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  • ऑटो उद्योग की बड़ी चिंता: विनिमय दर में उतार-चढ़ाव से घट रहा DVA, कंपनियों ने PLI नियमों में संशोधन का सुझाव दिया

    ऑटो उद्योग की बड़ी चिंता: विनिमय दर में उतार-चढ़ाव से घट रहा DVA, कंपनियों ने PLI नियमों में संशोधन का सुझाव दिया

    नई दिल्ली । वाहन क्षेत्र की उत्पादन-से-जुड़ी प्रोत्साहन (PLI) योजना के तहत मिलने वाले लाभ पर विदेशी मुद्रा विनिमय दरों के उतार-चढ़ाव का असर पड़ने लगा है। इसी को देखते हुए देश की प्रमुख वाहन निर्माता कंपनियों ने केंद्र सरकार से घरेलू मूल्य संवर्धन (Domestic Value Addition-DVA) की गणना के लिए एक निश्चित विनिमय दर लागू करने की मांग की है। उद्योग का कहना है कि रुपये में आई हालिया कमजोरी के कारण कई मॉडलों का स्थानीयकरण स्तर वास्तविक स्थिति से कम दिखाई दे रहा है, जिससे वे प्रोत्साहन योजना की पात्रता के दायरे से बाहर हो सकते हैं।

    25,938 करोड़ रुपये की ऑटो पीएलआई योजना का उद्देश्य देश में उन्नत ऑटोमोबाइल और ऑटो कंपोनेंट निर्माण को बढ़ावा देना है। योजना के तहत किसी पात्र वाहन मॉडल में आयातित पुर्जों और सामग्रियों की हिस्सेदारी निर्धारित सीमा के भीतर रहनी चाहिए। इसके लिए घरेलू मूल्य संवर्धन का एक न्यूनतम स्तर अनिवार्य किया गया है, ताकि स्थानीय विनिर्माण और सप्लाई चेन को प्रोत्साहन मिल सके।

    उद्योग प्रतिनिधियों के अनुसार, DVA की गणना वाहन की एक्स-फैक्ट्री कीमत और उसमें इस्तेमाल आयातित सामग्री की लागत के आधार पर की जाती है। चूंकि आयातित पुर्जों की कीमत विदेशी मुद्राओं में तय होती है, इसलिए रुपये के कमजोर होने पर उनकी लागत स्वतः बढ़ जाती है। इससे कागजों पर आयातित हिस्सेदारी अधिक और घरेलू मूल्य संवर्धन कम दिखाई देने लगता है, जबकि वास्तविक उत्पादन प्रक्रिया और स्थानीयकरण स्तर में कोई बदलाव नहीं होता।

    हाल ही में भारी उद्योग मंत्रालय और ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI) के साथ हुई बैठक में वाहन उद्योग के प्रतिनिधियों ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। उनका तर्क था कि विनिमय दरों में बदलाव एक बाहरी आर्थिक कारक है, जिस पर वाहन निर्माताओं का कोई नियंत्रण नहीं होता। ऐसे में केवल मुद्रा विनिमय के प्रभाव के कारण कंपनियों की पात्रता प्रभावित होना उचित नहीं माना जा सकता।

    उद्योग का कहना है कि बीते एक वर्ष के दौरान अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। इससे आयातित पुर्जों की लागत बढ़ गई है और कई मॉडलों के DVA प्रतिशत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। कंपनियों का मानना है कि यदि DVA की गणना के लिए एक पूर्व-निर्धारित या स्थिर विनिमय दर को आधार बनाया जाए, तो स्थानीयकरण का वास्तविक स्तर अधिक सटीक रूप से सामने आएगा और योजना का उद्देश्य भी बेहतर तरीके से पूरा होगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ऑटो उद्योग में वैश्विक सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण योगदान है। कई अत्याधुनिक कंपोनेंट अभी भी विदेशों से आयात किए जाते हैं। ऐसे में मुद्रा विनिमय दरों में तेज बदलाव कंपनियों की लागत संरचना और सरकारी प्रोत्साहन योजनाओं दोनों को प्रभावित कर सकते हैं। इस कारण उद्योग लंबे समय से ऐसी व्यवस्था की मांग करता रहा है जो विनिमय दरों के अस्थायी उतार-चढ़ाव से प्रभावित न हो।

    ऑटो पीएलआई योजना के तहत पात्रता और लाभ निर्धारण में ARAI की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह संस्था विभिन्न वाहन मॉडलों के स्थानीयकरण स्तर और अन्य तकनीकी मानकों का सत्यापन करती है। अब उद्योग की मांग पर सरकार और संबंधित एजेंसियां किस प्रकार विचार करती हैं, इस पर वाहन निर्माताओं की नजर बनी हुई है। यदि इस संबंध में कोई नीति संशोधन किया जाता है, तो इससे कई कंपनियों को राहत मिल सकती है और योजना के तहत निवेश तथा उत्पादन को बढ़ावा मिलने की संभावना बढ़ जाएगी।

  • Sebi की सख्त कार्रवाई के बाद Rajesh Exports पर संकट गहराया, PLI योजना से बाहर होने की आशंका से शेयरों में भारी बिकवाली

    Sebi की सख्त कार्रवाई के बाद Rajesh Exports पर संकट गहराया, PLI योजना से बाहर होने की आशंका से शेयरों में भारी बिकवाली

    नई दिल्ली । राजेश एक्सपोर्ट्स के शेयरों में लगातार गिरावट का दौर जारी है और निवेशकों की चिंता भी बढ़ती जा रही है। सप्ताह के पहले कारोबारी दिन कंपनी का शेयर पांच प्रतिशत के लोअर सर्किट के साथ बंद हुआ। पिछले तीन सत्रों के दौरान शेयर में करीब 15 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। बाजार में बढ़ती बेचैनी की मुख्य वजह कंपनी को एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल बैटरी स्टोरेज से जुड़ी उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना यानी पीएलआई योजना से बाहर किए जाने की आशंका है।

    सूत्रों के अनुसार, भारी उद्योग मंत्रालय कंपनी की पात्रता की समीक्षा कर रहा है। मंत्रालय के स्तर पर इस बात पर विचार किया जा रहा है कि क्या राजेश एक्सपोर्ट्स को योजना के लाभार्थियों की सूची में बनाए रखा जाए या नहीं। यदि कंपनी को योजना से बाहर किया जाता है, तो इसका असर उसके बैटरी कारोबार और भविष्य की विस्तार योजनाओं पर पड़ सकता है। यही कारण है कि निवेशक इस पूरे घटनाक्रम पर करीब से नजर बनाए हुए हैं।

    कंपनी से जुड़ी चिंताएं उस समय और बढ़ गईं जब बाजार नियामक ने हाल ही में एक अंतरिम आदेश जारी किया। नियामकीय कार्रवाई में कंपनी पर वित्तीय आंकड़ों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि कुछ सहायक कंपनियों के माध्यम से कई वर्षों के दौरान राजस्व को वास्तविक स्थिति से अधिक दिखाया गया। इसके अलावा संबंधित पक्षों के साथ लेनदेन में पारदर्शिता की कमी और आवश्यक खुलासों से जुड़े मुद्दों की भी जांच की जा रही है।

    मामले का संबंध कंपनी के लिथियम-आयन बैटरी कारोबार से जुड़ी इकाइयों से भी जोड़ा जा रहा है। यही कारण है कि बैटरी निर्माण क्षेत्र में कंपनी की भूमिका और सरकारी प्रोत्साहन योजनाओं के लिए उसकी पात्रता को लेकर नए सवाल खड़े हुए हैं। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जांच में गंभीर अनियमितताएं सामने आती हैं तो इसका प्रभाव केवल शेयर प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कंपनी की कारोबारी साख पर भी असर पड़ सकता है।

    नियामकीय कार्रवाई के तहत कंपनी के चेयरमैन और प्रमोटर के खिलाफ भी प्रतिबंधात्मक कदम उठाए गए हैं। उन्हें अगले आदेश तक कंपनी के शेयरों में खरीद-बिक्री करने से रोका गया है। साथ ही कंपनी के खातों की दोबारा फॉरेंसिक जांच कराने का निर्देश भी दिया गया है। इस फैसले ने निवेशकों के बीच अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है।

    हालांकि कंपनी ने सभी आरोपों को खारिज किया है। प्रबंधन का कहना है कि वह जांच एजेंसियों के साथ पूरा सहयोग कर रहा है और उसके खिलाफ लगाए गए आरोप तथ्यात्मक रूप से सही नहीं हैं। कंपनी का तर्क है कि केवल राजस्व बढ़ाकर दिखाने से कोई विशेष लाभ नहीं मिलता, विशेष रूप से तब जब उससे लाभप्रदता में कोई अतिरिक्त फायदा न हो। कंपनी ने भरोसा जताया है कि जांच पूरी होने के बाद वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।

    फिलहाल बाजार की नजर दो महत्वपूर्ण घटनाक्रमों पर टिकी हुई है। पहला, नियामकीय जांच की आगे की दिशा और उसके निष्कर्ष क्या रहते हैं। दूसरा, भारी उद्योग मंत्रालय पीएलआई योजना में कंपनी की पात्रता को लेकर क्या निर्णय लेता है। इन दोनों मामलों का असर आने वाले समय में कंपनी के शेयर मूल्य, निवेशकों के विश्वास और बैटरी कारोबार की संभावनाओं पर पड़ सकता है।

    शेयर बाजार में मौजूदा उतार-चढ़ाव यह संकेत दे रहा है कि निवेशक फिलहाल सतर्क रुख अपना रहे हैं। जब तक जांच और सरकारी समीक्षा प्रक्रिया पर स्पष्टता नहीं आती, तब तक कंपनी के शेयरों में अस्थिरता बनी रहने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।