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  • मऊगंज में आरटीओ चेकिंग के दौरान भड़का गुस्सा, ड्राइवरों ने अस्थायी ढांचे को जलाया

    मऊगंज में आरटीओ चेकिंग के दौरान भड़का गुस्सा, ड्राइवरों ने अस्थायी ढांचे को जलाया


    मऊगंज जिले के हनुमना आरटीओ चेकिंग पॉइंट पर शुक्रवार देर शाम उस समय भारी हंगामा खड़ा हो गया जब ट्रक ड्राइवरों ने आरटीओ कर्मचारियों पर अवैध वसूली और प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया देखते ही देखते विवाद इतना बढ़ गया कि आक्रोशित ड्राइवरों ने चेक पोस्ट के पास बनी कर्मचारियों की अस्थायी झोपड़ी और कुर्सियों को आग के हवाले कर दिया

    घटना मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा के समीप हनुमना बॉर्डर की बताई जा रही है यहां नियमित रूप से आरटीओ द्वारा चेकिंग की जाती है शुक्रवार को जांच के दौरान कर्मचारियों ने दो ट्रकों को रोककर दस्तावेजों की जांच शुरू की इसी बीच ड्राइवरों ने आरोप लगाया कि उनसे नियमों के नाम पर अवैध वसूली की जा रही है और उन्हें अनावश्यक रूप से परेशान किया जा रहा है

    ड्राइवरों का कहना था कि चेकिंग के नाम पर बार बार वाहनों को रोका जाता है और बिना किसी स्पष्ट कारण के आर्थिक दबाव बनाया जाता है इसी आरोप को लेकर मौके पर बहस शुरू हुई जो कुछ ही देर में उग्र रूप ले बैठी देखते ही देखते अन्य ट्रक चालक भी वहां जमा हो गए और माहौल तनावपूर्ण हो गया

    आक्रोशित भीड़ ने कर्मचारियों के अस्थायी ढांचे को निशाना बनाया और वहां रखी कुर्सियों व अन्य सामान को बाहर निकालकर आग लगा दी आगजनी से कुछ समय के लिए अफरा तफरी की स्थिति बन गई हालांकि किसी के गंभीर रूप से घायल होने की सूचना नहीं है

    घटना की जानकारी मिलते ही स्थानीय पुलिस मौके पर पहुंची और स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास किया पुलिस ने भीड़ को समझाकर हटाया और आग पर काबू पाया इसके बाद क्षेत्र में अतिरिक्त बल तैनात कर दिया गया ताकि दोबारा तनाव न बढ़े

    प्रशासन ने मामले की जांच के आदेश दिए हैं अधिकारियों का कहना है कि यदि अवैध वसूली के आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित कर्मचारियों पर कार्रवाई की जाएगी वहीं आगजनी और तोड़फोड़ में शामिल लोगों की पहचान भी की जा रही है सीसीटीवी फुटेज और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी

    यह घटना सीमा क्षेत्र में चल रही चेकिंग व्यवस्था और परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शी और डिजिटल व्यवस्था से इस तरह के विवादों को कम किया जा सकता है साथ ही ड्राइवरों और अधिकारियों के बीच संवाद की कमी भी ऐसे टकराव को जन्म देती है

    हनुमना बॉर्डर पर स्थिति नियंत्रण में बताई जा रही है लेकिन घटना ने परिवहन व्यवस्था और प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर नई बहस छेड़ दी है

  • 50 साल के कब्जे, कोर्ट के स्टे और चार रजिस्ट्री के बावजूद गरजा बुलडोजर: मऊगंज में प्रशासन बनाम गरीब

    50 साल के कब्जे, कोर्ट के स्टे और चार रजिस्ट्री के बावजूद गरजा बुलडोजर: मऊगंज में प्रशासन बनाम गरीब


    मऊगंज । कहते हैं कानून अंधा होता है लेकिन मऊगंज का राजस्व अमला इस कहावत से भी एक कदम आगे नजर आ रहा है यहां कानून न सिर्फ अंधा बल्कि बहरा भी दिखाई दे रहा है। देवतालाब उप-तहसील के नौडिया गांव में प्रशासन ने जिस तरह भारी पुलिस बल के साथ गरीबों के घरों पर बुलडोजर चलाने की तैयारी की उसने पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। यह कार्रवाई उस जमीन पर की जा रही है जिस पर लोग पिछले करीब 50 वर्षों से काबिज हैं और जहां सिविल कोर्ट का स्पष्ट स्थगन आदेश स्टे भी लागू है।

    पूरा विवाद 1988 में की गई एक रजिस्ट्री से शुरू होता है। आरोप है कि भगवानदीन पटेल नाम के एक रसूखदार पटवारी ने जमीन की रजिस्ट्री करवाई नामांतरण भी हुआ लेकिन इसके बाद खेल शुरू हुआ। पटवारी के भाई ने अपील दायर कर खरीदारों का नाम रिकॉर्ड से कटवा दिया और जमीन दोबारा अपने नाम दर्ज करा ली। हैरानी की बात यह है कि जिस अपील के आधार पर मालिकाना हक बदला गया उसका कोई रिकॉर्ड आज राजस्व विभाग के पास मौजूद नहीं है।

    यहीं से जमीन की जालसाजी का सिलसिला तेज हो गया। आरोप है कि एक ही जमीन की चार बार रजिस्ट्री की गई। 1988 के बाद वर्षों तक लोग उसी जमीन पर मकान बनाकर रहते रहे फिर 2022 में दोबारा खरीद-फरोख्त हुई। एक ही खसरे की जमीन अलग-अलग लोगों को बेची जाती रही और प्रशासन आंख मूंदे बैठा रहा। अब जब विवाद कोर्ट में है और मामला विचाराधीन है तो अचानक प्रशासन को यह जमीन “सरकारी” नजर आने लगी।

    सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सिविल कोर्ट का स्टे ऑर्डर प्रभावशील है तो प्रशासन किस कानून के तहत अतिक्रमण हटाने पहुंचा? क्या मऊगंज का राजस्व अमला खुद को माननीय न्यायालय से ऊपर समझता है? कार्रवाई के दौरान हालात इतने बिगड़ गए कि कुछ लोगों ने आत्मघाती कदम उठाने की कोशिश क किसी ने हाथ की नस काट ली तो किसी ने खुद को घर में बंद कर लिया।

    विडंबना यह भी है कि जिस जमीन को सरकारी बताया जा रहा है उससे जुड़े पुख्ता दस्तावेज प्रशासन के पास नहीं हैं। न यह स्पष्ट है कि जमीन कब और कैसे सरकारी घोषित हुई। इसके बावजूद कार्रवाई के दौरान जब लोगों ने विरोध किया तो अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया भले ही रोक दी गई लेकिन वर्तमान पटवारी ने पीड़ितों पर ही “कानूनी हंटर” चला दिया। नौ लोगों के खिलाफ सरकारी काम में बाधा और गाली-गलौज जैसी धाराओं में केस दर्ज कर लिया गया।

    आज नौडिया गांव के लोग अपनी ही जमीन पर खुद को बेगाना महसूस कर रहे हैं। सवाल यह है कि जिसने 27 डिसमिल हिस्से में 40 डिसमिल जमीन बेच दी उस पूर्व पटवारी पर अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या प्रशासन की जिम्मेदारी सिर्फ गरीबों के घर गिराना है या उस सिस्टम को दुरुस्त करना भी है जो भ्रष्टाचार को संरक्षण देता है?

  • मऊगंज में 'कागजी' तस्करी का भंडाफोड़: 28 गौवंशों से भरी 3 पिकअप जब्त; सरपंचों के फर्जी पत्राचार ने खोली प्रशासन की पोल

    मऊगंज में 'कागजी' तस्करी का भंडाफोड़: 28 गौवंशों से भरी 3 पिकअप जब्त; सरपंचों के फर्जी पत्राचार ने खोली प्रशासन की पोल


    मऊगंज । रीवा और मऊगंज जिले की सीमा पर स्थित लौर थाना क्षेत्र में गौ-तस्करी का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। पटपरा तिराहे पर स्थानीय ग्रामीणों की सजगता से गौवंशों से भरी तीन पिकअप गाड़ियों को पकड़ा गया है। इस कार्रवाई ने न केवल पशु क्रूरता की पराकाष्ठा को उजागर किया है, बल्कि यह भी साफ कर दिया है कि तस्करों ने बचने के लिए पंचायतों और कागजों का एक ऐसा मायाजाल बुना है, जिसकी जड़ें काफी गहरी हैं।

    क्रूरता की हदें पार, चीख भी नहीं सके बेजुबान ग्रामीणों ने जब घेराबंदी कर तीन पिकअप वाहनों MP17 G3621, MP17 ZH 1466, MP 17 G 346 को रोका, तो अंदर का नजारा देखकर रूह कांप गई। तीन गाड़ियों में कुल 28 गौवंशों को इतनी बेरहमी से ठूंस-ठूंस कर भरा गया था कि वे हिलने-डुलने तक में असमर्थ थे। पकड़े गए आरोपियों की पहचान महेंद्र गुप्ता, अंकित साकेत और सुरेश साहू निवासी मनगवां के रूप में हुई है।

    फर्जी दस्तावेजों का मायाजाल पकड़े जाने के बाद आरोपियों ने जो दस्तावेज पेश किए, वे तस्करी के इस खेल को और भी संदिग्ध बनाते हैं। मऊगंज की आमोखर ग्राम पंचायत के सरपंच ने 26 जनवरी को एक पत्र जारी कर 50 किलोमीटर दूर स्थित तिवरीगवां पंचायत से 70 गौवंशों की मांग की थी। हैरानी की बात यह है कि जब तिवरीगवां के सरपंच से संपर्क किया गया, तो उन्होंने ऐसे किसी भी पत्राचार या जानकारी से साफ इनकार कर दिया। आखिर एक पंचायत का सरपंच दूसरी पंचायत के आवारा पशुओं का ‘सौदा’ कैसे कर सकता है?

    गौ-सेवा या संगठित तस्करी? सूत्रों की मानें तो यह गौ-सेवा नहीं बल्कि तस्करी का एक संगठित सिंडिकेट है। आमोखर गौशाला, जिसकी क्षमता 400 है और जहाँ पहले से ही 500 से अधिक पशु बदहाली में हैं, वहाँ अचानक दूसरे जिले से पशु क्यों मंगाए जा रहे थे? आरोपियों ने बचाव के लिए रीवा प्रशासन का महीनों पुराना एक पत्र भी दिखाया, जिसका वर्तमान परिवहन से कोई कानूनी लेना-देना नहीं था। यह साफ इशारा करता है कि कागजों को ढाल बनाकर तस्करी की चाल चली जा रही थी।

    सवालों के घेरे में ‘खाकी’ और पंचायत आशुतोष मिश्रा और गोलू गौतम जैसे सजग युवाओं की बदौलत यह गिरोह पकड़ में तो आ गया, लेकिन पुलिस की कार्रवाई फिलहाल ‘पशु क्रूरता’ की साधारण धाराओं तक सीमित दिख रही है। सवाल उठता है कि क्या प्रशासन उन सरपंचों पर शिकंजा कसेगा जिन्होंने फर्जी पत्राचार किया? क्या पुलिस इस रैकेट के असली ‘मास्टरमाइंड’ तक पहुँचेगी? मऊगंज एसडीओपी सचि पाठक ने वैधानिक कार्रवाई का भरोसा दिया है, लेकिन ग्रामीणों की मांग है कि इसे केवल क्रूरता नहीं बल्कि संगठित अपराध मानकर जांच की जाए।