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  • पीएम मोदी का वीडियो हटाने के विवाद के बाद Meta पर कार्रवाई का दबाव बढ़ा, सरकार ने अवैध कंटेंट को लेकर मांगा जवाब

    पीएम मोदी का वीडियो हटाने के विवाद के बाद Meta पर कार्रवाई का दबाव बढ़ा, सरकार ने अवैध कंटेंट को लेकर मांगा जवाब

    नई दिल्ली । भारत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर गैरकानूनी सामग्री को लेकर सरकार का रुख लगातार सख्त होता जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़े एक वीडियो को फेसबुक से हटाए जाने के विवाद के बाद Meta पर सरकार की निगरानी और दबाव बढ़ा था। इसी पृष्ठभूमि में अब कंपनी की ओर से बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी गैरकानूनी सामग्री यानी CSAM के खिलाफ कार्रवाई किए जाने की जानकारी सामने आई है। इस पूरे घटनाक्रम ने भारत में सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही और उन्हें मिलने वाली सेफ हार्बर सुरक्षा को लेकर बहस को फिर तेज कर दिया है।

    सरकारी रुख के अनुसार सोशल मीडिया कंपनियां यदि अपने प्लेटफॉर्म पर मौजूद गैरकानूनी सामग्री के खिलाफ जरूरी कदम नहीं उठाती हैं तो उन्हें कानूनी संरक्षण को लेकर मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। अधिकारियों का कहना है कि कानून का उल्लंघन करने वाली सामग्री के मामलों में सेफ हार्बर का लाभ स्वतः सुनिश्चित नहीं माना जा सकता। हालांकि किसी कंपनी ने कानून का उल्लंघन किया है या नहीं और उसे सेफ हार्बर सुरक्षा मिलेगी या नहीं इसका अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही होगा।

    Meta के लिए यह मामला केवल CSAM सामग्री हटाने तक सीमित नहीं है। कंपनी के एल्गोरिदम, कंटेंट मॉडरेशन व्यवस्था और प्लेटफॉर्म पर सामग्री की पहुंच बढ़ाने वाली प्रणालियों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। सरकार की ओर से कंपनी से इस बात को लेकर जवाब मांगा गया है कि गैरकानूनी सामग्री को रोकने और बार बार सामने आने वाली ऐसी सामग्री पर कार्रवाई करने के लिए उसकी तकनीकी प्रणालियां किस तरह काम करती हैं।

    प्रधानमंत्री मोदी का फेसबुक वीडियो कुछ समय के लिए हटाए जाने के बाद भारत में Meta की कार्यप्रणाली को लेकर विवाद काफी बढ़ गया था। इस घटनाक्रम के बाद कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों और सरकार के बीच बैठक भी हुई थी। Meta की ओर से वीडियो हटाए जाने को गलती बताया गया और कंपनी के प्रमुख मार्क जुकरबर्ग ने इस मामले पर माफी मांगी थी। इसके बाद सरकार ने प्लेटफॉर्म पर मौजूद अन्य गंभीर समस्याओं को लेकर भी कंपनी से जवाब तलब किया।

    संसदीय स्तर पर भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को लेकर सख्त संदेश दिया गया था। समिति ने बाल यौन शोषण सामग्री, महिलाओं से जुड़ी आपत्तिजनक सामग्री और अन्य गैरकानूनी कंटेंट को हटाने की जिम्मेदारी को गंभीरता से लेने की बात कही थी। साथ ही चेतावनी दी गई थी कि कानून का पालन नहीं करने की स्थिति में संबंधित प्लेटफॉर्म के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सकती है।

    सरकार और Meta के बीच हुई चर्चाओं में CSAM के अलावा डीपफेक, वेरिफाइड अकाउंट की सुरक्षा, एल्गोरिद्मिक पक्षपात और भारतीय कानूनों के अनुपालन जैसे मुद्दे भी सामने आए। इससे स्पष्ट है कि भारत में सोशल मीडिया कंपनियों के लिए केवल कंटेंट हटाना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उन्हें अपनी मॉडरेशन व्यवस्था और तकनीकी प्रक्रियाओं को भी अधिक जवाबदेह बनाना पड़ सकता है।

    दुनिया के दूसरे देशों में भी सोशल मीडिया से जुड़े नुकसान और बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है। ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन सहित कई देशों में प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी और डिजिटल सामग्री की निगरानी को लेकर नियम कड़े किए जा रहे हैं। भारत में भी सरकार का मौजूदा रुख इसी व्यापक वैश्विक बहस के बीच सोशल मीडिया कंपनियों पर बढ़ती जवाबदेही का संकेत माना जा रहा है।

  • मेटा को केंद्र की दो टूक, भारत में ग्लोबल पॉलिसी नहीं बल्कि स्थानीय कानूनों के मुताबिक करना होगा मॉडरेशन

    मेटा को केंद्र की दो टूक, भारत में ग्लोबल पॉलिसी नहीं बल्कि स्थानीय कानूनों के मुताबिक करना होगा मॉडरेशन


    नई दिल्ली । 
    भारत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के संचालन और कंटेंट मॉडरेशन को लेकर केंद्र सरकार ने मेटा के सामने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। सरकार का कहना है कि भारत में फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप जैसे प्लेटफॉर्म केवल अपनी वैश्विक नीतियों के आधार पर काम नहीं कर सकते। उन्हें भारतीय कानूनों और देश की भाषाई तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुरूप अपने कंटेंट मॉडरेशन तंत्र को लागू करना होगा।

    मेटा और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के बीच इस मुद्दे पर कई दौर की बातचीत हो चुकी है। इन चर्चाओं के बाद सरकारी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल कंपनी के पूरे एल्गोरिदम को बदलने का कोई निर्देश नहीं दिया गया है। सरकार का जोर इस बात पर है कि प्लेटफॉर्म की नीतियां और मॉडरेशन व्यवस्था भारत में लागू कानूनी प्रावधानों के अनुरूप हो तथा स्थानीय परिस्थितियों को पर्याप्त महत्व दिया जाए।

    सरकार विशेष रूप से भारतीय भाषाओं और सांस्कृतिक संदर्भों को लेकर चिंतित है। अधिकारियों के अनुसार, विदेशों में बैठे मॉडरेशन दल कई बार भारत की अलग-अलग भाषाओं, सामाजिक संदर्भों और स्थानीय संवेदनशीलताओं को पूरी तरह नहीं समझ पाते। ऐसे में कंटेंट की सही पहचान और उचित कार्रवाई के लिए स्थानीय स्तर पर विशेषज्ञता और इनपुट बढ़ाने की आवश्यकता बताई गई है।

    बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट यानी सीएसएएम को लेकर सरकार ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। इस तरह के कंटेंट के मामले में किसी तरह की ढिलाई स्वीकार नहीं करने की बात कही गई है। सरकार चाहती है कि मेटा अपने प्लेटफॉर्म पर ऐसे कंटेंट की पहचान, रोकथाम और कार्रवाई के लिए अधिक प्रभावी व्यवस्था विकसित करे और संदिग्ध सामग्री के दोबारा सामने आने की संभावना को भी कम करे।

    डीपफेक के मुद्दे पर भी सरकार और मेटा के बीच चर्चा हुई है। खासतौर पर मशहूर हस्तियों से जुड़े सिंथेटिक कंटेंट को लेकर सरकार ने मानवीय समीक्षा की जरूरत पर जोर दिया है। अधिकारियों का मानना है कि केवल स्वचालित तकनीक के आधार पर किसी सामग्री को हटाने से गलत निर्णय की संभावना बनी रह सकती है। इसलिए संवेदनशील मामलों में ह्यूमन इन द लूप व्यवस्था के जरिए अंतिम समीक्षा की जरूरत बताई गई है।

    सरकार ने यह भी जानना चाहा है कि एक बार किसी हानिकारक या सिंथेटिक कंटेंट की पहचान होने के बाद उसे दोबारा यूजर्स तक पहुंचने और रिकमेंड होने से रोकने के लिए मेटा की व्यवस्था कितनी प्रभावी है। रिकमेंडेशन सिस्टम और वायरल कंटेंट को लेकर भी कंपनी से सवाल किए गए हैं।

    बैठकों में यह मुद्दा भी सामने आया कि कई बार यूजर्स को उनकी सामान्य पसंद से अलग सामग्री क्यों दिखाई जाती है और क्या रिकमेंडेशन सिस्टम सिंथेटिक या हानिकारक कंटेंट को अनावश्यक रूप से आगे बढ़ा रहा है। सरकार का जोर इस बात पर है कि पहचाने जा चुके नुकसानदायक कंटेंट की पहुंच को एल्गोरिदम के जरिए दोबारा बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए।

    इसके साथ ही मेटा के इंटरमीडियरी स्टेटस और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 के तहत मिलने वाली सेफ हार्बर सुरक्षा से जुड़े अनुपालन की भी समीक्षा की जा रही है। सरकार यह देख रही है कि प्लेटफॉर्म की कंटेंट रिकमेंडेशन में भूमिका उसके कानूनी दायित्वों को किस तरह प्रभावित करती है।

    फिलहाल सरकार और मेटा के बीच तकनीकी स्तर पर बातचीत जारी है और अगले दौर की बैठक होने की उम्मीद है। केंद्र का स्पष्ट संदेश यह है कि उद्देश्य मेटा के एल्गोरिदम को पूरी तरह बदलना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि उसके प्लेटफॉर्म, कंटेंट नीति और मॉडरेशन व्यवस्था भारतीय कानूनों के साथ देश की भाषाई और सांस्कृतिक जरूरतों के अनुरूप काम करें।

  • डीपफेक पर मेटा से सरकार की दो टूक, कार्रवाई नहीं हुई तो भारतीय कानून के तहत तय हो सकती है कंपनी की जवाबदेही

    डीपफेक पर मेटा से सरकार की दो टूक, कार्रवाई नहीं हुई तो भारतीय कानून के तहत तय हो सकती है कंपनी की जवाबदेही

    नई दिल्ली । डीपफेक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार होने वाली भ्रामक सामग्री को लेकर केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया मंच मेटा के प्रति सख्त रुख अपनाया है। सरकार ने कंपनी से डीपफेक सामग्री के खिलाफ ठोस और प्रभावी कदम उठाने को कहा है। साथ ही मेटा के साथ हुई बैठकों के परिणामों की समीक्षा के बाद आगे की कार्रवाई को लेकर कानूनी राय लेने की प्रक्रिया शुरू करने की बात सामने आई है। सरकार यह भी जांच कर रही है कि भारतीय कानून के तहत मेटा और अन्य ऑनलाइन मंचों को मिलने वाले मध्यस्थ के दर्जे की शर्तों का सही तरीके से पालन किया जा रहा है या नहीं।

    सरकारी सूत्रों के अनुसार, मौजूदा समीक्षा का मुख्य सवाल यह है कि ऑनलाइन मंच भारतीय कानून में मध्यस्थों के लिए निर्धारित जिम्मेदारियों का पालन कर रहे हैं या नहीं। सरकार यह भी देख रही है कि यदि किसी मंच की तकनीकी प्रणाली यह तय करती है कि किसी यूजर को कौन-सी सामग्री दिखाई जाएगी, तो उस स्थिति में उसकी भूमिका केवल एक निष्क्रिय मध्यस्थ तक सीमित मानी जा सकती है या नहीं। इसी आधार पर संबंधित कंपनियों की जिम्मेदारी तय करने को लेकर कानूनी पहलुओं की जांच की जा रही है।

    सरकार की नजर केवल मेटा तक सीमित नहीं रहने वाली है। आने वाले समय में अन्य प्रमुख ऑनलाइन मंचों को भी बातचीत के लिए बुलाया जा सकता है। इनके माध्यम से यह समझने की कोशिश होगी कि उनकी अनुशंसा प्रणाली किस तरह काम करती है और यूजर्स तक सामग्री पहुंचाने में उनकी तकनीकी भूमिका कितनी सक्रिय है। सरकार यह भी देख रही है कि भुगतान वाली सामग्री को बढ़ावा देने और यूजर के लिए सामग्री चुनने वाली प्रणालियों की भूमिका भारतीय कानून के मौजूदा प्रावधानों के तहत किस तरह निर्धारित होती है।

    डीपफेक को लेकर सरकार की चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि एआई तकनीक के इस्तेमाल से वास्तविक व्यक्ति के चेहरे, आवाज और वीडियो को बदलकर ऐसी सामग्री तैयार की जा सकती है, जो देखने में वास्तविक लगती है। ऐसी सामग्री का इस्तेमाल गलत सूचना फैलाने, किसी व्यक्ति की छवि खराब करने और लोगों को भ्रमित करने के लिए किया जा सकता है। बिना स्पष्ट लेबल वाली एआई-जनित सामग्री भी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर यूजर्स के लिए भ्रम की स्थिति पैदा कर सकती है।

    सरकार और मेटा के बीच इस मुद्दे पर लगातार कई दौर की बैठकें हुई हैं। दो दिनों तक कंपनी की टीम से विस्तृत पूछताछ के बाद तीसरे दिन तकनीकी स्तर पर चर्चा की गई। इसमें डीपफेक, बाल यौन शोषण सामग्री और बिना लेबल वाली एआई-जनित सामग्री से निपटने के लिए कंपनी की कार्ययोजना पर विशेष रूप से चर्चा हुई। सरकार की ओर से प्लेटफॉर्म की तकनीकी व्यवस्था और कंटेंट मॉडरेशन प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए।

    यह पूरा मामला उस घटनाक्रम के बाद और महत्वपूर्ण हो गया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक सोशल मीडिया पोस्ट पर मेटा के एआई आधारित कंटेंट फिल्टर की वजह से अस्थायी रोक लग गई थी। बाद में कंपनी ने इसे तकनीकी गलती बताया और पोस्ट बहाल करते हुए माफी मांगी थी। इसके बाद सरकार और कंपनी के बीच हुई बैठकों में प्लेटफॉर्म की कंटेंट मॉडरेशन व्यवस्था और तकनीकी प्रणालियों की भूमिका पर विशेष ध्यान दिया गया।

    अब सरकार बैठकों से मिले जवाबों और मेटा की कार्ययोजना की समीक्षा कर रही है। इसके बाद कानूनी राय के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जा सकती है। यदि जांच में यह पाया जाता है कि प्लेटफॉर्म भारतीय कानून के तहत अपनी जिम्मेदारियों का पालन नहीं कर रहे हैं, तो उनकी जवाबदेही तय करने की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं। इससे भारत में डीपफेक, एआई सामग्री और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी को लेकर नियामकीय व्यवस्था और सख्त होने के संकेत मिल रहे हैं।

  • Arvind Kejriwal I आप का दावा, भारत में ब्लॉक हुआ केजरीवाल का इंस्टाग्राम अकाउंट, मेटा से मांगा जवाब

    Arvind Kejriwal I आप का दावा, भारत में ब्लॉक हुआ केजरीवाल का इंस्टाग्राम अकाउंट, मेटा से मांगा जवाब


    नई दिल्ली ।
    आम आदमी पार्टी ने दावा किया है कि उसके राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का इंस्टाग्राम अकाउंट भारत में ब्लॉक कर दिया गया है। पार्टी का कहना है कि इस संबंध में उन्हें एक नोटिस भी मिला है, लेकिन अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया कि अकाउंट को किस वजह से रोका गया और इसे दोबारा कब तथा कैसे बहाल किया जाएगा। इस दावे के बाद राजनीतिक हलकों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की भूमिका और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।

    अरविंद केजरीवाल ने एक वीडियो संदेश जारी कर कहा कि उन्हें सूचना मिली है कि उनका इंस्टाग्राम अकाउंट भारत में प्रतिबंधित कर दिया गया है। उन्होंने बताया कि इस संबंध में उन्होंने कई बार संबंधित सोशल मीडिया कंपनी से फोन और ईमेल के माध्यम से संपर्क करने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला। उनके अनुसार कंपनी ने न तो कार्रवाई का कारण बताया और न ही अकाउंट दोबारा शुरू करने की प्रक्रिया की जानकारी दी।

    आम आदमी पार्टी के नेताओं ने इस पूरे घटनाक्रम को गंभीर बताते हुए आरोप लगाया कि सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वाले नेताओं और लोगों के सोशल मीडिया अकाउंट्स पर कार्रवाई की जा रही है। पार्टी का कहना है कि विपक्षी नेताओं की बढ़ती लोकप्रियता से घबराकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सेंसरशिप लागू करने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, इन आरोपों पर संबंधित पक्ष की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

    केजरीवाल ने दावा किया कि उन्हें कई ऐसे लोगों के संदेश और फोन कॉल भी मिले हैं, जिन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर इसी तरह की कार्रवाई की शिकायत की है। उनका कहना है कि यदि किसी अन्य व्यक्ति का भी अकाउंट इसी प्रकार बंद किया गया है, तो वह उनसे संपर्क करे ताकि ऐसे सभी मामलों को एक साथ उठाया जा सके। उन्होंने कहा कि इस विषय पर जवाबदेही तय होनी चाहिए और उपयोगकर्ताओं को यह जानने का अधिकार है कि उनके अकाउंट पर कार्रवाई किस आधार पर की गई।

    पार्टी का कहना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म आज राजनीतिक संवाद और जनसंपर्क का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुके हैं। ऐसे में किसी भी सार्वजनिक प्रतिनिधि या आम नागरिक के अकाउंट पर कार्रवाई पूरी पारदर्शिता के साथ होनी चाहिए। बिना स्पष्ट कारण बताए अकाउंट प्रतिबंधित किए जाने से कई तरह के सवाल खड़े होते हैं और इससे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की निष्पक्षता पर भी चर्चा शुरू हो जाती है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर होने वाली कार्रवाई और उसके नियम लगातार चर्चा का विषय बने हुए हैं। विभिन्न देशों में भी डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही, कंटेंट मॉडरेशन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर बहस जारी है। भारत में भी इस प्रकार के मामलों पर समय-समय पर राजनीतिक दल अपनी-अपनी प्रतिक्रिया देते रहे हैं।

    फिलहाल आम आदमी पार्टी इस मुद्दे को सार्वजनिक रूप से उठा रही है और मेटा से स्पष्टीकरण की मांग कर रही है। दूसरी ओर, इस मामले में आधिकारिक पुष्टि या विस्तृत बयान आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि अकाउंट पर की गई कार्रवाई का वास्तविक कारण क्या है और आगे इसकी स्थिति क्या होगी।

  • मेटा के एआई मॉडल ने टेस्टिंग के दौरान बाहरी सिस्टम में लगाई सेंध, इंटरनेट कनेक्शन की गड़बड़ी बनी वजह

    मेटा के एआई मॉडल ने टेस्टिंग के दौरान बाहरी सिस्टम में लगाई सेंध, इंटरनेट कनेक्शन की गड़बड़ी बनी वजह

    नई दिल्ली । आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बढ़ती क्षमताओं के बीच एक नया मामला सामने आया है, जिसने एआई सुरक्षा और परीक्षण प्रक्रियाओं को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। मेटा ने खुलासा किया है कि उसके एक एआई मॉडल ने साइबर सिक्योरिटी परीक्षण के दौरान अनजाने में इंटरनेट तक पहुंच बना ली और इसके बाद एक बाहरी सर्विस सिस्टम की सुरक्षा कमजोरी का फायदा उठाकर उसमें अनधिकृत प्रवेश कर लिया। हालांकि कंपनी ने स्पष्ट किया है कि यह घटना परीक्षण के दौरान हुई तकनीकी गड़बड़ी का परिणाम थी और इसकी विस्तृत जांच जारी है।

    कंपनी के अनुसार यह घटना उसके हाल ही में जारी किए गए एआई मॉडल ‘म्यूज स्पार्क 1.1’ के परीक्षण के दौरान हुई। परीक्षण के लिए तैयार किए गए विशेष वातावरण में एक गलत कॉन्फिगरेशन के कारण मॉडल इंटरनेट से कनेक्ट हो गया। सामान्य परिस्थितियों में इस प्रकार के परीक्षण पूरी तरह नियंत्रित और सीमित नेटवर्क पर किए जाते हैं, लेकिन तकनीकी त्रुटि के चलते मॉडल बाहरी नेटवर्क तक पहुंच गया। इसके बाद उसने एक थर्ड पार्टी सर्विस में मौजूद सुरक्षा कमजोरी का उपयोग करते हुए अनधिकृत पहुंच प्राप्त कर ली।

    मेटा ने कहा कि परीक्षण प्रक्रिया एक स्वतंत्र साइबर सिक्योरिटी पार्टनर के सहयोग से संचालित की जा रही थी। प्रारंभिक जांच में संकेत मिले हैं कि तकनीकी सेटअप में हुई कॉन्फिगरेशन संबंधी गलती के कारण यह स्थिति बनी। कंपनी ने जोर देकर कहा कि यह किसी जानबूझकर किए गए साइबर हमले का मामला नहीं था, बल्कि परीक्षण वातावरण में हुई चूक के कारण उत्पन्न हुई अप्रत्याशित घटना थी। पूरे घटनाक्रम की विस्तृत समीक्षा की जा रही है और सभी तथ्य सामने आने के बाद विस्तृत रिपोर्ट जारी की जाएगी।

    यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब दुनिया भर की प्रमुख एआई कंपनियां अधिक सक्षम और स्वायत्त मॉडल विकसित करने की दिशा में तेजी से काम कर रही हैं। पिछले कुछ सप्ताहों के दौरान अन्य बड़ी एआई कंपनियों ने भी परीक्षण के दौरान अपने मॉडल्स द्वारा बाहरी सिस्टम तक अनपेक्षित पहुंच बनाने जैसी घटनाओं की जानकारी साझा की थी। इन घटनाओं ने यह सवाल और गहरा कर दिया है कि अत्यधिक सक्षम एआई मॉडल्स के परीक्षण के लिए वर्तमान सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त है या नहीं।

    साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक एआई एजेंट अब केवल निर्देशों का पालन करने तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि वे नेटवर्क संरचना, सिस्टम की कमजोरियों और संभावित सुरक्षा खामियों की पहचान करने में भी पहले से अधिक सक्षम हो रहे हैं। यदि परीक्षण वातावरण पूरी तरह सुरक्षित और अलग-थलग न हो तो इस प्रकार की घटनाएं भविष्य में बड़े जोखिम का कारण बन सकती हैं। यही वजह है कि नियंत्रित परीक्षण ढांचे, मजबूत नेटवर्क आइसोलेशन और बहुस्तरीय सुरक्षा उपायों की आवश्यकता लगातार बढ़ती जा रही है।

    घटना के बाद एआई सुरक्षा मानकों और परीक्षण प्रक्रियाओं की समीक्षा की मांग भी तेज हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि नई पीढ़ी के एआई मॉडल्स की बढ़ती क्षमताओं को देखते हुए केवल पारंपरिक सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। कंपनियों को अधिक कठोर परीक्षण प्रोटोकॉल, सुरक्षित नेटवर्क संरचना और स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट अपनाने होंगे ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके। फिलहाल मेटा पूरे मामले की जांच में जुटा है और अंतिम निष्कर्ष आने के बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।

  • मार्क जुकरबर्ग ने भारत सरकार से मांगी माफी, सीएसएएम, डीपफेक और सिस्टम एरर को लेकर जताया खेद

    मार्क जुकरबर्ग ने भारत सरकार से मांगी माफी, सीएसएएम, डीपफेक और सिस्टम एरर को लेकर जताया खेद

    नई दिल्ली । मेटा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क जुकरबर्ग ने बाल यौन शोषण सामग्री (सीएसएएम), डीपफेक कंटेंट और ऑपरेटिंग सिस्टम से जुड़ी तकनीकी त्रुटियों को लेकर भारत सरकार से माफी मांगी है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, कंपनी ने कुछ मामलों में हुई चूक पर खेद व्यक्त करते हुए भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने का भरोसा दिया है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही और भारतीय कानूनों के पालन को लेकर सरकार लगातार सख्त रुख अपनाए हुए है।

    जानकारी के अनुसार, भारत सरकार ने मेटा को स्पष्ट किया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म की भूमिका केवल तकनीकी माध्यम तक सीमित नहीं मानी जा सकती। सरकार का कहना है कि यदि कोई मंच सामग्री के प्रसार और दृश्यता को प्रभावित करता है, तो उस पर भारतीय कानूनों के अनुरूप आवश्यक जिम्मेदारियां भी लागू होती हैं। इसी संदर्भ में कंपनी के प्रतिनिधियों के साथ विस्तृत चर्चा की गई और स्थानीय नियमों के पूर्ण अनुपालन पर जोर दिया गया।

    सरकारी सूत्रों के मुताबिक, बैठक के दौरान मेटा की ओर से सीएसएएम और डीपफेक जैसे संवेदनशील विषयों पर विशेष चिंता व्यक्त की गई। कंपनी ने स्वीकार किया कि इन चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए अपने तकनीकी तंत्र और निगरानी प्रणाली को लगातार मजबूत बनाने की आवश्यकता है। साथ ही ऑपरेटिंग सिस्टम से जुड़ी कुछ तकनीकी त्रुटियों पर भी खेद जताते हुए उन्हें दूर करने की प्रक्रिया तेज करने की बात कही गई।

    यह मामला उस विवाद के बाद और अधिक चर्चा में आया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो कुछ समय के लिए फेसबुक पर उपलब्ध नहीं रहा। इस घटना को गंभीरता से लेते हुए संबंधित संसदीय समिति ने मेटा से जवाब मांगा था और निर्धारित समय के भीतर बिना शर्त माफी की मांग की थी। समिति ने यह भी संकेत दिया था कि यदि कंपनी संतोषजनक जवाब देने में विफल रहती है तो नियामकीय स्तर पर आगे की कार्रवाई पर विचार किया जा सकता है।

    इसी क्रम में मेटा के एक वरिष्ठ प्रतिनिधिमंडल ने नई दिल्ली में इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की। बैठक के दौरान डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सामग्री प्रबंधन, पारदर्शिता, जवाबदेही और भारतीय कानूनों के पालन से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि भारत में संचालित सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को देश के लागू नियमों और कानूनी प्रावधानों का पूर्ण पालन करना होगा।

    मेटा और अन्य सोशल मीडिया कंपनियों के प्रतिनिधियों ने बैठक में कहा कि उनके प्लेटफॉर्म पर पहले से ही कंटेंट मॉडरेशन, फैक्ट-चेकिंग और सुरक्षा संबंधी कई आंतरिक व्यवस्थाएं लागू हैं। उन्होंने यह भी दोहराया कि प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग रोकने और आपत्तिजनक सामग्री के खिलाफ कार्रवाई को और प्रभावी बनाने के लिए लगातार तकनीकी सुधार किए जा रहे हैं। सरकार और डिजिटल प्लेटफॉर्म के बीच हुई यह बातचीत भविष्य में ऑनलाइन सुरक्षा, पारदर्शिता और डिजिटल जवाबदेही को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

  • पीएम मोदी का वीडियो हटने पर मेटा पर संसदीय समिति सख्त, मार्क जुकरबर्ग को तीन दिन में बिना शर्त माफी का अल्टीमेटम

    पीएम मोदी का वीडियो हटने पर मेटा पर संसदीय समिति सख्त, मार्क जुकरबर्ग को तीन दिन में बिना शर्त माफी का अल्टीमेटम

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो फेसबुक से कुछ समय के लिए हटाए जाने के मामले ने अब राजनीतिक और संसदीय स्तर पर तूल पकड़ लिया है। इस घटनाक्रम को लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से संबंधित संसदीय समिति ने मेटा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क जुकरबर्ग के प्रति कड़ा रुख अपनाया है। समिति ने कंपनी से तीन दिन के भीतर बिना शर्त माफी मांगने और इस घटना के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है। समिति का कहना है कि यदि निर्धारित समय में संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया तो कंपनी के खिलाफ आगे की कार्रवाई पर विचार किया जा सकता है।

    समिति के अनुसार सोशल मीडिया मंचों की जिम्मेदारी है कि वे सार्वजनिक महत्व की सामग्री के संचालन में पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखें। प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद से जुड़े आधिकारिक या सार्वजनिक महत्व के वीडियो के अस्थायी रूप से हटने की घटना को गंभीरता से लिया गया है। इसी कारण कंपनी से पूरे घटनाक्रम की विस्तृत जानकारी और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए उठाए जाने वाले कदमों का भी विवरण मांगा गया है।

    बताया गया है कि संसदीय समिति ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि यह तकनीकी त्रुटि थी तो उसके कारणों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। वहीं यदि किसी मानवीय निर्णय के कारण वीडियो हटाया गया था तो संबंधित जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ उचित कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए। समिति का मानना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सामग्री के प्रबंधन में स्पष्ट मानकों और जवाबदेही का पालन आवश्यक है, ताकि उपयोगकर्ताओं का विश्वास बना रहे।

    हाल के वर्षों में सोशल मीडिया कंपनियों और भारतीय संस्थानों के बीच डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही, सामग्री मॉडरेशन और सूचना प्रबंधन को लेकर कई बार चर्चा होती रही है। सरकार लगातार यह कहती रही है कि भारत में काम करने वाले सभी डिजिटल मंचों को देश के कानूनों और नियामकीय व्यवस्थाओं का पूरी तरह पालन करना चाहिए। इसी संदर्भ में यह मामला भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर किसी भी सार्वजनिक महत्व की सामग्री को हटाने या सीमित करने से पहले निर्धारित प्रक्रियाओं और पारदर्शिता का पालन आवश्यक है। इससे गलतफहमियों की संभावना कम होती है और प्लेटफॉर्म की विश्वसनीयता भी बनी रहती है। डिजिटल मंचों की बढ़ती भूमिका को देखते हुए जवाबदेही और तकनीकी दक्षता दोनों को समान महत्व दिया जा रहा है।

    अब सभी की नजर मेटा की अगली प्रतिक्रिया पर है। यदि कंपनी निर्धारित समय सीमा के भीतर अपना पक्ष रखती है और आवश्यक स्पष्टीकरण देती है तो मामले की दिशा अलग हो सकती है। वहीं यदि समिति को जवाब संतोषजनक नहीं लगता या निर्धारित समय में कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलती, तो संसदीय स्तर पर आगे की कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर डिजिटल प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी, पारदर्शिता और नियामकीय अनुपालन को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

  • बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही पर उठाए सवाल, कानून में बदलाव की कही बात

    बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही पर उठाए सवाल, कानून में बदलाव की कही बात

    नई दिल्ली । भारतीय जनता पार्टी के सांसद निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की कार्यप्रणाली, कर व्यवस्था और कानूनी जवाबदेही को लेकर केंद्र में बहस छेड़ दी है। संसद परिसर में मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने प्रमुख सोशल मीडिया कंपनियों पर कई गंभीर सवाल उठाए और कहा कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत मिलने वाले ‘सेफ हार्बर’ प्रावधान की समीक्षा की जानी चाहिए।

    निशिकांत दुबे ने दावा किया कि प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भारत में बड़ा कारोबार करते हैं, लेकिन उनके अनुसार कर भुगतान उस अनुपात में नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि इन कंपनियों की आय और टैक्स भुगतान के बीच बड़ा अंतर है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म को भारत में अपने कारोबार और गतिविधियों के प्रति अधिक जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।

    उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री को लेकर भी चिंता व्यक्त की। उनका कहना था कि कुछ मामलों में आपत्तिजनक और अवैध सामग्री को समय पर हटाने में प्लेटफॉर्म प्रभावी कार्रवाई नहीं करते। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ संगठनों और अभियानों को डिजिटल माध्यम पर असामान्य रूप से अधिक पहुंच मिलती है, जिससे पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े होते हैं।

    भाजपा सांसद ने हाल के कुछ सामाजिक और राजनीतिक अभियानों का उल्लेख करते हुए कहा कि कम समय में कुछ संगठनों की व्यूअरशिप और डिजिटल पहुंच में तेज वृद्धि देखी गई है। उन्होंने कहा कि इस तरह के मामलों में संबंधित प्लेटफॉर्म को स्पष्ट करना चाहिए कि कंटेंट की पहुंच और प्रसार किन आधारों पर निर्धारित होता है। उनके अनुसार इस विषय में अधिक पारदर्शिता आवश्यक है।

    निशिकांत दुबे ने वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क यानी वीपीएन के उपयोग का भी मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया कंपनियों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उनके प्लेटफॉर्म पर कितने उपयोगकर्ता वीपीएन का इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका मानना है कि इस प्रकार की जानकारी से डिजिटल गतिविधियों की बेहतर निगरानी और पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सकती है।

    उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ अवसरों पर महत्वपूर्ण सार्वजनिक व्यक्तियों से जुड़े कंटेंट को प्लेटफॉर्म से हटाया गया, जिससे अभिव्यक्ति और निष्पक्षता को लेकर प्रश्न खड़े हुए। उनके अनुसार यदि किसी प्रकार की सामग्री हटाई जाती है तो उसके लिए स्पष्ट और समान मानदंड होने चाहिए ताकि किसी भी प्रकार के पक्षपात की आशंका न रहे।

    अपने वक्तव्य में निशिकांत दुबे ने तेलंगाना सरकार द्वारा सोशल मीडिया कंपनियों के खिलाफ की गई कानूनी कार्रवाई का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यदि प्लेटफॉर्म अपनी जिम्मेदारियों का पालन नहीं करते हैं तो सरकारों को कानूनी विकल्पों पर विचार करना पड़ सकता है। साथ ही उन्होंने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत उपलब्ध ‘सेफ हार्बर’ प्रावधान की समीक्षा की आवश्यकता भी जताई।

    सेफ हार्बर वह कानूनी व्यवस्था है जिसके तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और अन्य इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को उपयोगकर्ताओं द्वारा साझा किए गए थर्ड पार्टी कंटेंट के लिए सीमित कानूनी सुरक्षा मिलती है, बशर्ते वे निर्धारित नियमों और कानूनी निर्देशों का पालन करें। फिलहाल सांसद के इन बयानों के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही, डिजिटल नियमन और सेफ हार्बर व्यवस्था को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।

  • पीएम मोदी का वीडियो हटने के विवाद पर महुआ मोइत्रा का बयान, मेटा और सरकार के बीच बढ़ा सियासी टकराव

    पीएम मोदी का वीडियो हटने के विवाद पर महुआ मोइत्रा का बयान, मेटा और सरकार के बीच बढ़ा सियासी टकराव

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फेसबुक वीडियो कुछ समय के लिए हटाए जाने के बाद शुरू हुआ विवाद अब राजनीतिक और तकनीकी दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बन गया है। इस पूरे मामले में तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने मेटा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क जुकरबर्ग के समर्थन में बयान देते हुए कहा है कि उन्हें किसी भी प्रकार के सरकारी दबाव में नहीं आना चाहिए और न ही इस मुद्दे पर माफी मांगनी चाहिए। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर और तेज हो गया है।

    महुआ मोइत्रा ने सोशल मीडिया पर जारी अपने संदेश में आरोप लगाया कि भारत सरकार अक्सर अपनी आलोचना से जुड़े कंटेंट को हटवाने का प्रयास करती है। उन्होंने कहा कि किसी तकनीकी कारण से कुछ घंटों के लिए वीडियो हट जाना कोई ऐसा मामला नहीं है, जिससे बड़ा संकट पैदा हो जाए। उनका कहना था कि किसी भी डिजिटल प्लेटफॉर्म को स्वतंत्र रूप से अपने नियमों के अनुसार काम करना चाहिए और दबाव में निर्णय नहीं लेने चाहिए।

    यह विवाद उस समय शुरू हुआ जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो फेसबुक से अस्थायी रूप से हट गया था। वीडियो में उन्होंने युवाओं से संवाद करते हुए पेपर लीक जैसे मामलों पर सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया था। बाद में मेटा ने इसे तकनीकी त्रुटि बताते हुए खेद व्यक्त किया और वीडियो को दोबारा बहाल कर दिया। हालांकि केंद्र सरकार ने इस स्पष्टीकरण को पर्याप्त नहीं माना और कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों से जवाब तलब किया।

    मामले की गंभीरता को देखते हुए संसदीय समिति की बैठक भी आयोजित की गई, जिसमें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही और कंटेंट मॉडरेशन व्यवस्था पर विस्तार से चर्चा हुई। बैठक के दौरान सदस्यों ने सवाल उठाया कि यदि देश के प्रधानमंत्री का आधिकारिक वीडियो भी सुरक्षित नहीं रह सकता, तो आम नागरिकों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर क्या भरोसा किया जा सकता है। समिति में डीपफेक तकनीक की रोकथाम और एल्गोरिदम की प्रभावशीलता पर भी चर्चा की गई।

    बैठक में उपस्थित मेटा अधिकारियों ने घटना पर खेद व्यक्त करते हुए समिति के सामने माफी मांगने की बात कही। कई सदस्यों ने केवल माफी को पर्याप्त नहीं बताते हुए जिम्मेदारी तय करने और आवश्यक कानूनी कार्रवाई की मांग भी रखी। उनका कहना था कि डिजिटल प्लेटफॉर्म को अपनी तकनीकी और निगरानी प्रणाली को और अधिक मजबूत बनाना होगा ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।

    इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एआई तकनीक से तैयार किए गए कथित मॉर्फ्ड फोटो और वीडियो प्रसारित किए जाने के मामले में भी जांच तेज हो गई है। इस संबंध में हैदराबाद पुलिस ने फेसबुक, इंस्टाग्राम और मेटा इंडिया से जुड़े अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज कर आवश्यक जानकारी मांगी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगा रही हैं कि कथित रूप से भ्रामक सामग्री तैयार करने और प्रसारित करने में किन लोगों की भूमिका रही। केंद्र सरकार ने भी इस पूरे मामले में संबंधित अधिकारियों से विस्तृत जवाब मांगा है। ऐसे में तकनीकी प्लेटफॉर्म की जवाबदेही, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल सुरक्षा को लेकर बहस एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर तेज होती दिखाई दे रही है।

  • युवाओं को सोशल मीडिया की लत का आरोप मेटा पर 1.4 खरब डॉलर जुर्माने की मांग से बढ़ीं मुश्किलें

    युवाओं को सोशल मीडिया की लत का आरोप मेटा पर 1.4 खरब डॉलर जुर्माने की मांग से बढ़ीं मुश्किलें


    नई दिल्ली । अमेरिका में सोशल मीडिया कंपनी मेटा एक बार फिर कानूनी विवादों के केंद्र में आ गई है। फेसबुक और इंस्टाग्राम की पैरेंट कंपनी पर आरोप लगाया गया है कि उसने अपने प्लेटफॉर्म को इस तरह डिजाइन किया जिससे किशोरों और युवा यूजर्स में सोशल मीडिया की लत बढ़ी और कंपनी ने सुरक्षा से जुड़े संभावित खतरों के बारे में लोगों को पूरी और सही जानकारी नहीं दी। इन गंभीर आरोपों के आधार पर अमेरिका के चार राज्यों ने मेटा पर लगभग 1.4 खरब डॉलर के जुर्माने की मांग की है। यदि यह मांग अदालत में स्वीकार होती है तो यह तकनीकी कंपनियों के खिलाफ प्रस्तावित सबसे बड़े आर्थिक दंडों में से एक माना जाएगा।

    कैलिफोर्निया कोलोराडो केंटकी और न्यू जर्सी की ओर से दायर मामलों में कहा गया है कि मेटा ने अपने प्लेटफॉर्म को इस तरह विकसित किया जिससे युवा उपयोगकर्ता लंबे समय तक स्क्रीन पर बने रहें। आरोप है कि कंपनी ने एल्गोरिद्म और अन्य फीचर्स के जरिए उपयोगकर्ताओं की निर्भरता बढ़ाई और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर पर्याप्त पारदर्शिता नहीं बरती। राज्यों का कहना है कि इस वजह से बड़ी संख्या में किशोर प्रभावित हुए हैं और इसी आधार पर भारी जुर्माने की मांग की गई है।

    मेटा ने अदालत में दायर अपने जवाब में इन सभी आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है। कंपनी का कहना है कि प्रस्तावित जुर्माना तथ्यों और कानूनी आधार से परे है। मेटा के अनुसार उपभोक्ता संरक्षण से जुड़े मामलों में इतनी बड़ी राशि के दंड का कोई उदाहरण नहीं है। कंपनी का यह भी दावा है कि फेसबुक और इंस्टाग्राम को युवाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखकर लगातार नए सुरक्षा फीचर्स के साथ अपडेट किया जाता रहा है और सोशल मीडिया की लत संबंधी आरोपों का कोई ठोस आधार नहीं है।

    इस मामले में सिर्फ चार राज्य ही नहीं बल्कि अमेरिका के कई अन्य राज्यों ने भी मेटा के खिलाफ अलग-अलग कानूनी कार्रवाई शुरू कर रखी है। कुल 29 राज्यों ने संघीय अदालत में कंपनी पर बच्चों और किशोरों के डेटा संग्रह तथा ऑनलाइन गोपनीयता कानूनों के उल्लंघन के आरोप लगाए हैं। इन मामलों में यह भी कहा गया है कि कंपनी ने अभिभावकों की उचित सहमति के बिना नाबालिगों से संबंधित जानकारी एकत्र की जो संघीय कानूनों का उल्लंघन हो सकता है।

    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल मेटा तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि भविष्य में सभी बड़ी सोशल मीडिया कंपनियों की कार्यप्रणाली और उनकी जवाबदेही तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है। यदि अदालत राज्यों के पक्ष में फैसला देती है तो डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बच्चों और किशोरों की सुरक्षा को लेकर दुनिया भर में नए और कड़े नियम लागू होने का रास्ता खुल सकता है।

    अब इस बहुचर्चित मामले की अगली महत्वपूर्ण सुनवाई अगस्त में अमेरिकी संघीय अदालत में होगी। इस दौरान अदालत यह तय करेगी कि मेटा पर लगाए गए आरोपों में कितनी कानूनी मजबूती है और क्या कंपनी पर भारी आर्थिक दंड लगाया जाना उचित होगा। दुनिया भर की टेक कंपनियों और डिजिटल उद्योग की नजरें अब इस फैसले पर टिकी हुई हैं क्योंकि इसका असर वैश्विक सोशल मीडिया उद्योग पर भी पड़ सकता है।