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  • मानसिक स्वास्थ्य बीमारियों पर हेल्थ इंश्योरेंस कवरेज की नई तस्वीर: अस्पताल में भर्ती से लेकर थेरेपी तक बदलते नियम, पॉलिसी चुनने से पहले समझें हर शर्त

    मानसिक स्वास्थ्य बीमारियों पर हेल्थ इंश्योरेंस कवरेज की नई तस्वीर: अस्पताल में भर्ती से लेकर थेरेपी तक बदलते नियम, पॉलिसी चुनने से पहले समझें हर शर्त

    नई दिल्ली । भारत में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बढ़ती जागरूकता के बीच हेल्थ इंश्योरेंस सेक्टर में भी महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल रहे हैं। अब कई बीमा कंपनियां मानसिक बीमारियों के इलाज को अपनी पॉलिसी के दायरे में शामिल कर रही हैं, जिससे मरीजों और उनके परिवारों को आर्थिक राहत मिलने की उम्मीद बढ़ी है। हालांकि इसके बावजूद कवरेज की वास्तविक स्थिति और शर्तें हर पॉलिसी में अलग-अलग हैं, जिसके कारण उपभोक्ताओं के लिए सही योजना का चयन करना चुनौतीपूर्ण हो गया है।

    पिछले कुछ वर्षों में नियामक स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य के समान मानने पर जोर दिया गया है। इसी बदलाव के चलते बीमा कंपनियों को मानसिक बीमारियों के इलाज को भी हेल्थ इंश्योरेंस में शामिल करने की दिशा में कदम बढ़ाने पड़े हैं। इसके बावजूद अधिकांश पॉलिसियों में यह सुविधा मुख्य रूप से तभी उपलब्ध होती है जब मरीज को अस्पताल में भर्ती कर इलाज कराया जाए।

    विशेषज्ञों के अनुसार कई बीमा योजनाओं में इन-पेशेंट ट्रीटमेंट यानी अस्पताल में भर्ती होने की स्थिति में ही खर्च का कवरेज दिया जाता है। इसमें डॉक्टर की फीस, दवाइयां, कमरे का किराया और अन्य चिकित्सा खर्च शामिल हो सकते हैं। हालांकि डे-केयर या सीमित अवधि के उपचार के लिए कवरेज कुछ चुनिंदा पॉलिसियों में ही मिलता है, जो पूरी तरह कंपनी की शर्तों पर निर्भर करता है।

    मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कई सामान्य उपचार जैसे काउंसलिंग, नियमित थेरेपी सेशन या मनोवैज्ञानिक से फॉलो-अप विजिट अक्सर अधिकांश पॉलिसियों में कवर नहीं होते। इससे उन लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है जिन्हें लंबे समय तक थेरेपी या मेंटल हेल्थ सपोर्ट की आवश्यकता होती है। इसके अलावा कई योजनाओं में क्लेम की अधिकतम सीमा और कमरे के किराए पर भी कैपिंग लागू होती है, जिससे कुल प्रतिपूर्ति राशि सीमित हो जाती है।

    बीमा पॉलिसियों में कुछ विशेष परिस्थितियों को अपवाद के रूप में भी शामिल किया जाता है। नशे की लत से जुड़े इलाज या स्वयं को नुकसान पहुंचाने जैसी स्थितियों में कई कंपनियां कवरेज नहीं देतीं। इसके साथ ही मानसिक बीमारियों से जुड़े मामलों में वेटिंग पीरियड भी लागू किया जा सकता है, जिसके दौरान पॉलिसीधारक क्लेम नहीं कर सकता।

    बाजार में उपलब्ध विभिन्न पॉलिसियों के बीच अंतर को देखते हुए उपभोक्ताओं के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वे बीमा खरीदने से पहले सभी नियमों और शर्तों को ध्यान से पढ़ें। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि केवल कम प्रीमियम के आधार पर निर्णय लेना आगे चलकर आर्थिक और मानसिक दोनों तरह की कठिनाइयों का कारण बन सकता है।

    बदलते समय के साथ कई कंपनियां अब मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को और अधिक व्यापक रूप से शामिल करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं, जिसमें थेरेपी और रिकवरी सपोर्ट भी शामिल हो सकता है। ऐसे में पॉलिसीधारकों के लिए यह जरूरी है कि वे समय-समय पर अपनी पॉलिसी की समीक्षा करें और जरूरत के अनुसार बेहतर विकल्प चुनें, ताकि भविष्य में इलाज के दौरान आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

  • एक्शन हीरो की असली कमजोरी सामने टाइगर श्रॉफ को उड़ान से डर नींद तक हो रही खराब

    एक्शन हीरो की असली कमजोरी सामने टाइगर श्रॉफ को उड़ान से डर नींद तक हो रही खराब


    नई दिल्ली । बॉलीवुड के एक्शन स्टार टाइगर श्रॉफ जिन्हें बड़े पर्दे पर खतरनाक स्टंट और जबरदस्त फिटनेस के लिए जाना जाता है हाल ही में अपनी एक निजी समस्या को लेकर चर्चा में आ गए हैं। पर्दे पर हर मुश्किल को आसानी से पार करते नजर आने वाले टाइगर ने खुलासा किया है कि वह असल जिंदगी में एक ऐसे डर से जूझ रहे हैं जो उन्हें अंदर तक परेशान कर देता है। यह डर है एयरोफोबिया यानी हवाई जहाज में उड़ान भरने का डर। उन्होंने बताया कि इस समस्या से निजात पाने के लिए अब वह प्रोफेशनल थेरेपी लेने पर विचार कर रहे हैं।

    टाइगर ने एक बातचीत के दौरान बताया कि कुछ साल पहले उन्हें एक फ्लाइट में बेहद खराब टर्बुलेंस का सामना करना पड़ा था। उस अनुभव ने उनके मन पर गहरा असर डाला और तभी से उनके अंदर उड़ान को लेकर डर बैठ गया। उन्होंने कहा कि उस समय उन्हें पूरी तरह से असहाय महसूस हुआ क्योंकि स्थिति पर उनका कोई नियंत्रण नहीं था। यही वजह है कि अब जब भी उन्हें फ्लाइट से यात्रा करनी होती है तो दो दिन पहले से ही बेचैनी और घबराहट शुरू हो जाती है।

    उन्होंने यह भी बताया कि पायलट अक्सर उन्हें समझाते हैं कि टर्बुलेंस कोई बड़ी बात नहीं होती और यह सड़क पर लगने वाले हल्के झटकों की तरह ही होता है लेकिन उनके दिमाग को यह बात स्वीकार नहीं होती। टाइगर का कहना है कि उन्हें हर चीज पर नियंत्रण रखना पसंद है लेकिन फ्लाइट के दौरान वह खुद को पूरी तरह बेबस महसूस करते हैं और यही उनकी चिंता का सबसे बड़ा कारण है।

    सिर्फ एयरोफोबिया ही नहीं टाइगर ने अपनी एक और समस्या का जिक्र किया। उन्होंने माना कि वह कई बार छोटी छोटी बातों को लेकर जरूरत से ज्यादा सोचने लगते हैं और इससे वह काफी कंफ्यूजन में पड़ जाते हैं। उन्होंने बताया कि कई बार उन्हें अपने दिनभर के काम तय करने में भी काफी मुश्किल होती है क्योंकि वह हर चीज को लेकर ज्यादा सोचने लगते हैं। यह स्थिति उनके लिए मानसिक रूप से थकाने वाली हो जाती है।

    वर्क फ्रंट की बात करें तो टाइगर श्रॉफ ने हीरोपंती वॉर और बागी जैसी फिल्मों के जरिए खुद को एक सफल एक्शन हीरो के रूप में स्थापित किया है लेकिन उनकी हालिया फिल्म बागी 4 बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाई। भारी बजट में बनी इस फिल्म का कलेक्शन निराशाजनक रहा और इसे फ्लॉप माना गया। हालांकि टाइगर अपनी फिटनेस और एक्शन स्टाइल के कारण फैंस के बीच अब भी काफी लोकप्रिय हैं।

    टाइगर का यह खुलासा इस बात की ओर इशारा करता है कि चमक दमक से भरी फिल्मी दुनिया के सितारे भी मानसिक और भावनात्मक चुनौतियों से अछूते नहीं हैं। एयरोफोबिया एक आम लेकिन गंभीर समस्या हो सकती है जिसमें व्यक्ति को उड़ान के दौरान अत्यधिक डर और घबराहट महसूस होती है। विशेषज्ञों के अनुसार सही काउंसलिंग और थेरेपी से इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है।

    टाइगर का अपने डर को खुले तौर पर स्वीकार करना कई लोगों के लिए प्रेरणा बन सकता है क्योंकि यह दिखाता है कि मदद लेना कमजोरी नहीं बल्कि समझदारी का कदम है। अब देखना दिलचस्प होगा कि वह इस डर पर कैसे काबू पाते हैं और आगे अपनी जिंदगी और करियर में किस तरह आगे बढ़ते हैं।

  • अचानक आने वाली उदासी से कैसे पाएं छुटकारा ऋतिक रोशन ने बताया 90 सेकंड का साइंस

    अचानक आने वाली उदासी से कैसे पाएं छुटकारा ऋतिक रोशन ने बताया 90 सेकंड का साइंस


    नई दिल्ली /मुंबई-बॉलीवुड अभिनेता ऋतिक रोशन न सिर्फ अपनी फिटनेस और फिल्मों के लिए जाने जाते हैं-बल्कि मानसिक स्वास्थ्य और आत्मचिंतन जैसे विषयों पर भी खुलकर बात करते रहे हैं। इसी कड़ी में ऋतिक ने सोशल मीडिया पर एक गहरा और विचारोत्तेजक पोस्ट साझा किया है-जिसमें उन्होंने अचानक बिना किसी कारण आने वाली उदासी से निपटने का एक आसान लेकिन वैज्ञानिक तरीका बताया है। इसे उन्होंने 90 सेकंड का नियम कहा है।ऋतिक ने अपने इंस्टाग्राम पोस्ट की शुरुआत हल्के-फुल्के अंदाज में करते हुए लिखा- कानूनी चेतावनी: बेमतलब की सुबह की बकवास। इसके बाद उन्होंने उस मानसिक स्थिति का जिक्र किया-जिससे लगभग हर इंसान कभी न कभी गुजरता है। उन्होंने लिखा कि कई बार जब सबकुछ ठीक चल रहा होता है-तभी अचानक दुनिया की नकारात्मकता सामने आने लगती है। अच्छी चीजें भी अपना दूसरा-नकारात्मक पहलू दिखाने लगती हैं और मन एक अजीब सी उदासी से घिर जाता है।

    ऋतिक ने बताया कि ऐसी स्थिति में हम अपने दिमाग से उस उदासी के कारण ढूंढने लगते हैं। हम तर्क गढ़ते हैं-थ्योरी बनाते हैं-समाधान सोचते हैं-लेकिन फिर भी उस बेवजह की उदासी से बाहर नहीं निकल पाते। यह भावना बिना किसी चेतावनी के हमें अपनी गिरफ्त में ले लेती है और पूरा दिन भारी लगने लगता है।अपने पोस्ट में अभिनेता ने ईमानदारी से स्वीकार किया कि वह भी उसी वक्त अपनी भावनाओं को शब्दों में ढाल रहे थे। उन्होंने लिखा कि कैसे हम बड़े-बड़े शब्दों के जरिए अपनी उदासी को खूबसूरत या तार्किक बनाने की कोशिश करते हैं। ऋतिक ने इस प्रवृत्ति पर भी सवाल उठाया कि आज की दुनिया में कैसे बेमतलब चीजों को भी इस तरह पेश किया जाता है कि वे जरूरी और समझदारी भरी लगने लगती हैं।

    इसके बाद ऋतिक ने विज्ञान का हवाला देते हुए एक अहम बात साझा की। उन्होंने न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. जिल बोल्टे टेलर का जिक्र करते हुए लिखा कि कोई भी भावना अपने शुद्ध रूप में सिर्फ 90 सेकंड तक ही रहती है। अगर हम उस भावना को बार-बार सोचकर जिंदा न रखें-तो वह या तो बदल जाती है या किसी दूसरी भावना में मिल जाती है। यानी-अगर हम खुद को 90 सेकंड तक संभाल लें-तो उदासी अपने आप कमजोर पड़ने लगती है।

    ऋतिक ने मजाकिया अंदाज में लिखा-इस पोस्ट को लिखने में मुझे 45 सेकंड लगे हैं-45 सेकंड अभी बाकी हैं। पोस्ट के अंत में उन्होंने उन लोगों को टैग किया जो शायद इस पोस्ट को समझ न पाएं या इसे पढ़कर नाराज हो जाएं। उन्होंने लिखा कि ऐसे लोग असल में जिंदगी को सही मायनों में जी रहे हैं।ऋतिक रोशन की यह पोस्ट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है और फैंस इसे मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक ईमानदार और जरूरी संदेश बता रहे हैं।