राफी मशीन, अल्ट्रासाउंड सिस्टम, एनेस्थीसिया मशीन और हार्ट वाल्व शामिल हैं।

    योजना ने वैश्विक निर्माताओं को भारत में विनिर्माण गतिविधियां स्थापित या विस्तारित करने के लिए भी आकर्षित किया है। इसके साथ तकनीक हस्तांतरण और उन्नत विनिर्माण क्षमताओं को बढ़ावा देने के लिए वैश्विक साझेदारियों पर भी काम हुआ है।

  • सितंबर में भारत की निजी अर्थव्यवस्था ने पकड़ी रफ्तार, कंपोजिट पीएमआई बढ़कर 56.5 पर पहुंचा

    सितंबर में भारत की निजी अर्थव्यवस्था ने पकड़ी रफ्तार, कंपोजिट पीएमआई बढ़कर 56.5 पर पहुंचा

    नई दिल्ली ।भारत के निजी क्षेत्र में सितंबर के दौरान आर्थिक गतिविधियों में मजबूती देखने को मिली है। मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर में बेहतर प्रदर्शन के चलते कंपोजिट पीएमआई बढ़कर 56.5 पर पहुंच गया। अगस्त में यह आंकड़ा 54.3 था। सितंबर का स्तर जून के बाद निजी क्षेत्र की गतिविधियों में सबसे तेज विस्तार को दर्शाता है।

    एचएसबीसी फ्लैश इंडिया कंपोजिट पीएमआई में देश के मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों की गतिविधियों को शामिल किया जाता है। सितंबर के आंकड़ों के अनुसार, दोनों क्षेत्रों की कंपनियों ने कारोबार में विस्तार दर्ज किया। नए ऑर्डर और रोजगार में भी बढ़ोतरी हुई, जबकि महंगाई का दबाव कम होने और कारोबारी भरोसे में सुधार के संकेत मिले।

    आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में निजी क्षेत्र की कारोबारी गतिविधियां अपने दीर्घकालिक औसत से ऊपर पहुंच गईं। मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की मजबूती ने संयुक्त गतिविधियों की रफ्तार बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस दौरान उत्पादन और घरेलू नए ऑर्डर में तेज वृद्धि दर्ज की गई।

    सितंबर में कंपनियों के कुल नए कारोबार में भी मजबूत बढ़ोतरी हुई। मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों में मांग बढ़ी, लेकिन सामान बनाने वाली कंपनियों में इसका असर ज्यादा स्पष्ट रहा। मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों की बिक्री में वृद्धि सात महीनों के उच्चतम स्तर तक पहुंच गई।

    सर्विस सेक्टर की कंपनियों ने नए ऑर्डर हासिल करने में मार्केटिंग गतिविधियों को उपयोगी बताया। सर्वेक्षण के गुणात्मक हिस्से में प्रॉपर्टी सेवाओं, परिवहन सेवाओं और नई यात्रा बुकिंग से जुड़ी मांग में बढ़ोतरी का उल्लेख किया गया।

    मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में भी कई उत्पादों की मांग बढ़ने की जानकारी सामने आई। कंपनियों ने एल्युमीनियम उत्पादों, इलेक्ट्रॉनिक सामान, खाद्य एवं पेय पदार्थों और फार्मास्युटिकल उत्पादों के साथ नए मॉडलों की मांग में बढ़ोतरी दर्ज की।

    सितंबर के दौरान रोजगार के मोर्चे पर भी सकारात्मक गतिविधि देखने को मिली। कंपनियों ने उत्पादन और नए ऑर्डर में लगातार वृद्धि के बीच अपनी स्टाफिंग क्षमता बढ़ाई। मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों में नई नौकरियां पैदा हुईं। दोनों क्षेत्रों में रोजगार विस्तार की दर लगभग समान रही।

    आर्थिक गतिविधियों में तेजी के साथ कंपनियों ने भविष्य की जरूरतों को देखते हुए इनपुट खरीद भी बढ़ाई। तैयार माल के स्टॉक से जुड़े सूचकांक में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह सूचकांक करीब साढ़े 11 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया।

    हालांकि, मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए लागत से जुड़ा दबाव बढ़ने के संकेत भी मिले। इनपुट कीमतों में बढ़ोतरी के बीच कंपनियों ने अपने मार्जिन को सुरक्षित रखने के लिए आउटपुट की कीमतों में भी वृद्धि की। इससे उत्पादों की कीमतों पर महंगाई का दबाव बढ़ने की स्थिति बनी।

    आर्थिक गतिविधियों के मजबूत रहने के बावजूद कंपनियों ने वैश्विक स्तर पर मौजूद अनिश्चितताओं को ध्यान में रखते हुए अपनी तैयारियां बढ़ाईं। मध्य पूर्व में बढ़े तनाव के बीच कंपनियों ने संभावित परिस्थितियों से निपटने के लिए बफर तैयार करने पर ध्यान दिया।

    सितंबर के पीएमआई आंकड़ों से निजी क्षेत्र में उत्पादन, नए कारोबार और रोजगार के स्तर पर व्यापक सुधार के संकेत मिले हैं। मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों की गतिविधियों में विस्तार के चलते संयुक्त पीएमआई अगस्त के मुकाबले काफी ऊपर रहा और जून के बाद सबसे मजबूत स्तर दर्ज किया गया।

  • अगस्त में थोक महंगाई बढ़कर 9.92 प्रतिशत पहुंची, ईंधन और खाद्य कीमतों में तेजी से बढ़ा दबाव

    अगस्त में थोक महंगाई बढ़कर 9.92 प्रतिशत पहुंची, ईंधन और खाद्य कीमतों में तेजी से बढ़ा दबाव

    नई दिल्ली ।देश में थोक महंगाई का दबाव अगस्त 2026 में एक बार फिर बढ़ा है। थोक मूल्य सूचकांक यानी WPI पर आधारित महंगाई दर अगस्त में बढ़कर 9.92 प्रतिशत हो गई, जबकि जुलाई 2026 में यह 9.78 प्रतिशत दर्ज की गई थी। महंगाई में यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से ईंधन और ऊर्जा तथा खाद्य वस्तुओं की कीमतों में आए उछाल से जुड़ी रही। इसके अलावा विनिर्माण क्षेत्र की महंगाई में भी मामूली वृद्धि दर्ज की गई।

    अगस्त में सभी वस्तुओं का समग्र थोक मूल्य सूचकांक बढ़कर 110.8 पर पहुंच गया। इससे पहले जुलाई में यह स्तर अलग था। थोक कीमतों में बढ़ोतरी का असर अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों पर दिखाई दिया, खासकर ईंधन और ऊर्जा तथा रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली खाद्य वस्तुओं पर।

    ईंधन और ऊर्जा श्रेणी में महंगाई सबसे ज्यादा बढ़ी। जुलाई में इस श्रेणी की महंगाई दर 20.05 प्रतिशत थी, जो अगस्त में बढ़कर 22.93 प्रतिशत हो गई। इसी अवधि में इस श्रेणी का सूचकांक भी 105.4 से बढ़कर 108.3 पर पहुंच गया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर घरेलू थोक कीमतों पर भी दिखाई दिया।

    खाद्य वस्तुओं की कीमतों में भी तेजी दर्ज की गई। जुलाई में खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर 6.65 प्रतिशत थी, जो अगस्त में बढ़कर 7.05 प्रतिशत हो गई। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि का असर घरेलू बजट पर पड़ने वाली लागत के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    विनिर्माण क्षेत्र में भी थोक महंगाई दर में मामूली बढ़ोतरी हुई। जुलाई में यह 8.29 प्रतिशत थी, जो अगस्त में बढ़कर 8.37 प्रतिशत हो गई। इस दौरान विनिर्मित उत्पादों का सूचकांक 108.4 से बढ़कर 108.8 पर पहुंच गया।

    हालांकि प्राथमिक वस्तुओं की श्रेणी में महंगाई दर में कमी दर्ज की गई। जुलाई में यह 8.52 प्रतिशत थी, जो अगस्त में घटकर 7.76 प्रतिशत रह गई। इसके बावजूद इस श्रेणी का सूचकांक 117.2 से बढ़कर 118.1 पर पहुंच गया। यानी महंगाई दर में कमी के बावजूद सूचकांक में बढ़ोतरी दर्ज की गई।

    अगस्त में थोक महंगाई को प्रभावित करने वाली प्रमुख वस्तुओं में खनिज तेल, पेट्रोलियम उत्पाद, खाद्य वस्तुएं, मूल धातु, गैर-खाद्य कृषि उत्पाद और रासायनिक उत्पाद शामिल रहे। इन क्षेत्रों में कीमतों में बदलाव का असर कुल WPI आंकड़े पर पड़ा।

    जून 2026 के थोक महंगाई के आंकड़ों में भी संशोधन किया गया है। जून की अंतिम थोक महंगाई दर को पहले जारी किए गए 9.87 प्रतिशत के अनुमान से बढ़ाकर 9.97 प्रतिशत कर दिया गया है। इसके साथ ही जून का अंतिम सूचकांक भी संशोधित किया गया। पहले यह 110.2 था, जिसे संशोधित कर 110.3 कर दिया गया।

    जुलाई के मुकाबले अगस्त में थोक महंगाई बढ़ने के आंकड़े ऐसे समय आए हैं जब ईंधन और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी ने कुल महंगाई दर को प्रभावित किया है। खास तौर पर ईंधन एवं ऊर्जा श्रेणी में हुई बढ़ोतरी ने अगस्त के आंकड़ों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    इस तरह अगस्त में WPI आधारित महंगाई दर 9.92 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो जुलाई के 9.78 प्रतिशत से अधिक है। ईंधन और ऊर्जा तथा खाद्य वस्तुओं की महंगाई में बढ़ोतरी के साथ विनिर्माण क्षेत्र में मामूली तेजी दर्ज हुई, जबकि प्राथमिक वस्तुओं की महंगाई दर में कमी आई। जून के आंकड़ों में संशोधन के बाद अब अंतिम दर 9.97 प्रतिशत दर्ज की गई है।

  • अमिताभ कांत ने बताया, देश हित में चीन के साथ सहयोग क्यों जरूरी, क्लीन टेक और औद्योगिक क्षमता पर दिया जोर

    अमिताभ कांत ने बताया, देश हित में चीन के साथ सहयोग क्यों जरूरी, क्लीन टेक और औद्योगिक क्षमता पर दिया जोर

    नई दिल्ली । इंडिया टुडे के BRICS Roundtable में नीति आयोग के पूर्व CEO अमिताभ कांत ने वैश्विक अर्थव्यवस्था, क्लीन टेक्नोलॉजी और भारत की औद्योगिक क्षमता पर विस्तार से विचार रखे. उन्होंने स्पष्ट किया कि वैश्विक उथल-पुथल के इस दौर में भारत के राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए अमेरिका और चीन दोनों पक्षों के साथ संतुलित रणनीति बनाकर काम करना अनिवार्य है.

    अमिताभ कांत के अनुसार, क्लीन टेक्नोलॉजी के लगभग सभी प्रमुख वर्टिकल्स में चीन का दबदबा है. दुनिया की करीब 95% क्लीन बैटरियां और 85% इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV) चीन में बनते हैं. इसके अलावा, क्रिटिकल मिनरल्स की प्रोसेसिंग तकनीक के साथ-साथ सोलर सेक्टर पर करीब 80% और विंड एनर्जी में 77% नियंत्रण चीन का ही है.

    दूसरी ओर, जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) के बाजार में अमेरिका का बड़ा प्रभाव है. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अभी भी बड़े पैमाने पर जीवाश्म ईंधन का आयात करता है, जिस पर सालाना लगभग 180 अरब डॉलर का खर्च आता है. पश्चिम एशिया में तनाव या युद्ध की स्थिति बनते ही कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं, जिससे भारत के आयात बिल, रुपये की स्थिरता और पूरी अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ता है.

    देश हित में चीन के साथ काम करना क्यों है जरूरी?

    ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को हासिल करने के लिए देश को भविष्य में तेजी से क्लीन टेक्नोलॉजी की दिशा में आगे बढ़ना होगा. ऐसे में भारत के राष्ट्रीय हित में चीन के साथ तकनीकी स्तर पर सहभागिता बनाना जरूरी है, लेकिन चीन को इस तकनीक को ‘वेपनाइज’ बनाने से रोकना होगा. चीन को यह तकनीक BRICS देशों और ग्लोबल साउथ के साथ साझा करनी चाहिए.

    चीन के नॉन-टैरिफ बैरियर्स और बाजार की असमानता

    चीन की नीति मुख्य रूप से निर्यात पर केंद्रित है, जबकि वह दूसरे देशों के आयात के लिए अपना बाजार आसानी से नहीं खोलता. चीन में मौजूद नॉन-टैरिफ बैरियर्स के कारण भारत के फार्मास्यूटिकल और ड्रग मैन्युफैक्चरर्स वहां आसानी से प्रवेश नहीं कर पाते. आगामी BRICS शिखर सम्मेलन और द्विपक्षीय वार्ताओं में भारत को चीन के सामने अपने बाजारों को खोलने और क्लीन टेक साझा करने का मुद्दा मजबूती से उठाना चाहिए.

    अमिताभ कांत ने कहा कि क्लीन टेक्नोलॉजी में किसी एक देश का अत्यधिक नियंत्रण वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बन सकता है। ग्लोबल साउथ के देशों के सतत विकास के लिए तकनीक, निवेश और बाजारों का आपस में साझा होना जरूरी है, ताकि एकाधिकार की स्थिति से बचा जा सके.

    भारत की आर्थिक वृद्धि पर बात करते हुए उन्होंने एक ग्लोबल इन्वेस्टमेंट बैंक की रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें भारत में नई औद्योगिक क्रांति की बात कही गई है. इसके पीछे स्पेस, सेमीकंडक्टर, डेटा सेंटर, इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर और एयरोस्पेस जैसे हाई-ग्रोथ सेक्टर्स की मुख्य भूमिका है.

    भारत में औद्योगिक वृद्धि को रफ्तार देने के लिए सरकार ने उन क्षेत्रों को निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स के लिए खोल दिया है, जिन पर पहले सरकारी नियंत्रण था. जियो-स्पेशियल, ड्रोन, स्पेस और डिफेंस सेक्टर्स में निजी भागीदारी और स्टार्टअप्स के आने से नई तकनीक, निवेश और प्रतिस्पर्धा को बड़ा प्रोत्साहन मिला है.

    डिजाइनिंग से आगे बढ़कर मैन्युफैक्चरिंग पर भारत का फोकस

    भारत अब केवल तकनीक और चिप डिजाइन करने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि मैन्युफैक्चरिंग क्षमता भी बढ़ा रहा है. सेमीकंडक्टर PLI योजना की सफलता और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में आई तेजी इसका प्रमाण हैं. भारत का लक्ष्य घरेलू मांग पूरी करने के साथ-साथ ग्लोबल सप्लाई चेन का प्रमुख हिस्सा बनना है.

    BRICS देश दुनिया की कुल GDP का लगभग 40% हिस्सा संभालते हैं. अमिताभ कांत ने सुझाव दिया कि भारत को अपनी अध्यक्षता के दौरान संगठन का ध्यान राजनीतिक ध्रुवीकरण या ‘पश्चिम-विरोधी’ रुख पर ले जाने के बजाय व्यापार, निवेश, जलवायु और विकास जैसे व्यावहारिक मुद्दों पर केंद्रित रखना चाहिए.

    पश्चिम एशिया के तनाव और विभिन्न सदस्य देशों की अलग-अलग प्राथमिकताओं के बीच भारत को ‘कंसेंसस बिल्डिंग’ की भूमिका निभानी होगी. जैसा कि भारत ने G20 सम्मेलन में संवेदनशील मुद्दों पर आम सहमति बनाकर दिखाया था, वैसा ही नेतृत्व BRICS में भी दिखाकर सभी देशों को एक न्यूनतम साझा एजेंडे पर साथ लाना होगा.

  • पीयूष गोयल के जापान दौरे से भारत-जापान आर्थिक साझेदारी को नई गति, 200 से अधिक कारोबारी प्रतिनिधि भी प्रतिनिधिमंडल में शामिल

    पीयूष गोयल के जापान दौरे से भारत-जापान आर्थिक साझेदारी को नई गति, 200 से अधिक कारोबारी प्रतिनिधि भी प्रतिनिधिमंडल में शामिल


    नई दिल्ली । 
    वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल का जापान दौरा सोमवार से शुरू हो गया है। चार दिवसीय आधिकारिक यात्रा के दौरान उनका मुख्य फोकस भारत और जापान के बीच आर्थिक साझेदारी को और मजबूत करने, निवेश के अवसर बढ़ाने और विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार करने पर रहेगा।

    पीयूष गोयल 27 अगस्त तक जापान में रहेंगे। इस दौरान वह टोक्यो, नागोया और ओसाका का दौरा करेंगे। उनके नेतृत्व में भारत का अब तक का सबसे बड़ा कारोबारी प्रतिनिधिमंडल जापान पहुंचा है, जिसमें 200 से अधिक बिजनेस प्रतिनिधि शामिल हैं। प्रतिनिधिमंडल में विभिन्न प्रमुख औद्योगिक और सेवा क्षेत्रों से जुड़े कारोबारी शामिल हैं।

    भारतीय प्रतिनिधिमंडल में मैन्युफैक्चरिंग, सेमीकंडक्टर, क्लीन एनर्जी और स्टील जैसे क्षेत्रों के प्रतिनिधियों के अलावा ऑटोमोटिव, वित्तीय सेवाओं, हेल्थकेयर और स्टार्टअप क्षेत्र से जुड़े कारोबारी भी शामिल हैं। इससे दौरे के दौरान होने वाली चर्चाओं का दायरा व्यापक रहने की उम्मीद है।

    टोक्यो पहुंचने के बाद गोयल ने जापान की प्रमुख कंपनी सुमितोमो कॉरपोरेशन के प्रेसिडेंट और सीईओ शिंगो उएनो के साथ बैठक की। दोनों पक्षों ने एनर्जी ट्रांसफॉर्मेशन, मोबिलिटी और औद्योगिक बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में भारत के साथ कंपनी के जुड़ाव को और गहरा करने की संभावनाओं पर चर्चा की।

    बैठक के दौरान भारत में निवेश आधारित आर्थिक विकास और तेजी से विस्तार कर रहे मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को जापानी कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण अवसर के तौर पर रेखांकित किया गया। भारत की औद्योगिक क्षमता और जापान की तकनीकी विशेषज्ञता के बीच सहयोग को आगे बढ़ाने पर भी जोर रहा।

    गोयल ने मेइजी सेइका फार्मा कंपनी लिमिटेड के प्रेसिडेंट और रिप्रेजेंटेटिव डायरेक्टर तोशियाकी नागासातो से भी मुलाकात की। इस बैठक में फार्मास्युटिकल क्षेत्र में भारत-जापान सहयोग को मजबूत करने और भारत में कंपनी की मैन्युफैक्चरिंग तथा रिसर्च एंड डेवलपमेंट गतिविधियों का विस्तार करने के अवसरों पर बातचीत हुई।

    भारत का फार्मास्युटिकल इकोसिस्टम जापानी कंपनियों के लिए बड़े स्तर पर कारोबार बढ़ाने और दीर्घकालिक विकास के अवसर उपलब्ध कराता है। ऐसे में इस क्षेत्र में सहयोग दोनों देशों के आर्थिक संबंधों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    गोयल की जापान यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब दोनों देश व्यापार और निवेश संबंधों को नई ऊंचाई देने की दिशा में काम कर रहे हैं। जापान भारत के प्रमुख आर्थिक साझेदारों में शामिल है और दोनों देशों के बीच तकनीक, निवेश, विनिर्माण तथा बुनियादी ढांचे से जुड़े क्षेत्रों में सहयोग की व्यापक संभावनाएं हैं।

    इस दौरे के दौरान कारोबारी बैठकों के साथ विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग और निवेश की संभावनाओं पर चर्चा होने की उम्मीद है। 200 से अधिक भारतीय कारोबारी प्रतिनिधियों की मौजूदगी इस यात्रा को व्यापारिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाती है। इससे भारतीय कंपनियों और जापानी उद्योग जगत के बीच सीधे संपर्क को बढ़ावा मिल सकता है।

    दौरे का व्यापक उद्देश्य दोनों देशों की विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी को आर्थिक स्तर पर और मजबूत करना है। निवेश, तकनीक, उत्पादन और औद्योगिक सहयोग के क्षेत्रों में आगे बढ़ने से भारत-जापान संबंधों को नए कारोबारी अवसर मिल सकते हैं।