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  • प्रेग्नेंसी में ज्यादा तनाव क्यों है खतरनाक? जानिए मां और बच्चे की सेहत पर वर्क प्रेशर के संभावित प्रभाव और बचाव के आसान उपाय

    प्रेग्नेंसी में ज्यादा तनाव क्यों है खतरनाक? जानिए मां और बच्चे की सेहत पर वर्क प्रेशर के संभावित प्रभाव और बचाव के आसान उपाय


    नई दिल्ली। गर्भावस्था किसी भी महिला के जीवन का बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील दौर होता है। इस समय मां का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य सीधे तौर पर गर्भ में पल रहे शिशु के विकास से जुड़ा होता है। आधुनिक जीवनशैली में बड़ी संख्या में महिलाएं गर्भावस्था के दौरान भी नौकरी और पेशेवर जिम्मेदारियां निभाती हैं। ऐसे में यदि लगातार काम का दबाव और मानसिक तनाव बना रहे तो इसका असर केवल मां की सेहत तक सीमित नहीं रह सकता बल्कि गर्भ में पल रहे बच्चे के विकास पर भी पड़ने की संभावना रहती है। विशेषज्ञों का कहना है कि तनाव को समय रहते नियंत्रित करना स्वस्थ गर्भावस्था के लिए बेहद जरूरी है।

    कुछ शोधों में यह संकेत मिले हैं कि लंबे समय तक अत्यधिक तनाव रहने पर शरीर में कोर्टिसोल जैसे तनाव से जुड़े हार्मोन का स्तर बढ़ सकता है। माना जाता है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे तो इसका प्रभाव गर्भ में पल रहे शिशु के मस्तिष्क के विकास और उसके भविष्य के व्यवहार पर पड़ सकता है। कुछ बच्चों में जन्म के बाद अधिक संवेदनशीलता या भावनात्मक बदलाव देखने की संभावना भी बताई गई है। हालांकि यह प्रभाव हर गर्भवती महिला या हर शिशु में समान रूप से दिखाई दे ऐसा जरूरी नहीं है।

    विशेषज्ञों के अनुसार गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक मानसिक दबाव कुछ मामलों में समय से पहले प्रसव या जन्म के समय कम वजन जैसे जोखिमों से भी जुड़ा पाया गया है। हालांकि किसी एक कारण को इसके लिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता क्योंकि गर्भावस्था पर पोषण जीवनशैली पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याएं और चिकित्सकीय देखभाल जैसे कई अन्य कारकों का भी प्रभाव पड़ता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि गर्भवती महिलाओं को अपने काम और आराम के बीच संतुलन बनाकर रखना चाहिए। यदि कार्यस्थल पर दबाव अधिक हो तो परिवार के सदस्यों सहकर्मियों या वरिष्ठ अधिकारियों से सहयोग लेने में संकोच नहीं करना चाहिए। समय पर विश्राम करना पर्याप्त नींद लेना और पौष्टिक भोजन करना मां और शिशु दोनों के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक माना जाता है।

    तनाव कम करने के लिए हल्की सैर डॉक्टर की सलाह के अनुसार योग और श्वास संबंधी व्यायाम भी लाभदायक हो सकते हैं। ध्यान और मेडिटेशन जैसी गतिविधियां मानसिक शांति बनाए रखने में मदद कर सकती हैं। यदि लगातार चिंता बेचैनी या तनाव महसूस हो रहा हो तो इसे नजरअंदाज करने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर होता है। जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ मानसिक स्वास्थ्य सहायता भी उपयोगी हो सकती है।

    गर्भावस्था के दौरान नियमित स्वास्थ्य जांच कराना भी बेहद महत्वपूर्ण है। समय समय पर डॉक्टर से परामर्श लेने से मां और शिशु दोनों की स्थिति पर नजर रखी जा सकती है और किसी भी संभावित समस्या की समय रहते पहचान की जा सकती है। बिना चिकित्सकीय सलाह के कोई भी दवा लेना या घरेलू उपचार अपनाना उचित नहीं माना जाता।

    विशेषज्ञों का कहना है कि गर्भावस्था केवल शारीरिक बदलाव का समय नहीं बल्कि भावनात्मक रूप से भी संवेदनशील अवधि होती है। ऐसे में परिवार का सहयोग सकारात्मक माहौल और तनावमुक्त जीवनशैली मां के आत्मविश्वास को बढ़ाने के साथ गर्भ में पल रहे शिशु के स्वस्थ विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

    ध्यान रहे कि तनाव और गर्भावस्था पर हुए शोध संभावित संबंधों की ओर संकेत करते हैं लेकिन हर गर्भवती महिला और हर गर्भावस्था अलग होती है। इसलिए किसी भी स्वास्थ्य संबंधी चिंता की स्थिति में योग्य स्त्री रोग विशेषज्ञ या चिकित्सक से व्यक्तिगत सलाह लेना सबसे उचित कदम है।

  • प्रेग्नेंसी में क्यों बढ़ जाता है चेहरे का ग्लो जानिए हार्मोन से लेकर ब्लड फ्लो तक की पूरी वैज्ञानिक वजह

    प्रेग्नेंसी में क्यों बढ़ जाता है चेहरे का ग्लो जानिए हार्मोन से लेकर ब्लड फ्लो तक की पूरी वैज्ञानिक वजह


    नई दिल्ली । गर्भावस्था किसी भी महिला के जीवन का बेहद खास दौर होता है। इन नौ महीनों के दौरान शरीर के भीतर कई ऐसे बदलाव होते हैं जिनका असर केवल मां और शिशु के स्वास्थ्य पर ही नहीं बल्कि त्वचा और चेहरे की रंगत पर भी साफ दिखाई देता है। अक्सर लोग कहते हैं कि गर्भावस्था में महिला के चेहरे पर अलग ही निखार और चमक आ जाती है जिसे सामान्य भाषा में प्रेग्नेंसी ग्लो कहा जाता है। हालांकि यह जरूरी नहीं कि हर महिला में यह बदलाव एक जैसा दिखाई दे क्योंकि हर शरीर की बनावट और हार्मोनल प्रतिक्रिया अलग होती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार गर्भावस्था के दौरान शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन का स्तर तेजी से बढ़ता है। इन हार्मोन का सीधा असर त्वचा पर पड़ता है। त्वचा तक रक्त संचार बेहतर होने लगता है जिससे चेहरे की कोशिकाओं को अधिक ऑक्सीजन और पोषण मिलता है। यही वजह है कि कई महिलाओं का चेहरा पहले की तुलना में अधिक ताजा साफ और चमकदार दिखाई देता है। गर्भावस्था के चौथे महीने के बाद यह बदलाव अधिक स्पष्ट रूप से नजर आने लगता है क्योंकि शुरुआती महीनों में उल्टी थकान और कमजोरी अधिक रहती है।

    प्रेग्नेंसी ग्लो की एक बड़ी वजह शरीर में बढ़ने वाली रक्त की मात्रा भी होती है। डॉक्टरों के अनुसार गर्भ में पल रहे शिशु की जरूरतों को पूरा करने के लिए महिला के शरीर में रक्त की मात्रा सामान्य से काफी अधिक हो जाती है। इससे चेहरे की महीन रक्त वाहिकाओं तक भी अधिक रक्त पहुंचता है जिससे गालों पर हल्की गुलाबी आभा और प्राकृतिक चमक दिखाई देती है। यही कारण है कि बिना किसी मेकअप के भी कई महिलाओं का चेहरा दमकता हुआ नजर आता है।

    गर्भावस्था के दौरान त्वचा में प्राकृतिक तेल का उत्पादन भी बढ़ जाता है। इससे त्वचा मुलायम और चमकदार दिख सकती है। हालांकि जिन महिलाओं की त्वचा पहले से तैलीय होती है उन्हें इस दौरान मुंहासों या पिंपल्स की समस्या भी हो सकती है। इसलिए यदि किसी गर्भवती महिला को चेहरे पर दाने निकल आएं तो इसे असामान्य नहीं माना जाता क्योंकि यह भी हार्मोनल बदलाव का सामान्य प्रभाव हो सकता है।

    जैसे जैसे गर्भ में शिशु का विकास होता है वैसे वैसे महिला के शरीर में गर्माहट और रक्त प्रवाह भी बढ़ता है। कई महिलाओं को इस दौरान सामान्य से अधिक गर्मी महसूस होती है। इसका असर चेहरे पर हल्की लालिमा और प्राकृतिक चमक के रूप में दिखाई देता है। यही बदलाव प्रेग्नेंसी ग्लो को और अधिक स्पष्ट बनाता है।

    इस दौरान सही खानपान भी त्वचा की खूबसूरती में अहम भूमिका निभाता है। यदि गर्भवती महिला अपने भोजन में ताजे फल हरी सब्जियां दूध दही दाल अंडा और प्रोटीन से भरपूर खाद्य पदार्थ शामिल करती है तथा पर्याप्त मात्रा में पानी पीती है तो त्वचा को आवश्यक विटामिन और पोषण मिलता है। इससे त्वचा स्वस्थ बनी रहती है और प्राकृतिक निखार बढ़ सकता है।

    हालांकि विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि हर महिला में प्रेग्नेंसी ग्लो दिखाई दे यह जरूरी नहीं है। किसी को चमक मिलती है तो किसी को पिग्मेंटेशन मुंहासे या त्वचा संबंधी दूसरी समस्याएं भी हो सकती हैं। इसलिए गर्भावस्था के दौरान त्वचा में होने वाले बदलावों को सामान्य रूप से स्वीकार करना चाहिए और किसी भी गंभीर समस्या की स्थिति में डॉक्टर की सलाह लेना सबसे बेहतर विकल्प होता है।

  • मैटरनिटी परिसर की घटना के बाद एक्शन देवास जिला अस्पताल ने बदली व्यवस्था अब प्रसव से पहले होगी विशेष निगरानी

    मैटरनिटी परिसर की घटना के बाद एक्शन देवास जिला अस्पताल ने बदली व्यवस्था अब प्रसव से पहले होगी विशेष निगरानी


    देवास  देवास जिला अस्पताल ने मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनाने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाया है। अब हाई रिस्क गर्भवती महिलाओं को उनकी संभावित प्रसव तिथि से सात दिन पहले अस्पताल में भर्ती किया जाएगा ताकि प्रसव के दौरान किसी भी प्रकार की आपात स्थिति से समय रहते निपटा जा सके। यह निर्णय हाल ही में मैटरनिटी परिसर में हुई एक प्रसव संबंधी घटना के बाद लिया गया है जिसमें महिला के अस्पताल देर से पहुंचने की बात सामने आई थी।

    गुरुवार को मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. सरोजनी जेम्स बैक ने जिला अस्पताल की मैटरनिटी विंग का निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने भर्ती गर्भवती महिलाओं से बातचीत कर उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली और अस्पताल में उपलब्ध सुविधाओं का भी जायजा लिया। निरीक्षण के दौरान यह पाया गया कि कई हाई रिस्क गर्भवती महिलाएं प्रसव पीड़ा शुरू होने के बाद काफी देर से अस्पताल पहुंचती हैं जिससे मां और नवजात दोनों के लिए गंभीर जोखिम पैदा हो जाता है।

    स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अस्पताल प्रबंधन ने नई व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया है। इसके तहत सभी हाई रिस्क गर्भवती महिलाओं को संभावित प्रसव तिथि से सात दिन पहले अस्पताल में भर्ती कर उनकी नियमित चिकित्सकीय निगरानी की जाएगी। इससे किसी भी जटिल स्थिति का समय रहते उपचार संभव हो सकेगा और सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित किया जा सकेगा।

    सिर्फ हाई रिस्क गर्भवतियों के लिए ही नहीं बल्कि सामान्य गर्भवती महिलाओं के लिए भी नई पहल शुरू की गई है। अस्पताल प्रशासन अब संभावित प्रसव तिथि से चार दिन पहले गर्भवती महिलाओं से फोन पर संपर्क करेगा और उन्हें समय पर अस्पताल पहुंचकर भर्ती होने के लिए प्रेरित करेगा। इसका उद्देश्य अंतिम समय की भागदौड़ और प्रसव के दौरान होने वाली संभावित जटिलताओं को कम करना है।

    निरीक्षण के दौरान सीएमएचओ ने अस्पताल के सोनोग्राफी केंद्र और चिकित्सकों के कक्ष का भी निरीक्षण किया तथा अधिकारियों को सभी आवश्यक व्यवस्थाएं बेहतर बनाए रखने के निर्देश दिए। उन्होंने गर्भवती महिलाओं को नियमित स्वास्थ्य जांच कराने और सरकार द्वारा संचालित मातृ स्वास्थ्य योजनाओं का पूरा लाभ उठाने की सलाह भी दी।

    अस्पताल प्रशासन का मानना है कि समय पर भर्ती और लगातार चिकित्सकीय निगरानी से मातृ मृत्यु और नवजात शिशुओं से जुड़े जोखिमों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। नई व्यवस्था का उद्देश्य सुरक्षित मातृत्व को बढ़ावा देना और हर गर्भवती महिला को समय पर बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना है।

  • भीषण गर्मी में बढ़ा प्रेग्नेंसी रिस्क, समय से पहले डिलीवरी और लो बर्थ वेट का खतरा तेज..

    भीषण गर्मी में बढ़ा प्रेग्नेंसी रिस्क, समय से पहले डिलीवरी और लो बर्थ वेट का खतरा तेज..

    नई दिल्ली।
    भीषण गर्मी का असर अब सिर्फ सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका गंभीर प्रभाव गर्भवती महिलाओं और उनके अजन्मे बच्चों पर भी देखने को मिल रहा है। देश के कई हिस्सों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुंच चुका है, जिससे गर्म हवाएं और लू का प्रकोप लगातार बढ़ता जा रहा है।

    चिकित्सकों के अनुसार, इस तरह की अत्यधिक गर्मी शरीर पर अतिरिक्त दबाव डालती है, जिससे गर्भवती महिलाओं में कई प्रकार की जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं। शरीर में पानी की कमी और गर्मी से होने वाला तनाव कई बार समय से पहले प्रसव का कारण बन सकता है। यह स्थिति मां और बच्चे दोनों के लिए जोखिम भरी मानी जाती है।

    गर्मी का असर केवल प्रसव प्रक्रिया तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि यह गर्भ में पल रहे शिशु के विकास को भी प्रभावित करता है। जब शरीर में पर्याप्त पोषण और रक्त प्रवाह ठीक से नहीं हो पाता, तो बच्चे का वजन जन्म के समय सामान्य से कम हो सकता है। यह स्थिति आगे चलकर नवजात के स्वास्थ्य पर असर डाल सकती है।

    इसके अलावा, लंबे समय तक तेज धूप और गर्म वातावरण में रहने से गर्भवती महिलाओं में रक्तचाप बढ़ने का खतरा भी रहता है। यह स्थिति शरीर में कमजोरी, थकान और अन्य जटिलताओं को जन्म दे सकती है, जो प्रेग्नेंसी के दौरान अधिक खतरनाक साबित हो सकती हैं।

    विशेषज्ञ इस समय विशेष सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं। गर्भवती महिलाओं को दिन के सबसे गर्म समय में बाहर निकलने से बचना चाहिए और पर्याप्त मात्रा में पानी पीकर शरीर को हाइड्रेट रखना चाहिए। हल्का और संतुलित आहार तथा ठंडे वातावरण में आराम इस दौरान बेहद जरूरी माना जा रहा है।