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  • वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाकर 300 एमएमटीपीए करेगा, इंडो-पैसिफिक में मजबूत होगी ऊर्जा आपूर्ति

    वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाकर 300 एमएमटीपीए करेगा, इंडो-पैसिफिक में मजबूत होगी ऊर्जा आपूर्ति

    नई दिल्ली । वैश्विक स्तर पर युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव के कारण ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था पर दबाव बढ़ने के बीच भारत ने अपनी तेल रिफाइनिंग क्षमता को और विस्तार देने की तैयारी तेज कर दी है। देश की मौजूदा रिफाइनिंग क्षमता करीब 272 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष है, जिसे बढ़ाकर 300 एमएमटीपीए करने का लक्ष्य रखा गया है। केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने शुक्रवार को यह जानकारी दी।

    भारत वर्तमान में दुनिया के सबसे बड़े तेल रिफाइनिंग देशों में शामिल है और उसकी रिफाइनरियां घरेलू मांग पूरी करने के साथ पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। क्षमता में प्रस्तावित वृद्धि से देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की क्षमता बढ़ेगी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति संबंधी अनिश्चितताओं के बीच रणनीतिक मजबूती हासिल करने में मदद मिलेगी।

    केंद्रीय मंत्री के अनुसार भारत दुनिया के प्रमुख रिफाइनिंग केंद्रों में अपनी स्थिति मजबूत कर चुका है। देश में 23 रिफाइनरियां सालाना करीब 270 मिलियन मीट्रिक टन कच्चे तेल को संसाधित करने की क्षमता रखती हैं। रिफाइनिंग क्षेत्र के विस्तार को भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा बाजार में भूमिका बढ़ाने से जोड़कर देखा जा रहा है।

    भारत पेट्रोलियम उत्पादों का शुद्ध निर्यातक भी है। ऐसे में अतिरिक्त रिफाइनिंग क्षमता देश को घरेलू खपत के साथ-साथ मित्र देशों को भरोसेमंद ऊर्जा आपूर्ति उपलब्ध कराने में सक्षम बनाएगी। विशेष रूप से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में ऊर्जा सुरक्षा को लेकर बढ़ती चुनौतियों के बीच भारत अपनी रिफाइनिंग और आपूर्ति क्षमता को रणनीतिक संपत्ति के रूप में विकसित कर रहा है।

    इसी व्यापक ऊर्जा सहयोग के तहत भारत और मॉरिशस के बीच तेल और गैस क्षेत्र में महत्वपूर्ण समझौता हुआ है। दोनों देशों ने ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके साथ ही इंडियनऑयल और मॉरिशस की स्टेट ट्रेडिंग कॉरपोरेशन के बीच पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति को लेकर पांच साल का समझौता भी हुआ है।

    समझौते के तहत मॉरिशस को पेट्रोलियम उत्पादों की नियमित और भरोसेमंद आपूर्ति सुनिश्चित करने की दिशा में काम किया जाएगा। इससे द्वीपीय देश की ऊर्जा जरूरतों के लिए स्थिर आपूर्ति व्यवस्था विकसित करने में मदद मिलने की उम्मीद है। भारत के लिए यह समझौता क्षेत्रीय ऊर्जा सहयोग को मजबूत करने और अपने रिफाइनिंग नेटवर्क की उपयोगिता बढ़ाने का अवसर भी है।

    भारत और मॉरिशस के बीच ऊर्जा साझेदारी को दोनों देशों की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता से जोड़कर देखा जा रहा है। सरकार से सरकार और कारोबार से कारोबार स्तर पर हुए समझौतों से ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग के नए रास्ते खुलने की उम्मीद है। इससे पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति, व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में दोनों देशों के संबंध और मजबूत हो सकते हैं।

    वैश्विक बाजार में कच्चे तेल और रिफाइंड उत्पादों की कीमतों तथा आपूर्ति पर बाहरी घटनाओं का प्रभाव लगातार दिखाई देता है। ऐसे माहौल में घरेलू रिफाइनिंग क्षमता का विस्तार भारत को ऊर्जा क्षेत्र में अधिक लचीलापन प्रदान कर सकता है। 300 एमएमटीपीए का लक्ष्य हासिल होने पर भारत की उत्पादन और निर्यात क्षमता में भी महत्वपूर्ण विस्तार की संभावना बनेगी।

    सरकार का जोर केवल रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत को एक भरोसेमंद और स्थिर ऊर्जा भागीदार के रूप में स्थापित करने पर भी है। मॉरिशस के साथ हुआ समझौता इसी दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है। आने वाले वर्षों में रिफाइनिंग क्षमता और क्षेत्रीय ऊर्जा साझेदारियों का विस्तार भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

  • मॉरीशस ने मालदीव के साथ तोड़े सभी राजनयिक रिश्ते, चागोस द्वीप विवाद बना वजह

    मॉरीशस ने मालदीव के साथ तोड़े सभी राजनयिक रिश्ते, चागोस द्वीप विवाद बना वजह


    नई दिल्ली/माले। मॉरीशस सरकार ने शुक्रवार 27 फरवरी को एक बड़ा कूटनीतिक फैसला लिया और मालदीव के साथ अपने सभी राजनयिक संबंधों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। यह कदम मालदीव के चागोस द्वीप समूह की संप्रभुता को लेकर बदलते रुख के बाद उठाया गया। ध्यान दें कि दोनों देश भारत के मित्र हैं।

    विवाद का कारण

    मॉरीशस के विदेश मंत्रालय के अनुसार मालदीव ने हाल ही में चागोस द्वीप समूह पर मॉरीशस की संप्रभुता को मान्यता देना बंद कर दिया है। साथ ही मालदीव ने मॉरीशस और ब्रिटेन के बीच चागोस को लेकर हुए हालिया समझौते पर आपत्ति जताई। मॉरीशस की कैबिनेट ने इस कदम को राष्ट्रीय हितों की रक्षा और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के पालन के लिए आवश्यक बताया।

    मालदीव का रुख

    मालदीव के राष्ट्रपति इब्राहिम मुइज्जू ने 5 फरवरी को स्टेट ऑफ द नेशन संबोधन में कहा कि चागोस पर मालदीव का दावा मॉरीशस या किसी अन्य देश से अधिक मजबूत है। उन्होंने 2022 में मालदीव की पिछली सरकार द्वारा मॉरीशस की मान्यता को औपचारिक रूप से वापस ले लिया और इसे समुद्री हितों की सुरक्षा के लिए जरूरी बताया।

    चागोस द्वीप समूह: विवाद की पृष्ठभूमि

    चागोस द्वीप समूह हिंद महासागर में स्थित 60 से अधिक छोटे द्वीपों का समूह है जिसमें सबसे बड़ा डिएगो गार्सिया है। रणनीतिक रूप से इसका महत्व बहुत अधिक है क्योंकि यहां से मध्य पूर्व दक्षिण एशिया और अफ्रीका पर सैन्य और सुरक्षा निगरानी आसान है।

    1965 में ब्रिटेन ने मॉरीशस से चागोस को अलग कर दिया और इसे ब्रिटिश-हिंद महासागर क्षेत्र का हिस्सा बना दिया। डिएगो गार्सिया पर अमेरिका ने 1966 में 50 साल के पट्टे पर सैन्य अड्डा बनाया जो आज भी अमेरिकी रणनीतिक हितों के लिए महत्वपूर्ण है। इसके लिए ब्रिटेन ने 1967-1973 के बीच द्वीप के 1,500–2,000 मूल निवासियों को मॉरीशस और सेशेल्स में विस्थापित कर दिया।

    अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप

    मॉरीशस ने दशकों तक चागोस पर अपनी संप्रभुता के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी। 2019 में ICJ ने ब्रिटेन को द्वीप को मॉरीशस को सौंपने की सलाह दी। UN महासभा ने भी ब्रिटेन से मॉरीशस को चागोस सौंपने का प्रस्ताव पारित किया।

    हालिया ब्रिटेन-मॉरीशस समझौता

    ब्रिटेन और मॉरीशस ने समझौता किया जिसमें मॉरीशस की संप्रभुता को मान्यता दी गई लेकिन डिएगो गार्सिया पर अमेरिकी सैन्य बेस लंबे पट्टे (99 साल) के तहत संचालित होता रहेगा।

    मालदीव का विवाद
    मालदीव ने अब चागोस पर मॉरीशस की संप्रभुता और ब्रिटेन के साथ हुए समझौते पर आपत्ति जताई। इससे मॉरीशस ने मालदीव के साथ सभी राजनयिक संबंध तोड़ दिए।