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  • यूपीआई एमडीआर लागू करने की तारीख टली, दीपावली के तुरंत बाद चुनिंदा डिजिटल भुगतानों पर व्यापारियों से लिया जाएगा शुल्क

    यूपीआई एमडीआर लागू करने की तारीख टली, दीपावली के तुरंत बाद चुनिंदा डिजिटल भुगतानों पर व्यापारियों से लिया जाएगा शुल्क

    नई दिल्ली ।भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) ने प्रस्तावित यूपीआई मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) फ्रेमवर्क लागू करने का समय आगे बढ़ा दिया है। अब इसे दीपावली के तुरंत बाद लागू किया जाएगा। हालांकि, इसके लिए कोई निश्चित तारीख घोषित नहीं की गई है। एनपीसीआई ने मंगलवार, 13 अक्टूबर को जारी अधिसूचना में बताया कि यूपीआई और सर्विसेज स्टीयरिंग कमेटी ने त्योहारों के मौसम को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया है। लागू होने की तारीख की जानकारी अलग से दी जाएगी।

    यह निर्णय ऐसे समय में आया है, जब व्यापारी संगठनों, फिनटेक कंपनियों और भुगतान सेवाएं देने वाली कंपनियों ने फ्रेमवर्क लागू करने की तारीख आगे बढ़ाने की मांग की थी। इन संगठनों को आशंका थी कि त्योहारों के दौरान बिक्री अधिक रहने के बीच नए शुल्क की व्यवस्था लागू होने से कारोबार प्रभावित हो सकता है। इसी स्थिति को ध्यान में रखते हुए इसे दीपावली के बाद लागू करने का फैसला किया गया है।

    प्रस्तावित व्यवस्था के तहत 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा पर्सन-टू-मर्चेंट (पी2एम) यूपीआई लेनदेन पर एमडीआर की दर 0.4 प्रतिशत निर्धारित की गई है। यह दर पिछले महीने यूपीआई स्टीयरिंग कमेटी ने तय की थी। हालांकि, यह शुल्क सभी यूपीआई लेनदेन पर लागू नहीं होगा, बल्कि निर्धारित श्रेणी के व्यापारी भुगतानों तक सीमित रहेगा।

    एमडीआर वह शुल्क है, जो डिजिटल भुगतान की प्रक्रिया पूरी करने के बदले व्यापारियों से लिया जाता है। निर्धारित दर के हिसाब से 2,000 रुपये के भुगतान पर 0.4 प्रतिशत की गणना करने पर 8 रुपये शुल्क बनता है। इसी तरह 10,000 रुपये के भुगतान पर यह राशि 40 रुपये होती है। यह गणना निर्धारित शुल्क दर के आधार पर है और वास्तविक लागू होने की शर्तें संबंधित व्यवस्था के अनुसार होंगी।

    सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि यूपीआई एमडीआर का भुगतान व्यापारियों को करना होगा। वे इस शुल्क को किसी भी तरीके से ग्राहकों पर नहीं डाल सकते। इसका अर्थ है कि निर्धारित व्यवस्था के तहत शुल्क की जिम्मेदारी व्यापारी की होगी और ग्राहकों से इसे अलग से वसूलने की अनुमति नहीं होगी।

    इस प्रस्ताव पर भुगतान क्षेत्र से जुड़े लोगों के बीच चर्चा भी हुई है। विश्व बैंक समूह के कार्यकारी निदेशक नीलकंठ मिश्रा ने इससे पहले कहा था कि यूपीआई लेनदेन पर एमडीआर की अनुमति देना एक अधिकार प्रदान करने वाले नियम की तरह होगा। उनका मानना था कि भुगतान क्षेत्र में मौजूद प्रतिस्पर्धा के कारण शुल्क में बड़े स्तर पर बढ़ोतरी की आशंका कम है।

    मिश्रा ने कहा था कि बाजार में ऐसी कंपनियां भी रही हैं, जो एमडीआर शुल्क नहीं ले पाने के बावजूद अपना कारोबार जारी रखने और बाजार में बने रहने में सफल रहीं। उनके बयान का मुख्य आधार भुगतान क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा थी। फिलहाल एनपीसीआई ने फ्रेमवर्क लागू करने के लिए दीपावली के बाद का समय तय किया है, जबकि इसकी सटीक तारीख और लागू होने से जुड़ी विस्तृत जानकारी की घोषणा अभी बाकी है।

  • व्यापारी संगठनों ने नए UPI MDR फ्रेमवर्क को त्योहारी सीजन तक टालने की मांग की, बिक्री प्रभावित होने की जताई आशंका

    व्यापारी संगठनों ने नए UPI MDR फ्रेमवर्क को त्योहारी सीजन तक टालने की मांग की, बिक्री प्रभावित होने की जताई आशंका


    नई दिल्ली ।
    व्यापारी संगठनों ने 15 अक्टूबर से लागू होने वाले नए यूपीआई एमडीआर यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट फ्रेमवर्क को त्योहारी सीजन तक टालने की अपील की है। संगठनों ने भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) से इस प्रस्ताव को त्योहारी सीजन और अगले साल की शुरुआत तक लागू नहीं करने का अनुरोध किया है। व्यापारियों का कहना है कि यदि बदलाव तय समय पर लागू किया गया तो त्योहारी सीजन के दौरान उनकी बिक्री पर असर पड़ सकता है।

    नए एमडीआर फ्रेमवर्क के तहत 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर चुनिंदा व्यापारी श्रेणियों के लिए 5 रुपये का एक समान शुल्क लागू किया जाएगा। इसके अलावा 2,000 रुपये से अधिक के बड़े पर्सन-टू-मर्चेंट यानी पी2एम भुगतान पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लगाया जाएगा। इस शुल्क की अधिकतम सीमा 300 रुपये निर्धारित की गई है।

    प्रस्तावित व्यवस्था को लेकर व्यापारी संगठनों की मुख्य चिंता त्योहारी सीजन में लेनदेन और बिक्री पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को लेकर है। संगठनों ने इसी वजह से नए फ्रेमवर्क को कुछ समय के लिए टालने की अपील की है। उनका आग्रह है कि इसे त्योहारी खरीदारी की अवधि समाप्त होने और अगले साल की शुरुआत तक लागू न किया जाए।

    एनपीसीआई के अनुमान के अनुसार, प्रस्तावित बदलाव का असर मर्चेंट ट्रांजैक्शन के केवल 4 प्रतिशत हिस्से पर पड़ेगा। संस्था के मुताबिक 95 प्रतिशत से अधिक पर्सन-टू-मर्चेंट यूपीआई भुगतान इस एमडीआर फ्रेमवर्क के दायरे से बाहर रहेंगे। वहीं, पीयर-टू-पीयर यानी पी2पी मर्चेंट मॉडल का इस्तेमाल करने वाले छोटे व्यापारियों को जीरो एमडीआर की सुविधा पहले की तरह मिलती रहेगी।

    आम यूपीआई उपयोगकर्ताओं के लिए मुफ्त यूपीआई इस्तेमाल को लेकर किसी मासिक कोटे या सीमा का प्रावधान नहीं किया गया है। उपयोगकर्ता तय मुफ्त फ्रेमवर्क के तहत लेनदेन जारी रख सकेंगे और उन पर एमडीआर शुल्क नहीं लगाया जाएगा। इस तरह प्रस्तावित बदलाव का सीधा दायरा मुख्य रूप से कुछ विशेष व्यापारी श्रेणियों और निर्धारित भुगतान लेनदेन तक सीमित रहेगा।

    नए फ्रेमवर्क में छोटे व्यापारियों के बीच यूपीआई के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए एक विशेष फंड बनाने का भी प्रावधान है। इसके लिए कुल एमडीआर कलेक्शन का 5 प्रतिशत हिस्सा निर्धारित किया गया है। एमडीआर से मिलने वाली राशि को अलग-अलग कंपनियों के बीच वितरित किया जाएगा। इस राशि का इस्तेमाल यूपीआई के विस्तार, साइबर सुरक्षा और इनोवेशन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया जाएगा।

    इसके साथ ही एनपीसीआई ने बैंकों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा है कि व्यापारी एमडीआर शुल्क का बोझ ग्राहकों पर न डालें। ऐसे में नए फ्रेमवर्क में शुल्क व्यवस्था के साथ व्यापारियों और ग्राहकों पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर भी स्पष्ट प्रावधान रखे गए हैं। फिलहाल व्यापारी संगठन नए एमडीआर फ्रेमवर्क को लागू करने की तारीख आगे बढ़ाने की मांग कर रहे हैं, ताकि त्योहारी अवधि के दौरान उनकी बिक्री पर संभावित असर से बचा जा सके।

  • यूपीआई पेमेंट पर एमडीआर को लेकर बड़ी सफाई, 96 प्रतिशत से ज्यादा ट्रांजैक्शन पर नहीं पड़ेगा शुल्क का असर

    यूपीआई पेमेंट पर एमडीआर को लेकर बड़ी सफाई, 96 प्रतिशत से ज्यादा ट्रांजैक्शन पर नहीं पड़ेगा शुल्क का असर

    नई दिल्ली ।यू पीआई भुगतान को लेकर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर और उस पर लगने वाले जीएसटी को लेकर उठ रही चिंताओं के बीच स्थिति स्पष्ट की गई है। नई व्यवस्था के तहत छोटे व्यापारियों और कम राशि वाले अधिकांश यूपीआई भुगतान पर एमडीआर का बोझ नहीं पड़ेगा।

    जानकारी के अनुसार, 2,000 रुपये तक के सभी व्यक्ति-से-व्यापारी यानी पी2एम यूपीआई ट्रांजैक्शन पर पहले की तरह शून्य एमडीआर लागू रहेगा। ऐसे भुगतान पर एमडीआर नहीं होने के कारण उससे संबंधित जीएसटी का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

    सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2,000 रुपये तक के भुगतान यूपीआई मर्चेंट ट्रांजैक्शन वॉल्यूम का 96 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हैं। इसका मतलब है कि यूपीआई के माध्यम से होने वाले अधिकांश व्यापारी भुगतान एमडीआर और उससे जुड़े जीएसटी दायित्व से बाहर रहेंगे।

    छोटे व्यापारियों के लिए एक अन्य महत्वपूर्ण प्रावधान भी रखा गया है। जिन व्यापारियों की मासिक यूपीआई प्राप्तियां एक लाख रुपये तक हैं, उन्हें एमडीआर का भुगतान नहीं करना होगा। इसलिए इस श्रेणी के व्यापारियों पर एमडीआर के संबंध में जीएसटी लगने का सवाल भी नहीं उठता।

    एमडीआर का उद्देश्य यूपीआई भुगतान व्यवस्था से जुड़े विभिन्न भागीदारों के बीच भुगतान प्रक्रिया की लागत को पूरा करना है। इसमें बैंक, भुगतान सेवा प्रदाता और यूपीआई एप प्रदाता जैसे भागीदार शामिल होते हैं। एमडीआर सरकार या यूपीआई व्यवस्था संचालित करने वाली संस्था द्वारा लगाया जाने वाला कोई कर नहीं है।

    नई व्यवस्था में 2,000 रुपये से अधिक के पी2एम यूपीआई ट्रांजैक्शन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लागू होगा। हालांकि, 75,000 रुपये या उससे अधिक के ट्रांजैक्शन के लिए एमडीआर की अधिकतम सीमा 300 रुपये प्रति ट्रांजैक्शन निर्धारित की गई है।

    कुछ आवश्यक और कम मार्जिन वाले क्षेत्रों के लिए अलग व्यवस्था रखी गई है। रेलवे, दूरसंचार, बीमा, ईंधन और कृषि इनपुट जैसे क्षेत्रों में 2,000 रुपये से अधिक के ट्रांजैक्शन पर पांच रुपये प्रति ट्रांजैक्शन का फ्लैट एमडीआर लागू होगा। इसका उद्देश्य इन क्षेत्रों में भुगतान लागत को सीमित और पूर्वानुमेय रखना है।

    एमडीआर पर जीएसटी को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की गई है। यदि किसी व्यापारी को एमडीआर पर जीएसटी का भुगतान करना पड़ता है, तो वह अन्य इनपुट टैक्स की तरह इस राशि को अपनी जीएसटी देनदारी के विरुद्ध समायोजित कर सकता है। ऐसे में यह राशि सीधे तौर पर व्यापारी की अंतिम लागत नहीं बनती।

    दूसरी ओर, व्यक्ति-से-व्यक्ति यानी पी2पी यूपीआई भुगतान पहले की तरह पूरी तरह मुफ्त रहेंगे। इसमें भुगतान की राशि कितनी भी हो, पी2पी ट्रांजैक्शन पर एमडीआर लागू नहीं होगा।

    इस व्यवस्था का असर मुख्य रूप से 2,000 रुपये से अधिक के कुछ पी2एम भुगतान पर पड़ेगा। वहीं कम राशि वाले भुगतान और एक लाख रुपये तक की मासिक यूपीआई प्राप्ति वाले छोटे व्यापारी इससे बाहर रहेंगे।

    कुल मिलाकर, यूपीआई मर्चेंट ट्रांजैक्शन के बड़े हिस्से पर शून्य एमडीआर की व्यवस्था जारी रहेगी। 96 प्रतिशत से अधिक मर्चेंट ट्रांजैक्शन 2,000 रुपये तक के होने के कारण अधिकांश डिजिटल भुगतान इस शुल्क व्यवस्था के दायरे में नहीं आएंगे।

  • UPI पेमेंट पर चार्ज की तैयारी, 2000 रुपये तक कोई शुल्क नहीं, बड़े भुगतान पर दुकानदारों से वसूली संभव

    UPI पेमेंट पर चार्ज की तैयारी, 2000 रुपये तक कोई शुल्क नहीं, बड़े भुगतान पर दुकानदारों से वसूली संभव

    नई दिल्ली । UPI से भुगतान करने वाले लोगों के लिए शुल्क से जुड़ा नया बदलाव सामने आया है। 2000 रुपये तक के UPI भुगतान पर कोई चार्ज नहीं लगाया जाएगा, जबकि इससे अधिक राशि के भुगतान पर शुल्क लगाने का रास्ता साफ होने की बात सामने आई है। हालांकि, इस शुल्क का सीधा भुगतान ग्राहक को नहीं करना होगा। 2000 रुपये से अधिक के लेनदेन पर लगने वाले शुल्क की दर तय करने की जिम्मेदारी NPCI यानी नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया की होगी।

    अब तक UPI भुगतान को लेकर यह व्यवस्था थी कि किसी भी राशि के लेनदेन पर कोई चार्ज नहीं लिया जाता था। नई व्यवस्था में 2000 रुपये तक के भुगतान को शुल्क से बाहर रखा गया है। इससे ज्यादा राशि के भुगतान पर शुल्क की व्यवस्था लागू होने की संभावना है। ऐसे में बड़े मूल्य के UPI लेनदेन करने वाले दुकानदारों और कारोबारियों पर इसका असर पड़ सकता है।

    सामने आई जानकारी के अनुसार 2000 रुपये से अधिक के UPI भुगतान पर शुल्क कितना होगा, इसका अंतिम फैसला NPCI करेगा। इसकी दर 0.3 से 0.5 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान लगाया जा रहा है। हालांकि, यह अंतिम दर नहीं है और वास्तविक शुल्क NPCI के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगा।

    यदि शुल्क की दर 0.3 से 0.5 प्रतिशत के बीच रहती है, तो 5000 रुपये के भुगतान पर 15 से 25 रुपये तक का शुल्क बन सकता है। यह राशि ग्राहक से सीधे वसूल किए जाने की बात नहीं है। इसका भुगतान दुकानदार या संबंधित व्यापारी को करना होगा। यानी किसी दुकान पर 5000 रुपये का सामान खरीदने के लिए UPI से भुगतान करने वाले ग्राहक को अलग से 15 या 25 रुपये देने की जरूरत नहीं होगी।

    इस व्यवस्था में व्यक्ति से व्यक्ति के बीच होने वाले UPI लेनदेन को अलग रखा गया है। यानी कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को पैसे भेजता है, तो राशि कितनी भी हो, उसके लिए चार्ज नहीं लगेगा। इस तरह व्यक्तिगत लेनदेन पर शुल्क का असर नहीं पड़ेगा।

    बदलाव का मुख्य असर व्यापारिक भुगतान पर पड़ने की संभावना है। दुकानदारों और कारोबारियों द्वारा ग्राहकों से सामान या सेवाओं के बदले UPI के जरिए प्राप्त की जाने वाली बड़ी रकम पर शुल्क लागू हो सकता है। हालांकि, इस शुल्क की अंतिम दर और लागू होने से जुड़ी विस्तृत व्यवस्था NPCI के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगी।

    UPI देश में डिजिटल भुगतान का प्रमुख माध्यम बन चुका है और छोटे से लेकर बड़े लेनदेन तक इसका इस्तेमाल किया जाता है। नई व्यवस्था में 2000 रुपये तक के भुगतान को बिना शुल्क जारी रखने की बात कही गई है। इससे रोजमर्रा की छोटी खरीदारी के लिए UPI इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों पर सीधे शुल्क का प्रभाव नहीं पड़ेगा।

    दूसरी ओर, 2000 रुपये से अधिक के भुगतान पर शुल्क की संभावित व्यवस्था कारोबारियों के लिए नई लागत पैदा कर सकती है। हालांकि, व्यक्ति से व्यक्ति के बीच होने वाले लेनदेन पर किसी राशि की सीमा के आधार पर शुल्क नहीं लगाया जाएगा।

    फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बिंदु NPCI द्वारा तय की जाने वाली शुल्क दर है। 2000 रुपये से अधिक के UPI भुगतान पर कितना प्रतिशत शुल्क लगेगा और यह व्यवस्था किस तरह लागू होगी, इसकी तस्वीर अंतिम निर्णय के बाद साफ होगी। फिलहाल 2000 रुपये तक के भुगतान को शुल्क से मुक्त रखने की व्यवस्था बताई गई है।

  • UPI पर MDR शुल्क को लेकर नया मॉडल तैयार, छोटे कारोबारियों को राहत देकर बड़े मर्चेंट्स से शुल्क लेने की तैयारी

    UPI पर MDR शुल्क को लेकर नया मॉडल तैयार, छोटे कारोबारियों को राहत देकर बड़े मर्चेंट्स से शुल्क लेने की तैयारी

    नई दिल्ली ।भारत में डिजिटल भुगतान के सबसे प्रमुख माध्यमों में शामिल UPI पर लंबे समय से शुल्क व्यवस्था को लेकर चर्चा होती रही है। मौजूदा व्यवस्था में आम तौर पर UPI लेनदेन पर सीधे मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR का बोझ नहीं पड़ता। इससे ग्राहकों के लिए भुगतान आसान और बिना अतिरिक्त शुल्क के बना हुआ है, लेकिन डिजिटल भुगतान से जुड़ी कंपनियों और बुनियादी ढांचे की लागत को लेकर वित्तीय दबाव की चर्चा लगातार सामने आती रही है।

    इसी चुनौती के बीच डेबिट कार्ड से जुड़े पुराने नियामकीय मॉडल को UPI के लिए संभावित आधार के तौर पर देखा जा रहा है। इस विचार के तहत शुल्क व्यवस्था ऐसी बनाई जा सकती है, जिसमें छोटे कारोबारियों को अतिरिक्त लागत से बचाया जाए और बड़े तथा संगठित कारोबारियों से सीमित शुल्क लिया जाए।

    डेबिट कार्ड से जुड़े नियमों में छोटे कारोबारियों के लिए MDR की ऊपरी सीमा कम रखी गई है। सालाना 20 लाख रुपये से कम कारोबार करने वाले छोटे मर्चेंट्स के लिए अधिकतम MDR 0.40 प्रतिशत तक सीमित रखने का प्रावधान बताया गया है। इसी तरह के सिद्धांत को UPI में अपनाने पर छोटे किराना दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों और छोटे कारोबारियों को शुल्क से पूरी तरह राहत देने का विकल्प बन सकता है।

    दूसरी ओर बड़े शोरूम, मॉल, ई-कॉमर्स कंपनियों और संगठित रिटेल कारोबार को अलग श्रेणी में रखा जा सकता है। ऐसे कारोबारियों से उनकी भुगतान क्षमता और कारोबार के आकार के अनुसार मामूली MDR लेने का प्रस्ताव चर्चा में है। इसका उद्देश्य UPI के संचालन और भुगतान व्यवस्था की लागत को साझा करना हो सकता है, बिना छोटे व्यापारियों पर अतिरिक्त बोझ डाले।

    इस संभावित मॉडल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू आम उपभोक्ताओं को सीधे शुल्क से बचाना है। बैंक खाते से दूसरे बैंक खाते में UPI के जरिए पैसे भेजने वाले ग्राहकों के लिए भुगतान मुफ्त रखने की कोशिश की जा सकती है। यानी शुल्क व्यवस्था लागू होने की स्थिति में भी इसका सीधा असर सामान्य व्यक्ति के प्रत्येक UPI भुगतान पर डालने से बचने का विकल्प रखा जा सकता है।

    UPI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ लेनदेन की संख्या और डिजिटल भुगतान प्रणाली को संचालित करने के लिए आवश्यक तकनीकी ढांचे की लागत भी बढ़ रही है। भुगतान कंपनियों को सर्वर, सुरक्षा, तकनीकी रखरखाव और अन्य व्यवस्थाओं पर लगातार खर्च करना पड़ता है। ऐसे में लंबे समय तक शून्य MDR व्यवस्था बनाए रखने के लिए सरकार की ओर से प्रोत्साहन राशि की जरूरत पड़ती है।

    प्रस्तावित मॉडल का एक उद्देश्य इस वित्तीय दबाव को कम करना भी हो सकता है। यदि बड़े मर्चेंट्स से सीमित शुल्क लिया जाता है, तो भुगतान व्यवस्था से जुड़े पक्षों के लिए अतिरिक्त राजस्व का स्रोत बन सकता है। इससे तकनीकी ढांचे और साइबर सुरक्षा को मजबूत करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

    हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि डेबिट कार्ड से जुड़े नियमों को UPI पर उसी रूप में लागू करना तय नहीं है। UPI की मौजूदा संरचना, भुगतान प्रक्रिया और इसमें शामिल संस्थाओं को देखते हुए किसी भी शुल्क मॉडल के लिए अलग नियम और शर्तें तय करनी पड़ सकती हैं।

    फिलहाल चर्चा का केंद्र यही है कि डिजिटल भुगतान की लोकप्रियता और मुफ्त लेनदेन की सुविधा बरकरार रखते हुए व्यवस्था को आर्थिक रूप से टिकाऊ कैसे बनाया जाए। यदि छोटे कारोबारियों और आम ग्राहकों को सुरक्षित रखते हुए बड़े मर्चेंट्स से सीमित शुल्क लेने का मॉडल तैयार होता है, तो UPI के विस्तार और वित्तीय स्थिरता के बीच संतुलन बनाने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

  • UPI Payment पर MDR की चर्चा के बीच सरकार ने साफ किया पूरा गणित, जानिए किसे देना पड़ सकता है शुल्क

    UPI Payment पर MDR की चर्चा के बीच सरकार ने साफ किया पूरा गणित, जानिए किसे देना पड़ सकता है शुल्क

    नई दिल्ली ।यूपीआई से भुगतान करने वाले करोड़ों लोगों के बीच पिछले कुछ दिनों से मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR को लेकर सवाल उठ रहे थे। खासतौर पर 2000 रुपये से अधिक के यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाए जाने की चर्चाओं के कारण यह आशंका बनी हुई थी कि आने वाले समय में डिजिटल भुगतान महंगा हो सकता है। अब सरकार ने इस मुद्दे पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि आम लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है।

    लोकसभा में पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 से संबंधित विधेयक पारित होने के बाद सरकार ने यूपीआई भुगतान व्यवस्था और संभावित MDR को लेकर अपना रुख सामने रखा है। सरकार के मुताबिक, एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के बीच होने वाले यूपीआई भुगतान पर कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा। ऐसे में रोजमर्रा के व्यक्तिगत लेनदेन करने वाले ग्राहकों पर प्रस्तावित व्यवस्था का सीधा असर नहीं पड़ेगा।

    MDR यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट उस शुल्क को कहा जाता है, जो डिजिटल भुगतान स्वीकार करने वाले व्यापारी या दुकानदार की ओर से बैंक अथवा भुगतान सेवा उपलब्ध कराने वाली संस्था को दिया जाता है। यह डिजिटल भुगतान की सुविधा से जुड़ी लागत का हिस्सा होता है। इसलिए इसे सीधे ग्राहक पर लगाया जाने वाला शुल्क नहीं माना जाता है।

    सरकार ने कहा है कि यदि भविष्य में यूपीआई लेनदेन पर MDR लागू किया जाता है तो उसका दायरा सीमित रखा जाएगा। सभी तरह के यूपीआई भुगतान पर एक समान शुल्क लगाने की कोई योजना नहीं बताई गई है। व्यक्ति से व्यक्ति होने वाले लेनदेन इससे बाहर रहेंगे और अधिकांश छोटे दुकानदारों तथा कारोबारियों पर भी इसका बड़ा असर नहीं पड़ने की बात कही गई है।

    संभावित व्यवस्था के तहत तय सीमा से अधिक मूल्य वाले कुछ चुनिंदा मर्चेंट भुगतान पर MDR लगाया जा सकता है। सरकार के अनुसार, ऐसी स्थिति में शुल्क की राशि काफी कम रखी जा सकती है। यह शुल्क कार्ड के जरिए होने वाले डिजिटल भुगतान पर लगने वाले शुल्क की तुलना में भी कम हो सकता है।

    सरकार ने संभावित MDR की जरूरत के पीछे यूपीआई के लगातार बढ़ते इस्तेमाल को प्रमुख कारण बताया है। डिजिटल भुगतान का दायरा बढ़ने के साथ साइबर सुरक्षा को मजबूत करने, ऑनलाइन धोखाधड़ी रोकने और भुगतान प्रणाली को सुरक्षित बनाए रखने के लिए लगातार खर्च की आवश्यकता होती है। इसी वजह से डिजिटल भुगतान व्यवस्था की लागत और उसके प्रबंधन को लेकर चर्चा चल रही है।

    हालांकि, अभी यूपीआई पर MDR लागू करने को लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। वित्त मंत्री ने भी स्पष्ट किया है कि यदि भविष्य में MDR लागू किया जाता है तो उसका भुगतान व्यापारी करेंगे, ग्राहकों से सीधे शुल्क लेने की व्यवस्था नहीं होगी। इससे व्यक्तिगत यूपीआई भुगतान करने वाले लोगों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ने की आशंका फिलहाल नहीं है।

    भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा भी इस विषय में जल्दबाजी में कोई निष्कर्ष निकालने से बचने की बात कह चुके हैं। भुगतान व्यवस्था से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अभी बातचीत जारी है। अंतिम नीति तय होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि किन श्रेणियों के मर्चेंट भुगतान को संभावित शुल्क के दायरे में रखा जा सकता है।

    इस बीच वित्त मंत्रालय ने उन दावों को भी गलत बताया है, जिनमें कहा गया था कि किसी बाहरी दबाव के कारण यूपीआई से जुड़ी नीति में बदलाव किया जा रहा है। सरकार का मौजूदा रुख स्पष्ट है कि व्यक्ति से व्यक्ति होने वाले यूपीआई भुगतान पर कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा और यदि भविष्य में MDR की व्यवस्था लागू होती है तो उसका दायरा सीमित रखा जाएगा।

    इसलिए फिलहाल सामान्य यूपीआई उपयोगकर्ताओं के लिए राहत की स्थिति है। छोटे व्यक्तिगत भुगतान करने वालों को किसी नए शुल्क की चिंता करने की जरूरत नहीं है। दूसरी ओर, व्यापारिक लेनदेन को लेकर अंतिम नियम आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि संभावित MDR किन भुगतान श्रेणियों पर लागू होगा और उसकी वास्तविक दर कितनी होगी।