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  • ईरान युद्ध के चलते कई देशों में आसमान पर पहुंचे पेट्रोल-डीजल के दाम… भारत में अब तक राहत

    ईरान युद्ध के चलते कई देशों में आसमान पर पहुंचे पेट्रोल-डीजल के दाम… भारत में अब तक राहत


    नई दिल्ली।
    ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध (Iran–US–Israel War.) शुरू होने के बाद से अबतक कई देशों में पेट्रोल-डीजल के दाम (Petrol-Diesel Price) आसमान पर पहुंच गए। फिलीपिंस में डीजल के रेट में 172 प्रतिशत उछाल आया तो म्यांमार में पेट्रोल के रेट डबल हो गए। लेकिन, भारत में पेट्रोल-डीजल के रेट में अभी राहत है। दिल्ली में पेट्रोल 94.77 और डीजल 87.67 रुपये प्रति लीटर पर पिछले कई साल से अटका हुआ है। यह आशंका प्रबल है कि यह राहत चुनाव के बाद छिन सकती है।


    पेट्रोल के दाम सबसे अधिक बढ़ाने वाले देश

    globalpetrolprices.com के लेटेस्ट डेटा के मुताबिक पेट्रोल के सबसे अधिक दाम बढ़ाने वाले देशों में म्यांमार (101.1%), फिलीपींस (72.6%), मलेशिया (68.1%), लाओस (45.6%), जिम्बाब्वे (42.9%) पाकिस्तान (42.0%), यूएई (40.8%), कंबोडिया (40.4%) और नेपाल (39.5%)।


    डीजल के दाम सबसे अधिक बढ़ाने वाले देश

    फिलीपींस 172.0%
    लाओस 169.5%
    म्यांमार 161.4%
    मलेशिया 124.7%
    न्यूजीलैंड 89.9%
    यूएई 86.1%
    कंबोडिया 84.0%
    लेबनान 80.5%
    वियतनाम 77.9%
    ऑस्ट्रेलिया 65.3%
    स्रोत: globalpetrolprices.com


    कई देशों को क्यों बढ़ाने पड़े पेट्रोल-डीजल के दाम

    युद्ध के शुरू होने के बाद ्रबेंट क्रूड की कीमत 71 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 111 डॉलर तक पहुंच गईं। सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बढ़ी, जिससे मार्च के मध्य तक ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर के ऊपर पहुंच गया। 6 अप्रैल तक यह 111.73 डॉलर पर था। हालांकि, सीजफायर के बीच इसमें गिरावट आई और कीमत 95.49 डॉलर पर आ गई।

    इस उतार-चढ़ाव का सीधा असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ा। दुनिया भर में औसत पेट्रोल कीमत 1.2 डॉलर प्रति लीटर से बढ़कर 1.44 डॉलर और डीजल 1.2 से 1.6 डॉलर प्रति लीटर तक पहुंच गया। डेटा के अनुसार कुछ देशों में ईंधन कीमतों में विस्फोटक उछाल देखने को मिली। खासतौर पर एशिया और छोटे आयात-निर्भर देशों में दाम तेजी से बढ़े।


    भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम क्यों नहीं बढ़े?

    एक ओर जब पूरी दुनिया में पेट्रोल-डीजल की कीमतो में आग लगी हई है तो दूसरी ओर भारत में शांति है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि भारत में इस दौरान पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगभग कोई बदलाव नहीं हुआ है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण बंगाल समेत 5 राज्यों का चुनाव और सरकार द्वारा टैक्स में कटौती। केंद्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल को महंगा होने से बचाने के लिए 10-10 रुपये टैक्स कम कर दिए। वहीं, निर्यात पर टैक्स बढ़ाया, ताकि घरेलू सप्लाई में दिक्कत न हो।

    क्या चुनाव बाद पेट्रोल-डीजल हो जाएगा महंगा?
    चाय की दुकानों से लेकर चौक-चौराहों तक यह चर्चा आम है कि पेट्रोल-डीजल के दाम 5 राज्यों के चुनाव के बाद बढ़ जाएंगे। Macquarie Group ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पेट्रोल पर कंपनियों को 18 और डीजल पर 35 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है। इस रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव के बाद पेट्रोल और डीजल की कीमतों में इजाफा होने की संभावना है। क्यांकि, एक बैरल कच्चे तेल में 10 डॉलर की बढ़ोतरी की वजह से कंपनियों को करीब 6 रुपये प्रति लीटर का नुकसान होता है।

  • मिडिल ईस्ट संकट के बीच कई देशो ने बढ़ाए पेट्रोल-डीजल के दाम, भारत में अभी तक राहत

    मिडिल ईस्ट संकट के बीच कई देशो ने बढ़ाए पेट्रोल-डीजल के दाम, भारत में अभी तक राहत


    नई दिल्ली।
    दुनिया (World) के कई देशों में पेट्रोल-डीजल के दाम (Petrol-Diesel Prices) बढ़ चुके हैं, लेकिन अभी तक भारत (India) के लोगों के लिए राहत है। ईरान-इजरायल युद्ध (Iran-Israel War.) की आग में जल रहे मिडिल-वेस्ट (Middle-West) के चलते कच्चे तेल में उबाल है।दुनिया (World) के कई देशों में पेट्रोल-डीजल के दाम (Petrol-Diesel Prices) बढ़ चुके हैं, लेकिन अभी तक भारत (India) के लोगों के लिए राहत है। ईरान-इजरायल युद्ध (Iran-Israel War.) की आग में जल रहे मिडिल-वेस्ट (Middle-West) के चलते कच्चे तेल में उबाल है। इसका असर ईंधन की कीमतों पर पड़ रहा है। 23 फरवरी 2026 को जहां दुनिया भर में ईंधन की कीमतें सामान्य स्तर पर थीं, वहीं ईरान में युद्ध शुरू होने के बाद से हालात पूरी तरह बदल गए। ब्रेंट क्रूड ने 71 डॉलर प्रति बैरल से छलांग लगाते हुए 100 डॉलर का आंकड़ा पार कर लिया। यह करीब 45 प्रतिशत की बढ़ोतरी है, जो ग्लोबल एनर्जी मार्केट में युद्ध की गंभीर आशंकाओं को साफ दर्शाता है।


    कीमतों का सीधा असर आम आदमी की जेब पर

    इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ना शुरू हो गया है। ग्लोबल पेट्रोल प्राइस डॉट कॉम के मुताबिक ग्लोबल लेवल पर पेट्रोल की औसत कीमतें 1.20 डॉलर प्रति लीटर से बढ़कर 1.27 डॉलर पर पहुंच गई हैं। जबकि, डीजल ने तो और भी तेज रफ्तार दिखाई है। डीजल की औसत कीमत 1.20 डॉलर से 1.33 डॉलर प्रति लीटर पर जा पहुंची। ये आंकड़े बताते हैं कि डीजल पर युद्ध की मार कहीं ज्यादा भारी पड़ी है।


    लाओस में डीजल ने लगाई 72.4 की छलांग

    लाओस में डीजल ने 72.4 प्रतिशत की छलांग लगाई है। वियतनाम में पेट्रोल की कीमतों में 50 प्रतिशत और डीजल में 65.8 प्रतिशत का उछाल आया है। कंबोडिया में डीजल 37.3 प्रतिशत महंगा हुआ है। ये आंकड़े बताते हैं कि दक्षिण पूर्व एशिया के इन देशों में ईंधन संकट ने विकराल रूप ले लिया है।


    नाइजीरिया में डीजल 62% महंगा, अमेरिका में भी भारी उछाल

    अफ्रीकी देश नाइजीरिया में पेट्रोल 39.5 प्रतिशत और डीजल 62.5 प्रतिशत महंगा हो चुका है। वहीं अमेरिका में भी डीजल में 27.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। प्यूर्टो रिको में तो डीजल 25.1 प्रतिशत महंगा हुआ है।


    यूरोप में जर्मनी और स्पेन सबसे ज्यादा प्रभावित

    यूरोपीय देशों में जर्मनी सबसे बुरी तरह प्रभावित हुआ है। यहां डीजल 25.3 प्रतिशत महंगा हुआ है। स्पेन में भी डीजल ने 25.6 प्रतिशत का उछाल दर्ज किया है। बेल्जियम, डेनमार्क और फ्रांस में भी डीजल के रेट 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़े हैं।


    भारत, चीन, रूस और सऊदी अरब में राहत

    हैरानी की बात है कि भारत, चीन, रूस और सऊदी अरब जैसे बड़े देशों में अभी तक पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। अल्जीरिया, अर्जेंटीना, ब्राजील, मैक्सिको और वेनेजुएला सहित तमाम देश ऐसे हैं, जहां कीमतें स्थिर हैं। यह साफ दिखता है कि ये सरकारें या तो सब्सिडी दे रही हैं या फिर कीमतों को नियंत्रित कर रही हैं।


    क्या भारत में आगे चलकर बढ़ेंगे पेट्रोल-डीजल के दाम

    कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का दबाव तो भारत पर भी पड़ रहा है। इधर देश के 5 राज्यों में चुनाव का भी ऐलान हो चुका है। ऐसे में कई विशेषज्ञों को लगता है कि चुनाव से पहले शायद की पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़े।


    कच्चे तेल का भारत पर क्या होगा असर

    क्रूड में हर 1 डॉलर की बढ़ोतरी से सालाना आयात बिल में लगभग 2 अरब डॉलर का इजाफा होता है। अभी क्रूड 100 डॉलर के पार बना हुआ है। इसका असर ये होगा कि आयात बिल बढ़ेगा, रुपये पर दबाव बढ़ेगा, सरकारी खर्च बढ़ेगा। इन चीजों से इससे अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है। यही नहीं, ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स, एविएशन,मैन्युफैक्चरिंग सब पर असर पड़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर युद्ध जारी रहता है इसका असर लंबे समय तक रह सकता है।


    इन देशों में उल्टा असर: सस्ता हो गया पेट्रोल-डीजल

    कुछ देशों में तो कीमतें घटी भी हैं। फिजी में पेट्रोल 4.3 प्रतिशत और डीजल 1.8 प्रतिशत सस्ता हुआ है। मेडागास्कर में दोनों में 4 प्रतिशत की गिरावट आई है। जांबिया में पेट्रोल 4.6 प्रतिशत सस्ता हुआ है। यानी इन देशों की सरकारों ने जनता को राहत देने के लिए कीमतों में कटौती का फैसला किया है।


    यहां पेट्रोल-डीजल के रेट में विरोधाभासी तस्वीर

    सीरिया में जहां पेट्रोल 5 प्रतिशत सस्ता हुआ है, वहीं डीजल 1.7 प्रतिशत महंगा हुआ है। उरुग्वे में पेट्रोल 1.2 और डीजल 3.2 प्रतिशत सस्ता हुआ है। यह अंतर बताता है कि इन देशों में सरकारें दोनों पेट्रोल और डीजल पर अलग-अलग नीति अपना रही हैं।


    युद्ध का लंबा साया: क्या और खराब होंगे हालात

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह तो सिर्फ शुरुआत है। आमतौर पर रिटेल मार्केट में तेल की कीमतों का पूरा असर दिखने में दो-तीन हफ्ते लग जाते हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में कुछ और भी देशों में कीमतें बढ़ सकती हैं। अगर युद्ध लंबा खिंचा तो नियंत्रित बाजार वाले देश भी तेल की कीमतें बढ़ाने पर मजबूर हो सकते हैं। फिलहाल यह तय है कि आम आदमी के लिए आने वाले दिनों में मुश्किलें और बढ़ा सकती है।

  • बदलते दौर में बिना शादी के बच्चे पैदा करना कई देशों में हुआ सामान्य … कई जगह अब भी सामाजिक कलंक!

    बदलते दौर में बिना शादी के बच्चे पैदा करना कई देशों में हुआ सामान्य … कई जगह अब भी सामाजिक कलंक!


    नई दिल्ली।
    शादी, परिवार और संतान… जिन्हें कभी समाज की स्थायी नींव माना जाता था, लेकिन बदलते समय (Changing Times) में दुनिया के कई हिस्सों में ये अवधारणाएं नए सिरे से परिभाषित हो रही हैं। बदलती जीवनशैली (Changing Lifestyle), कानूनी व्यवस्था (Legal System) और सामाजिक स्वीकृति (Social Acceptance) के कारण विवाह (Marriage) के बाहर बच्चों का जन्म कुछ देशों में सामान्य हो चुका है, जबकि कहीं यह अभी भी सामाजिक कलंक बना हुआ है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार, कई देशों में विवाह के बाहर बच्चों का जन्म अब आम बात हो गई है। हालांकि, एशिया और कुछ अन्य क्षेत्रों में यह प्रवृत्ति अभी भी बहुत कम है। ये बदलाव सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े हैं, जहां विवाह हर जगह संतान प्राप्ति की शर्त नहीं रहा। यूं कहें तो बिना शादी के परिवार बसाना कई जगहों पर ‘न्यू नॉर्मल’ बन गया है। ओईसीडी (OECD) के नए आंकड़ों के अनुसार, विश्व के कई देशों में औसतन लगभग 43% बच्चे विवाह के बाहर पैदा हो रहे हैं। यानी बिना शादी के महिलाएं मां बन रही हैं। आइए जानते हैं कि इस मामले में कौन-से देश सबसे आगे हैं…


    सबसे आगे लैटिन अमेरिका

    लैटिन अमेरिकी देश इस मामले में सबसे आगे हैं। कोलंबिया में 87% बच्चे विवाह के बाहर जन्म ले रहे हैं। इसके बाद चिली (78.1%), कोस्टा रिका (74%) और मैक्सिको (73.7%) का नंबर आता है। यहां लिव-इन रिलेशनशिप लंबे समय से सामाजिक और कानूनी रूप से स्वीकार्य है, जिससे औपचारिक शादी की जरूरत कम हो गई है। ऐतिहासिक असमानता और कानूनी पहुंच की कमी ने भी इन बदलावों को बढ़ावा दिया है।


    नॉर्डिक देशों में कल्याण व्यवस्था के साथ हाई रेशियो

    नॉर्डिक देशों ने परिवार के मानदंडों को नए सिरे से परिभाषित किया है। आइसलैंड में 69.4%, नॉर्वे में 61.2%, स्वीडन में 58% (लगभग) और डेनमार्क में 55% के आसपास बच्चे विवाह के बाहर पैदा हो रहे हैं। यहां मजबूत सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था और बच्चों को माता-पिता की वैवाहिक स्थिति से अलग कानूनी संरक्षण मिलने से विवाह अब व्यक्तिगत चुनाव बन गया है। लिव इन में रहने वाले जोड़ों को विवाहित जोड़ों के बराबर अधिकार प्राप्त हैं।


    एशिया और पूर्वी भूमध्यसागरीय में न्यूनतम दरें

    दूसरी ओर एशिया के कई देशों में स्थिति बिल्कुल उलट है। जापान में सिर्फ 2.4%, दक्षिण कोरिया में 4.7%, तुर्की में 3.1%, इजरायल में 8.6% और ग्रीस में 9.7% बच्चे विवाह के बाहर जन्म लेते हैं। यहां सांस्कृतिक मूल्य, धार्मिक परंपराएं और सख्त कानूनी ढांचा विवाह को संतान से जोड़े रखते हैं। एकल माता-पिता को सामाजिक कलंक और कम सहायता मिलने से यह प्रवृत्ति दबाव में रहती है।


    ओईसीडी

    भारत जैसे देशों में भी विवाह के बाहर जन्म की दर बहुत कम बनी हुई है। यही विवाद के बाहर बच्चों की जन्म दर एक फीसदी से भी कम है। भारत के पड़ोसी देशों और एशिया में भी यही स्थिति है, जहां सांस्कृतिक और सामाजिक मानदंड विवाह को प्राथमिकता देते हैं।


    एंग्लो-अमेरिकी और पश्चिमी यूरोप

    संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस और ज्यादातर पश्चिमी यूरोपीय देश बीचों बीच खड़े हैं। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में लगभग 40 प्रतिशत बच्चे विवाह के बाहर पैदा होते हैं, जो ऑस्ट्रिया और इटली के स्तर के करीब है। इन आंकड़ों से साफ है कि विवाह के बाहर बच्चों का जन्म सिर्फ सामाजिक बदलाव नहीं, बल्कि कानूनी संरचना, कल्याणकारी नीतियों और सांस्कृतिक स्वीकार्यता का संयुक्त परिणाम है। आने वाले वर्षों में यह अंतर और बढ़ सकता है, जिसका असर भारत समेत अन्य एशियाई देशों पर भी पड़ सकता है।