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  • MP: बालाघाट के बैगा अंचल में मलेरिया और मीजल्स की वजह से हुई 19 बच्चों की मौत….

    MP: बालाघाट के बैगा अंचल में मलेरिया और मीजल्स की वजह से हुई 19 बच्चों की मौत….


    भोपाल।
    मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के बालाघाट (Balaghat) के बैगा अंचल में 19 बच्चों की मौत ने पूरे सिस्टम को सवालों के घेरे में ला दिया है. शुरुआत में इन बच्चों की मौत के पीछे कुपोषण (Malnutrition) को वजह माना गया था, लेकिन ICMR और दूसरे प्रमुख स्वास्थ्य संस्थानों की जांच रिपोर्ट में मौतों की मुख्य वजह मलेरिया और मीजल्स (Malaria and Measles) यानी खसरा संक्रमण (Measles infection) सामने आया है. जांच में खसरा और मलेरिया संक्रमण को बच्चों की मौत की प्रमुख वजह बताया गया है. लेकिन इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद मामला खत्म नहीं हुआ है. इसके बजाय बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ा एक और बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।

    जिन बच्चों में खसरे का संक्रमण मिला, वे सभी नियमित टीकाकरण से छूटे हुए थे. यानी संक्रमण से बचाव के लिए जरूरी टीकाकरण इन बच्चों तक नहीं पहुंच पाया था. बालाघाट में हुई 19 बच्चों की मौतें संक्रमण से जुड़ी बताई गई हैं, लेकिन आदिवासी इलाकों में बच्चों के सामने सिर्फ संक्रमण का खतरा नहीं है. इन इलाकों में कुपोषण भी बच्चों के स्वास्थ्य को लगातार कमजोर कर रहा है. एक तरफ मलेरिया और खसरे जैसे संक्रमण हैं और दूसरी तरफ कुपोषण की समस्या. इन दोनों के बीच आदिवासी बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।

    एक तरफ बीमारी, दूसरी तरफ कुपोषण

    ग्रामीण मध्य प्रदेश में बच्चों की पोषण स्थिति को लेकर नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-6 के आंकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं. आंकड़ों के मुताबिक ग्रामीण मध्य प्रदेश में अंडरवेट बच्चों का आंकड़ा 33 फीसदी से बढ़कर 42 फीसदी से ज्यादा हो गया है. इस स्थिति में सवाल यह है कि बच्चों को बीमारी से बचाने वाली वैक्सीन और कुपोषण से बचाने वाला पोषण दोनों की व्यवस्था में कमी कहां रह गई. बालाघाट में सामने आई 19 बच्चों की मौतों ने इन दोनों व्यवस्थाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    एक ओर अगर बच्चे नियमित टीकाकरण से छूट रहे हैं तो दूसरी ओर उन्हें पर्याप्त पोषण भी नहीं मिल पा रहा है. ऐसे में संक्रमण और कुपोषण दोनों बच्चों के स्वास्थ्य के लिए चुनौती बन रहे हैं. केंद्र के मिशन पोषण 2.0 के तहत गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के साथ 6 साल तक के बच्चों को साल में कम से कम 300 दिन पोषण आहार दिए जाने का प्रावधान है. लेकिन मध्य प्रदेश की करीब 97 हजार आंगनबाड़ियों में एक साल में जुलाई तक करीब 260 दिन ही नियमित पोषण आहार मिलने के आरोप लगाए गए हैं. यानी जिस व्यवस्था के तहत बच्चों और महिलाओं तक पूरे साल पोषण पहुंचाने की बात है, वहां नियमित सप्लाई को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।

    इसी बीच प्रदेश में पोषण आहार बनाने वाले रीवा, सागर, देवास, शिवपुरी और होशंगाबाद सहित जिलों के सभी 7 प्लांट बंद किए जा चुके हैं. पोषण आहार की व्यवस्था में हुए बदलाव ने भी सवाल खड़े किए हैं. जिस व्यवस्था का उद्देश्य बच्चों तक लगातार पोषण पहुंचाना था, वही व्यवस्था बदलाव के दौरान प्रभावित हुई. ऐसे में आदिवासी क्षेत्रों में बच्चों को मिलने वाले पोषण आहार की नियमितता को लेकर चिंता सामने आई है।


    सरकार ने माना, व्यवस्था बदलने के दौरान सप्लाई प्रभावित हुई

    महिला एवं बाल विकास विभाग मंत्री निर्मला भूरिया के मुताबिक पुरानी व्यवस्था में ग्रामीण एवं पंचायत विकास विभाग की ओर से पोषण आहार उपलब्ध कराया जा रहा था. मंत्री के अनुसार यह व्यवस्था संतोषजनक नहीं पाई गई, जिसके बाद इसमें बदलाव किया गया. नए टेंडर जारी होने तक स्थानीय स्तर पर विभाग स्वसहायता समूहों के जरिए बच्चों को पोषण आहार उपलब्ध करा रहा है. हालांकि मंत्री ने यह भी माना कि व्यवस्था बदलने के दौरान कुछ दिनों तक पोषण आहार की सप्लाई प्रभावित हुई थी. इससे यह सवाल और अहम हो जाता है कि व्यवस्था बदलने के बीच बच्चों तक पोषण आहार की नियमित पहुंच कैसे सुनिश्चित की गई. खासकर उन इलाकों में जहां पहले से ही बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण की स्थिति चुनौतीपूर्ण है।


    बालाघाट में बच्चों की मौत पर सरकार गंभीर

    बालाघाट में बच्चों की मौत के मामले को गंभीरता से लेते हुए महिला एवं बाल विकास मंत्री निर्मला भूरिया ने विभाग की सचिव को बालाघाट जाने के निर्देश दिए हैं. इसका उद्देश्य वहां के हालात पर नजर रखना और स्थिति की जानकारी लेना है. बालाघाट के बैगा अंचल में हुई 19 बच्चों की मौतों ने स्वास्थ्य, टीकाकरण और पोषण व्यवस्था को लेकर कई सवाल सामने रख दिए हैं. जांच में मलेरिया और खसरा संक्रमण मौतों की मुख्य वजह सामने आने के बाद अब नियमित टीकाकरण भी चर्चा के केंद्र में है. क्योंकि जिन बच्चों में खसरे का संक्रमण मिला, वे नियमित टीकाकरण से छूटे हुए थे. वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण मध्य प्रदेश में अंडरवेट बच्चों की संख्या बढ़ने का आंकड़ा भी सामने है।


    बालाघाट में बच्चों की मौत पर सरकार गंभीर

    मध्य प्रदेश की चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि देश की कमजोर जनजातीय आबादी का बड़ा हिस्सा इसी राज्य में रहता है. देश में 75 जनजातीय समूहों को विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह घोषित किया गया है. मध्य प्रदेश में डिंडोरी, मंडला, बालाघाट, अनूपपुर, उमरिया, श्योपुर और छिंदवाड़ा के जनजातीय समुदाय इस श्रेणी में शामिल हैं. ऐसे में बालाघाट की 19 बच्चों की मौत केवल एक इलाके की घटना नहीं रह जाती, बल्कि यह सवाल उठाती है कि कमजोर जनजातीय इलाकों में बच्चों तक स्वास्थ्य और पोषण की सुविधाएं कितनी नियमित और प्रभावी तरीके से पहुंच रही हैं।

    बालाघाट में बच्चों की मौत की जांच में मलेरिया और खसरा संक्रमण सामने आया है. खसरे से संक्रमित बच्चों का नियमित टीकाकरण नहीं हुआ था. दूसरी ओर ग्रामीण मध्य प्रदेश में कुपोषण के आंकड़े बढ़े हैं और पोषण आहार की सप्लाई में भी व्यवधान की बात सरकार ने स्वीकार की है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आदिवासी बच्चों को एक साथ बीमारी और कुपोषण से कैसे बचाया जाए. टीकाकरण और पोषण दोनों की नियमित व्यवस्था बच्चों के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है. बालाघाट की घटना ने इस पूरी व्यवस्था की जमीनी स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

  • Maldives में खसरे का प्रकोप….. मुसीबत में फिर संकटमोचक बना भारत…. वैक्सीन-दवाएं भेजी

    Maldives में खसरे का प्रकोप….. मुसीबत में फिर संकटमोचक बना भारत…. वैक्सीन-दवाएं भेजी


    माले।
    भारत (India) ने अपनी ‘पड़ोसी प्रथम’ नीति (‘Neighbourhood First’ policy) को दोहराते हुए, मालदीव (Maldives) में फैले खसरे (Measles) के प्रकोप से निपटने के लिए उसे बड़ी मात्रा में चिकित्सा सहायता (Medical Assistance) भेजी है। भारत ने मालदीव में खसरे के बढ़ते मामलों से निपटने और वहां टीकाकरण को मजबूत करने में मदद के लिए खसरे के टीके की 20,000 खुराक और लगभग तीन टन मेडिकल आपूर्ति भेजी है।

    विदेश मंत्रालय (MEA) के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर इस बात की पुष्टि की है कि भारत सरकार सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा और टीकाकरण को मजबूत करने के लिए मालदीव की मदद कर रही है। भेजी गई सहायता में शामिल हैं:

    – 20,000 एमआर (Measles-Rubella) वैक्सीन की खुराकें: ताकि बीमारी के प्रसार को तुरंत रोका जा सके।
    – 3 टन का मेडिकल कंसाइनमेंट: इसमें आवश्यक दवाइयां, सिरिंज, डायग्नोस्टिक किट और अन्य महत्वपूर्ण चिकित्सा सामग्री शामिल हैं।
    – विदेश मंत्रालय के बयान के अनुसार, यह समय पर दी गई सहायता मालदीव सरकार को खसरे के बढ़ते मामलों को नियंत्रित करने और उनकी प्रतिक्रिया क्षमताओं को बढ़ाने में काफी मदद करेगी।


    कूटनीतिक संबंध और ‘विजन महासागर’

    मालदीव का भारत की ‘पड़ोसी प्रथम’ नीति और ‘विजन महासागर’ में एक विशेष और महत्वपूर्ण स्थान है। दोनों देशों के लोगों के आपसी लाभ और साझा प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने के लिए भारत, मालदीव सरकार के साथ मिलकर काम करने के लिए हमेशा तत्पर रहा है। संकट के समय में सबसे पहले मदद का हाथ बढ़ाना भारत की इसी विदेश नीति का एक अहम हिस्सा है।


    मालदीव में खसरे की वापसी: एक चिंता का विषय

    विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने वर्ष 2021 में इस बात की पुष्टि की थी कि मालदीव ने खसरे का पूरी तरह से उन्मूलन कर दिया है। एक बार बीमारी को खत्म करने के बाद, देश में इस नए प्रकोप का सामने आना एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता है, जिससे निपटने के लिए अब तेजी से कदम उठाए जा रहे हैं।


    खसरा क्या है और इसके लक्षण क्या हैं?

    खसरा एक बेहद संक्रामक वायरल बीमारी है, जो मुख्य रूप से बच्चों को अपना शिकार बनाती है। यह संक्रमित व्यक्ति की नाक, मुंह या गले से निकलने वाली बूंदों के जरिए हवा में फैलता है। संक्रमण के 10-12 दिन बाद इसके लक्षण दिखाई देते हैं। इनमें तेज बुखार, नाक बहना, आंखें लाल होना और मुंह के अंदर छोटे सफेद धब्बे पड़ना शामिल हैं। कुछ दिनों के बाद शरीर पर लाल दाने उभरने लगते हैं, जो चेहरे और ऊपरी गर्दन से शुरू होकर धीरे-धीरे पूरे शरीर में नीचे की ओर फैल जाते हैं।


    खसरा उन्मूलन का वैश्विक महत्व

    WHO और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, खसरे के उन्मूलन से व्यापक स्तर पर जीवन रक्षक प्रभाव पड़ते हैं। इस क्षेत्र में उन्मूलन रणनीतियों से हर साल खसरे के कम से कम 11 लाख मामलों को रोका जा सकता है। रोके गए हर एक मामले से व्यक्ति के लगभग 2 सप्ताह के ‘विकलांगता-समायोजित जीवन वर्ष’ (DALYs) को बचाया जा सकता है।


    मृत्यु दर में कमी

    2020-2023 के दौरान विभिन्न रणनीतियों के संयोजन से खसरे के कारण होने वाली लगभग 11 लाख मौतों को टाला गया है। प्रति मृत्यु को टालने के लिए औसत खर्च मात्र 1,373 अमेरिकी डॉलर आंका गया है, जो इस बीमारी के खिलाफ टीकाकरण को सबसे प्रभावी और जरूरी स्वास्थ्य निवेश बनाता है।