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  • तुर्किए और पाकिस्तान के साथ सऊदी अरब के रक्षा समझौते पर भड़का ईरान, बताया कागजी समझौता।

    तुर्किए और पाकिस्तान के साथ सऊदी अरब के रक्षा समझौते पर भड़का ईरान, बताया कागजी समझौता।

    नई दिल्ली ।पश्चिम एशिया के कूटनीतिक और सामरिक परिदृश्य में उस समय नया मोड़ आ गया जब सऊदी अरब, तुर्किए और पाकिस्तान ने मक्का में एक ऐतिहासिक संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस त्रिपक्षीय समझौते के मुख्य प्रावधान के अनुसार, तीनों में से किसी भी एक देश पर होने वाले किसी भी सैन्य हमले को तीनों देशों पर सामूहिक हमला माना जाएगा। इस उच्चस्तरीय बैठक में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किए के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ शामिल हुए। हालांकि, इस समझौते के सामने आते ही पड़ोसी देश ईरान की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की गई है।

    ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति आयोग के वरिष्ठ सदस्य इब्राहिम रजाई ने इस समझौते पर तीखा हमला बोलते हुए इसे बेअसर करार दिया। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से कहा कि तुर्किए और पाकिस्तान के साथ केवल कागजी समझौते कर लेने से सऊदी अरब को वास्तविक सुरक्षा हासिल नहीं हो सकती। उन्होंने अतीत का हवाला देते हुए टिप्पणी की कि जिस प्रकार दशकों तक पश्चिमी देशों पर निर्भर रहने के बाद भी स्थायी सुरक्षा नहीं मिल सकी, उसी प्रकार यह समझौता भी निष्प्रभावी साबित होगा। ईरान ने सुझाव दिया कि सुरक्षा की तलाश करने के बजाय अपनी क्षेत्रीय नीतियों में बुनियादी बदलाव लाने की आवश्यकता है।

    दूसरी ओर, समझौते में शामिल तीनों देशों ने इस रक्षा तंत्र को पूरी तरह से रक्षात्मक और संतुलित बताया है। सऊदी अरब के अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यह कदम किसी विशेष सैन्य गुट या सांप्रदायिक समूह के निर्माण के उद्देश्य से नहीं उठाया गया है और न ही यह उनके अन्य अंतरराष्ट्रीय संबंधों को प्रभावित करेगा। तुर्किए के प्रतिनिधियों का कहना है कि यह समझौता किसी एक देश के खिलाफ केंद्रित नहीं है और भविष्य में अन्य क्षेत्रीय देशों के शामिल होने का मार्ग भी खुला रखा गया है।

    सामरिक विश्लेषकों का मानना है कि यह समझौता तीनों देशों की अलग-अलग क्षमताओं के एकत्रीकरण का परिणाम है। इसमें पाकिस्तान का विशाल सैन्य अनुभव, सऊदी अरब की मजबूत आर्थिक क्षमता और तुर्किए की आधुनिक रक्षा तकनीक शामिल है। जहां एक तरफ यह गठबंधन तीनों देशों के बीच दशकों पुराने संबंधों को संस्थागत रूप देने का प्रयास है, वहीं ईरान की तीखी आपत्ति से स्पष्ट है कि इस रक्षा सौदे ने खाड़ी और दक्षिण एशियाई क्षेत्र की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

  • ईरान अमेरिका तनाव के बाद यूरोप का बड़ा कदम होर्मुज मिशन बिना अमेरिका

    ईरान अमेरिका तनाव के बाद यूरोप का बड़ा कदम होर्मुज मिशन बिना अमेरिका


    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर खतरे के बीच यूरोपीय संघ अब एक बड़ा रणनीतिक कदम उठाने की तैयारी में है। रिपोर्ट के मुताबिक यूरोपीय देश होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री मार्गों की सुरक्षा के लिए एक नया मिशन तैयार कर रहे हैं जिसमें अमेरिका की सीधी भागीदारी नहीं होगी। यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब अमेरिका और ईरान के बीच एक महीने से अधिक समय तक चला संघर्ष वैश्विक राजनीति और ट्रांस अटलांटिक संबंधों को नया रूप दे चुका है।

    द वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार इस प्रस्ताव का नेतृत्व ब्रिटेन और फ्रांस कर रहे हैं। इसका उद्देश्य संघर्ष के बाद समुद्री व्यापार में भरोसा बहाल करना और जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना है।

    फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने स्पष्ट किया है कि यह मिशन पूरी तरह रक्षात्मक होगा और यूरोपीय नौसेना किसी अमेरिकी कमांड के तहत काम नहीं करेगी। इसका मकसद शिपिंग कंपनियों को यह भरोसा दिलाना है कि युद्ध के बाद क्षेत्र में व्यापार करना सुरक्षित रहेगा।

    इस प्रस्ताव में कई अहम कदम शामिल हैं जैसे समुद्र में बिछाई गई माइंस को हटाना नेवल एस्कॉर्ट्स तैनात करना और सर्विलांस सिस्टम को मजबूत करना। खास बात यह है कि इस गठबंधन में अमेरिका इजरायल और ईरान जैसे सीधे संघर्ष में शामिल देशों को बाहर रखा जाएगा।

    फ्रांस के विदेश मंत्री जीन नोएल बैरोट के अनुसार यह मिशन तभी शुरू होगा जब क्षेत्र में शांति स्थापित हो जाएगी। साथ ही ओमान और ईरान जैसे तटीय देशों के सहयोग की भी जरूरत होगी। इस मिशन में जर्मनी की भी अहम भूमिका मानी जा रही है जो जहाज और निगरानी संसाधन उपलब्ध करा सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह योजना तीन मुख्य उद्देश्यों पर आधारित है पहला फंसे हुए जहाजों को सुरक्षित बाहर निकालना दूसरा समुद्र में बिछाई गई माइंस को हटाना और तीसरा सुरक्षित समुद्री मार्ग सुनिश्चित करना।

    होर्मुज स्ट्रेट वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का बेहद अहम मार्ग है जहां से दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा तेल गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह की बाधा का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है जिसमें भारत जैसे बड़े आयातक देश भी शामिल हैं।

    यह पहल इस बात का संकेत है कि यूरोपीय संघ अब वैश्विक सुरक्षा में अपनी स्वतंत्र भूमिका बढ़ाना चाहता है। साथ ही यह अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ते मतभेदों को भी दर्शाता है जहां यूरोपीय देश अब अपनी रणनीति खुद तय करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।