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  • ईरान पर जरूरत पड़ी तो फिर होगी सैन्य कार्रवाई: इजरायली राजदूत का बड़ा बयान, वेस्ट एशिया तनाव फिर बढ़ा

    ईरान पर जरूरत पड़ी तो फिर होगी सैन्य कार्रवाई: इजरायली राजदूत का बड़ा बयान, वेस्ट एशिया तनाव फिर बढ़ा

    नई दिल्ली। वेस्ट एशिया में तनाव और कूटनीतिक हलचल के बीच इजरायल ने एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है। नई दिल्ली स्थित इजरायली दूतावास के राजदूत रियूवेन अजार ने साफ कहा है कि यदि परिस्थितियां बिगड़ती हैं तो इजरायल ईरान के खिलाफ दोबारा सैन्य कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा।

    यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को लेकर चर्चाएं तेज हैं और पश्चिम एशिया में तनाव को कम करने की कोशिशें जारी हैं। हालांकि, इजरायल ने संकेत दिया है कि वह सुरक्षा से जुड़े किसी भी खतरे को लेकर समझौता नहीं करेगा।

    इजरायली राजदूत ने कहा कि ईरानी सत्ता पिछले दो दशकों से क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती बनी हुई है। उनका आरोप है कि ईरान अंतरराष्ट्रीय नियमों और परमाणु अप्रसार संधि (NPT) तथा अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के दिशा-निर्देशों का पालन ठीक से नहीं कर रहा है। उन्होंने कहा कि IAEA की रिपोर्टों में भी ईरान की अनुपालन स्थिति पर सवाल उठाए गए हैं।

    राजदूत के अनुसार, यदि कोई देश कानूनी अधिकारों का दावा करता है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का पालन भी करना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि इजरायल क्षेत्र में सुरक्षा बनाए रखने के लिए पूरी तरह सतर्क है और जरूरत पड़ने पर निर्णायक कदम उठाएगा।

    इसी बीच लेबनान को लेकर भी इजरायल ने अपना रुख स्पष्ट किया है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के आदेश पर बेरूत के दक्षिणी उपनगरों में हिज्बुल्लाह के ठिकानों पर हमले किए गए। इजरायल का कहना है कि यह कार्रवाई उसके उत्तरी क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जरूरी थी।

    राजदूत अजार ने दावा किया कि संघर्षविराम के बावजूद इजरायल पर 1000 से अधिक रॉकेट और ड्रोन हमले हुए हैं, जिनमें कई नागरिकों की जान भी गई है। उन्होंने कहा कि जब तक हिज्बुल्लाह स्थायी संघर्षविराम और हमले रोकने की गारंटी नहीं देता, तब तक जवाबी कार्रवाई जारी रहेगी।

    इजरायल ने यह भी संकेत दिया कि वह केवल सैन्य ही नहीं बल्कि क्षेत्रीय आर्थिक स्थिरता के लिए भी योगदान देने को तैयार है, बशर्ते सुरक्षा स्थिति नियंत्रण में रहे। राजदूत ने कहा कि पश्चिम एशिया में स्थिरता तभी संभव है जब सभी पक्ष जिम्मेदारी के साथ व्यवहार करें और आतंकवादी गतिविधियों पर रोक लगे।

    इस बयान के बाद एक बार फिर पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है, खासकर ऐसे समय में जब कूटनीतिक प्रयासों से शांति की उम्मीदें भी बनी हुई हैं।

  • ईरान-अमेरिका डील पर ट्रंप का बड़ा दावा: ‘समझौता लगभग तय’, होर्मुज खुलने की बात; तेहरान ने किया खंडन

    ईरान-अमेरिका डील पर ट्रंप का बड़ा दावा: ‘समझौता लगभग तय’, होर्मुज खुलने की बात; तेहरान ने किया खंडन

    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान के साथ एक बड़ा शांति समझौता “काफी हद तक तय” हो चुका है और बस अंतिम औपचारिकताओं पर काम चल रहा है। ट्रंप ने कहा कि यह समझौता अमेरिका, ईरान और कुछ अन्य देशों के बीच बातचीत के बाद आगे बढ़ा है।

    ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए कहा कि उन्होंने इस मुद्दे पर इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से भी बातचीत की है, जो “सकारात्मक” रही। उनके मुताबिक समझौते के तहत होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोले जाने की दिशा में भी चर्चा हुई है।

    हालांकि ईरान ने ट्रंप के इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बगाई ने कहा कि फिलहाल प्राथमिकता युद्ध को समाप्त करने की है और किसी भी तरह का अंतिम समझौता अभी नहीं हुआ है। उन्होंने यह भी साफ किया कि होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान का नियंत्रण बना रहेगा।

    रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान केवल युद्ध-पूर्व स्तर पर जहाजों की आवाजाही बहाल करने पर सहमत हो सकता है, लेकिन इसे पूरी तरह “फ्री नेविगेशन” नहीं माना जाएगा।

    इस बीच न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान सैद्धांतिक रूप से अपने अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम भंडार को सौंपने पर सहमत हो सकता है। हालांकि इसकी प्रक्रिया और शर्तों पर आगे औपचारिक बातचीत होनी बाकी है।

    यह मुद्दा अमेरिका की प्रमुख मांगों में से एक रहा है, क्योंकि इसे ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने की दिशा में अहम कदम माना जाता है। फिलहाल दोनों पक्षों के अलग-अलग बयानों ने इस संभावित समझौते को लेकर असमंजस और बढ़ा दिया है।

  • ईरान पर अमेरिकी हमले की योजना टली, खाड़ी देशों की अपील पर ट्रंप ने लिया फैसला, समझौता पर जोर

    ईरान पर अमेरिकी हमले की योजना टली, खाड़ी देशों की अपील पर ट्रंप ने लिया फैसला, समझौता पर जोर

    वॉशिंगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर प्रस्तावित एक बड़े सैन्य हमले को फिलहाल के लिए रोक दिया है। यह हमला मंगलवार को होने वाला था, लेकिन अंतिम समय पर खाड़ी देशों के नेताओं की अपील के बाद इसे टाल दिया गया।

    ट्रंप ने सोमवार को सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए इसकी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि मौजूदा समय में दोनों पक्षों के बीच गंभीर बातचीत चल रही है, इसलिए सैन्य कार्रवाई को फिलहाल रोक दिया गया है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई ठोस समझौता नहीं होता है तो हालात फिर से बिगड़ सकते हैं। इससे पहले ट्रंप ने ईरान को सख्त चेतावनी दी थी कि अगर वार्ता विफल रहती है तो युद्धविराम के कमजोर होने के बाद स्थिति गंभीर संघर्ष में बदल सकती है।

    जानकारी के मुताबिक, इस संभावित हमले को लेकर अमेरिकी सेना को पहले से तैयार रहने के निर्देश दिए गए थे। राष्ट्रपति ट्रंप ने सैन्य अधिकारियों से कहा था कि यदि ईरान के साथ कोई स्वीकार्य समझौता नहीं होता, तो पल भर के नोटिस पर बड़े सैन्य हमले के लिए तैयार रहें। इससे यह संकेत मिला था कि अमेरिका कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार था। हालांकि यह हमला अचानक टाल दिया गया। ट्रंप ने बताया कि यह फैसला मध्य पूर्व में अमेरिका के सहयोगी देशों—कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की अपील के बाद लिया गया है।

    इससे पहले सप्ताहांत में ट्रंप ने ईरान को बेहद कड़े शब्दों में चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि ईरान के पास समय बहुत कम है और अगर समझौता नहीं हुआ तो परिणाम गंभीर होंगे। उन्होंने यह भी कहा था कि स्थिति लगातार तनावपूर्ण बनी हुई है और युद्धविराम किसी भी समय टूट सकता है।

  • 45 साल तक दाहिना हाथ छिपाए रहे अयातुल्लाह अली खामेनेई, जानिए क्‍या थी वजह ?

    45 साल तक दाहिना हाथ छिपाए रहे अयातुल्लाह अली खामेनेई, जानिए क्‍या थी वजह ?


    नई दिल्ली। ईरान की सत्ता पर तीन दशक से अधिक समय तक मजबूत पकड़ बनाए रखने वाले अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत की खबर ने पश्चिम एशिया की राजनीति में हलचल मचा दी है। अमेरिकी और इजरायली हमलों में उनके मारे जाने की सूचना के बाद खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ गया है और कई देशों में विरोध प्रदर्शन भी देखने को मिल रहे हैं। 36 वर्षों तक सर्वोच्च नेता रहे खामेनेई का राजनीतिक जीवन जितना प्रभावशाली रहा उतना ही विवादों से भी घिरा रहा। लेकिन उनके जीवन का एक ऐसा पहलू भी था जिसने उन्हें 45 साल तक अपना दाहिना हाथ सार्वजनिक रूप से छिपाने पर मजबूर कर दिया।

    1981 का वह धमाका जिसने बदल दी तकदीर

    साल 1981 में जब खामेनेई ईरान के राष्ट्रपति थे और ईरान-इराक युद्ध का दौर चल रहा था तभी उन पर एक जानलेवा हमला हुआ। नमाज के बाद वह लोगों से बातचीत कर रहे थे कि एक व्यक्ति उनकी मेज पर टेप रिकॉर्डर रखकर चला गया। कुछ ही देर बाद उसमें विस्फोट हो गया। इस हमले की जिम्मेदारी फुरकान ग्रुप ने ली और इसे इस्लामिक रिपब्लिक के लिए तोहफा बताया।
    विस्फोट में खामेनेई गंभीर रूप से घायल हो गए और कई महीनों तक अस्पताल में भर्ती रहे। इस हमले का सबसे बड़ा असर उनके दाहिने हाथ पर पड़ा जो हमेशा के लिए निष्क्रिय हो गया। उसमें लकवा मार गया। बाद में उन्होंने कहा था कि उन्हें एक हाथ की जरूरत नहीं अगर उनका दिमाग और जुबान काम करते रहें तो वही काफी है। इसके बाद से वह शपथ या सार्वजनिक कार्यक्रमों में बायां हाथ ही उठाते थे।

    खोमैनी की विरासत और सत्ता तक सफर
    1989 में रूहोल्ला खोमैनी की मृत्यु के बाद खामेनेई को ईरान का सर्वोच्च नेता चुना गया। इससे पहले वह राष्ट्रपति रह चुके थे और क्रांति के शुरुआती दौर से ही सक्रिय थे। 1939 में मशहद में जन्मे खामेनेई ने नजफ और क़ुम के धार्मिक मदरसों में शिक्षा प्राप्त की। किशोरावस्था में ही उन्होंने क्रांतिकारी इस्लामी विचारधारा अपनाई जिसमें नवाब सफावी जैसे धर्मगुरुओं का प्रभाव था।

    1958 में उनकी मुलाकात खोमैनी से हुई और उन्होंने उनकी विचारधारा को अपना लिया। खोमैनीवाद का मूल सिद्धांत विलायत-ए-फकीह था जिसके तहत सर्वोच्च धार्मिक नेता को व्यापक राजनीतिक और धार्मिक अधिकार मिलते हैं। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद यही व्यवस्था ईरान की सत्ता संरचना का आधार बनी।

    सत्ता सख्ती और विरोध

    सर्वोच्च नेता बनने के बाद खामेनेई ने घरेलू राजनीति पर मजबूत नियंत्रण स्थापित किया। उन्होंने इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर आईआरजीसी के साथ करीबी संबंध बनाए जो समय के साथ देश की सबसे प्रभावशाली ताकतों में से एक बन गई। उनके शासनकाल में आंतरिक विरोध को सख्ती से दबाया गया। हाल के वर्षों में हुए जनआंदोलनों को भी कठोरता से नियंत्रित किया गया जिनमें बड़ी संख्या में लोगों की मौत की खबरें सामने आईं।

    हालांकि उनकी नियुक्ति भी विवादों से घिरी रही। कुछ धर्मगुरुओं ने सवाल उठाया कि उनके पास ग्रैंड अयातुल्ला का दर्जा नहीं था जो संवैधानिक रूप से जरूरी माना जाता था। बाद में संविधान संशोधन और जनमत संग्रह के जरिए सर्वोच्च नेता बनने की शर्तों में बदलाव किया गया और उन्हें औपचारिक मान्यता दी गई।

    प्रभाव जो दशकों तक कायम रहा

    खामेनेई को अक्सर आधुनिक ईरान का सबसे शक्तिशाली नेता माना गया। भले ही इस्लामी क्रांति के जनक खोमैनी थे लेकिन लंबे समय तक सत्ता में बने रहकर खामेनेई ने राजनीतिक सैन्य और धार्मिक संस्थाओं पर गहरी पकड़ स्थापित की। उनका दाहिना हाथ भले ही निष्क्रिय रहा लेकिन सत्ता पर उनकी पकड़ मजबूत बनी रही। उनकी मृत्यु के बाद अब ईरान एक नए दौर की ओर बढ़ रहा है लेकिन खामेनेई का नाम देश के राजनीतिक इतिहास में लंबे समय तक चर्चा का विषय बना रहेगा।