Tag: Middle East Tension Impact

  • फार्मा, फूड और कृषि सेक्टर को मिलेगा फायदा, केंद्र का बड़ा फैसला


    नई दिल्ली। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच केंद्र सरकार ने औद्योगिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए एलपीजी आवंटन का नया फॉर्मूला तय किया है। Ministry of Petroleum and Natural Gas के इस फैसले का मकसद जरूरी सेक्टर्स को गैस की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना और ऊर्जा संकट के संभावित असर को कम करना है।

    किन सेक्टर्स को मिलेगी प्राथमिकता

    नए फॉर्मूले के तहत फार्मा, फूड, कृषि, पॉलीमर, पैकेजिंग, पेंट, स्टील, बीज, सिरेमिक, फाउंड्री, फोर्जिंग, ग्लास और एयरोसोल जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को बल्क एलपीजी उपलब्ध कराई जाएगी। सरकार का मानना है कि ये सेक्टर देश की अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा की जरूरतों से सीधे जुड़े हैं, इसलिए इन्हें प्राथमिकता देना जरूरी है।

    खपत के आधार पर तय होगा आवंटन

    सरकार ने तय किया है कि इन उद्योगों को मार्च 2026 से पहले की उनकी एलपीजी खपत का 70 प्रतिशत आवंटित किया जाएगा। हालांकि, पूरे सेक्टर के लिए कुल सीमा 0.2 टीएमटी (थाउजेंड मीट्रिक टन) प्रति दिन रखी गई है, ताकि सभी को संतुलित तरीके से गैस मिल सके।

    जहां गैस विकल्प नहीं, वहां पहले एलपीजी

    नई नीति में यह भी स्पष्ट किया गया है कि जिन उद्योगों में एलपीजी की जगह प्राकृतिक गैस (PNG) का उपयोग संभव नहीं है, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर एलपीजी दी जाएगी। इससे उत्पादन पर असर कम होगा और सप्लाई चेन बनी रहेगी।

    रजिस्ट्रेशन और पीएनजी कनेक्शन जरूरी

    सरकार ने उद्योगों के लिए कुछ शर्तें भी तय की हैं। कंपनियों को तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) के साथ रजिस्ट्रेशन कराना होगा और साथ ही सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों के पास पीएनजी कनेक्शन के लिए आवेदन करना होगा। हालांकि, जिन उद्योगों में एलपीजी अनिवार्य है, वहां यह शर्त लागू नहीं होगी।

    राज्यों के लिए भी प्रोत्साहन योजना

    सरकार ने राज्यों को पहले ही नॉन-डोमेस्टिक पैक्ड एलपीजी का 70 प्रतिशत आवंटन कर दिया है। इसके अलावा 10 प्रतिशत अतिरिक्त कोटा उन राज्यों को मिलेगा, जो पीएनजी से जुड़े सुधार लागू करेंगे। राज्यों को तीन प्रमुख कदम उठाने को कहा गया है

    गैस वितरण आदेश 2026 को सभी विभागों तक पहुंचाना
    रिफॉर्म-लिंक्ड एलपीजी आवंटन का लाभ उठाना
    कंप्रेस्ड बायो गैस नीति को जल्द लागू करना
    छोटे सिलेंडरों की मांग में उछाल

    सरकार के मुताबिक, 23 मार्च से अब तक करीब 7.8 लाख 5 किलो के फ्री-ट्रेड एलपीजी सिलेंडर बेचे जा चुके हैं। सिर्फ एक दिन में 1.06 लाख से ज्यादा सिलेंडर बिके, जो मांग में तेज बढ़ोतरी का संकेत है। इसके अलावा तेल कंपनियों ने जागरूकता बढ़ाने के लिए 1,300 से ज्यादा शिविर भी लगाए हैं।

    क्या होगा असर?

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह नया फॉर्मूला उद्योगों को राहत देने के साथ-साथ ऊर्जा आपूर्ति को संतुलित रखने में मदद करेगा। खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता बनी हुई है, यह कदम आर्थिक गतिविधियों को सुचारू बनाए रखने में अहम साबित हो सकता है।

  • मध्य पूर्व तनाव का असर: वित्त वर्ष के आखिरी सत्र में सेंसेक्स 1,635 अंक लुढ़का

    मध्य पूर्व तनाव का असर: वित्त वर्ष के आखिरी सत्र में सेंसेक्स 1,635 अंक लुढ़का


    नई दिल्ली। चालू वित्त वर्ष (2025-26) के आखिरी कारोबारी सत्र में भारतीय शेयर बाजार में सोमवार को बड़ी गिरावट देखने को मिली। दिन के अंत में सेंसेक्स 1,635.67 अंक या 2.22 प्रतिशत की गिरावट के साथ 71,947.55 और निफ्टी 488.20 अंक या 2.14 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 22,331.40 पर था।

    बाजार में चौतरफा गिरावट देखी गई। करीब सभी सूचकांक लाल निशान में बंद हुए। निफ्टी पीएसयू बैंक (4.56 प्रतिशत), निफ्टी फाइनेंशियल सर्विस (3.49 प्रतिशत), निफ्टी प्राइवेट बैंक (3.37 प्रतिशत), निफ्टी रियल्टी (2.84 प्रतिशत), निफ्टी इंडिया डिफेंस (2.80 प्रतिशत), निफ्टी सर्विसेज (2.72 प्रतिशत), निफ्टी कंज्यूमर ड्यूरेबल्स ( 2.58 प्रतिशत), निफ्टी मीडिया (2.50 प्रतिशत) और निफ्टी ऑटो (2.39 प्रतिशत) की कमजोरी के साथ बंद हुआ।

    लार्जकैप के साथ मिडकैप और स्मॉलकैप में भी गिरावट देखी गई। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 1,447.80 अंक या 2.68 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 52,650 और निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स 416.20 अंक या 2.66 प्रतिशत की गिरावट के साथ 15,203.80 पर था।सेंसेक्स पैक में 30 में केवल दो शेयर हरे निशान में बंद हुए।

    बजाज फाइनेंस, एसबीआई, इंडिगो, एक्सिस बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक, एचडीएफसी बैंक, ट्रेंट, भारती एयरटेल, अल्ट्राटेक सीमेंट, एमएंडएम, आईटीसी, आईसीआईसीआई बैंक, सन फार्मा और एशियन पेंट्स लूजर्स थे। केवल टेक महिंद्रा और पावर ग्रिड ही हरे निशान में बंद हुए।

    शेयर बाजार में बड़ी गिरावट के कारण बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) पर सूचीबद्ध सभी कंपनियों का मार्केटकैप करीब 10 लाख करोड़ रुपए कम होकर 412 लाख करोड़ रुपए हो गया है, जो कि शुक्रवार को 422 लाख करोड़ रुपए था।

    बाजार में गिरावट की वजह मध्य पूर्व में तनाव का बढ़ना है, जिसके समाप्त होने के कोई संकेत नहीं मिल रहे हैं। इससे बाजार में निवेशकों की धारणा कमजोरी हुई है।

    एसबीआई सिक्योरिटीज के टेक्निकल और डेरिवेटिव्स प्रमुख सुदीप शाह ने कहा कि वित्त वर्ष 26 के आखिरी दिन बाजार की शुरुआत गैप डाउन के साथ हुई है और हालांकि, बाद में हल्की रिकवरी हुई, लेकिन ऊपरी स्तर से लगातार बिकवाली ने बाजार में गिरावट को बढ़ावा दिया। इससे दिन के अंत में निफ्टी 2.14 प्रतिशत की गिरावट के साथ बंद हुआ।

    उन्होंने आगे कहा कि निफ्टी के लिए सपोर्ट 22,200 से लेकर 22,150 के आसपास है और अगर यहां से गिरावट बढ़ती है तो निफ्टी 22,000 और फिर 21,800 तक जा सकता है। हालांकि, 22,450-22,500 रुकावट का स्तर है।

  • मध्य पूर्व तनाव का असर, भारतीय शेयर बाजार में सेंसेक्स 2% से अधिक गिरकर खुला

    मध्य पूर्व तनाव का असर, भारतीय शेयर बाजार में सेंसेक्स 2% से अधिक गिरकर खुला


    नई दिल्ली।  भारतीय शेयर बाजार गुरुवार के निफ्टी सत्र में तेज गिरावट के साथ खुला। सुबह के शुरुआती कारोबार में बीएसई सेंसेक्स 1,942.22 अंक या 2.55 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 74,750.92 पर और निफ्टी 50 580 अंक या 2.4 प्रतिशत की गिरावट के साथ 23,197.75 पर ट्रेड कर रहा था।

    बाजार में चौतरफा दबाव देखा गया। रियल्टी, प्राइवेट बैंक, ऑटो, फाइनेंस सर्विसेज, पीएसयू बैंक, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, सर्विसेज, डिफेंस और मेटल सभी सेक्टर्स लाल निशान में रहे। लार्जकैप के साथ मिडकैप और स्मॉलकैप रिकवरी में भी गिरावट दर्ज की गई। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 1,194.40 अंक या 2.12 प्रतिशत घटकर 55,095.45 और निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स 246.50 अंक या 1.52 प्रतिशत कमजोर होकर 15,930.95 पर था।

    सेंसेक्स पैक के 30 रिकवरी में से 28 लाल निशान में थे। प्रमुख रिकवरी में HDFC Bank, L&T, Axis Bank, M&M, Trent, Itrannal, Asian Paints, Bajaj Finance, Maruti Suzuki, Kotak Mahindra, Ultratech Engineering, Bajaj Finserv और Indiango शामिल थे। केवल NTPC और पावर ग्रिड हरे निशान में बंद हुए।

    रिटेल्स का मानना ​​है कि बाजार में गिरावट का मुख्य कारण पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव हैं। अमेरिका और इजरायल ने बुधवार को ईरान के दक्षिणी हिस्से में साउथ पार्स गैस फील्ड और असालुयेह शहर की तेल-गैस सुविधाओं पर एयरस्ट्राइक किया। जवाब में ईरान ने कतर के सबसे बड़े गैस प्लांट रास लफान पर मिसाइल हमले किए। इससे वैश्विक तेल कीमतों में तेज उछाल आया और निवेशक जोखिम से बचने के लिए बिकवाली कर रहे हैं।

    अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी दबाव देखा गया। टोक्यो, शंघाई, हांगकांग, बैंकॉक और सोल लाल निशान में बंद हुए। अमेरिकी बाजार बुधवार को लाल निशान में बंद हुए, जिसमें डाओ 1.63 प्रतिशत और नैस्डैक 1.46 प्रतिशत की गिरावट के साथ समाप्त हुआ।

    विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की बिकवाली जारी रही। बुधवार को एफआईआई ने 2,714.35 करोड़ रुपये की इक्विटी बेची, जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) ने 3,253.03 करोड़ रुपये का निवेश किया।

  • मध्य पूर्व तनाव के बीच डॉलर के मुकाबले रुपया टूटा, ऑल-टाइम लो पर पहुंचा

    मध्य पूर्व तनाव के बीच डॉलर के मुकाबले रुपया टूटा, ऑल-टाइम लो पर पहुंचा


    नई दिल्ली। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच बुधवार को डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 92.50 का स्तर तोड़ते हुए 92.634 पर पहुंच गया। यह अब तक का नया ऑल टाइम लो है। इससे पहले रुपए का सुप्रीम गिरावट स्तर 92.4750 था।

    सत्र की शुरुआत डॉलर के मुकाबले रुपए के 92.402 पर खुलने के साथ हुई थी, लेकिन दिन के दौरान रुपया लगातार कमजोर हुआ और अंत में नए निचले स्तर पर बंद हुआ। दिन में रुपया न्यूनतम 92.334 और सुप्रीम 92.643 को दिलाने में सफल रहा।

    रुपया कमजोर होने के प्रमुख कारण

    विश्लेषकों के अनुसार, डॉलर के मुकाबले रुपए में कमजोरी का मुख्य कारण मध्य पूर्व में संघर्ष और वैश्विक तेल कीमतों में वृद्धि है। ईरान युद्ध के चलते कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति टमाटर के पार जा चुकी हैं। भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, जिससे बढ़ती कीमतों का सीधा असर रुपये पर पड़ रहा है।

    कच्चे तेल की कीमतों में पिछले एक महीने में 50 प्रतिशत से ज़्यादा की तेज़ी देखी गई है। अभी में ब्रेंट क्रूड 103 डॉलर प्रति बैरल और डब्ल्यूटीआई क्रूड 94 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहे हैं।

    एलकेपी सिक्योरिटीज के जतिन त्रिवेदी ने कहा कि इम्पोर्ट बिल में लगातार बढ़ोतरी के दबाव के चलते रुपया 92.60 के नीचे फिसल गया। उन्होंने आगे बताया कि होर्मुज जलदमरूमध्य में माल ढुलाई पर रुकावटें और कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भारत के लिए इम्पोर्ट लागत में लगातार बढ़ोतरी का कारण बन रही हैं।

    अमेरिकी नीतिगत फैसले पर नजर

    विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व के नीतिगत फैसले डॉलर की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इसके परिणामस्वरूप रुपए के उतार-चढ़ाव में बढ़ोतरी हो सकती है।

    निकट भविष्य में डॉलर के मुकाबले रुपया 92.25-92.95 के कमजोर दायरे में रहने की उम्मीद तय जा रही है। बाजार में निवेशक और व्यापारी इस पर बढ़ोतरी से नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि मध्य पूर्व में तनाव और तेल की ऊंची कीमतें रुपया दबाव में रख सकती हैं।

    बुधवार को डॉलर के मुकाबले रुपया ऑल टाइम लो 92.634 पर पहुंच गया। मध्य पूर्व में संघर्ष और बढ़ती कच्चे तेल की कीमतें इसके मुख्य कारण हैं। विश्लेषकों का रुझान है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व के फैसले और वैश्विक आर्थिक परिदृश्य से रुपया निकट भविष्य में 92.25-92.95 के कमजोर दायरे में बने रहने की संभावना है। भारत की तेल आयात निर्भरता और होर्मुज जलडमरूमध्य पर संकट रुपये के दबाव को और बढ़ा रहा है।

  • मध्य पूर्व तनाव का असर: भारतीय शेयर बाजार में हफ्तेभर में 6% गिरावट

    मध्य पूर्व तनाव का असर: भारतीय शेयर बाजार में हफ्तेभर में 6% गिरावट


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर भारत के शेयर बाजार पर भी साफ दिखाई दिया। इस सप्ताह प्रमुख घरेलू बेंचमार्क इंडेक्स में भारी गिरावट दर्ज की गई और बाजार में लगातार बिकवाली का माहौल बना रहा।

    सप्ताह के दौरान Nifty 50 में 5.31 प्रतिशत की गिरावट आई और आखिरी कारोबारी दिन यह 2.06 प्रतिशत टूटकर 23,151 के स्तर पर बंद हुआ। वहीं BSE Sensex 1,470.50 अंक यानी 1.93 प्रतिशत गिरकर 74,564 के स्तर पर बंद हुआ।

    विशेषज्ञों के मुताबिक, पश्चिम एशिया में तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। भारत जैसे ऊर्जा आयातक देश के लिए यह स्थिति आर्थिक चिंताओं को बढ़ाती है, जिससे निवेशकों की धारणा कमजोर हुई और बाजार में भारी बिकवाली देखने को मिली।

    ऑटो सेक्टर में सबसे ज्यादा गिरावट
    इस गिरावट का सबसे ज्यादा असर ऑटो सेक्टर पर पड़ा। Nifty Auto Index में इस सप्ताह करीब 10 से 11 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जो मार्च 2020 के बाद इसका सबसे खराब साप्ताहिक प्रदर्शन माना जा रहा है।

    ऑटो इंडेक्स के लगभग सभी शेयरों में भारी बिकवाली देखने को मिली। इसके अलावा सप्ताह के आखिरी कारोबारी दिन बैंकिंग, मेटल और ऑटो सेक्टर के शेयरों में भी तेज गिरावट दर्ज की गई।

    एक दिन में 10 लाख करोड़ रुपये का नुकसान
    शुक्रवार को बाजार में आई तेज गिरावट के कारण निवेशकों की संपत्ति में भारी कमी आई। अनुमान के मुताबिक सिर्फ एक कारोबारी सत्र में ही निवेशकों के करीब 10 लाख करोड़ रुपये डूब गए।

    वहीं व्यापक बाजार सूचकांकों में भी गिरावट देखने को मिली। Nifty Midcap 100 4.59 प्रतिशत गिर गया, जबकि Nifty Smallcap 100 में 3.66 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।

    बाजार में बढ़ा डर और उतार-चढ़ाव
    विश्लेषकों के अनुसार बाजार में डर और अस्थिरता बढ़ रही है। इसका संकेत India VIX से भी मिलता है, जो 22 के स्तर से ऊपर पहुंच गया है। यह आने वाले समय में बाजार में ज्यादा उतार-चढ़ाव की संभावना का संकेत देता है।

    तकनीकी विश्लेषकों का कहना है कि निफ्टी के लिए 23,000 का स्तर तत्काल सपोर्ट माना जा रहा है। इसके बाद 23,300 और 23,500 के स्तर पर रेजिस्टेंस देखने को मिल सकता है।

    वहीं Bank Nifty के लिए 53,500 पहला सपोर्ट स्तर है और इसके नीचे 53,000 का स्तर अहम माना जा रहा है। दूसरी ओर 54,000 और 54,300 के स्तर को प्रमुख रेजिस्टेंस बताया जा रहा है।

    कच्चे तेल और गैस की चिंता बढ़ी
    विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतें महंगाई के जोखिम को बढ़ा सकती हैं। इसके अलावा एलएनजी और एलपीजी की संभावित कमी से औद्योगिक उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है। सीएनजी की उपलब्धता पर दबाव बढ़ने से उपभोक्ताओं की मांग के पैटर्न में बदलाव आ सकता है, खासकर उन शहरों में जहां सीएनजी वाहनों का ज्यादा इस्तेमाल होता है।

    रुपये पर भी बढ़ा दबाव
    वैश्विक अनिश्चितता के बीच भारतीय मुद्रा भी कमजोर हुई है। भारतीय रुपया लगातार दूसरे सप्ताह गिरावट के साथ अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 92.45 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर वैश्विक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी बनी रहती है, तो आने वाले दिनों में बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।

    पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने भारतीय शेयर बाजार पर दबाव बढ़ा दिया है। इस हफ्ते बाजार में आई करीब 6 प्रतिशत की गिरावट ने निवेशकों को बड़ा झटका दिया है, और फिलहाल बाजार की दिशा काफी हद तक वैश्विक हालात पर निर्भर रहने वाली है।

  • मिडिल ईस्ट तनाव का असर! सोने की चमक बढ़ी, लगातार पांचवें दिन दाम चढ़े

    मिडिल ईस्ट तनाव का असर! सोने की चमक बढ़ी, लगातार पांचवें दिन दाम चढ़े


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव और ऊर्जा कीमतों में उछाल के बीच सोना एक बार फिर निवेशकों का पसंदीदा सुरक्षित ठिकाना बन गया है। वैश्विक बाजारों में मंगलवार को सोने की कीमतों में लगातार पांचवें सत्र में तेजी दर्ज की गई। भू-राजनीतिक अनिश्चितता और महंगाई की आशंकाओं ने कीमती धातुओं में जोरदार खरीदारी को बढ़ावा दिया है।

    एमसीएक्स पर रिकॉर्ड उछाल
    भारत के Multi Commodity Exchange of India (एमसीएक्स) पर अप्रैल डिलीवरी वाला सोना सोमवार को 2.53 प्रतिशत चढ़कर 1,66,199 रुपये प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया। वहीं मई डिलीवरी वाली चांदी 0.90 प्रतिशत गिरकर 2,80,090 रुपये प्रति किलोग्राम पर बंद हुई। होली के कारण मंगलवार को पहले सत्र में एमसीएक्स पर कारोबार बंद रहा और शाम 5 बजे से ट्रेडिंग दोबारा शुरू होनी है।

    वैश्विक बाजारों में भी तेजी
    अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्पॉट गोल्ड 0.8 प्रतिशत बढ़कर 5,360 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गया, जबकि अमेरिकी गोल्ड फ्यूचर्स में करीब 1 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई। स्पॉट सिल्वर लगभग 1.9 प्रतिशत उछलकर 91.11 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गया। हालांकि डॉलर इंडेक्स 0.19 प्रतिशत बढ़कर 98.57 पर पहुंच गया, जिससे डॉलर आधारित सोना विदेशी खरीदारों के लिए महंगा हो गया और तेजी की रफ्तार पर कुछ हद तक अंकुश लगा।

    तनाव की आग में घी का काम कर रहा तेल
    अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कहा है कि ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जरूरत पड़ने तक जारी रहेगी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, तेहरान ने सऊदी अरब में तेल और गैस ढांचे को निशाना बनाया है और रणनीतिक होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों को नुकसान पहुंचाने की चेतावनी दी है। इसके जवाब में इजरायल ने ईरान के कमांड केंद्रों पर ‘हमलों की नई लहर’ शुरू करने की घोषणा की। इस बढ़ते टकराव से ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने की आशंका गहरा गई है।

    अमेरिकी कच्चा तेल वायदा 1.4 प्रतिशत बढ़कर 72.23 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया, जबकि ब्रेंट क्रूड 1.87 प्रतिशत की तेजी के साथ 79.2 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखा। तेल की बढ़ती कीमतें महंगाई की चिंताओं को और हवा दे रही हैं, जिससे सोने की मांग मजबूत हो रही है।

    फेड की नीति पर नजर
    निवेशक अब अमेरिका के विनिर्माण और गैर-विनिर्माण पीएमआई, एडीपी नॉन-फार्म रोजगार आंकड़े और बेरोजगारी दर जैसे संकेतकों पर नजर टिकाए हुए हैं। इन आंकड़ों से Federal Reserve की आगे की मौद्रिक नीति का संकेत मिल सकता है। यदि महंगाई दबाव बना रहता है और ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है। हालांकि अनिश्चितता के माहौल में निवेशक फिलहाल सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर झुकाव दिखा रहे हैं।

    2026 में 25% चढ़ चुका है सोना
    साल 2026 में अब तक सोने की कीमतों में करीब 25 प्रतिशत की तेजी आ चुकी है। पिछले वर्ष भी सोना लगभग 64 प्रतिशत चढ़ा था। इस तेजी के पीछे केंद्रीय बैंकों की मजबूत खरीदारी, एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ETF) में बढ़ता निवेश और फेडरल रिजर्व की स्वतंत्रता को लेकर चिंताएं प्रमुख कारण रही हैं।

    विश्लेषकों का मानना है कि जब तक मध्य पूर्व में हालात सामान्य नहीं होते और ऊर्जा बाजार स्थिर नहीं होता, तब तक सोने में मजबूती बनी रह सकती है। हालांकि मजबूत डॉलर और ऊंची ब्याज दरें इसकी रफ्तार को सीमित कर सकती हैं।