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  • प्लास्टिक नोटों में जानवरों की चर्बी जैसी अफवाहों का बाजार गर्म… जानिए क्या है सच?

    प्लास्टिक नोटों में जानवरों की चर्बी जैसी अफवाहों का बाजार गर्म… जानिए क्या है सच?


    नई दिल्ली।
    जेब में रखा नोट (Note) कुछ ही समय में मुड़ जाता है, गंदा हो जाता है और कई बार फट भी जाता है। इसी समस्या के बीच भारत (India) में पॉलिमर यानी प्लास्टिक (Plastic Currency) आधारित नोट लाने की तैयारी हो रही है। इसे लेकर कई तरह की बातें और अफवाहें भी चल रही हैं कि क्या कागज के नोट बंद हो जाएंगे? क्या प्लास्टिक के नोट ज्यादा टिकेंगे? यह कैसे अलग है? आखिर सरकार ने क्या मंजूरी दी है? क्या इन नोटों में पशु की चर्बी से बनी सामग्री भी डाली जाएगी? ये नोट कब तक आपकी जेब में आएंगे? इससे क्या बदलेगा? आइए जानते हैं…


    क्या है पॉलिमर नोट?

    पॉलिमर नोट (Polymer note) कागज के बजाय एक खास प्लास्टिक आधारित सामग्री से बनाए जाते हैं। इनकी सबसे बड़ी खासियत इनका ज्यादा टिकाऊ होना है। पॉलिमर सामग्री पानी, गंदगी और फटने के मामले में कागज की तुलना में ज्यादा मजबूत होती है। इसका फायदा खासकर उन छोटे नोटों में हो सकता है जो रोजाना बहुत ज्यादा इस्तेमाल होते हैं। ऐसे नोट जल्दी खराब होते हैं और उन्हें बार-बार बदलना पड़ता है। पॉलिमर नोट ज्यादा समय तक चलें तो नए नोट छापने और पुराने नोट बदलने की जरूरत कम हो सकती है।


    सरकार ने अभी क्या मंजूरी दी है?

    भारतीय रिजर्व बैंक ने अपने केंद्रीय बोर्ड की सिफारिश के बाद सरकार को पॉलिमर नोटों के क्षेत्रीय परीक्षण का प्रस्ताव भेजा था। यह प्रस्ताव भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 25 के तहत भेजा गया था। सरकार ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इसके तहत 10 और 20 रुपये के एक-एक अरब पॉलिमर नोट, यानी कुल दो अरब नोटों का क्षेत्रीय परीक्षण किया जाएगा। अगर परीक्षण सफल रहा तो इन दोनों मूल्यवर्ग के पॉलिमर नोटों को नियमित रूप से जारी किया जा सकता है।


    क्या कागज के पुराने नोट बंद हो जाएंगे?

    नहीं। सरकार ने साफ किया है कि पॉलिमर नोट कागज के नोटों को हटाकर नहीं लाए जाएंगे। अगर परीक्षण सफल होता है और इनकी नियमित आपूर्ति शुरू होती है तो पॉलिमर नोट मौजूदा कागज के नोटों के साथ ही चलेंगे। इसलिए पॉलिमर नोट आने का मतलब यह नहीं है कि लोगों के पास मौजूद कागज के नोट अचानक बेकार हो जाएंगे।


    इन्हें लाने का मुख्य मकसद क्या है?

    आरबीआई का मानना है कि पॉलिमर नोट पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में अधिक समय तक चलते हैं। विशेष रूप से छोटे मूल्यवर्ग के नोट, जिनका उपयोग सबसे अधिक होता है और जो जल्दी खराब हो जाते हैं, उनके लिए यह बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं। इससे नोटों की बार-बार छपाई और प्रतिस्थापन पर आने वाली लागत में भी कमी आने की संभावना है। पॉलिमर नोटों में उन्नत सुरक्षा तकनीक का भी इस्तेमाल किया जाएगा। इनमें पारदर्शी विंडो सहित कई आधुनिक सुरक्षा फीचर शामिल किए जा सकते हैं, जिससे नकली नोटों की पहचान आसान होगी और जालसाजी पर प्रभावी अंकुश लगाने में मदद मिलेगी।


    क्या पहले भी हुई थी प्लास्टिक के नोटों को लाने की कोशिश?

    भारत में पॉलिमर नोट का विचार नया नहीं है। 2009 में इस दिशा में काम शुरू हुआ था। इसके बाद 2012 में 10 रुपये के एक अरब पॉलिमर नोटों का क्षेत्रीय परीक्षण करने की योजना बनाई गई। इसके लिए अलग-अलग भौगोलिक और मौसम संबंधी परिस्थितियों वाले पांच शहर चुने गए थे जिनमें कोच्चि, मैसूर, जयपुर, शिमला और भुवनेश्वर शामिल थे। उस समय भी मकसद कम मूल्यवर्ग के नोटों की उम्र बढ़ाना था।

    2012 का परीक्षण क्यों आगे नहीं बढ़ पाया?
    उस समय पॉलिमर नोटों को तेज गति से चलने वाली मशीनों में इस्तेमाल करने पर घर्षण और स्थैतिक बिजली की समस्या सामने आई। इससे नोट आपस में चिपकने लगे और मशीनों में एक साथ कई नोट जाने की परेशानी हुई। इसके अलावा उस समय पॉलिमर सामग्री का इस्तेमाल, उसकी स्याही के घिसने, अलग-अलग मौसम में प्रदर्शन और मशीनों के साथ अनुकूलता जैसी चुनौतियां भी सामने आईं।


    पुरानी योजना के सामने और क्या दिक्कतें थीं?

    उस समय पॉलिमर नोट बनाने की सामग्री चीन, मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देशों से आयात की जाती थी। आयात से जुड़ी प्रक्रियाएं और सामग्री की कीमत भी चुनौती थीं। इसके अलावा कई वाणिज्यिक बैंकों ने अपने मौजूदा ढांचे को पॉलिमर नोटों के अनुरूप बदलने के लिए होने वाली अतिरिक्त पूंजीगत लागत को लेकर चिंता जताई थी।

    2016 की नोटबंदी के बाद इस योजना की रफ्तार और प्रभावित हुई। आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2016-17 में मुद्रा छपाई की लागत 7,965 करोड़ रुपये तक पहुंच गई थी। इसके बाद पॉलिमर नोट से जुड़े प्रयोग आगे नहीं बढ़ सके।


    इस बार पिछली समस्या से कैसे निपटा जा रहा है?

    इस बार पॉलिमर सामग्री में एंटी-स्टैटिक कोटिंग का प्रावधान रखा गया है। इसका उद्देश्य स्थैतिक बिजली की समस्या को कम करना है, ताकि नोट आपस में चिपकें नहीं और मशीनों में एक साथ कई नोट जाने या मशीन के अटकने जैसी समस्या कम हो। भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से जारी टेंडर के अनुसार, ऐसी सामग्री मांगी गई है जिस पर आवश्यक अपारदर्शी परत के साथ एंटी-स्टैटिक कोटिंग हो और जो छपाई व स्याही के चिपकने के लिए उपयुक्त हो।


    नोट में सुरक्षा के लिए क्या?

    पॉलिमर सामग्री में सुरक्षा विशेषताओं को शामिल करने की क्षमता मांगी गई है। इसमें पारदर्शी खिड़की में चित्र, धातु जैसा अंक, चुंबकीय सुरक्षा धागा, छाया चित्र और चमक बदलने वाला पैटर्न जैसी विशेषताएं शामिल हैं। इस तरह सुरक्षा संबंधी कुछ विशेषताओं को पॉलिमर सामग्री में ही शामिल किया जा सकता है।


    नोटों में पशु चर्बी की अफवाह में कितना दम है?

    इस तरह की बातें सिर्फ कोरी अफवाह हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से जारी टेंडर में पॉलिमर सामग्री को लेकर एक खास शर्त रखी गई है। इसमें पशु वसा यानी एनिमल टैलो या पशु का डीएनए नहीं होना चाहिए। इसके लिए कंपनी को इसका प्रमाण पत्र देना होगा। केवल प्रमाण पत्र ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि कंपनियों की ओर से दिए गए पॉलिमर नमूनों की प्रयोगशाला में जांच भी की जाएगी।


    आरबीआई की नोट छापने वाली कंपनी ने क्या प्रक्रिया शुरू की?

    भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड यानी बीआरबीएनएमपीएल ने 17 जुलाई 2026 को पॉलिमर सब्सट्रेट की आपूर्ति के लिए वैश्विक रुचि आमंत्रण जारी किया है। इसमें ऐसी योग्य कंपनियों से रुचि मांगी गई है, जो भारतीय बैंक नोटों की छपाई के लिए सुरक्षा विशेषताओं वाली अपारदर्शी पॉलिमर सब्सट्रेट शीट बना और उपलब्ध करा सकें। यह अभी अंतिम खरीद निविदा नहीं है। इस प्रक्रिया में योग्य कंपनियों की पहचान की जाएगी और आगे मुख्य निविदा की प्रक्रिया हो सकती है।

  • कमजोर वैश्विक संकेतों और प्रमुख सेक्टरों में बिकवाली के चलते सेंसेक्स 183.15 अंक और निफ्टी 126.80 अंक गिरकर बंद हुए।

    कमजोर वैश्विक संकेतों और प्रमुख सेक्टरों में बिकवाली के चलते सेंसेक्स 183.15 अंक और निफ्टी 126.80 अंक गिरकर बंद हुए।

    नई दिल्ली ।भारतीय शेयर बाजार में बुधवार को कारोबारी सप्ताह के तीसरे दिन गिरावट देखने को मिली। पिछले सत्र में तेजी के बाद घरेलू बाजार बुधवार को कमजोर वैश्विक संकेतों के बीच दबाव में रहा। आईटी, एफएमसीजी और ऑटो शेयरों में कमजोरी ने प्रमुख सूचकांकों पर असर डाला। कारोबार समाप्त होने पर सेंसेक्स 183.15 अंक यानी 0.24 प्रतिशत की गिरावट के साथ 77,472.94 अंक पर बंद हुआ। निफ्टी 50 भी 126.80 अंक यानी 0.52 प्रतिशत टूटकर 24,207.75 अंक पर पहुंच गया।

    बुधवार के सत्र की शुरुआत हालांकि सकारात्मक रुख के साथ हुई थी। सेंसेक्स पिछले कारोबारी सत्र के 77,656.09 अंक के स्तर से 236 अंक की बढ़त के साथ 77,892.10 अंक पर खुला। शुरुआती कारोबार में खरीदारी बढ़ने से यह 330.75 अंक तक चढ़कर 77,986.84 अंक के इंट्रा-डे उच्च स्तर पर पहुंच गया। हालांकि बाद में बाजार की शुरुआती बढ़त कायम नहीं रह सकी और सूचकांक फिसलकर 77,472.94 अंक के दिन के निचले स्तर पर बंद हुआ।

    निफ्टी 50 भी 24,334.55 अंक के पिछले बंद स्तर की तुलना में मामूली बढ़त के साथ 24,341.95 अंक पर खुला। कारोबार के दौरान यह 24,378.60 अंक के उच्च स्तर तक पहुंचा, लेकिन बाद में बिकवाली का दबाव बढ़ने से 24,207.75 अंक के निचले स्तर तक आ गया। अंत में निफ्टी 0.52 प्रतिशत की गिरावट के साथ बंद हुआ।

    व्यापक बाजार में भी एक समान रुख नहीं रहा। निफ्टी मिडकैप इंडेक्स में 0.10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जबकि निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स 0.81 प्रतिशत की बढ़त के साथ बंद हुआ। इससे संकेत मिला कि बड़े शेयरों में दबाव के बावजूद कुछ छोटे शेयरों में निवेशकों की दिलचस्पी बनी रही।

    सेक्टरवार कारोबार में निफ्टी आईटी इंडेक्स सबसे कमजोर क्षेत्रों में रहा। एफएमसीजी, ऑटो और रियल्टी शेयरों पर भी दबाव देखा गया। इसके विपरीत मेटल, प्राइवेट बैंक और सीमेंट से जुड़े शेयरों में मजबूती रही। बैंकिंग और मेटल क्षेत्र की कुछ कंपनियों में खरीदारी ने बाजार की गिरावट को सीमित करने में मदद की।

    निफ्टी 50 के प्रमुख बढ़त वाले शेयरों में कोटक महिंद्रा बैंक, एक्सिस बैंक, जेएसडब्ल्यू स्टील, अल्ट्राटेक सीमेंट, एचडीएफसी लाइफ और एसबीआई लाइफ शामिल रहे। दूसरी ओर भारती एयरटेल, पावरग्रिड, इंफोसिस, एलएंडटी, नेस्ले इंडिया और श्रीराम फाइनेंस कमजोर प्रदर्शन करने वाले प्रमुख शेयरों में रहे।

    बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, शुरुआती बढ़त के बाद अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग रुझान बनने से प्रमुख सूचकांकों पर दबाव बढ़ा। वैश्विक बाजारों के संकेतों के साथ कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक घटनाक्रम भी निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण रहे।

    ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों में संभावित ढील से महंगाई को लेकर कुछ चिंताएं कम होने की बात कही गई। इससे घरेलू बॉन्ड यील्ड में नरमी और बैंकिंग शेयरों में मजबूती देखने को मिली। बेहतर कमाई की उम्मीदों से मेटल शेयरों में भी खरीदारी रही। हालांकि आईटी शेयरों में गिरावट ने इन क्षेत्रों की तेजी का असर काफी हद तक कम कर दिया।

    अमेरिका में आव्रजन नियमों को लेकर सख्ती और वीजा अपॉइंटमेंट से जुड़े घटनाक्रम के कारण आईटी कंपनियों के मार्जिन पर दबाव की आशंकाएं बनी हुई हैं। आने वाले दिनों में निवेशकों की नजर अमेरिकी महंगाई के प्रमुख आंकड़ों पर रहेगी। विशेष रूप से कोर पीसीई आंकड़ों से ब्याज दरों की दिशा को लेकर बाजार को संकेत मिलने की उम्मीद है। इन आंकड़ों के आधार पर वैश्विक निवेश धारणा और उभरते बाजारों में पूंजी प्रवाह की दिशा प्रभावित हो सकती है।

  • वैश्विक सूचकांक प्रदाता एमएससीआई ने अगस्त समीक्षा के तहत भारतीय शेयर बाजार में किया बड़ा फेरबदल, 31 अगस्त से प्रभावी होंगे बदलाव।

    वैश्विक सूचकांक प्रदाता एमएससीआई ने अगस्त समीक्षा के तहत भारतीय शेयर बाजार में किया बड़ा फेरबदल, 31 अगस्त से प्रभावी होंगे बदलाव।


    नई दिल्ली ।
    वैश्विक सूचकांक प्रदाता एमएससीआई अर्थात मॉर्गन स्टेनली कैपिटल इंटरनेशनल ने अपनी अगस्त की आवधिक समीक्षा के तहत भारतीय शेयर बाजार के प्रमुख सूचकांकों में महत्वपूर्ण बदलावों की घोषणा की है। इस नवीनतम समीक्षा के अंतर्गत अदाणी एनर्जी सॉल्यूशंस सहित चार नई कंपनियों को एमएससीआई इंडिया इंडेक्स में स्थान दिया गया है। इसके विपरीत तीन कंपनियों को इस सूचकांक से बाहर का रास्ता दिखाया गया है। यह सभी पुनर्संतुलन 31 अगस्त के कारोबार की समाप्ति के पश्चात आधिकारिक रूप से प्रभावी कर दिए जाएंगे।

    एमएससीआई द्वारा जारी विवरण के अनुसार, मुख्य सूचकांक में शामिल की गई अन्य कंपनियां मुख्य रूप से पूंजी बाजार और फार्मास्यूटिकल्स जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों से संबद्ध रखती हैं। वैश्विक सूचकांक में कंपनियों का चयन उनके बाजार पूंजीकरण, तरलता और फ्री-फ्लोट जैसे कड़े वैश्विक मानकों के आधार पर किया जाता है। इन्हीं मानकों के आधार पर यह निर्धारित होता है कि किस कंपनी का सूचकांक में प्रवेश होगा अथवा किसे बाहर किया जाएगा।

    मुख्य सूचकांक के साथ-साथ एमएससीआई इंडिया डोमेस्टिक स्मॉल कैप इंडेक्स में भी बड़ा पुनर्गठन देखने को मिला है। इस स्मॉल कैप सूचकांक में 12 नए शेयरों को स्थान दिया गया है, जबकि 19 शेयरों को सूचकांक से हटा दिया गया है। इस प्रकार स्मॉल कैप श्रेणी में सात कंपनियों की शुद्ध कमी दर्ज की गई है। इस बदलाव से भारतीय शेयर बाजार में बड़े पैमाने पर पोर्टफोलियो पुनर्संतुलन की प्रक्रिया प्रारंभ होने की संभावना है।

    एमएससीआई इंडेक्स को दुनिया भर के बड़े संस्थागत निवेशक और पैसिव फंड मुख्य बेंचमार्क के रूप में उपयोग करते हैं। जब भी इस सूचकांक में कोई बदलाव होता है, तब अंतरराष्ट्रीय फंड प्रबंधक अपने पोर्टफोलियो को नए वेटेज के अनुसार पुनर्संतुलित करते हैं। इसके परिणामस्वरूप संबंधित कंपनियों के शेयरों में भारी मात्रा में विदेशी पूंजी का आगमन या निकासी देखने को मिलती है। एमएससीआई का भारत केंद्रित सूचकांक भारतीय इक्विटी बाजार के लगभग 85 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है।

    बाजार विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस समीक्षा के बाद भारतीय शेयर बाजार में अरबों रुपये का पैसिव निवेश प्रवाह आ सकता है। पूर्व में भी यह संभावना व्यक्त की गई थी कि कुछ बेहतर प्रदर्शन करने वाली कंपनियां स्मॉल कैप श्रेणी से पदोन्नत होकर स्टैंडर्ड इंडेक्स का हिस्सा बन सकती हैं। मध्य प्रदेश सहित देश भर के निवेशकों और बाजार विश्लेषकों की नजरें इन बदलावों के बाद होने वाले पूंजी प्रवाह पर टिकी हुई हैं।

    एमएससीआई की आधिकारिक घोषणा के तुरंत बाद संबंधित कंपनियों के शेयरों में मजबूत खरीदारी का रुझान देखा गया। विशेष रूप से अदाणी एनर्जी सॉल्यूशंस के शेयर में शुरुआती सत्र में ही बढ़त दर्ज की गई। लंबे समय के वित्तीय प्रदर्शन के दृष्टिकोण से देखा जाए तो कंपनी के शेयर ने पिछले वर्षों में निवेशकों को लगातार बेहतर रिटर्न प्रदान किया है। इस वैश्विक सूचकांक में शामिल होने से कंपनी के शेयरों में अंतरराष्ट्रीय निवेश प्रवाह और अधिक मजबूत होने की उम्मीद जताई जा रही है।

  • Stock Market Closing: बैंकिंग शेयरों की तेजी और क्रूड ऑयल में नरमी से लगातार दूसरे दिन मजबूत हुआ भारतीय बाजार

    Stock Market Closing: बैंकिंग शेयरों की तेजी और क्रूड ऑयल में नरमी से लगातार दूसरे दिन मजबूत हुआ भारतीय बाजार

    नई दिल्ली । वैश्विक बाजारों से मिले मिश्रित संकेतों के बावजूद भारतीय शेयर बाजार ने गुरुवार को लगातार दूसरे कारोबारी सत्र में मजबूती के साथ कारोबार समाप्त किया। निवेशकों की सकारात्मक धारणा, कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और बैंकिंग शेयरों में खरीदारी के चलते प्रमुख सूचकांकों में बढ़त दर्ज की गई। कारोबार के अंत में बीएसई सेंसेक्स 373.76 अंकों की बढ़त के साथ 78,954.76 के स्तर पर बंद हुआ, जबकि एनएसई निफ्टी 11.35 अंक चढ़कर 24,636.00 पर पहुंच गया। निफ्टी का 24,600 के ऊपर बंद होना बाजार की मजबूती का संकेत माना जा रहा है।

    कारोबार के दौरान बाजार में उतार-चढ़ाव देखने को मिला, लेकिन अंतिम चरण में चुनिंदा हैवीवेट और बैंकिंग शेयरों में खरीदारी बढ़ने से सूचकांक हरे निशान में बंद हुए। इससे पहले मंगलवार की गिरावट के बाद भी बाजार ने वापसी करते हुए लगातार दूसरे दिन बढ़त दर्ज की है। निवेशकों का मानना है कि घरेलू आर्थिक संकेतकों और वैश्विक परिस्थितियों में सुधार से आगे भी बाजार को समर्थन मिल सकता है।

    सेक्टरवार प्रदर्शन पर नजर डालें तो पीएसयू बैंक शेयरों में सबसे अधिक तेजी देखने को मिली। इसके अलावा ऑयल एंड गैस, फाइनेंशियल सर्विसेज और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर ने भी सकारात्मक प्रदर्शन किया। दूसरी ओर मीडिया, रियल्टी, ऑटो, मेटल और आईटी सेक्टर में मुनाफावसूली के कारण गिरावट दर्ज की गई। इसके बावजूद व्यापक बाजार में स्मॉलकैप शेयरों की मजबूती ने निवेशकों का भरोसा बनाए रखा।

    निफ्टी 50 के प्रमुख शेयरों में एसबीआई, बीईएल, टाइटन, श्रीराम फाइनेंस, सिप्ला और इटरनल में अच्छी बढ़त दर्ज की गई। वहीं पावर ग्रिड, टाटा स्टील, जेएसडब्ल्यू स्टील, टीसीएस और बजाज ऑटो के शेयर दबाव में रहे। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशक फिलहाल मजबूत मूलभूत आधार वाली कंपनियों में निवेश को प्राथमिकता दे रहे हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार कच्चे तेल की कीमतों में आई नरमी और पश्चिम एशिया में समुद्री व्यापार को सामान्य बनाने की दिशा में जारी कूटनीतिक प्रयासों ने बाजार की धारणा को मजबूत किया है। इससे महंगाई पर दबाव कम होने और कंपनियों की लागत घटने की उम्मीद बढ़ी है, जिसका सकारात्मक असर कॉर्पोरेट मुनाफे पर पड़ सकता है। इसी वजह से निवेशकों का भरोसा बाजार में बना हुआ है।

    भारतीय रिजर्व बैंक के स्थिर नीतिगत रुख और आर्थिक विकास को लेकर सकारात्मक संकेतों ने भी निवेशकों का उत्साह बढ़ाया है। बैंकिंग और ऊर्जा क्षेत्र के शेयरों में आई खरीदारी इसी भरोसे को दर्शाती है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि आने वाली तिमाहियों में बेहतर कॉर्पोरेट नतीजों की संभावना निवेशकों को आकर्षित कर सकती है।

    हालांकि कुछ क्षेत्रों में मुनाफावसूली देखने को मिली, लेकिन स्मॉलकैप और चुनिंदा वैल्यू शेयरों में निवेशकों की दिलचस्पी बनी रही। विशेष रूप से ऊर्जा, टेलीकॉम और रिटेल से जुड़े कारोबार में लंबी अवधि की संभावनाओं को देखते हुए निवेशकों ने खरीदारी जारी रखी। इससे बाजार का समग्र रुख सकारात्मक बना रहा और प्रमुख सूचकांक लगातार दूसरे दिन बढ़त के साथ बंद होने में सफल रहे।

  • सरकार ने LIC में 6.5 फीसदी हिस्सेदारी बिक्री शुरू की, शेयर 8 प्रतिशत तक टूटने से बाजार में हलचल

    सरकार ने LIC में 6.5 फीसदी हिस्सेदारी बिक्री शुरू की, शेयर 8 प्रतिशत तक टूटने से बाजार में हलचल

    नई दिल्ली । देश की सबसे बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) के शेयर मंगलवार को तेज दबाव में दिखाई दिए। केंद्र सरकार द्वारा ऑफर फॉर सेल (ओएफएस) के माध्यम से अपनी हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया शुरू किए जाने के बाद कंपनी के शेयर में कारोबार के दौरान लगभग 8 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई। हालांकि बाद में शेयर में कुछ सुधार देखने को मिला, लेकिन दिनभर निवेशकों के बीच इस फैसले को लेकर चर्चा बनी रही।

    सरकार ने एलआईसी में अपनी 2.5 प्रतिशत मूल हिस्सेदारी बिक्री के साथ 4 प्रतिशत तक का ग्रीनशू विकल्प भी रखा है। इस तरह कुल 6.5 प्रतिशत हिस्सेदारी बाजार में बिक्री के लिए उपलब्ध कराई गई है। इस हिस्सेदारी बिक्री से केंद्र सरकार को 31 हजार करोड़ रुपये से अधिक जुटाने की उम्मीद है। यह सार्वजनिक क्षेत्र की किसी प्रमुख वित्तीय संस्था में सरकार की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी बिक्री में शामिल माना जा रहा है।

    ऑफर फॉर सेल के लिए प्रति शेयर 382 रुपये का फ्लोर प्राइस तय किया गया है, जो बाजार मूल्य से लगभग 10 प्रतिशत कम है। इसी वजह से बाजार खुलते ही एलआईसी के शेयर पर दबाव बढ़ गया और निवेशकों ने बिकवाली शुरू कर दी। कारोबार के दौरान शेयर लगभग 390.70 रुपये तक फिसल गया। बाद में कुछ खरीदारी लौटने से गिरावट सीमित हुई, लेकिन शेयर दिनभर दबाव में ही कारोबार करता रहा।

    शेयर में आई गिरावट का असर कंपनी के कुल बाजार पूंजीकरण पर भी दिखाई दिया। एलआईसी का मार्केट कैप घटकर लगभग 5.03 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि ओएफएस के दौरान फ्लोर प्राइस कम तय होने के कारण अल्पकालिक दबाव बनना सामान्य स्थिति है। हालांकि दीर्घकाल में कंपनी के प्रदर्शन और निवेशकों की भागीदारी पर बाजार की नजर बनी रहेगी।

    सरकार की ओर से यह ऑफर दो दिनों के लिए खोला गया है। पहले दिन गैर-खुदरा यानी संस्थागत निवेशकों को आवेदन का अवसर दिया गया है, जबकि दूसरे दिन खुदरा निवेशक भी इसमें भाग ले सकेंगे। इस प्रक्रिया के माध्यम से सरकार अपनी हिस्सेदारी घटाने के साथ-साथ सार्वजनिक शेयरधारिता बढ़ाने के लक्ष्य को भी पूरा करना चाहती है।

    वर्तमान में एलआईसी में केंद्र सरकार की लगभग 96.5 प्रतिशत हिस्सेदारी है। नियामकीय प्रावधानों के अनुसार सूचीबद्ध कंपनियों में न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता बनाए रखना आवश्यक होता है। ऐसे में इस हिस्सेदारी बिक्री को उसी दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। सरकार का उद्देश्य बाजार में अधिक सार्वजनिक भागीदारी सुनिश्चित करने के साथ पूंजी जुटाना भी है।

    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में निवेशकों की प्रतिक्रिया, ओएफएस को मिलने वाला प्रतिसाद और एलआईसी के शेयर का प्रदर्शन इस प्रक्रिया की सफलता तय करेगा। फिलहाल निवेशकों की नजर इस हिस्सेदारी बिक्री और इसके बाजार पर पड़ने वाले प्रभाव पर बनी हुई है।

  • गिरावट के बाद शेयर बाजार की दमदार वापसी, सेंसेक्स 889 अंक उछला, निफ्टी 24,250 के पार बंद

    गिरावट के बाद शेयर बाजार की दमदार वापसी, सेंसेक्स 889 अंक उछला, निफ्टी 24,250 के पार बंद

    नई दिल्ली। वैश्विक बाजारों से मिले मिश्रित संकेतों के बावजूद भारतीय शेयर बाजार ने बुधवार को जोरदार वापसी करते हुए निवेशकों का भरोसा मजबूत किया। पिछले कारोबारी सत्र की गिरावट के बाद घरेलू बाजार में व्यापक खरीदारी देखने को मिली, जिसके चलते बीएसई सेंसेक्स 889.68 अंकों की बढ़त के साथ 77,654.60 पर बंद हुआ। वहीं, एनएसई निफ्टी 50 भी 264.85 अंकों की छलांग लगाकर 24,250.20 के स्तर पर पहुंच गया। दिनभर के कारोबार में दोनों प्रमुख सूचकांकों में एक प्रतिशत से अधिक की तेजी दर्ज की गई।

    कारोबार की शुरुआत भी सकारात्मक रुख के साथ हुई थी। सेंसेक्स अपने पिछले बंद स्तर से करीब 658 अंक ऊपर खुला और कारोबार के दौरान एक समय लगभग 1,000 अंकों तक उछल गया। इसी तरह निफ्टी ने भी मजबूत शुरुआत की और दिन के दौरान 24,283.55 के उच्चतम स्तर तक पहुंचने में सफल रहा। बाजार में लगातार बनी खरीदारी ने दिन के अंत तक तेजी का माहौल कायम रखा।

    बाजार में आई तेजी का सबसे बड़ा आधार आईटी शेयर रहे, जिनमें मजबूत खरीदारी देखने को मिली। इसके अलावा फार्मा, मेटल, मीडिया, टेलीकॉम, एफएमसीजी, प्राइवेट बैंक और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर के शेयरों में भी अच्छी बढ़त दर्ज की गई। केवल रियल एस्टेट सेक्टर दबाव में रहा और लाल निशान में बंद हुआ। व्यापक बाजारों में भी सकारात्मक माहौल दिखाई दिया। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स में करीब 0.82 प्रतिशत और स्मॉलकैप 100 इंडेक्स में लगभग 1.48 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई, जिससे यह संकेत मिला कि निवेशकों की रुचि केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रही।

    प्रमुख कंपनियों की बात करें तो जियो फाइनेंशियल सर्विसेज, हिंदुस्तान यूनिलीवर, इंफोसिस, हिंडाल्को इंडस्ट्रीज और लार्सन एंड टुब्रो के शेयरों में दो प्रतिशत से अधिक की तेजी देखने को मिली। दूसरी ओर, महिंद्रा एंड महिंद्रा, पावर ग्रिड, आयशर मोटर्स, बजाज ऑटो, बीईएल, ओएनजीसी और एचडीएफसी लाइफ के शेयर दबाव में रहे और इनमें हल्की गिरावट दर्ज की गई।

    बाजार की इस तेजी का सीधा फायदा निवेशकों को भी मिला। बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण एक ही कारोबारी सत्र में करीब 4 लाख करोड़ रुपये बढ़ गया। इसके साथ ही कुल मार्केट कैप बढ़कर 483 लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंच गया। इससे यह साफ हुआ कि व्यापक स्तर पर निवेशकों का भरोसा फिर से मजबूत हुआ है और खरीदारी का रुझान बढ़ा है।

    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि हाल की गिरावट के बाद निवेशकों ने आकर्षक स्तरों पर खरीदारी की, जिससे बाजार को मजबूती मिली। विशेषज्ञों के अनुसार इसे वैल्यू बाइंग का संकेत माना जा सकता है। हालांकि आने वाले दिनों में बाजार की दिशा काफी हद तक कंपनियों के तिमाही नतीजों, पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति और कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर करेगी। यदि वैश्विक हालात स्थिर रहते हैं और कॉरपोरेट नतीजे उम्मीद के अनुरूप आते हैं, तो बाजार में सकारात्मक रुख आगे भी जारी रह सकता है।

  • कीमती धातुओं के बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच सोने की कीमतों में बड़ी गिरावट, निवेशकों के लिए नए अवसर और चुनौतियां

    कीमती धातुओं के बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच सोने की कीमतों में बड़ी गिरावट, निवेशकों के लिए नए अवसर और चुनौतियां

    नई दिल्ली । भारतीय बुलियन और सर्राफा बाजार में सोने की कीमतों में लगातार आ रही गिरावट ने निवेशकों और खरीदारों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। वर्ष की शुरुआत में सर्वकालिक उच्च स्तर को छूने के बाद अब सोने के दामों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। रिकॉर्ड स्तर से करीब 37 हजार रुपये प्रति दस ग्राम की गिरावट के बाद बाजार में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि क्या यह नए निवेश का सही समय है या अभी कीमतों में और सुधार देखने को मिल सकता है।

    वैश्विक बाजार के रुझानों का सीधा असर घरेलू सर्राफा बाजार पर देखने को मिल रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भू-राजनीतिक तनावों, कच्चे तेल की अनिश्चित कीमतों और अमेरिकी केंद्रीय बैंक की सख्त मौद्रिक नीतियों के कारण सोने की वैश्विक दरों पर लगातार दबाव बना हुआ है। जनवरी महीने में अंतरराष्ट्रीय बाजार में 5,602 डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने वाला सोना अब घटकर करीब 4,040 डॉलर प्रति औंस के आसपास कारोबार कर रहा है। इसी के प्रभाव से भारतीय बाजार में भी कीमतें एक लाख अस्सी हजार रुपये के पीक स्तर से गिरकर एक लाख तैंतालीस हजार रुपये प्रति दस ग्राम के स्तर पर आ गई हैं।

    बाजार विशेषज्ञों के अनुसार सोने की कीमतों में इस नरमी का मुख्य कारण केंद्रीय बैंकों की ब्याज दर नीतियां हैं। अमेरिका में महंगाई पर नियंत्रण के लिए अपनाई जा रही कड़ी मौद्रिक नीतियों और ब्याज दरों में कटौती की संभावना न के बराबर होने के कारण निवेशक फिक्स्ड रिटर्न देने वाले अन्य वित्तीय साधनों की ओर रुख कर रहे हैं। चूंकि सोना कोई प्रत्यक्ष ब्याज या लाभांश प्रदान नहीं करता, इसलिए उच्च ब्याज दर के दौर में इसकी मांग पर नकारात्मक प्रभाव देखने को मिलता है।

    बाजार के दीर्घकालिक आंकड़ों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि सोने ने ऐतिहासिक रूप से निवेशकों को सुरक्षित और आकर्षक रिटर्न दिया है। पिछले तीन दशकों के दौरान इस पीली धातु के मूल्यों में व्यापक वृद्धि दर्ज की गई है। यद्यपि अल्पकालिक अवधि में भू-राजनीतिक बदलावों और आर्थिक नीतियों के कारण इसमें बड़े उतार-चढ़ाव आते रहे हैं, लेकिन दीर्घकालिक नजरिए से इसे हमेशा से एक मजबूत परिसंपत्ति माना जाता रहा है।

    बाजार विश्लेषकों का सुझाव है कि जो निवेशक अपने पोर्टफोलियो में सोने को शामिल करना चाहते हैं, उनके लिए एकमुश्त निवेश के बजाय व्यवस्थित तरीके से किस्तों में खरीदारी करना अधिक जोखिम-रहित रणनीति हो सकती है। आने वाले समय में वैश्विक बाजार के रुझानों और नीतिगत निर्णयों के आधार पर कीमतों में सीमित दायरे का उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना जताई जा रही है।

  • वैश्विक तनाव के बीच सपाट बंद हुआ शेयर बाजार, सेंसेक्स दिन के उच्चतम स्तर से 393 अंक फिसला, निफ्टी भी बढ़त गंवाकर बंद

    वैश्विक तनाव के बीच सपाट बंद हुआ शेयर बाजार, सेंसेक्स दिन के उच्चतम स्तर से 393 अंक फिसला, निफ्टी भी बढ़त गंवाकर बंद

    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कमजोर वैश्विक संकेतों के बीच गुरुवार को भारतीय शेयर बाजार उतार-चढ़ाव भरे कारोबार के बाद लगभग सपाट स्तर पर बंद हुआ। शुरुआती कारोबार में निवेशकों की खरीदारी से बाजार में अच्छी तेजी देखने को मिली, लेकिन दिन के दूसरे हिस्से में मुनाफावसूली हावी होने से अधिकांश बढ़त खत्म हो गई। कारोबार समाप्त होने पर बीएसई सेंसेक्स 1.44 अंक की मामूली बढ़त के साथ 77,186.87 अंक पर बंद हुआ, जबकि एनएसई निफ्टी 50 सूचकांक 5.75 अंक की गिरावट के साथ 24,072.75 अंक पर बंद हुआ।

    कारोबार की शुरुआत सकारात्मक रही। सेंसेक्स करीब 203 अंकों की बढ़त के साथ खुला और दिन के दौरान 77,579.69 अंक के उच्चतम स्तर तक पहुंच गया। हालांकि बाद में बिकवाली बढ़ने से यह अपने इंट्रा-डे हाई से करीब 393 अंक नीचे फिसलकर बंद हुआ। इसी तरह निफ्टी भी शुरुआती मजबूती के साथ 24,186.50 अंक तक पहुंचा, लेकिन अंतिम घंटों में मुनाफावसूली के चलते अपनी अधिकांश बढ़त गंवा बैठा।

    बाजार की व्यापक तस्वीर मिश्रित रही। कारोबार के दौरान लगभग 1,947 शेयरों में तेजी दर्ज की गई, जबकि 2,119 शेयर गिरावट के साथ बंद हुए और 194 शेयरों में कोई बदलाव नहीं हुआ। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी दबाव देखने को मिला। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स में 0.41 प्रतिशत और स्मॉलकैप 100 इंडेक्स में 0.10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जिससे यह संकेत मिला कि निवेशकों ने मुनाफावसूली को प्राथमिकता दी।

    सेक्टोरल प्रदर्शन की बात करें तो कंज्यूमर ड्यूरेबल्स इंडेक्स सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाला सेक्टर रहा, जिसमें 1.48 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई। इसके अलावा मीडिया, आईटी, ऑटो, एफएमसीजी और फार्मा शेयरों में भी खरीदारी देखने को मिली। दूसरी ओर रियल्टी, पीएसयू बैंक, मेटल, प्राइवेट बैंक और बैंकिंग शेयरों पर दबाव बना रहा। रियल्टी इंडेक्स में सबसे अधिक करीब एक प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।

    निफ्टी 50 के प्रमुख बढ़त वाले शेयरों में एचसीएल टेक, इंटरग्लोब एविएशन (इंडिगो), विप्रो, मारुति सुजुकी, बजाज फाइनेंस और महिंद्रा एंड महिंद्रा शामिल रहे। वहीं इटरनल, एसबीआई लाइफ, बजाज फिनसर्व, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स और एचडीएफसी बैंक के शेयरों में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई।

    बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और एशियाई बाजारों से मिले कमजोर संकेतों के कारण निवेशक पूरे सत्र के दौरान सतर्क बने रहे। महंगाई से जुड़ी चिंताओं का असर विशेष रूप से बैंकिंग और रियल्टी शेयरों पर देखने को मिला। हालांकि कुछ पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर आयात शुल्क दोबारा लागू होने और चुनिंदा कंपनियों के बेहतर तिमाही नतीजों के चलते केमिकल सेक्टर में मजबूती बनी रही।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कारोबारी सत्रों में निवेशकों की नजर कंपनियों के तिमाही परिणाम, प्रबंधन की भविष्य की रणनीति, मानसून की प्रगति, कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक आर्थिक घटनाक्रम पर रहेगी। यही कारक निकट भविष्य में भारतीय शेयर बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

  • बाजार में बिकने वाला सिंथेटिक पनीर की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी में केन्द्र सरकार

    बाजार में बिकने वाला सिंथेटिक पनीर की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी में केन्द्र सरकार


    नई दिल्ली।
    सरकार (Government) बाजार (Market) में बिकने वाले सिंथेटिक पनीर (Synthetic Cheese) पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर रही है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (Food Safety and Standards Authority of India- FSSAI) ने फैसला लिया है कि कम पोषण वाले और सेहत को नुकसान पहुंचाने वाले दिखावटी पनीर को बाजार से पूरी तरह बाहर किया जाएगा। मामले से जुड़े दो अधिकारियों ने यह जानकारी दी।

    इस मामले में बनी एक हाई लेवल कमेटी ने अक्टूबर 2025 में इस प्रस्ताव को अंतिम रूप दिया था, जिसे मार्च 2026 की बैठक में आधिकारिक मंजूरी दे दी गई है। समिति का कहना था कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा डेयरी उत्पादक देश है, लेकिन इसके बावजूद बाजार में बड़ी मात्रा में सस्ता सिंथेटिक पनीर बेचा जा रहा है। यह असली पनीर जैसा दिखता और स्वाद में मिलता-जुलता होता है, जिससे आम ग्राहक के लिए पहचान करना मुश्किल हो जाता है और वह भ्रमित होता है।


    1,000 कंपनियों के पास सिंथेटिक पनीर बनाने के लाइसेंस

    इसी वजह से इसे बाजार से चरणबद्ध तरीके से हटाने की योजना बनाई जा रही है। वर्तमान में सिंथेटिक पनीर की बिक्री पर पूरी तरह रोक नहीं है। देश में करीब 1,000 ऐसी कंपनियां या कारोबारी हैं, जिनके पास इसे बनाने का लाइसेंस है। नई नीति के तहत अब नए लाइसेंस जारी नहीं किए जाएंगे और मौजूदा कंपनियों को अपना स्टॉक खत्म करने और उत्पादन बंद करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाएगा।


    इसलिए पड़ी जरूरत

    बीते कुछ समय से बाजार में ‘सिंथेटिक पनीर’ का चलन तेजी से बढ़ा है। यह एक सस्ता विकल्प है, जिसे ताजे दूध की बजाय मुख्यतः पाम ऑयल, मिल्क पाउडर, स्टार्च और इमल्सीफायर्स से बनाया जाता है। यह दिखने और बनावट में असली पनीर जैसा होता है, लेकिन इसकी गुणवत्ता और पोषण मूल्य दूध से बने पनीर की तुलना में काफी कम होता है। यह सिंथेटिक पनीर सस्ता होने के कारण कई रेस्तरां में उपयोग किया जाता है, जिससे उपभोक्ताओं को भ्रम होता है।

    लगातार बढ़ रहा बाजार: उत्तर भारत में खासतौर पर पनीर प्रोटीन का प्रमुख स्रोत माना जाता है। यही कारण है कि भारत का पनीर बाजार 10.8 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। मार्केट रिसर्च कंपनी आईएमएआरसी के अनुसार, वर्ष 2033 तक भारतीय पनीर बाजार के 22.1 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जिसकी वार्षिक वृद्धि दर 8.7% रहने की संभावना है।

    कीमत में भारी अंतर: अधिकारियों के अनुसार, असली ब्रांडेड पनीर की कीमत करीब 450 रुपये प्रति किलो तक होती है, जबकि खुले में बिकने वाला सिंथेटिक या बिना ब्रांड वाला पनीर 250 से 300 रुपये प्रति किलो तक बिकता है।


    स्वास्थ्य पर भी खतरा बढ़ा

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, सिंथेटिक पनीर में प्रोटीन की मात्रा बहुत कम और फैट बहुत ज्यादा होता है। इसके नियमित सेवन से स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है। इससे शरीर में इंसुलिन प्रतिरोध पैदा हो सकता है, जो टाइप-2 डायबिटीज का कारण बन सकता है।

  • निवेशकों की बिकवाली भारी पड़ी, एक हफ्ते में सोना 500 और चांदी 7,000 रुपये से ज्यादा कमजोर

    निवेशकों की बिकवाली भारी पड़ी, एक हफ्ते में सोना 500 और चांदी 7,000 रुपये से ज्यादा कमजोर


    नई दिल्ली।इस सप्ताह कीमती धातुओं के बाजार में कमजोरी का माहौल देखने को मिला, जहां सोना और चांदी दोनों ही मुनाफावसूली के दबाव में आ गए। शुरुआती मजबूती के बाद निवेशकों ने ऊंचे स्तरों पर अपनी होल्डिंग बेचनी शुरू कर दी, जिससे कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। हालांकि सप्ताह के अंतिम दिन हल्की रिकवरी देखने को मिली, लेकिन पूरे सप्ताह का रुझान गिरावट की ओर ही रहा।

    सोने की कीमतों में साप्ताहिक आधार पर करीब 0.34 प्रतिशत की गिरावट देखी गई। हफ्ते के अंत में इसमें मामूली सुधार हुआ और कीमत करीब 1,52,799 रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास पहुंच गई। दिन के दौरान सोने ने 1,53,164 रुपये का उच्च स्तर और 1,50,750 रुपये का निचला स्तर छुआ, जो बाजार में जारी अस्थिरता को दर्शाता है। पूरे सप्ताह में सोना करीब 523 रुपये सस्ता हो गया, जो यह बताता है कि निवेशक सतर्क रुख अपनाए हुए हैं।

    चांदी के मामले में गिरावट और ज्यादा गहरी रही। एक हफ्ते के दौरान इसकी कीमत में 7,000 रुपये से अधिक की कमी दर्ज की गई। हालांकि अंतिम कारोबारी दिन इसमें तेजी आई और यह करीब 2,44,321 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई। दिनभर के कारोबार में चांदी ने 2,45,555 रुपये का उच्च स्तर और 2,38,291 रुपये का निचला स्तर छुआ, जिससे इसके दामों में तेज उतार-चढ़ाव का अंदाजा लगाया जा सकता है।

    बाजार में इस गिरावट की मुख्य वजह मुनाफावसूली रही। जब कीमतें लगातार बढ़ती हैं, तो निवेशक लाभ सुरक्षित करने के लिए बिकवाली करते हैं, जिससे कीमतों पर दबाव बनता है। इसके अलावा वैश्विक स्तर पर चल रहे घटनाक्रमों ने भी बाजार की दिशा तय करने में भूमिका निभाई। अंतरराष्ट्रीय तनाव के बीच कूटनीतिक हल निकलने की उम्मीदों ने सुरक्षित निवेश की मांग को थोड़ा कमजोर किया, जिससे सोने और चांदी पर दबाव पड़ा।

    हालांकि बॉन्ड यील्ड में गिरावट ने सोने को कुछ समर्थन दिया, क्योंकि इससे बिना ब्याज वाली संपत्तियों की आकर्षण क्षमता बढ़ती है। इसके बावजूद बाजार में मजबूत तेजी नहीं आ सकी, क्योंकि निवेशक अभी भी अनिश्चित परिस्थितियों को लेकर सतर्क हैं। निचले स्तरों पर खरीदारी जरूर देखने को मिली, लेकिन यह तेजी को स्थायी रूप नहीं दे सकी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल बाजार संतुलन की स्थिति में है, जहां न तो तेज गिरावट की आशंका है और न ही मजबूत तेजी के स्पष्ट संकेत। आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम, डॉलर की चाल और आर्थिक नीतियां कीमती धातुओं की दिशा तय करेंगी। ऐसे में निवेशकों को सावधानी के साथ रणनीति बनानी होगी, क्योंकि बाजार में अस्थिरता आगे भी जारी रह सकती है।