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  • सुरों के सरताज मोहम्मद रफी का वो कालजयी गीत, जिसे गाने के लिए महमूद ने बुलावाया था असली किन्नरों को, आज भी ताजा हैं यादें।

    सुरों के सरताज मोहम्मद रफी का वो कालजयी गीत, जिसे गाने के लिए महमूद ने बुलावाया था असली किन्नरों को, आज भी ताजा हैं यादें।


    नई दिल्ली। भारतीय संगीत के स्वर्ण युग में जब भी सादगी और प्रतिभा के संगम की बात होती है, तो मोहम्मद रफी का नाम सबसे ऊपर आता है। संगीत जगत के इस महान गायक से जुड़े अनगिनत किस्से आज भी लोगों की आँखों में चमक और दिल में सम्मान भर देते हैं। ऐसा ही एक दिलचस्प और भावुक कर देने वाला वाकया मशहूर कॉमेडियन और अभिनेता महमूद की एक फिल्म के दौरान घटित हुआ था। उस दौर में महमूद अपनी फिल्मों में नवीनता लाने के लिए जाने जाते थे, और उन्होंने एक गीत के फिल्मांकन के लिए कुछ ऐसा करने का निर्णय लिया जो उस समय के सिनेमा के लिए बेहद अनूठा था। उन्होंने तय किया कि एक विशेष गीत के चित्रण में किसी कलाकार के बजाय असली किन्नरों को शामिल किया जाएगा, ताकि उस दृश्य की संवेदनशीलता और वास्तविकता को पर्दे पर जीवंत किया जा सके।

    जब इस गीत की रिकॉर्डिंग की बात आई, तो सुरों के सम्राट मोहम्मद रफी ने अपनी जादुई आवाज से उसे इस तरह सजाया कि हर कोई मंत्रमुग्ध रह गया। रिकॉर्डिंग स्टूडियो से लेकर फिल्म के सेट तक, रफी साहब का व्यवहार उन सभी लोगों के प्रति इतना सहज और सम्मानजनक था कि वहां मौजूद हर व्यक्ति उनकी विनम्रता का कायल हो गया। सेट पर जब असली किन्नरों ने रफी साहब के गाये उस गीत पर अपनी प्रस्तुति दी, तो माहौल पूरी तरह से भावनात्मक हो गया। उस समय के चश्मदीदों का कहना है कि रफी साहब ने न केवल अपनी आवाज का जादू बिखेरा, बल्कि उन कलाकारों के साथ बेहद आत्मीयता से बातचीत भी की, जिससे उन्हें कभी यह महसूस नहीं हुआ कि वे सिनेमा की चकाचौंध वाली दुनिया से अलग हैं।

    यह किस्सा न केवल मोहम्मद रफी की महान गायकी को दर्शाता है, बल्कि उनके उस व्यक्तित्व को भी उजागर करता है जहाँ ऊंच-नीच या सामाजिक भेदभाव की कोई जगह नहीं थी। महमूद, जो खुद एक मंझे हुए कलाकार थे, रफी साहब के इस समर्पण और व्यवहार को देखकर दंग रह गए थे। इस गीत के माध्यम से समाज के एक ऐसे वर्ग को मुख्यधारा के सिनेमा में सम्मान के साथ पेश किया गया, जिन्हें अक्सर हाशिये पर रखा जाता था। रफी साहब की आवाज में जो दर्द और रूहानियत थी, उसने उस गीत को कालजयी बना दिया। आज दशकों बाद भी जब इस गाने की चर्चा होती है, तो लोग केवल उसकी धुन को ही नहीं, बल्कि उसके पीछे की इस मानवीय कहानी को भी याद करते हैं।

    फिल्मी गलियारों में यह बात आज भी मिसाल के तौर पर दी जाती है कि कैसे एक महान कलाकार अपनी कला के जरिए सामाजिक दूरियों को मिटा सकता है। मोहम्मद रफी ने अपनी पूरी जिंदगी में हजारों गाने गाए, लेकिन कुछ चुनिंदा काम ऐसे थे जिन्होंने उन्हें ‘फरिश्ता’ इंसान की छवि दी। इस विशेष अनुभव ने साबित किया कि संगीत की कोई सीमा नहीं होती और जब इसे सच्चे दिल से गाया जाए, तो यह हर आत्मा को छू लेता है। महमूद और रफी साहब की इस जुगलबंदी ने सिनेमा के इतिहास में एक ऐसा अध्याय जोड़ दिया, जो आज की पीढ़ी के कलाकारों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है। सादगी, सम्मान और सुरों का यह अद्भुत मेल भारतीय सिनेमा की उन धरोहरों में से एक है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।

  • अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की सफल जोड़ी दशकों पुराने इस कल्ट क्लासिक शीर्षक के साथ बड़े पर्दे पर वापसी कर रही है।

    अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की सफल जोड़ी दशकों पुराने इस कल्ट क्लासिक शीर्षक के साथ बड़े पर्दे पर वापसी कर रही है।

    नई दिल्ली:   भारतीय सिनेमा के विकास क्रम में साठ का दशक एक ऐसा समय था जब मनोरंजन की नई विधाएं जन्म ले रही थीं। उस दौर में जब दर्शक मुख्य रूप से सामाजिक और रूमानी फिल्मों को पसंद करते थे तब दिग्गज कलाकार महमूद ने एक बड़ा जोखिम उठाया। उन्होंने वर्ष 1965 में फिल्म भूत बंगला के जरिए दर्शकों को एक ऐसी दुनिया से रूबरू कराया जहां डर के साये में हंसी के ठहाके गूंजते थे।
    लगभग दो घंटे पच्चीस मिनट की यह फिल्म न केवल उस समय की सफलतम फिल्मों में शामिल हुई बल्कि इसने आने वाले समय के लिए एक नई शैली की नींव भी रखी। यह फिल्म आज भी उन सिने प्रेमियों के लिए एक मिसाल है जो सस्पेंस और हास्य के सटीक संतुलन को समझना चाहते हैं। उस समय के सीमित संसाधनों के बावजूद इस फिल्म ने जो प्रभाव पैदा किया वह आज के आधुनिक तकनीक वाले दौर में भी दुर्लभ प्रतीत होता है।

    महमूद ने इस फिल्म में न केवल मुख्य भूमिका निभाई बल्कि इसके निर्देशन की जिम्मेदारी भी बहुत कुशलता से संभाली। उनकी रचनात्मक दृष्टि का ही परिणाम था कि फिल्म का हर दृश्य दर्शकों को अंत तक बांधे रखने में सफल रहा। फिल्म में अभिनेत्री तनुजा और महान संगीतकार आरडी बर्मन की उपस्थिति ने इसमें चार चांद लगा दिए थे।

    आरडी बर्मन के संगीत ने उस समय की फिल्म संगीत की दिशा बदल दी थी और आज भी वे धुनें लोगों के कानों में रस घोलती हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस फिल्म के जरिए ही पंचम दा के नाम से मशहूर इस महान संगीतकार ने अभिनय की दुनिया में भी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई थी। उनकी जादुई धुनों और महमूद की शानदार कॉमेडी ने मिलकर एक ऐसा सिनेमाई अनुभव प्रदान किया जो छह दशक बीत जाने के बाद भी भारतीय दर्शकों के जेहन में ताजा है।

    वर्तमान समय में जब भारतीय सिनेमा एक बार फिर अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है तो साठ के दशक की उन यादों का ताजा होना स्वाभाविक है। हाल ही में फिल्म जगत में एक बड़ी घोषणा ने हलचल मचा दी है जब अक्षय कुमार और निर्देशक प्रियदर्शन की जोड़ी के एक नए प्रोजेक्ट की जानकारी सामने आई।

    इस प्रोजेक्ट का शीर्षक भी वही रखा गया है जिसने साठ के दशक में अपनी अनूठी कहानी से तहलका मचाया था। अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की जोड़ी ने पहले भी दर्शकों को कई बेहतरीन कॉमेडी फिल्में दी हैं जिससे प्रशंसकों के बीच उम्मीदें और भी बढ़ गई हैं। यह देखना वास्तव में दिलचस्प है कि तकनीक के इस आधुनिक युग में पुराने दौर की उस सादगी और स्वाभाविक डर को किस तरह नए कलेवर में पेश किया जाएगा ताकि वह नई पीढ़ी को भी उसी तरह प्रभावित कर सके।

    हॉरर कॉमेडी एक ऐसी कठिन विधा है जिसमें संतुलन बनाना बहुत चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। यदि कहानी में डर की मात्रा अधिक हो जाए तो वह शुद्ध हॉरर फिल्म बन जाती है और यदि हंसी ज्यादा हो जाए तो वह केवल एक साधारण कॉमेडी बनकर रह जाती है। महमूद ने 1965 में इस बारीक अंतर को बहुत संजीदगी से पकड़ा था और एक संतुलित पटकथा तैयार की थी।

    उस समय की तकनीकी सीमाओं के बावजूद उन्होंने छायांकन और ध्वनि के प्रभावी उपयोग से एक ऐसा रहस्यमयी माहौल बनाया जिसने लोगों को अपनी कुर्सियों से उछलने पर मजबूर कर दिया। आज के दौर में जब फिल्म निर्माण की प्रक्रिया बहुत महंगी और जटिल हो गई है तब भी उन पुरानी फिल्मों की कहानी और उनके पात्रों की गहराई अतुलनीय लगती है। नई फिल्म से दर्शकों को यही अपेक्षा है कि वह उस ऐतिहासिक विरासत का सम्मान करते हुए मनोरंजन का एक नया मानदंड स्थापित करेगी।

    भारतीय दर्शक हमेशा से ही विविधतापूर्ण और मौलिक कहानियों के प्रति आकर्षित रहे हैं। साठ के दशक की उस फिल्म ने न केवल व्यावसायिक सफलता हासिल की बल्कि उसने भविष्य के फिल्मकारों को यह साहस भी दिया कि वे लीक से हटकर प्रयोग कर सकें। आज की पीढ़ी के लिए वह पुरानी फिल्म एक ऐसे अध्याय की तरह है जिसमें मनोरंजन के साथ-साथ सिनेमाई बारीकियों का अद्भुत समावेश था।

    अक्षय कुमार का इस शैली में वापस आना और उसी ऐतिहासिक शीर्षक का चयन करना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अच्छी कहानियों और प्रभावशाली विषयों की प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं होती। आने वाले समय में यह नया प्रोजेक्ट निश्चित रूप से सिनेमा प्रेमियों के बीच व्यापक चर्चा का विषय बना रहेगा और यह साबित करेगा कि कला का कोई अंत नहीं होता बल्कि वह समय के साथ और भी निखरती जाती है।