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  • होर्मुज संकट के दौरान भारत की रणनीति रही असरदार, तेल आपूर्ति और कीमतों को सामान्य रखने में मिली सफलता

    होर्मुज संकट के दौरान भारत की रणनीति रही असरदार, तेल आपूर्ति और कीमतों को सामान्य रखने में मिली सफलता

    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े संकट के दौरान भारत ने ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तेजी से रणनीतिक कदम उठाए। विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर लिए गए फैसलों, सक्रिय ऊर्जा कूटनीति और वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की उपलब्धता के कारण देश में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की आपूर्ति सामान्य बनी रही। इससे वैश्विक संकट के बावजूद घरेलू बाजार पर सीमित प्रभाव पड़ा।

    ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि संकट की शुरुआत के साथ ही भारत ने पारंपरिक सहयोगी देशों के साथ समन्वय और मजबूत किया। संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और कतर जैसे प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ता देशों के साथ पहले से स्थापित रणनीतिक संबंध इस दौरान काफी उपयोगी साबित हुए। उच्च स्तर पर लगातार संपर्क बनाए रखने से कच्चे तेल और एलपीजी की आपूर्ति बाधित नहीं हुई और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिली।

    भारत ने केवल खाड़ी देशों पर निर्भर रहने के बजाय ऊर्जा आयात के स्रोतों का भी विस्तार किया। रूस, अमेरिका, वेनेजुएला, नाइजीरिया, गैबॉन और गुयाना जैसे देशों से भी कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई गई। इस रणनीति का उद्देश्य किसी एक क्षेत्र में संकट की स्थिति पैदा होने पर वैकल्पिक स्रोतों के माध्यम से आपूर्ति बनाए रखना था। विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा आयात का विविधीकरण भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

    वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के बावजूद भारत में ईंधन की कीमतों को अपेक्षाकृत नियंत्रित रखा गया। इसके लिए सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने समन्वित रणनीति अपनाई। बढ़ी हुई लागत का एक बड़ा हिस्सा स्वयं वहन किया गया, जिससे आम उपभोक्ताओं पर महंगाई का अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ा। साथ ही करों में राहत और मूल्य प्रबंधन के उपायों ने भी बाजार को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    सरकार ने घरेलू स्तर पर भी ऊर्जा प्रबंधन को प्राथमिकता दी। एलपीजी के घरेलू उत्पादन में वृद्धि, ईंधन वितरण प्रणाली की लगातार निगरानी और आवश्यक क्षेत्रों को प्राथमिकता के आधार पर आपूर्ति सुनिश्चित करने जैसे कदम उठाए गए। इससे देशभर में किसी बड़े ईंधन संकट की स्थिति नहीं बनी और आवश्यक सेवाओं पर भी इसका प्रभाव सीमित रहा।

    विशेषज्ञों का कहना है कि कई देशों में ऊर्जा संकट के कारण ईंधन की कमी, लंबी कतारें और आवश्यक सेवाओं पर असर देखने को मिला, लेकिन भारत अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में रहा। इसका प्रमुख कारण समय पर लिए गए नीतिगत फैसले, मजबूत अंतरराष्ट्रीय साझेदारी और संकट प्रबंधन की प्रभावी रणनीति रही। इससे न केवल ऊर्जा आपूर्ति सुचारु बनी रही बल्कि आर्थिक गतिविधियों को भी निरंतर गति मिलती रही।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियां यह संकेत देती हैं कि भविष्य में भी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर दीर्घकालिक रणनीति अपनाना आवश्यक होगा। वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का विकास, आयात के विविध विकल्प और मजबूत अंतरराष्ट्रीय सहयोग भारत को संभावित वैश्विक संकटों से सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। पश्चिम एशिया संकट के दौरान अपनाई गई रणनीति को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।

  • पश्चिम एशिया तनाव के बावजूद भारत पर भरोसा बरकरार, फिच ने वित्त वर्ष 2027 के लिए 6.4% जीडीपी वृद्धि अनुमान कायम रखा 2.

    पश्चिम एशिया तनाव के बावजूद भारत पर भरोसा बरकरार, फिच ने वित्त वर्ष 2027 के लिए 6.4% जीडीपी वृद्धि अनुमान कायम रखा 2.

    नई दिल्ली । वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर सकारात्मक संकेत सामने आए हैं। अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसी फिच रेटिंग्स ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर का अनुमान 6.4 प्रतिशत पर बरकरार रखा है। एजेंसी का मानना है कि बाहरी चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी मजबूती और घरेलू मांग देश की विकास यात्रा को आगे बढ़ाती रहेगी।

    फिच की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव, ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और तेल कीमतों में संभावित उतार-चढ़ाव का असर दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है। इसके बावजूद भारत अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में बना हुआ है। एजेंसी का कहना है कि घरेलू खपत, निवेश गतिविधियां और आर्थिक सुधारों का प्रभाव विकास दर को सहारा देता रहेगा।

    रिपोर्ट में घरेलू मांग को भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत बताया गया है। उपभोक्ता खर्च और निवेश गतिविधियों में निरंतर वृद्धि से आर्थिक गति बनी रहने की संभावना व्यक्त की गई है। इसके अलावा आयात में वास्तविक कमी के कारण शुद्ध बाहरी मांग का भी विकास दर में सकारात्मक योगदान रहने का अनुमान जताया गया है।

    फिच का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव का प्रभाव स्थायी नहीं रहेगा। एजेंसी के अनुसार, यदि वैश्विक हालात सामान्य होते हैं तो वित्त वर्ष 2027-28 में भारतीय अर्थव्यवस्था और अधिक मजबूती के साथ आगे बढ़ सकती है। इसी आधार पर अगले वित्त वर्ष के लिए 6.7 प्रतिशत वृद्धि दर का अनुमान व्यक्त किया गया है। इसके बाद आर्थिक विकास दर के धीरे-धीरे संतुलित स्तर पर लौटने की संभावना जताई गई है।

    रिपोर्ट में तेल कीमतों को प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल किया गया है। फिच के मुख्य अर्थशास्त्री ब्रायन कूल्टन के अनुसार, ऊर्जा कीमतों में वृद्धि वैश्विक आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ा सकती है। हालांकि सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में बढ़ते निवेश और डिजिटल सेवाओं पर बढ़ता खर्च कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं को सहारा प्रदान कर रहा है। भारत जैसे देशों को भी इससे लाभ मिलने की उम्मीद है।

    महंगाई के मोर्चे पर एजेंसी ने सतर्क दृष्टिकोण अपनाया है। फिच का अनुमान है कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति आने वाले महीनों में बढ़ सकती है। वर्ष 2026 के अंत तक महंगाई दर 5.3 प्रतिशत तक पहुंचने की संभावना जताई गई है। इसके पीछे ऊर्जा लागत में वृद्धि और सांख्यिकीय आधार प्रभाव को प्रमुख कारण माना गया है।

    रिपोर्ट में मौसम संबंधी जोखिमों का भी उल्लेख किया गया है। सामान्य से कम मानसून या अत्यधिक गर्मी जैसी परिस्थितियां खाद्य उत्पादन और आपूर्ति को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसी स्थिति में खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है, जिससे महंगाई दर पर अतिरिक्त असर पड़ने की आशंका रहेगी।

    भारतीय मुद्रा को लेकर एजेंसी का दृष्टिकोण अपेक्षाकृत स्थिर है। फिच का मानना है कि वर्ष के शेष समय में रुपये में बड़े स्तर पर गिरावट की संभावना नहीं है। हालांकि वैश्विक परिस्थितियों के कारण सीमित उतार-चढ़ाव संभव है, लेकिन व्यापक अस्थिरता की आशंका फिलहाल कम दिखाई देती है।

    गौरतलब है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने भी हाल ही में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 6.6 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान व्यक्त किया है। केंद्रीय बैंक ने भी वैश्विक आपूर्ति शृंखला में संभावित व्यवधान, वित्तीय बाजारों की अस्थिरता और मौसम संबंधी चुनौतियों को प्रमुख जोखिम बताया है। इसके बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल बना हुआ है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत घरेलू बाजार, बढ़ता निवेश, डिजिटलीकरण और बुनियादी ढांचे पर निरंतर खर्च भारत की आर्थिक वृद्धि को आने वाले वर्षों में भी समर्थन देते रहेंगे। वैश्विक चुनौतियों के बीच फिच का ताजा अनुमान भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती और स्थिरता पर अंतरराष्ट्रीय विश्वास को दर्शाता है।

  • इजरायल-ईरान से तुरंत हमले रोकने की अपील, ट्रंप बोले– “अब गोलीबारी बंद होनी चाहिए, बातचीत की मेज पर लौटें”

    इजरायल-ईरान से तुरंत हमले रोकने की अपील, ट्रंप बोले– “अब गोलीबारी बंद होनी चाहिए, बातचीत की मेज पर लौटें”

    नई दिल्ली । मध्य-पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायल और ईरान से तत्काल सैन्य कार्रवाई रोकने की अपील की है। उन्होंने दोनों देशों से स्पष्ट शब्दों में कहा कि अब “गोलीबारी बंद” कर देनी चाहिए और स्थिति को और आगे बढ़ाने के बजाय बातचीत के रास्ते पर लौटना चाहिए।

    यह बयान ऐसे समय आया है जब ईरान और इजरायल के बीच मिसाइल और ड्रोन हमलों के बाद तनाव एक बार फिर तेज हो गया है। हाल ही में ईरान की ओर से इजरायल पर मिसाइल दागे जाने की खबर सामने आई, जिसके जवाब में इजरायल ने भी तेहरान के कई ठिकानों को निशाना बनाया। इन जवाबी कार्रवाइयों ने क्षेत्र में व्यापक संघर्ष की आशंका को और बढ़ा दिया है।

    ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए बेहद संक्षिप्त लेकिन सख्त संदेश जारी करते हुए दोनों देशों से संयम बरतने की अपील की। उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों को अपने-अपने हमले रोक देने चाहिए क्योंकि आगे टकराव बढ़ाने से केवल स्थिति और गंभीर होगी। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अब समय संघर्ष नहीं बल्कि कूटनीति का है।

    इससे पहले भी ट्रंप ने मीडिया से बातचीत में ईरान से अपील करते हुए कहा था कि मिसाइल हमलों को रोककर उसे वार्ता की मेज पर लौटना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका और ईरान किसी समझौते के बेहद करीब थे, लेकिन हालिया घटनाओं ने उस प्रक्रिया को प्रभावित किया है। ट्रंप के अनुसार, अगर हालात शांत रहते तो आने वाले दिनों में समझौता संभव था।

    एक अन्य बयान में ट्रंप ने यह भी कहा कि वह इजरायल के प्रधानमंत्री से सीधे बात करेंगे और उनसे जवाबी कार्रवाई को रोकने का आग्रह करेंगे। उन्होंने कहा कि दोनों देशों ने एक-दूसरे पर हमला कर दिया है और अब आगे की कार्रवाई से बचना चाहिए। उनका कहना था कि क्षेत्र को और अधिक अस्थिर होने से बचाने के लिए तत्काल कदम जरूरी हैं।

    इस बीच क्षेत्र में लगातार बढ़ते सैन्य टकराव ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ा दी है। मिसाइल हमलों, ड्रोन स्ट्राइक और जवाबी कार्रवाइयों के कारण स्थिति तेजी से अस्थिर होती जा रही है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तनाव जल्द कम नहीं हुआ तो यह संघर्ष व्यापक क्षेत्रीय संकट का रूप ले सकता है।

    इजरायली रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की ओर से दिए गए बयान में कहा गया है कि यह स्थिति पहले के हमलों और गतिविधियों का परिणाम है, जिससे तनाव और अधिक गहरा गया है। फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या कूटनीतिक प्रयासों के जरिए इस टकराव को रोका जा सकेगा या हालात और बिगड़ेंगे।

  • ईरान पर अमेरिकी हमले के बाद भड़का तनाव, जवाबी कार्रवाई से मध्य पूर्व में फिर से संघर्ष की आशंका गहराई

    ईरान पर अमेरिकी हमले के बाद भड़का तनाव, जवाबी कार्रवाई से मध्य पूर्व में फिर से संघर्ष की आशंका गहराई

    नई दिल्ली ।  अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चल रहा तनाव एक बार फिर गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है, जिससे मिडिल ईस्ट में बड़े सैन्य संघर्ष की आशंका तेज हो गई है। हालिया घटनाक्रम में दोनों देशों के बीच सीमित सैन्य हमलों और जवाबी कार्रवाइयों ने क्षेत्रीय स्थिरता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका ने ईरान के कुछ रणनीतिक ठिकानों पर कार्रवाई की है, जिसे उसने अपने ड्रोन और सैन्य संपत्तियों की सुरक्षा से जुड़ी प्रतिक्रिया बताया है। इन हमलों में ईरान के तटीय और द्वीपीय क्षेत्रों में स्थित रडार और ड्रोन नियंत्रण प्रणाली को निशाना बनाए जाने की बात सामने आई है।

    इसके बाद स्थिति और अधिक तनावपूर्ण हो गई जब ईरान की ओर से भी जवाबी कार्रवाई की गई। ईरानी सैन्य इकाइयों ने कथित तौर पर उन ठिकानों को निशाना बनाया, जहां से अमेरिकी सैन्य अभियान संचालित किए जा रहे थे। इस घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ा दी है क्योंकि दोनों देशों के बीच पहले से जारी असहमति अब खुले सैन्य टकराव की दिशा में बढ़ती दिखाई दे रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति को जल्द नियंत्रित नहीं किया गया तो यह संघर्ष व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है, इस पूरे विवाद का केंद्र बना हुआ है। इस रणनीतिक क्षेत्र में किसी भी प्रकार की सैन्य गतिविधि का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है। यही कारण है कि कई वैश्विक शक्तियां दोनों देशों से संयम बरतने और कूटनीतिक समाधान अपनाने की अपील कर रही हैं।

    हालांकि दोनों पक्षों की ओर से अभी तक औपचारिक रूप से पूर्ण युद्ध की घोषणा नहीं की गई है, लेकिन सीमित हमलों और जवाबी कार्रवाइयों की श्रृंखला ने हालात को बेहद संवेदनशील बना दिया है। क्षेत्रीय देशों में भी इस स्थिति को लेकर चिंता का माहौल है और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सतर्कता बढ़ा दी गई है।

    विश्लेषकों का यह भी मानना है कि यह टकराव केवल सैन्य स्तर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव भी वैश्विक स्तर पर देखने को मिल सकते हैं। खासकर तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

    वर्तमान हालात को देखते हुए यह स्पष्ट है कि यदि दोनों देशों के बीच बातचीत और कूटनीति के रास्ते को मजबूत नहीं किया गया, तो मिडिल ईस्ट एक बार फिर बड़े संकट की ओर बढ़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब इस पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए है और स्थिति को नियंत्रण में लाने के प्रयास तेज हो गए हैं।

  • ईरान-डील विवाद के बीच ट्रंप का सख्त रुख: डेमोक्रेट्स पर निशाना, कहा- बातचीत में बाधा डालना बंद करें

    ईरान-डील विवाद के बीच ट्रंप का सख्त रुख: डेमोक्रेट्स पर निशाना, कहा- बातचीत में बाधा डालना बंद करें

    नई दिल्ली । अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान ने ईरान के साथ चल रही कूटनीतिक बातचीत के बीच एक बार फिर राजनीतिक हलचल तेज कर दी है। मध्य पूर्व में पहले से ही तनावपूर्ण हालात के बीच ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान समझौता करना चाहता है और ऐसा समझौता अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए लाभकारी साबित हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि इस पूरी प्रक्रिया में अनावश्यक राजनीतिक टिप्पणियां बातचीत को प्रभावित कर रही हैं और इससे कूटनीतिक प्रयासों में कठिनाई पैदा हो रही है। ट्रंप ने अपने बयान में विपक्षी डेमोक्रेट्स और कुछ रिपब्लिकन नेताओं पर भी निशाना साधते हुए कहा कि लगातार नकारात्मक बयानबाजी से स्थिति और जटिल हो जाती है। उनके अनुसार जब राजनीतिक वर्ग बार-बार यह कहता है कि तेज कार्रवाई होनी चाहिए या फिर रुक जाना चाहिए, तो इससे वास्तविक वार्ता प्रक्रिया प्रभावित होती है और निर्णय लेने में बाधाएं उत्पन्न होती हैं। उन्होंने लोगों से धैर्य रखने की अपील करते हुए कहा कि अंततः परिणाम सकारात्मक होंगे और स्थिति नियंत्रण में रहेगी।

    इसी बीच अमेरिकी सेंट्रल कमांड की ओर से जारी बयान में कहा गया कि उसने ईरान के गोरुक शहर और केश्म द्वीप के पास आत्मरक्षा में कुछ सैन्य कार्रवाई की है। इस कार्रवाई को ईरान की कथित आक्रामक गतिविधियों के जवाब के रूप में बताया गया है। सेंट्रल कमांड के अनुसार ईरान द्वारा एक ड्रोन को अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में गिराए जाने के बाद यह कदम उठाया गया। इसके जवाब में अमेरिकी सेना ने एयर डिफेंस सिस्टम, एक ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन और कई ड्रोन को निष्क्रिय करने का दावा किया है, जिन्हें क्षेत्रीय समुद्री मार्गों के लिए खतरा बताया गया था।

    दूसरी ओर ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने भी जवाबी कार्रवाई का दावा करते हुए कहा है कि उसने अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। हालांकि ईरान ने इन ठिकानों के स्थान को स्पष्ट नहीं किया है। दोनों देशों की ओर से ऐसे दावे सामने आने के बाद क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी स्थिति पर नजर रखी जा रही है।

    विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के बयान और जवाबी कार्रवाइयों से कूटनीतिक प्रयासों पर दबाव बढ़ सकता है। ईरान और अमेरिका के बीच पहले से चले आ रहे मतभेदों के बीच यह ताजा घटनाक्रम स्थिति को और जटिल बना रहा है। राजनीतिक और सैन्य दोनों स्तरों पर जारी यह तनाव आने वाले दिनों में वैश्विक कूटनीति के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बन सकता है। फिलहाल सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि बातचीत की प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ती है और क्या दोनों पक्ष किसी साझा समझौते की ओर बढ़ पाते हैं या नहीं।

  • अमेरिका-ईरान तनाव पर बड़ा दावा, ऑपरेशन एपिक फ्यूरी 2.0’ की रिपोर्ट से हलचल संभावित सैन्य विकल्पों पर चर्चा, आधिकारिक पुष्टि नहीं

    अमेरिका-ईरान तनाव पर बड़ा दावा, ऑपरेशन एपिक फ्यूरी 2.0’ की रिपोर्ट से हलचल संभावित सैन्य विकल्पों पर चर्चा, आधिकारिक पुष्टि नहीं



    नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव को लेकर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल तेज हो गई है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि यदि ईरान के साथ कूटनीतिक बातचीत विफल रहती है तो अमेरिका सैन्य विकल्पों पर विचार कर सकता है, जिसमें कथित तौर पर ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी 2.0’ जैसी योजनाओं का उल्लेख किया जा रहा है।

    हालांकि, अब तक न तो पेंटागन और न ही अमेरिकी सरकार की ओर से इस नाम के किसी भी ऑपरेशन की आधिकारिक पुष्टि की गई है। रिपोर्ट्स में इसे संभावित रणनीतिक योजना या सैन्य विकल्पों की चर्चा के रूप में बताया गया है, न कि घोषित अभियान के रूप में।

    जानकारी के अनुसार, चर्चा में मौजूद संभावित विकल्पों में ईरान के सैन्य ढांचे, परमाणु संबंधित ठिकानों और रणनीतिक बुनियादी ढांचे पर सीमित हवाई हमलों की संभावना शामिल बताई जा रही है। कुछ रिपोर्ट्स में विशेष अभियानों और समुद्री/रणनीतिक ठिकानों को लेकर भी अलग-अलग सैन्य विकल्पों का जिक्र किया गया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान और अमेरिका के बीच मौजूदा तनाव पहले से ही नाजुक दौर में है और किसी भी सैन्य कार्रवाई की स्थिति में पश्चिम एशिया में हालात तेजी से बिगड़ सकते हैं।

    फिलहाल यह पूरा मामला खुफिया रिपोर्ट्स और मीडिया दावों पर आधारित है, जबकि दोनों देशों की ओर से आधिकारिक स्तर पर संयम और कूटनीतिक बातचीत की ही बात कही जाती रही है।

  • पश्चिम एशिया तनाव के बीच पीएम मोदी ने ईरान से की अहम चर्चा शांति का संदेश

    पश्चिम एशिया तनाव के बीच पीएम मोदी ने ईरान से की अहम चर्चा शांति का संदेश

    नई दिल्ली: भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से फोन पर बातचीत की और उन्हें ईद तथा नवरोज के अवसर पर शुभकामनाएं दीं यह बातचीत ऐसे समय में हुई है जब अमेरिका और इजरायल के साथ ईरान के बीच संघर्ष लगातार जारी है

    प्रधानमंत्री ने अपनी बातचीत में पश्चिम एशिया में शांति स्थिरता और समृद्धि की उम्मीद जताई उन्होंने कहा कि ऐसे पावन अवसर आपसी समझ और सहयोग को बढ़ाने का माध्यम बन सकते हैं और क्षेत्र में सकारात्मक माहौल तैयार कर सकते हैं

    पीएम मोदी ने बातचीत के दौरान इस बात पर भी चिंता व्यक्त की कि क्षेत्र में महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर पर हो रहे हमले न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित कर रहे हैं बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन को भी बाधित कर सकते हैं उन्होंने ऐसे कदमों की निंदा करते हुए सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की

    समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर जोर देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए समुद्री रास्तों का सुरक्षित और निर्बाध रहना बेहद जरूरी है भारत ने इस दौरान ईरान का आभार भी जताया कि वह वहां रह रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा का ध्यान रख रहा है

    इससे पहले भी दोनों नेताओं के बीच 12 मार्च को बातचीत हुई थी जिसमें क्षेत्र में बढ़ते तनाव और उसके वैश्विक प्रभावों पर चर्चा की गई थी उस समय भी प्रधानमंत्री ने आवश्यक वस्तुओं और ऊर्जा की निर्बाध आपूर्ति की आवश्यकता पर जोर दिया था और चेतावनी दी थी कि किसी भी तरह की रुकावट भारत और पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है

    भारत लगातार इस पूरे संकट के दौरान “डायलॉग और डिप्लोमेसी” की नीति पर जोर दे रहा है प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में कई देशों के नेताओं से बातचीत कर शांति की पहल को आगे बढ़ाया है उन्होंने कुवैत के क्राउन प्रिंस ओमान के सुल्तान फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों मलेशिया के प्रधानमंत्री और कतर के अमीर से भी बातचीत की थी

    इन सभी बातचीतों में भारत का संदेश एक ही रहा है कि किसी भी विवाद का समाधान संवाद और कूटनीति के जरिए ही संभव है प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि बातचीत और सहयोग ही स्थायी शांति का सबसे प्रभावी रास्ता है

    वर्तमान में ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच जारी संघर्ष के कारण वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट और व्यापार बाधित होने की आशंका बढ़ गई है ऐसे में भारत का यह कूटनीतिक प्रयास न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है

    प्रधानमंत्री मोदी की यह बातचीत शांति संवाद और सहयोग पर आधारित भारत की विदेश नीति को दर्शाती है जो मौजूदा वैश्विक तनाव के बीच संतुलन और स्थिरता बनाए रखने की दिशा में अहम भूमिका निभा रही है