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  • प्रेग्नेंसी के दौरान हाई बीपी से बचना है तो आज से शुरू करें ये 6 हेल्दी फूड्स स्वस्थ मां और स्वस्थ शिशु की मजबूत नींव

    प्रेग्नेंसी के दौरान हाई बीपी से बचना है तो आज से शुरू करें ये 6 हेल्दी फूड्स स्वस्थ मां और स्वस्थ शिशु की मजबूत नींव


    नई दिल्ली। गर्भावस्था हर महिला के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील दौर होता है। इस दौरान शरीर में कई हार्मोनल और शारीरिक बदलाव होते हैं जिनका असर स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। इन्हीं बदलावों के बीच हाई ब्लड प्रेशर यानी उच्च रक्तचाप एक ऐसी समस्या है जिसे हल्के में लेना मां और गर्भ में पल रहे शिशु दोनों के लिए जोखिम भरा साबित हो सकता है। यदि समय रहते इसे नियंत्रित न किया जाए तो प्री-एक्लेम्पसिया समय से पहले प्रसव और अन्य जटिलताओं का खतरा बढ़ सकता है। अच्छी बात यह है कि संतुलित और पौष्टिक आहार अपनाकर ब्लड प्रेशर को काफी हद तक नियंत्रित रखा जा सकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार गर्भावस्था के दौरान ऐसी चीजों का सेवन करना चाहिए जो शरीर को जरूरी पोषक तत्व देने के साथ रक्तचाप को भी संतुलित रखने में मदद करें। पोटैशियम से भरपूर फल जैसे केला संतरा और तरबूज इस दौरान बेहद लाभकारी माने जाते हैं। पोटैशियम शरीर में सोडियम के प्रभाव को कम करता है जिससे ब्लड प्रेशर नियंत्रित रखने में सहायता मिलती है। इन फलों का नियमित सेवन शरीर को ऊर्जा देने के साथ हाइड्रेट भी रखता है।

    हरी पत्तेदार सब्जियां भी गर्भवती महिलाओं की डाइट का महत्वपूर्ण हिस्सा होनी चाहिए। पालक मेथी सरसों और अन्य हरी सब्जियों में मैग्नीशियम आयरन और फोलेट जैसे पोषक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। ये रक्त संचार को बेहतर बनाते हैं और हाई ब्लड प्रेशर के खतरे को कम करने में मदद करते हैं। साथ ही शिशु के विकास के लिए भी ये पोषक तत्व बेहद जरूरी होते हैं।

    दूध दही और पनीर जैसे कैल्शियम युक्त खाद्य पदार्थ भी गर्भावस्था में बहुत फायदेमंद माने जाते हैं। पर्याप्त कैल्शियम शरीर की हड्डियों को मजबूत रखने के साथ रक्तचाप को संतुलित रखने में भी मदद करता है। यदि डॉक्टर की सलाह हो तो कैल्शियम सप्लीमेंट भी लिया जा सकता है लेकिन बिना सलाह के किसी भी सप्लीमेंट का सेवन नहीं करना चाहिए।

    प्रोटीन से भरपूर आहार भी इस समय बेहद जरूरी है। दालें राजमा चना सोयाबीन अंडा और यदि डॉक्टर अनुमति दें तो मछली जैसे प्रोटीन स्रोत शरीर को ताकत देने के साथ ब्लड प्रेशर को संतुलित रखने में मदद करते हैं। प्रोटीन शिशु के स्वस्थ विकास के लिए भी आवश्यक पोषक तत्वों में शामिल है।

    साबुत अनाज जैसे ओट्स ब्राउन राइस जौ और मल्टीग्रेन आटा भी गर्भवती महिलाओं के लिए अच्छे विकल्प हैं। इनमें मौजूद फाइबर पाचन तंत्र को स्वस्थ रखते हैं और रक्त शर्करा तथा रक्तचाप दोनों को नियंत्रित रखने में मदद करते हैं। इससे शरीर को लंबे समय तक ऊर्जा भी मिलती है।

    नट्स और बीज जैसे बादाम अखरोट अलसी और चिया सीड्स में हेल्दी फैट्स ओमेगा थ्री फैटी एसिड और मैग्नीशियम पाया जाता है। इनका सीमित मात्रा में सेवन हृदय को स्वस्थ रखने और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने में मदद करता है। हालांकि इनका सेवन भी संतुलित मात्रा में ही करना चाहिए।

    इसके अलावा गर्भावस्था में ज्यादा नमक तली हुई चीजें पैकेज्ड फूड और अत्यधिक मीठे खाद्य पदार्थों से दूरी बनानी चाहिए। पर्याप्त पानी पीना नियमित हल्की शारीरिक गतिविधि करना और समय-समय पर डॉक्टर से ब्लड प्रेशर की जांच कराना भी बेहद जरूरी है।

    ध्यान रखें कि केवल खानपान के भरोसे हाई ब्लड प्रेशर का इलाज नहीं किया जा सकता। यदि डॉक्टर दवा लेने की सलाह दें तो उसे नियमित रूप से लेना चाहिए। सही डाइट स्वस्थ जीवनशैली और चिकित्सकीय निगरानी के साथ गर्भावस्था को सुरक्षित और स्वस्थ बनाया जा सकता है।

  • प्रेग्नेंसी में क्यों बढ़ जाती है चेहरे की प्राकृतिक चमक? जानिए हार्मोन, रक्त प्रवाह और त्वचा में होने वाले बदलावों का वैज्ञानिक कारण

    प्रेग्नेंसी में क्यों बढ़ जाती है चेहरे की प्राकृतिक चमक? जानिए हार्मोन, रक्त प्रवाह और त्वचा में होने वाले बदलावों का वैज्ञानिक कारण

    नई दिल्ली । गर्भावस्था महिला के जीवन का ऐसा चरण है, जिसमें शरीर के भीतर अनेक प्राकृतिक और जैविक परिवर्तन होते हैं। इन बदलावों का प्रभाव केवल शिशु के विकास तक सीमित नहीं रहता, बल्कि त्वचा, बाल, मानसिक स्थिति और संपूर्ण स्वास्थ्य पर भी दिखाई देता है। इन्हीं परिवर्तनों के कारण कई महिलाओं के चेहरे पर एक विशेष प्रकार की प्राकृतिक चमक दिखाई देती है, जिसे सामान्य भाषा में ‘प्रेग्नेंसी ग्लो’ कहा जाता है। हालांकि यह जरूरी नहीं कि हर महिला को इसका अनुभव एक जैसा हो, क्योंकि प्रत्येक शरीर की प्रतिक्रिया अलग होती है।

    चिकित्सकों के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है। इन हार्मोनल बदलावों का असर त्वचा पर भी पड़ता है। हार्मोन त्वचा की कोशिकाओं की सक्रियता बढ़ाने के साथ रक्त संचार को बेहतर बनाने में मदद करते हैं, जिससे चेहरा अधिक ताजा, स्वस्थ और चमकदार दिखाई दे सकता है। यही कारण है कि कई महिलाओं के चेहरे पर बिना किसी अतिरिक्त सौंदर्य प्रसाधन के भी प्राकृतिक निखार नजर आता है।

    गर्भावस्था में शरीर में रक्त की मात्रा भी सामान्य से काफी अधिक हो जाती है ताकि मां और गर्भ में पल रहे शिशु दोनों की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके। रक्त प्रवाह बढ़ने से चेहरे की महीन रक्त वाहिकाओं तक अधिक ऑक्सीजन और पोषक तत्व पहुंचते हैं। इसके परिणामस्वरूप गालों पर हल्की गुलाबी आभा और त्वचा पर प्राकृतिक चमक दिखाई दे सकती है। विशेषज्ञ इसे प्रेग्नेंसी ग्लो का एक प्रमुख कारण मानते हैं।

    इस दौरान त्वचा की तेल ग्रंथियां भी अधिक सक्रिय हो सकती हैं। इससे त्वचा मुलायम और चमकदार दिखाई देती है, लेकिन जिन महिलाओं की त्वचा पहले से तैलीय होती है, उनमें मुंहासे या पिंपल्स की समस्या भी बढ़ सकती है। इसलिए चेहरे पर मुंहासे होना भी गर्भावस्था के दौरान होने वाला सामान्य परिवर्तन माना जाता है और इसे किसी गंभीर समस्या का संकेत नहीं माना जाता, जब तक चिकित्सक अलग सलाह न दें।

    जैसे-जैसे गर्भावस्था आगे बढ़ती है, शरीर का तापमान और त्वचा में रक्त प्रवाह भी बढ़ सकता है। कई महिलाओं को इस दौरान सामान्य से अधिक गर्मी महसूस होती है। इसका प्रभाव चेहरे पर हल्की लालिमा और ताजगी के रूप में दिखाई देता है। यह भी उन प्राकृतिक कारणों में शामिल है, जिनकी वजह से गर्भावस्था के दौरान त्वचा अधिक दमकती हुई नजर आती है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि संतुलित आहार और पर्याप्त पानी का सेवन भी त्वचा के स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ताजे फल, हरी सब्जियां, साबुत अनाज, दालें, दूध, दही, अंडे और प्रोटीन से भरपूर भोजन शरीर को आवश्यक विटामिन और खनिज उपलब्ध कराते हैं। पर्याप्त जल सेवन से शरीर हाइड्रेट रहता है, जिससे त्वचा स्वस्थ और चमकदार बनी रह सकती है।

    हालांकि डॉक्टर यह भी स्पष्ट करते हैं कि हर गर्भवती महिला में प्रेग्नेंसी ग्लो दिखाई दे, यह आवश्यक नहीं है। कुछ महिलाओं को त्वचा पर पिग्मेंटेशन, रूखापन, मुंहासे या अन्य परिवर्तन भी हो सकते हैं। इसलिए किसी भी बदलाव को सामान्य शारीरिक प्रक्रिया के रूप में समझना चाहिए और त्वचा या स्वास्थ्य से जुड़ी किसी भी गंभीर परेशानी होने पर स्वयं उपचार करने के बजाय विशेषज्ञ चिकित्सक से सलाह लेना सबसे सुरक्षित विकल्प माना जाता है।

  • गर्भावस्था में कॉस्मेटिक्स बन सकते हैं खतरे की वजह AIIMS की रिसर्च में सामने आए चौंकाने वाले तथ्य

    गर्भावस्था में कॉस्मेटिक्स बन सकते हैं खतरे की वजह AIIMS की रिसर्च में सामने आए चौंकाने वाले तथ्य


    नई दिल्ली । गर्भावस्था का समय किसी भी महिला के जीवन का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण दौर माना जाता है। इस दौरान खानपान से लेकर जीवनशैली तक हर छोटी बड़ी बात का सीधा असर मां और गर्भ में पल रहे शिशु के स्वास्थ्य पर पड़ता है। अब ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस नई दिल्ली की अगुवाई में हुई एक नई रिसर्च ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है। अध्ययन में संकेत मिले हैं कि रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले कुछ कॉस्मेटिक्स पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स और प्लास्टिक से जुड़े रसायन गर्भवती महिलाओं के शरीर में जमा होकर हार्मोन के सामान्य कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका असर केवल मां तक सीमित नहीं रहता बल्कि गर्भ में पल रहे शिशु के विकास पर भी पड़ सकता है।

    इस शोध में 641 स्वस्थ गर्भवती महिलाओं को शामिल किया गया। गर्भावस्था के अलग अलग चरणों में उनके यूरिन सैंपल की जांच की गई ताकि यह पता लगाया जा सके कि शरीर में कौन कौन से रसायन मौजूद हैं। जांच के दौरान सबसे अधिक मात्रा मिथाइलपैराबेन नामक रसायन की पाई गई। यह एक प्रिजर्वेटिव है जिसका इस्तेमाल सामान्य रूप से स्किन केयर प्रोडक्ट्स लोशन फेस क्रीम शैंपू मेकअप और अन्य पर्सनल केयर उत्पादों में किया जाता है।

    शोधकर्ताओं को मोनोएथाइल फ्थेलेट नामक रसायन भी अधिक मात्रा में मिला। यह रसायन प्लास्टिक उत्पादों और सिंथेटिक खुशबू वाले कई सामानों में इस्तेमाल किया जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार ये दोनों एंडोक्राइन डिसरप्टिंग केमिकल्स की श्रेणी में आते हैं। ऐसे रसायन शरीर के हार्मोन संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं और गर्भावस्था के दौरान यह जोखिम और अधिक बढ़ जाता है।

    अध्ययन में यह भी सामने आया कि गर्भावस्था की दूसरी तिमाही के दौरान इन रसायनों का स्तर सबसे अधिक पाया गया। यही वह समय होता है जब गर्भ में पल रहे शिशु के अंगों और शरीर का तेजी से विकास हो रहा होता है। ऐसे संवेदनशील चरण में यदि हार्मोन के कार्य में किसी प्रकार की बाधा आती है तो इसका असर बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ सकता है।

    एम्स के विशेषज्ञों के अनुसार जिन महिलाओं के शरीर में इन रसायनों का स्तर अधिक पाया गया उनके नवजात शिशुओं के जन्म के समय वजन लंबाई और विटामिन डी के स्तर में भी अंतर देखा गया। हालांकि शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह अध्ययन केवल संभावित संबंधों की ओर संकेत करता है। इन निष्कर्षों की पूरी पुष्टि के लिए भविष्य में और बड़े स्तर पर विस्तृत शोध किए जाने की आवश्यकता होगी।

    विशेषज्ञों का कहना है कि गर्भवती महिलाओं को इस दौरान अनावश्यक कॉस्मेटिक्स के उपयोग से बचना चाहिए और जहां तक संभव हो कम रसायन वाले या सुरक्षित उत्पादों का चयन करना चाहिए। साथ ही प्लास्टिक के बर्तनों और पैकेजिंग में लंबे समय तक भोजन रखने से भी बचना बेहतर हो सकता है। प्राकृतिक और सुरक्षित विकल्प अपनाने से संभावित जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारत में ऐसे रसायनों के उपयोग और उनकी निगरानी के लिए स्पष्ट और सख्त नियम बनाए जाने चाहिए ताकि उपभोक्ताओं विशेषकर गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित उत्पाद उपलब्ध हो सकें। जागरूकता बढ़ाने के साथ यदि महिलाएं चिकित्सकीय सलाह के अनुसार उत्पादों का चयन करें तो गर्भावस्था के दौरान मां और शिशु दोनों के स्वास्थ्य की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

  • थाली में जितने ज्यादा रंग, उतनी बेहतर सेहत, विशेषज्ञों ने बताया गर्भावस्था में संतुलित और पौष्टिक आहार का सबसे आसान तरीका

    थाली में जितने ज्यादा रंग, उतनी बेहतर सेहत, विशेषज्ञों ने बताया गर्भावस्था में संतुलित और पौष्टिक आहार का सबसे आसान तरीका

    नई दिल्ली ।
    गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को अपने खान-पान पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत होती है क्योंकि इस समय लिया गया भोजन केवल मां ही नहीं बल्कि गर्भ में पल रहे शिशु की सेहत को भी प्रभावित करता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, इस दौरान संतुलित और पोषण से भरपूर आहार बेहद जरूरी होता है और इसी कारण ‘सतरंगी थाली’ को सबसे बेहतर विकल्प माना जाता है। सतरंगी थाली का मतलब है भोजन में अलग-अलग रंगों के फल, सब्जियां, अनाज और पौष्टिक खाद्य पदार्थों को शामिल करना, जिससे शरीर को हर जरूरी पोषक तत्व मिल सके।

    विशेषज्ञों का कहना है कि हर रंग के खाद्य पदार्थ में अलग-अलग पोषण तत्व मौजूद होते हैं। जब भोजन में कई रंग शामिल होते हैं, तो शरीर को विटामिन, मिनरल्स, फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट्स और प्रोटीन संतुलित मात्रा में मिलते हैं। यही कारण है कि केवल एक जैसे भोजन पर निर्भर रहने के बजाय विविधता वाला भोजन ज्यादा लाभकारी माना जाता है।

    गर्भवती महिलाओं के लिए यह और भी ज्यादा जरूरी हो जाता है क्योंकि इस समय शरीर को अतिरिक्त ऊर्जा और पोषण की आवश्यकता होती है। सही खान-पान से गर्भ में बच्चे का विकास बेहतर होता है और मां की सेहत भी मजबूत बनी रहती है। इसके अलावा संतुलित आहार प्रसव के बाद शरीर की रिकवरी में भी मदद करता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाता है।

    हरे रंग की सब्जियां जैसे पालक और अन्य पत्तेदार सब्जियां आयरन और फोलिक एसिड का अच्छा स्रोत मानी जाती हैं, जो खून की कमी को दूर करने में मदद करती हैं। लाल रंग के खाद्य पदार्थ शरीर को जरूरी एंटीऑक्सीडेंट्स और विटामिन प्रदान करते हैं, जबकि पीले और नारंगी रंग के फल विटामिन सी और पोटैशियम से भरपूर होते हैं। इसी तरह बैंगनी रंग के खाद्य पदार्थ शरीर में सूजन कम करने और कोशिकाओं की सुरक्षा में मददगार माने जाते हैं।

    डाइट एक्सपर्ट्स का मानना है कि गर्भावस्था में एक जैसा भोजन बार-बार खाने से शरीर को सभी जरूरी पोषक तत्व नहीं मिल पाते। ऐसे में भोजन में रंगों और स्वाद की विविधता होना जरूरी है। इससे न केवल खाने का स्वाद बढ़ता है बल्कि भूख भी अच्छी लगती है और शरीर को संपूर्ण पोषण प्राप्त होता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, स्वस्थ मां ही स्वस्थ बच्चे को जन्म देती है और इसकी शुरुआत सही खान-पान से होती है। इसलिए गर्भावस्था के दौरान रोजाना की थाली में अलग-अलग रंगों के मौसमी फल और सब्जियां शामिल करना बेहद जरूरी माना जाता है। सतरंगी थाली केवल देखने में आकर्षक नहीं होती, बल्कि यह बेहतर स्वास्थ्य और सुरक्षित मातृत्व की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी है।