Tag: MentalHealth

  • ADHD vs Anxiety: ध्यान नहीं लगता या हर समय रहती है चिंता, जानिए दोनों मानसिक स्थितियों में क्या है बड़ा अंतर

    ADHD vs Anxiety: ध्यान नहीं लगता या हर समय रहती है चिंता, जानिए दोनों मानसिक स्थितियों में क्या है बड़ा अंतर


    नई दिल्ली ।
    आज की तेज रफ्तार जीवनशैली में ध्यान न लगना, बार-बार बेचैनी महसूस होना, किसी काम पर फोकस न कर पाना और लगातार चिंता में रहना जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। कई लोग इन लक्षणों को सामान्य तनाव या एंग्जायटी समझ लेते हैं, जबकि कई मामलों में यह अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर यानी ADHD का संकेत भी हो सकता है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों स्थितियों के कई लक्षण एक जैसे दिखाई देते हैं, लेकिन इनके कारण, पहचान और इलाज पूरी तरह अलग होते हैं। इसलिए सही समय पर सही निदान कराना बेहद जरूरी है।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि ADHD एक न्यूरोडेवलपमेंटल डिसऑर्डर है, जिसमें मस्तिष्क का वह हिस्सा प्रभावित होता है जो ध्यान, व्यवहार नियंत्रण और कार्यों की योजना बनाने से जुड़ा होता है। इसके लक्षण अक्सर बचपन में शुरू होते हैं और कई लोगों में वयस्क होने तक बने रह सकते हैं। दूसरी ओर एंग्जायटी एक मानसिक स्वास्थ्य विकार है, जिसमें व्यक्ति लगातार चिंता, डर और तनाव महसूस करता है। यही अत्यधिक चिंता उसकी एकाग्रता और दैनिक जीवन को प्रभावित करती है।

    दोनों स्थितियों में ध्यान भटकना, काम अधूरा छोड़ देना, बेचैनी महसूस होना और रोजमर्रा के कार्यों में कठिनाई जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। यही समानता लोगों को भ्रमित कर देती है। उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति का ध्यान मीटिंग के दौरान बार-बार भटकता है, तो ADHD में इसका कारण मस्तिष्क की कार्यप्रणाली से जुड़ी समस्या हो सकती है, जबकि एंग्जायटी में व्यक्ति का ध्यान लगातार चल रही चिंताओं और नकारात्मक विचारों के कारण भटकता है।

    ADHD के प्रमुख लक्षणों में बार-बार चीजें भूल जाना, एक जगह लंबे समय तक बैठने में कठिनाई, हाथ-पैर लगातार हिलाना, बिना सोचे तुरंत प्रतिक्रिया देना, दूसरों की बात बीच में काट देना और समय प्रबंधन में परेशानी शामिल हो सकती है। इसके विपरीत एंग्जायटी डिसऑर्डर में हर समय किसी अनहोनी का डर बना रहना, दिल की धड़कन तेज होना, पसीना आना, सांस लेने में कठिनाई, मांसपेशियों में तनाव और अत्यधिक चिंता प्रमुख संकेत माने जाते हैं।

    मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि ADHD और एंग्जायटी में सबसे बड़ा अंतर उनके मूल कारण में होता है। ADHD में ध्यान स्वाभाविक रूप से भटकता है और व्यक्ति आवेगपूर्ण व्यवहार कर सकता है, जबकि एंग्जायटी में चिंता और भय के कारण निर्णय लेने में देरी होती है तथा व्यक्ति हर स्थिति को लेकर जरूरत से ज्यादा सोचता है। इसके अलावा ADHD की शुरुआत सामान्यतः बचपन में होती है, जबकि एंग्जायटी किसी भी उम्र में विकसित हो सकती है।

    विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि कई लोगों में ADHD और एंग्जायटी दोनों एक साथ मौजूद हो सकते हैं। ऐसी स्थिति को कॉमॉर्बिडिटी कहा जाता है। इसलिए केवल इंटरनेट पर लक्षण पढ़कर स्वयं बीमारी का अनुमान लगाना उचित नहीं है। सही पहचान के लिए विस्तृत मेडिकल हिस्ट्री, व्यवहार का मूल्यांकन और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ द्वारा जांच आवश्यक होती है।

    डॉक्टरों का कहना है कि यदि ध्यान की कमी, अत्यधिक चिंता, बेचैनी या आवेगपूर्ण व्यवहार लंबे समय तक बना रहे और पढ़ाई, नौकरी या पारिवारिक जीवन को प्रभावित करने लगे, तो बिना देर किए मनोचिकित्सक या क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट से सलाह लेनी चाहिए। समय पर सही निदान और उचित उपचार से दोनों स्थितियों को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है और व्यक्ति सामान्य जीवन जी सकता है।

  • आर्थिक संकट और मानसिक तनाव ने ली दो जिंदगियां इंदौर में मां बेटे की मौत ने झकझोर दिया पूरा शहर

    आर्थिक संकट और मानसिक तनाव ने ली दो जिंदगियां इंदौर में मां बेटे की मौत ने झकझोर दिया पूरा शहर


    इंदौर । इंदौर के परदेशीपुरा क्षेत्र से एक बेहद दुखद घटना सामने आई है जहां आर्थिक तंगी और लंबे समय से मानसिक बीमारी से जूझ रहे मां और बेटे ने जहरीला पदार्थ खाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। दोनों को गंभीर हालत में अस्पताल पहुंचाया गया था लेकिन इलाज के दौरान पहले बेटे और फिर मां की मौत हो गई। इस घटना ने पूरे इलाके को गमगीन कर दिया है और एक बार फिर मानसिक स्वास्थ्य तथा आर्थिक संकट से जूझ रहे परिवारों की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    पुलिस के अनुसार 62 वर्षीय इंदिरा और उनके 35 वर्षीय बेटे संजय मंगलवार दोपहर अपने घर से करीब 100 मीटर दूर स्थित एक बगीचे में पहुंचे थे। वहीं दोनों ने जहरीला पदार्थ खा लिया। कुछ समय बाद स्थानीय लोगों ने उन्हें बेसुध हालत में देखा और परिजनों को सूचना दी। सूचना मिलते ही दोनों को तत्काल एमवाय अस्पताल पहुंचाया गया जहां डॉक्टरों ने उनका उपचार शुरू किया। इलाज के दौरान बुधवार शाम संजय ने दम तोड़ दिया जबकि गुरुवार सुबह इंदिरा की भी मौत हो गई।

    परदेशीपुरा थाना पुलिस के मुताबिक प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि दोनों ने अपनी इच्छा से जहरीला पदार्थ खाया था। अस्पताल में होश आने पर दिए गए शुरुआती बयान में भी मां और बेटे ने किसी पर आरोप नहीं लगाया और स्वयं जहर खाने की बात स्वीकार की थी। पुलिस अब पूरे मामले की विस्तृत जांच कर रही है ताकि घटना से जुड़े सभी पहलुओं की पुष्टि की जा सके।

    परिजनों ने बताया कि इंदिरा के पति का कई वर्ष पहले निधन हो चुका था। इसके बाद वह अपनी बहन और उनके परिवार के साथ रह रही थीं। परिवार ही उनके रहने खाने और अन्य जरूरतों का पूरा खर्च उठाता था। बेटा संजय भी किसी प्रकार का रोजगार नहीं करता था और लंबे समय से घर पर ही रह रहा था। आर्थिक परेशानियों के साथ दोनों मानसिक बीमारी से भी पीड़ित थे जिसके चलते उनका इलाज बाणगंगा स्थित मानसिक चिकित्सालय में चल रहा था।

    रिश्तेदारों के अनुसार मंगलवार दोपहर एक परिचित ने सूचना दी कि मां और बेटा घर के पास बने बगीचे में बेहोश पड़े हैं। जब परिवार मौके पर पहुंचा तब दोनों की सांसें चल रही थीं। आसपास मौजूद लोगों की मदद से उन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया लेकिन डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद दोनों को बचाया नहीं जा सका।

    पुलिस का कहना है कि पोस्टमार्टम के बाद शव परिजनों को सौंप दिए गए हैं। मामले में मर्ग कायम कर जांच की जा रही है और जहरीले पदार्थ के संबंध में भी जानकारी जुटाई जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल किसी तरह की आपराधिक साजिश के संकेत नहीं मिले हैं लेकिन सभी तथ्यों की जांच पूरी होने के बाद ही अंतिम निष्कर्ष सामने आएगा।

    यह घटना समाज के सामने मानसिक स्वास्थ्य और आर्थिक संकट जैसी गंभीर चुनौतियों को भी उजागर करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक आर्थिक दबाव और मानसिक बीमारी का समय पर उपचार तथा सामाजिक सहयोग न मिलने पर व्यक्ति गहरे अवसाद में जा सकता है। ऐसे मामलों में परिवार समाज और स्वास्थ्य संस्थाओं की समय पर मदद कई बार बड़ी त्रासदी को टाल सकती है।

  • प्यार से हत्या तक क्यों पहुंच रहे रिश्ते एक्सपर्ट ने बताए बदलते समाज और मानसिक तनाव के चौंकाने वाले कारण

    प्यार से हत्या तक क्यों पहुंच रहे रिश्ते एक्सपर्ट ने बताए बदलते समाज और मानसिक तनाव के चौंकाने वाले कारण


    भोपाल । बीते कुछ समय में सामने आए कई चर्चित मामलों ने समाज को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या पति पत्नी और प्रेम संबंधों में हिंसा का स्वरूप पहले से अधिक खतरनाक होता जा रहा है। मध्य प्रदेश सहित देश के अलग अलग हिस्सों में सामने आए हत्या और गंभीर अपराधों के मामलों ने रिश्तों में बढ़ते तनाव और मानसिक असंतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती सामाजिक परिस्थितियां संवाद की कमी सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव और विवाहेतर संबंधों से उपजा तनाव कई बार लोगों को हिंसक सोच की ओर धकेल देता है। हालांकि वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि किसी अपराध को केवल महिला या पुरुष अथवा मानसिक बीमारी से जोड़कर देखना पूरी तरह गलत और वैज्ञानिक दृष्टि से अनुचित होगा।

    भोपाल के मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी के अनुसार पिछले सात से आठ वर्षों में पुरुषों के साथ मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना से जुड़े मामलों में लगभग साठ से सत्तर प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है। पहले जहां गंभीर आक्रामकता या हत्या जैसे विचारों के साथ महीने में एक या दो मरीज इलाज के लिए आते थे वहीं अब हर महीने पांच से दस ऐसे मामले सामने आ रहे हैं। इनमें केवल शारीरिक हिंसा ही नहीं बल्कि मानसिक प्रताड़ना और रिश्तों में लगातार बढ़ता तनाव भी प्रमुख कारण बनकर उभर रहा है।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि उनके पास आने वाले कई मामलों में मरीज स्वयं स्वीकार करते हैं कि उनके मन में अपने जीवनसाथी को नुकसान पहुंचाने या हत्या करने जैसे विचार आते हैं। एक मामले में युवा महिला ने चिकित्सकों को बताया कि उसे डर है कहीं वह अपने पति की हत्या न कर दे। जांच में सामने आया कि लंबे समय से वह अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं कर पा रही थी और व्यक्तित्व संबंधी समस्याओं से भी जूझ रही थी। उपचार और कपल काउंसलिंग के बाद उसकी स्थिति में सुधार आया और हिंसक विचार समाप्त हो गए।

    एक अन्य मामले में एक व्यक्ति ने स्वीकार किया कि उसके मन में कई बार पत्नी की हत्या कर जेल जाने तक के विचार आते थे। जांच में उसमें डिप्रेशन और पर्सनैलिटी डिसऑर्डर जैसी मानसिक समस्याएं सामने आईं। विशेषज्ञों ने उसके मानसिक उपचार और व्यवहार नियंत्रण पर काम किया जिसके बाद उसकी स्थिति में सुधार देखा गया।

    डॉ. त्रिवेदी का कहना है कि सोशल मीडिया ने लोगों की अपेक्षाएं और तुलना की प्रवृत्ति बढ़ा दी है। संयुक्त परिवारों की जगह न्यूक्लियर फैमिली का चलन बढ़ने से भावनात्मक सहारा कम हुआ है। इसके साथ ही रिश्तों में संवाद की कमी और विवाहेतर संबंधों से पैदा होने वाला अविश्वास कई बार मानसिक दबाव को बढ़ा देता है। मनोरंजन के बदलते स्वरूप का भी असर देखने को मिल रहा है जहां अपराध करने वाले किरदारों को भी नायक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जिससे कुछ लोगों की सोच प्रभावित होती है।

    हालांकि विशेषज्ञ इस बात पर विशेष जोर देते हैं कि मानसिक बीमारी से जूझ रहे अधिकांश लोग कभी हिंसक नहीं होते। किसी भी अपराध को केवल मानसिक रोग या किसी एक लिंग से जोड़कर देखना उचित नहीं है। यदि रिश्तों में लगातार तनाव गुस्सा अवसाद या हिंसक विचार महसूस हों तो समय रहते मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक की मदद लेना बेहद जरूरी है। सही समय पर काउंसलिंग और उपचार न केवल रिश्तों को बचा सकता है बल्कि किसी बड़ी और दुखद घटना को भी टाल सकता है।

  • भोपाल में दर्दनाक घटना लंबे समय से बीमारी और मानसिक तनाव से जूझ रहे बुजुर्ग ने किया सुसाइड

    भोपाल में दर्दनाक घटना लंबे समय से बीमारी और मानसिक तनाव से जूझ रहे बुजुर्ग ने किया सुसाइड


    भोपाल । मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के बैरागढ़ थाना क्षेत्र से एक बेहद दुखद घटना सामने आई है जहां लंबे समय से गंभीर बीमारी और मानसिक तनाव से जूझ रहे 60 वर्षीय बुजुर्ग ने घर के भीतर फांसी लगाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। घटना के बाद पूरे इलाके में शोक का माहौल है जबकि पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। शुरुआती जांच में सामने आया है कि मृतक पिछले कई महीनों से पैरालिसिस की बीमारी से पीड़ित थे और इसी कारण गहरे अवसाद में चले गए थे।

    पुलिस के अनुसार मृतक की पहचान मनोहर लाल रैकवार पिता मोहनलाल रैकवार निवासी बेटा गांव बैरागढ़ के रूप में हुई है। वह पेशे से प्लंबर थे और अपने परिवार के साथ रहते थे। करीब आठ महीने पहले उन्हें पैरालिसिस का अटैक आया था जिसके बाद उनके शरीर का एक हिस्सा ठीक से काम नहीं कर रहा था। बीमारी के चलते उनकी दिनचर्या पूरी तरह बदल गई थी और सामान्य काम भी दूसरों की मदद के बिना कर पाना मुश्किल हो गया था।

    परिजनों के अनुसार लगातार बिगड़ती सेहत और शारीरिक असहायता ने उन्हें मानसिक रूप से भी काफी परेशान कर दिया था। धीरे धीरे वह अवसाद की स्थिति में पहुंच गए थे और अधिकतर समय घर में ही रहते थे। बीमारी के कारण उनका सामाजिक और पेशेवर जीवन भी प्रभावित हो गया था जिससे उनकी चिंता और बढ़ती चली गई।

    शुक्रवार सुबह जब उनकी पत्नी नींद से उठकर घर की पहली मंजिल पर पहुंचीं तो उन्होंने मनोहर लाल को पाइप के सहारे बनाए गए फंदे पर लटका देखा। यह दृश्य देखकर उन्होंने तुरंत शोर मचाया जिसके बाद आसपास रहने वाले रिश्तेदार और पड़ोसी मौके पर पहुंचे। सभी ने मिलकर उन्हें नीचे उतारा लेकिन तब तक उनकी मौत हो चुकी थी। घटना की सूचना तत्काल बैरागढ़ थाना पुलिस को दी गई।

    सूचना मिलते ही पुलिस टीम मौके पर पहुंची और घटनास्थल का निरीक्षण किया। इसके बाद शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया। पुलिस ने मर्ग कायम कर पूरे मामले की जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों का कहना है कि प्रारंभिक जांच में बीमारी और उससे उपजे मानसिक तनाव के कारण आत्महत्या की आशंका सामने आई है। हालांकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

    यह घटना एक बार फिर इस बात की याद दिलाती है कि गंभीर बीमारी केवल शरीर को ही नहीं बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को भी गहराई से प्रभावित कर सकती है। लंबे समय तक चलने वाली शारीरिक समस्याएं कई बार व्यक्ति को अवसाद और निराशा की ओर धकेल देती हैं। ऐसे समय में परिवार और समाज का भावनात्मक सहयोग तथा समय पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

    यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से मानसिक तनाव अवसाद या निराशा से जूझ रहा हो तो उसकी भावनाओं को गंभीरता से लेना चाहिए और उसे अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। समय पर संवाद और चिकित्सकीय सहायता कई बार किसी की जिंदगी बचा सकती है।

  • क्या बिल्ली पालने से बढ़ सकता है मानसिक बीमारी का खतरा? नई स्टडी ने चौंकाए वैज्ञानिक सावधानी बरतने की दी सलाह

    क्या बिल्ली पालने से बढ़ सकता है मानसिक बीमारी का खतरा? नई स्टडी ने चौंकाए वैज्ञानिक सावधानी बरतने की दी सलाह


    नई दिल्ली । घर में बिल्ली पालना आजकल केवल शौक नहीं बल्कि कई लोगों की जीवनशैली का हिस्सा बन चुका है। पालतू जानवरों से लगाव तनाव कम करने और मानसिक सुकून देने के लिए भी जाना जाता है। हालांकि हाल ही में सामने आई एक वैज्ञानिक स्टडी ने बिल्ली पालने वालों का ध्यान एक संभावित स्वास्थ्य जोखिम की ओर खींचा है। शोध में दावा किया गया है कि बिल्लियों के संपर्क और एक गंभीर मानसिक बीमारी सिजोफ्रेनिया के बीच संभावित संबंध देखा गया है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि इसका मतलब यह नहीं है कि बिल्ली पालने से हर व्यक्ति को यह बीमारी हो जाएगी।

    ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने कई वर्षों में प्रकाशित विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों का विश्लेषण किया। इस समीक्षा में अलग अलग देशों के शोध आंकड़ों को शामिल किया गया। अध्ययन के दौरान यह पाया गया कि जिन लोगों का बिल्लियों से अधिक संपर्क रहा उनमें सिजोफ्रेनिया से जुड़े जोखिम कुछ मामलों में अधिक दिखाई दिए। हालांकि वैज्ञानिकों ने यह भी माना कि इस संबंध को पूरी तरह साबित करने के लिए अभी और विस्तृत शोध की आवश्यकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार इस संभावित संबंध का कारण टोक्सोप्लाज्मा गोंडी नामक एक सूक्ष्म परजीवी माना जाता है। यह परजीवी मुख्य रूप से संक्रमित बिल्लियों के मल में पाया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति उचित स्वच्छता का पालन नहीं करता और किसी तरह यह परजीवी शरीर में प्रवेश कर जाए तो कुछ मामलों में यह मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र को प्रभावित कर सकता है। हालांकि अधिकांश स्वस्थ लोगों में संक्रमण होने पर भी कोई गंभीर लक्षण दिखाई नहीं देते।

    डॉक्टरों का कहना है कि सिजोफ्रेनिया एक जटिल मानसिक बीमारी है जिसके पीछे केवल एक कारण जिम्मेदार नहीं होता। आनुवंशिक प्रवृत्ति मानसिक तनाव मस्तिष्क में रासायनिक असंतुलन पर्यावरणीय प्रभाव और कई अन्य जैविक कारण भी इस बीमारी के विकास में भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए केवल बिल्ली पालने को इस बीमारी का सीधा कारण मानना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि यदि आप घर में बिल्ली पालते हैं तो घबराने की आवश्यकता नहीं है बल्कि कुछ सामान्य सावधानियां अपनाना ही पर्याप्त है। बिल्ली का लिटर बॉक्स साफ करने के बाद हमेशा साबुन से अच्छी तरह हाथ धोएं। घर और पालतू जानवर दोनों की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें। नियमित रूप से पशु चिकित्सक से बिल्ली का स्वास्थ्य परीक्षण कराएं और गर्भवती महिलाओं कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोगों तथा छोटे बच्चों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि टोक्सोप्लाज्मा संक्रमण इन समूहों के लिए अधिक जोखिम पैदा कर सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि पालतू जानवरों से मिलने वाले भावनात्मक और मानसिक लाभ भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। इसलिए किसी एक अध्ययन के आधार पर बिल्ली पालना छोड़ देने की जरूरत नहीं है। जरूरी यह है कि वैज्ञानिक तथ्यों को समझते हुए स्वच्छता और जिम्मेदार देखभाल को प्राथमिकता दी जाए। संतुलित जानकारी और सावधानी ही आपको और आपके पालतू साथी दोनों को सुरक्षित रख सकती है।

  • मानसिक स्वास्थ्य बीमारियों पर हेल्थ इंश्योरेंस कवरेज की नई तस्वीर: अस्पताल में भर्ती से लेकर थेरेपी तक बदलते नियम, पॉलिसी चुनने से पहले समझें हर शर्त

    मानसिक स्वास्थ्य बीमारियों पर हेल्थ इंश्योरेंस कवरेज की नई तस्वीर: अस्पताल में भर्ती से लेकर थेरेपी तक बदलते नियम, पॉलिसी चुनने से पहले समझें हर शर्त

    नई दिल्ली । भारत में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बढ़ती जागरूकता के बीच हेल्थ इंश्योरेंस सेक्टर में भी महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल रहे हैं। अब कई बीमा कंपनियां मानसिक बीमारियों के इलाज को अपनी पॉलिसी के दायरे में शामिल कर रही हैं, जिससे मरीजों और उनके परिवारों को आर्थिक राहत मिलने की उम्मीद बढ़ी है। हालांकि इसके बावजूद कवरेज की वास्तविक स्थिति और शर्तें हर पॉलिसी में अलग-अलग हैं, जिसके कारण उपभोक्ताओं के लिए सही योजना का चयन करना चुनौतीपूर्ण हो गया है।

    पिछले कुछ वर्षों में नियामक स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य के समान मानने पर जोर दिया गया है। इसी बदलाव के चलते बीमा कंपनियों को मानसिक बीमारियों के इलाज को भी हेल्थ इंश्योरेंस में शामिल करने की दिशा में कदम बढ़ाने पड़े हैं। इसके बावजूद अधिकांश पॉलिसियों में यह सुविधा मुख्य रूप से तभी उपलब्ध होती है जब मरीज को अस्पताल में भर्ती कर इलाज कराया जाए।

    विशेषज्ञों के अनुसार कई बीमा योजनाओं में इन-पेशेंट ट्रीटमेंट यानी अस्पताल में भर्ती होने की स्थिति में ही खर्च का कवरेज दिया जाता है। इसमें डॉक्टर की फीस, दवाइयां, कमरे का किराया और अन्य चिकित्सा खर्च शामिल हो सकते हैं। हालांकि डे-केयर या सीमित अवधि के उपचार के लिए कवरेज कुछ चुनिंदा पॉलिसियों में ही मिलता है, जो पूरी तरह कंपनी की शर्तों पर निर्भर करता है।

    मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कई सामान्य उपचार जैसे काउंसलिंग, नियमित थेरेपी सेशन या मनोवैज्ञानिक से फॉलो-अप विजिट अक्सर अधिकांश पॉलिसियों में कवर नहीं होते। इससे उन लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है जिन्हें लंबे समय तक थेरेपी या मेंटल हेल्थ सपोर्ट की आवश्यकता होती है। इसके अलावा कई योजनाओं में क्लेम की अधिकतम सीमा और कमरे के किराए पर भी कैपिंग लागू होती है, जिससे कुल प्रतिपूर्ति राशि सीमित हो जाती है।

    बीमा पॉलिसियों में कुछ विशेष परिस्थितियों को अपवाद के रूप में भी शामिल किया जाता है। नशे की लत से जुड़े इलाज या स्वयं को नुकसान पहुंचाने जैसी स्थितियों में कई कंपनियां कवरेज नहीं देतीं। इसके साथ ही मानसिक बीमारियों से जुड़े मामलों में वेटिंग पीरियड भी लागू किया जा सकता है, जिसके दौरान पॉलिसीधारक क्लेम नहीं कर सकता।

    बाजार में उपलब्ध विभिन्न पॉलिसियों के बीच अंतर को देखते हुए उपभोक्ताओं के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वे बीमा खरीदने से पहले सभी नियमों और शर्तों को ध्यान से पढ़ें। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि केवल कम प्रीमियम के आधार पर निर्णय लेना आगे चलकर आर्थिक और मानसिक दोनों तरह की कठिनाइयों का कारण बन सकता है।

    बदलते समय के साथ कई कंपनियां अब मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को और अधिक व्यापक रूप से शामिल करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं, जिसमें थेरेपी और रिकवरी सपोर्ट भी शामिल हो सकता है। ऐसे में पॉलिसीधारकों के लिए यह जरूरी है कि वे समय-समय पर अपनी पॉलिसी की समीक्षा करें और जरूरत के अनुसार बेहतर विकल्प चुनें, ताकि भविष्य में इलाज के दौरान आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

  • एक्शन हीरो की असली कमजोरी सामने टाइगर श्रॉफ को उड़ान से डर नींद तक हो रही खराब

    एक्शन हीरो की असली कमजोरी सामने टाइगर श्रॉफ को उड़ान से डर नींद तक हो रही खराब


    नई दिल्ली । बॉलीवुड के एक्शन स्टार टाइगर श्रॉफ जिन्हें बड़े पर्दे पर खतरनाक स्टंट और जबरदस्त फिटनेस के लिए जाना जाता है हाल ही में अपनी एक निजी समस्या को लेकर चर्चा में आ गए हैं। पर्दे पर हर मुश्किल को आसानी से पार करते नजर आने वाले टाइगर ने खुलासा किया है कि वह असल जिंदगी में एक ऐसे डर से जूझ रहे हैं जो उन्हें अंदर तक परेशान कर देता है। यह डर है एयरोफोबिया यानी हवाई जहाज में उड़ान भरने का डर। उन्होंने बताया कि इस समस्या से निजात पाने के लिए अब वह प्रोफेशनल थेरेपी लेने पर विचार कर रहे हैं।

    टाइगर ने एक बातचीत के दौरान बताया कि कुछ साल पहले उन्हें एक फ्लाइट में बेहद खराब टर्बुलेंस का सामना करना पड़ा था। उस अनुभव ने उनके मन पर गहरा असर डाला और तभी से उनके अंदर उड़ान को लेकर डर बैठ गया। उन्होंने कहा कि उस समय उन्हें पूरी तरह से असहाय महसूस हुआ क्योंकि स्थिति पर उनका कोई नियंत्रण नहीं था। यही वजह है कि अब जब भी उन्हें फ्लाइट से यात्रा करनी होती है तो दो दिन पहले से ही बेचैनी और घबराहट शुरू हो जाती है।

    उन्होंने यह भी बताया कि पायलट अक्सर उन्हें समझाते हैं कि टर्बुलेंस कोई बड़ी बात नहीं होती और यह सड़क पर लगने वाले हल्के झटकों की तरह ही होता है लेकिन उनके दिमाग को यह बात स्वीकार नहीं होती। टाइगर का कहना है कि उन्हें हर चीज पर नियंत्रण रखना पसंद है लेकिन फ्लाइट के दौरान वह खुद को पूरी तरह बेबस महसूस करते हैं और यही उनकी चिंता का सबसे बड़ा कारण है।

    सिर्फ एयरोफोबिया ही नहीं टाइगर ने अपनी एक और समस्या का जिक्र किया। उन्होंने माना कि वह कई बार छोटी छोटी बातों को लेकर जरूरत से ज्यादा सोचने लगते हैं और इससे वह काफी कंफ्यूजन में पड़ जाते हैं। उन्होंने बताया कि कई बार उन्हें अपने दिनभर के काम तय करने में भी काफी मुश्किल होती है क्योंकि वह हर चीज को लेकर ज्यादा सोचने लगते हैं। यह स्थिति उनके लिए मानसिक रूप से थकाने वाली हो जाती है।

    वर्क फ्रंट की बात करें तो टाइगर श्रॉफ ने हीरोपंती वॉर और बागी जैसी फिल्मों के जरिए खुद को एक सफल एक्शन हीरो के रूप में स्थापित किया है लेकिन उनकी हालिया फिल्म बागी 4 बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाई। भारी बजट में बनी इस फिल्म का कलेक्शन निराशाजनक रहा और इसे फ्लॉप माना गया। हालांकि टाइगर अपनी फिटनेस और एक्शन स्टाइल के कारण फैंस के बीच अब भी काफी लोकप्रिय हैं।

    टाइगर का यह खुलासा इस बात की ओर इशारा करता है कि चमक दमक से भरी फिल्मी दुनिया के सितारे भी मानसिक और भावनात्मक चुनौतियों से अछूते नहीं हैं। एयरोफोबिया एक आम लेकिन गंभीर समस्या हो सकती है जिसमें व्यक्ति को उड़ान के दौरान अत्यधिक डर और घबराहट महसूस होती है। विशेषज्ञों के अनुसार सही काउंसलिंग और थेरेपी से इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है।

    टाइगर का अपने डर को खुले तौर पर स्वीकार करना कई लोगों के लिए प्रेरणा बन सकता है क्योंकि यह दिखाता है कि मदद लेना कमजोरी नहीं बल्कि समझदारी का कदम है। अब देखना दिलचस्प होगा कि वह इस डर पर कैसे काबू पाते हैं और आगे अपनी जिंदगी और करियर में किस तरह आगे बढ़ते हैं।

  • अचानक आने वाली उदासी से कैसे पाएं छुटकारा ऋतिक रोशन ने बताया 90 सेकंड का साइंस

    अचानक आने वाली उदासी से कैसे पाएं छुटकारा ऋतिक रोशन ने बताया 90 सेकंड का साइंस


    नई दिल्ली /मुंबई-बॉलीवुड अभिनेता ऋतिक रोशन न सिर्फ अपनी फिटनेस और फिल्मों के लिए जाने जाते हैं-बल्कि मानसिक स्वास्थ्य और आत्मचिंतन जैसे विषयों पर भी खुलकर बात करते रहे हैं। इसी कड़ी में ऋतिक ने सोशल मीडिया पर एक गहरा और विचारोत्तेजक पोस्ट साझा किया है-जिसमें उन्होंने अचानक बिना किसी कारण आने वाली उदासी से निपटने का एक आसान लेकिन वैज्ञानिक तरीका बताया है। इसे उन्होंने 90 सेकंड का नियम कहा है।ऋतिक ने अपने इंस्टाग्राम पोस्ट की शुरुआत हल्के-फुल्के अंदाज में करते हुए लिखा- कानूनी चेतावनी: बेमतलब की सुबह की बकवास। इसके बाद उन्होंने उस मानसिक स्थिति का जिक्र किया-जिससे लगभग हर इंसान कभी न कभी गुजरता है। उन्होंने लिखा कि कई बार जब सबकुछ ठीक चल रहा होता है-तभी अचानक दुनिया की नकारात्मकता सामने आने लगती है। अच्छी चीजें भी अपना दूसरा-नकारात्मक पहलू दिखाने लगती हैं और मन एक अजीब सी उदासी से घिर जाता है।

    ऋतिक ने बताया कि ऐसी स्थिति में हम अपने दिमाग से उस उदासी के कारण ढूंढने लगते हैं। हम तर्क गढ़ते हैं-थ्योरी बनाते हैं-समाधान सोचते हैं-लेकिन फिर भी उस बेवजह की उदासी से बाहर नहीं निकल पाते। यह भावना बिना किसी चेतावनी के हमें अपनी गिरफ्त में ले लेती है और पूरा दिन भारी लगने लगता है।अपने पोस्ट में अभिनेता ने ईमानदारी से स्वीकार किया कि वह भी उसी वक्त अपनी भावनाओं को शब्दों में ढाल रहे थे। उन्होंने लिखा कि कैसे हम बड़े-बड़े शब्दों के जरिए अपनी उदासी को खूबसूरत या तार्किक बनाने की कोशिश करते हैं। ऋतिक ने इस प्रवृत्ति पर भी सवाल उठाया कि आज की दुनिया में कैसे बेमतलब चीजों को भी इस तरह पेश किया जाता है कि वे जरूरी और समझदारी भरी लगने लगती हैं।

    इसके बाद ऋतिक ने विज्ञान का हवाला देते हुए एक अहम बात साझा की। उन्होंने न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. जिल बोल्टे टेलर का जिक्र करते हुए लिखा कि कोई भी भावना अपने शुद्ध रूप में सिर्फ 90 सेकंड तक ही रहती है। अगर हम उस भावना को बार-बार सोचकर जिंदा न रखें-तो वह या तो बदल जाती है या किसी दूसरी भावना में मिल जाती है। यानी-अगर हम खुद को 90 सेकंड तक संभाल लें-तो उदासी अपने आप कमजोर पड़ने लगती है।

    ऋतिक ने मजाकिया अंदाज में लिखा-इस पोस्ट को लिखने में मुझे 45 सेकंड लगे हैं-45 सेकंड अभी बाकी हैं। पोस्ट के अंत में उन्होंने उन लोगों को टैग किया जो शायद इस पोस्ट को समझ न पाएं या इसे पढ़कर नाराज हो जाएं। उन्होंने लिखा कि ऐसे लोग असल में जिंदगी को सही मायनों में जी रहे हैं।ऋतिक रोशन की यह पोस्ट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है और फैंस इसे मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक ईमानदार और जरूरी संदेश बता रहे हैं।