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  • 26 से 30 जून तक EPFO पोर्टल रहेगा ठप, पीएफ क्लेम और UMANG समेत कई ऑनलाइन सेवाएं रहेंगी अस्थायी रूप से बंद

    26 से 30 जून तक EPFO पोर्टल रहेगा ठप, पीएफ क्लेम और UMANG समेत कई ऑनलाइन सेवाएं रहेंगी अस्थायी रूप से बंद

    नई दिल्ली। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के करोड़ों सदस्यों के लिए महत्वपूर्ण सूचना जारी की गई है। संगठन अपने डिजिटल सिस्टम को अधिक सक्षम और सुरक्षित बनाने के लिए डेटाबेस माइग्रेशन तथा क्लेम प्रोसेसिंग सॉफ्टवेयर का अपग्रेडेशन कर रहा है। इस तकनीकी प्रक्रिया के चलते 26 जून से 30 जून तक ईपीएफओ की कई प्रमुख ऑनलाइन सेवाएं अस्थायी रूप से बंद रहेंगी। इस दौरान सदस्य और नियोक्ता दोनों ही कई जरूरी सुविधाओं का उपयोग नहीं कर सकेंगे।

    ईपीएफओ के अनुसार, 26 जून की मध्यरात्रि से 30 जून की रात 11:59 बजे तक मेंबर पोर्टल, एम्प्लॉयर पोर्टल और उमंग ऐप के माध्यम से उपलब्ध अधिकांश ऑनलाइन सेवाएं प्रभावित रहेंगी। इन पांच दिनों के दौरान उपयोगकर्ता अपने खाते में लॉग इन नहीं कर पाएंगे, जिससे ऑनलाइन माध्यम से होने वाले कई कार्य पूरी तरह बाधित रहेंगे। संगठन को उम्मीद है कि सभी सेवाएं 1 जुलाई से दोबारा सामान्य रूप से शुरू हो जाएंगी।

    इस अवधि में कर्मचारी नया पीएफ क्लेम जमा नहीं कर सकेंगे और पहले से जमा क्लेम की स्थिति भी ऑनलाइन नहीं देख पाएंगे। इसके अलावा ई-पासबुक डाउनलोड करने या खाते का विवरण देखने की सुविधा भी उपलब्ध नहीं रहेगी। जिन कर्मचारियों को अपने भविष्य निधि खाते से संबंधित किसी प्रक्रिया को पूरा करना है, उन्हें सेवाएं बहाल होने तक इंतजार करना होगा।

    नियोक्ताओं पर भी इस तकनीकी अपग्रेडेशन का असर पड़ेगा। वे इलेक्ट्रॉनिक चालान-कम-रिटर्न (ईसीआर) दाखिल नहीं कर सकेंगे और नए कर्मचारियों के लिए यूनिवर्सल अकाउंट नंबर (यूएएन) से जुड़ी ऑनलाइन प्रक्रिया भी अस्थायी रूप से बंद रहेगी। इससे नई नियुक्तियों और नियमित मासिक अनुपालन से जुड़े कुछ कार्य निर्धारित अवधि तक प्रभावित रह सकते हैं।

    ईपीएफओ ने स्पष्ट किया है कि यह कदम संगठन की डिजिटल व्यवस्था को अधिक आधुनिक, तेज और सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से उठाया जा रहा है। सिस्टम माइग्रेशन पूरा होने के बाद क्लेम प्रोसेसिंग और अन्य ऑनलाइन सेवाओं के पहले से अधिक प्रभावी और सुचारु रूप से संचालित होने की उम्मीद है। इसलिए यह अस्थायी असुविधा भविष्य में बेहतर डिजिटल सेवाएं उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

    देशभर में सात करोड़ से अधिक कर्मचारी ईपीएफओ की सेवाओं से जुड़े हुए हैं। निजी क्षेत्र में कार्यरत कर्मचारियों के लिए कर्मचारी भविष्य निधि योजना सामाजिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार है। ऐसे में संगठन ने सदस्यों और नियोक्ताओं से अपील की है कि जिन कार्यों के लिए ऑनलाइन सेवाओं की आवश्यकता है, वे उन्हें 1 जुलाई के बाद पूरा करने की योजना बनाएं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी उन्नयन से भविष्य में क्लेम निपटान की गति बेहतर होगी और ऑनलाइन सेवाओं की विश्वसनीयता भी बढ़ेगी। हालांकि जिन कर्मचारियों को तत्काल पीएफ निकासी, क्लेम स्टेटस या अन्य डिजिटल सेवाओं की आवश्यकता है, उन्हें अगले कुछ दिनों तक इंतजार करना पड़ सकता है। 1 जुलाई से सभी सेवाएं सामान्य रूप से बहाल होने की संभावना जताई गई है।

  • सीमा सुरक्षा और घुसपैठ पर सख्ती के बीच बयानबाजी तेज, बांग्लादेशी नागरिकों को लेकर छिड़ी नई बहस

    सीमा सुरक्षा और घुसपैठ पर सख्ती के बीच बयानबाजी तेज, बांग्लादेशी नागरिकों को लेकर छिड़ी नई बहस

    नई दिल्ली । अवैध प्रवासन और सीमा सुरक्षा का मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। हाल के दिनों में अवैध रूप से भारत में रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों के खिलाफ चल रही कार्रवाई को लेकर विभिन्न स्तरों पर बहस तेज हुई है। इस विषय ने न केवल देश के भीतर राजनीतिक चर्चा को प्रभावित किया है, बल्कि पड़ोसी देशों और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का भी ध्यान अपनी ओर खींचा है।

    सीमा से जुड़े राज्यों में लंबे समय से अवैध घुसपैठ और पहचान संबंधी मुद्दे राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं। सरकार का कहना है कि जिन लोगों के पास वैध दस्तावेज नहीं हैं और जो कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना देश में प्रवेश करते हैं, उनके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जा रही है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य सीमा प्रबंधन को मजबूत करना और कानूनी व्यवस्था को प्रभावी बनाना बताया जा रहा है।

    हाल के अभियानों के दौरान बड़ी संख्या में ऐसे लोगों की पहचान किए जाने का दावा किया गया है, जिनके पास भारतीय नागरिकता अथवा वैध निवास संबंधी आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे। इसके बाद उन्हें निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं के तहत वापस भेजने की कार्रवाई शुरू की गई। प्रशासनिक स्तर पर इस प्रक्रिया के लिए विशेष व्यवस्था भी की गई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अवैध प्रवासन का मुद्दा केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक पहलुओं से भी जुड़ा हुआ है। सीमा क्षेत्रों में जनसंख्या दबाव, संसाधनों पर असर और मतदाता सूची जैसे विषय समय-समय पर राजनीतिक बहस का हिस्सा बनते रहे हैं। इसी कारण यह मुद्दा संवेदनशील और व्यापक प्रभाव वाला माना जाता है।

    इस बीच कुछ विदेशी राजनीतिक विश्लेषकों और टिप्पणीकारों ने भारत की कार्रवाई पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उनके बयानों को लेकर भी चर्चा तेज हुई है। हालांकि भारतीय पक्ष लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि अवैध प्रवास और वैध नागरिकता के मुद्दे को कानूनी दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए और किसी भी कार्रवाई का आधार निर्धारित नियम एवं प्रक्रियाएं होती हैं।

    भारत और बांग्लादेश के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार, संपर्क और विकास से जुड़े कई साझा कार्यक्रम भी संचालित हैं। ऐसे में सीमा प्रबंधन और अवैध प्रवासन जैसे विषयों पर संतुलित और संस्थागत सहयोग की आवश्यकता लगातार महसूस की जाती रही है।

    विश्लेषकों के अनुसार सीमा सुरक्षा को मजबूत बनाने के साथ-साथ कानूनी प्रवासन व्यवस्था को प्रभावी बनाना भी जरूरी है। इससे एक ओर राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताओं का समाधान किया जा सकता है, वहीं दूसरी ओर दोनों देशों के बीच सहयोग और विश्वास को भी बनाए रखा जा सकता है।

    वर्तमान घटनाक्रम ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि अवैध प्रवासन का मुद्दा आने वाले समय में भी राजनीतिक और प्रशासनिक चर्चा का प्रमुख विषय बना रह सकता है। सरकारें जहां सीमा सुरक्षा और कानूनी व्यवस्था को प्राथमिकता दे रही हैं, वहीं इस विषय पर क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिक्रियाएं भी लगातार सामने आ रही हैं।

  • पश्चिम बंगाल में अवैध प्रवासियों पर सख्ती, 11 होल्डिंग सेंटरों में 335 लोग रखे गए, पहचान प्रक्रिया तेज

    पश्चिम बंगाल में अवैध प्रवासियों पर सख्ती, 11 होल्डिंग सेंटरों में 335 लोग रखे गए, पहचान प्रक्रिया तेज

    नई दिल्ली । देश के विभिन्न हिस्सों में अवैध प्रवासन और सीमा सुरक्षा को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच पश्चिम बंगाल से एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक कार्रवाई सामने आई है, जहां राज्य सरकार ने संदिग्ध अवैध प्रवासियों की पहचान और उनके कानूनी सत्यापन के लिए 11 होल्डिंग सेंटर स्थापित किए हैं। इन सेंटरों में फिलहाल कुल 335 लोगों को रखा गया है, जिनके दस्तावेजों और नागरिकता से जुड़ी स्थिति की जांच की जा रही है। प्रशासन का कहना है कि यह कदम पूरी तरह से निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत उठाया गया है और इसका उद्देश्य किसी भी प्रकार की अवैध गतिविधि पर नियंत्रण रखते हुए व्यवस्था को मजबूत करना है।

    अधिकारियों के अनुसार इन होल्डिंग सेंटरों का संचालन राज्य के अलग-अलग जिलों में किया जा रहा है, जहां पुलिस और जिला प्रशासन की निगरानी में लोगों को अस्थायी रूप से रखा गया है। इनमें बड़ी संख्या उन क्षेत्रों से सामने आई है जो अंतरराष्ट्रीय सीमा के करीब स्थित हैं, जहां अवैध घुसपैठ की आशंका अधिक मानी जाती है। इन केंद्रों में पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को अलग-अलग परिस्थितियों में रखा गया है और उनके रिकॉर्ड का सत्यापन किया जा रहा है ताकि उनकी वास्तविक पहचान स्पष्ट हो सके।

    प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुरूप की जा रही है, जिसमें संदिग्ध विदेशी नागरिकों की पहचान, उन्हें सुरक्षित स्थान पर रखना और आवश्यक जांच पूरी होने तक निगरानी में रखना शामिल है। राज्य स्तर पर इस व्यवस्था को मजबूत करने के लिए कई जिलों में विशेष टीमों का गठन किया गया है, जो दस्तावेजों की जांच और स्थानीय स्तर पर जानकारी जुटाने का कार्य कर रही हैं।

    इस बीच राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे पर चर्चा तेज हो गई है, जहां अवैध घुसपैठ और सीमा सुरक्षा को लेकर अलग-अलग मत सामने आ रहे हैं। कुछ पक्ष इसे सुरक्षा व्यवस्था की मजबूती के लिए आवश्यक कदम बता रहे हैं, जबकि अन्य इसे मानवीय दृष्टिकोण से जोड़कर देखने की बात कह रहे हैं। हालांकि प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति के साथ अनावश्यक कठोरता नहीं बरती जाएगी और पूरी प्रक्रिया कानून के दायरे में रहकर ही आगे बढ़ाई जाएगी।

    फिलहाल सभी होल्डिंग सेंटरों में रखे गए लोगों के दस्तावेजों की जांच, उनके मूल देश की पुष्टि और अन्य कानूनी औपचारिकताओं को पूरा किया जा रहा है। जांच पूरी होने के बाद ही यह तय किया जाएगा कि किन लोगों को देश से वापस भेजने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी और किन मामलों में आगे की कानूनी कार्रवाई की आवश्यकता है। प्रशासन का कहना है कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शिता और नियमों के अनुरूप की जा रही है ताकि किसी भी प्रकार की त्रुटि की संभावना न रहे और कानून व्यवस्था मजबूत बनी रहे।

  • उमंग सिंघार ने आदिवासी इलाकों से बढ़ते पलायन पर सरकार पर साधा निशाना, बोले- ये गंभीर मानवीय संकट है

    उमंग सिंघार ने आदिवासी इलाकों से बढ़ते पलायन पर सरकार पर साधा निशाना, बोले- ये गंभीर मानवीय संकट है


    भोपाल। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचलों से लगातार हो रहे पलायन को लेकर राज्य सरकार पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों की मौजूदा स्थिति बेहद चिंताजनक है, जहां बड़ी संख्या में आदिवासी परिवार रोजगार, शिक्षा और सम्मानजनक जीवन की तलाश में अपने ही राज्य से बाहर जाने को मजबूर हो रहे हैं। उनके अनुसार यह केवल आर्थिक समस्या नहीं बल्कि आदिवासी समाज के सम्मान और अस्तित्व से जुड़ा गंभीर मानवीय संकट है।

    सिंघार ने कहा कि सदियों से जल, जंगल और जमीन से जुड़े आदिवासी समुदाय आज अपने गांव और खेत छोड़कर दूसरे राज्यों में मजदूरी करने के लिए विवश हो रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज का यह पलायन उनकी पहचान और सम्मान से जुड़ा एक गहरा सामाजिक संकट बनता जा रहा है।

    भाजपा सरकार की नीतियों को ठहराया जिम्मेदार

    आदिवासियों के पलायन के मुद्दे पर उन्होंने भाजपा सरकार की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया। उनका आरोप है कि वर्षों से सत्ता में रही सरकार दलित और आदिवासी समाज के मुद्दों पर केवल घोषणाएं और प्रचार तक सीमित रही है। उन्होंने कहा कि आदिवासी गौरव के नाम पर कार्यक्रम तो आयोजित किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर आदिवासी परिवारों को रोजगार और बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं, जिसके कारण उन्हें प्रदेश छोड़कर जाना पड़ रहा है।

    सरकार की नीतियों की विफलता का स्पष्ट संकेत

    नेता प्रतिपक्ष ने यह भी कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर पर्याप्त रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं हैं। इसके साथ ही स्वास्थ्य सेवाओं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की भी कमी बनी हुई है। उनका कहना है कि जब किसी प्रदेश के मूल निवासी ही अपनी जमीन और गांव छोड़ने के लिए मजबूर हो जाएं, तो यह सरकार की नीतियों की विफलता का स्पष्ट संकेत है।

    उल्लेखनीय है कि मध्‍य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिलों से हर वर्ष बड़ी संख्या में मजदूर काम की तलाश में अन्य राज्यों की ओर पलायन करते हैं। इस मुद्दे को लेकर अब कांग्रेस ने राज्य सरकार पर आदिवासी समाज की उपेक्षा का आरोप लगाया है।

  • इंदौर दूषित पानी से न केवल जानें गईं. छोटे कारोबारियों की रोजी-रोटी भी प्रभावित

    इंदौर दूषित पानी से न केवल जानें गईं. छोटे कारोबारियों की रोजी-रोटी भी प्रभावित


    इंदौर । इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी के कारण अब तक 18 लोगों की जान जा चुकी है. और सैकड़ों लोग अस्पतालों में भर्ती हैं। वहीं. इस भयावह स्थिति का असर केवल स्वास्थ्य पर ही नहीं. बल्कि यहां के छोटे कारोबारों पर भी गहरा पड़ा है। दूषित पानी के कारण लोग बाहर का खाना खाने से बचने लगे हैं. जिसके कारण फास्ट फूड. चाय-नाश्ता और ठेले-खोमचों पर ग्राहकी पूरी तरह से ठप हो गई है।

    राजवीर सिंह कुशवाह. जो भागीरथपुरा में बर्गर. पिज्जा और चायनीज आइटम बेचते थे. बताते हैं कि नए साल की छुट्टियों में उनके कारोबार की सबसे ज्यादा कमाई होती थी। 31 दिसंबर और 1 जनवरी के बीच उनका बिजनेस बहुत अच्छा चलता था. लेकिन इस बार 28 दिसंबर से 5 जनवरी तक दुकान पूरी तरह बंद रही। “हमारे फास्ट फूड आइटम्स में पानी का इस्तेमाल होता है. और खराब पानी के कारण हमें दुकान बंद रखनी पड़ी। अब दुकान तो खोली है. लेकिन ग्राहक बिल्कुल नहीं आ रहेउन्होंने कहा।

    इसी तरह. महेश हार्डिया. जो पानीपुरी और चाट बेचते हैं. बताते हैं कि 8-10 दिनों से उनका ठेला बंद है। पानी की गंदगी के कारण प्रशासन ने ठेला बंद करने का आदेश दिया था। “हम रोज 700-800 रुपये कमाते थे. लेकिन अब काम नहीं हो रहा। अब तक जितनी सेविंग्स हैं. उससे काम चल रहा है। जब तक पानी की समस्या ठीक नहीं होती. काम में सुधार की उम्मीद कम हैमहेश ने कहा।नाश्ते की दुकान चलाने वाली सीमा सिकरवार भी परेशान हैं। दूषित पानी के कारण ग्राहक बहुत कम हो गए हैं। पहले की तरह ज्यादा ग्राहक नहीं आ रहे हैं। अब बोरिंग का पानी इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन इससे भी ज्यादा समस्या हो रही है सीमा ने बताया।

    दूसरी ओर. इस संकट का असर अब परिवारों पर भी पड़ने लगा है। रोशनी कोरी. जो कपड़े की दुकान पर काम करती थीं. ने बताया कि उनके परिवार ने भागीरथपुरा छोड़ने का फैसला किया है।मेरे बेटे की तबीयत खराब हो गई थी. अब ठीक हो गया है. लेकिन इस गंदे पानी के कारण हम सागर लौटने का सोच रहे हैं। हम यहां 8-9 महीने से किराए पर रह रहे थे. लेकिन अब हमें यहां से पलायन करना पड़ रहा हैउन्होंने कहा।इस क्षेत्र में दूषित पानी का असर गहरा है और इससे छोटे व्यापारियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। उनका कहना है कि जब तक पानी की गुणवत्ता ठीक नहीं होती. उनका कारोबार ठीक से नहीं चल पाएगा।

    वहीं. कलेक्टर और नगर निगम कमिश्नर लगातार हालात का जायजा ले रहे हैं और पानी की सप्लाई को सुधारने के प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन जब तक लोग भरोसा नहीं करते. व्यापारियों की स्थिति में सुधार की कोई संभावना नहीं दिख रही है।इंदौर में हुई इस जलसंकट की घटना ने ना सिर्फ स्वास्थ्य को प्रभावित किया है. बल्कि रोजी-रोटी के संकट को भी जन्म दिया है। इस गंभीर स्थिति में छोटे कारोबारी अपनी दिक्कतें साझा कर रहे हैं. और प्रशासन से जल्द सुधार की उम्मीद लगाए बैठे हैं।इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी के कारण अब तक 18 लोगों की जान जा चुकी है. और सैकड़ों लोग अस्पतालों में भर्ती हैं। वहीं. इस भयावह स्थिति का असर केवल स्वास्थ्य पर ही नहीं. बल्कि यहां के छोटे कारोबारों पर भी गहरा पड़ा है।
    दूषित पानी के कारण लोग बाहर का खाना खाने से बचने लगे हैं. जिसके कारण फास्ट फूड. चाय-नाश्ता और ठेले-खोमचों पर ग्राहकी पूरी तरह से ठप हो गई है।राजवीर सिंह कुशवाह. जो भागीरथपुरा में बर्गर. पिज्जा और चायनीज आइटम बेचते थे. बताते हैं कि नए साल की छुट्टियों में उनके कारोबार की सबसे ज्यादा कमाई होती थी। 31 दिसंबर और 1 जनवरी के बीच उनका बिजनेस बहुत अच्छा चलता था. लेकिन इस बार 28 दिसंबर से 5 जनवरी तक दुकान पूरी तरह बंद रही। “हमारे फास्ट फूड आइटम्स में पानी का इस्तेमाल होता है. और खराब पानी के कारण हमें दुकान बंद रखनी पड़ी। अब दुकान तो खोली है. लेकिन ग्राहक बिल्कुल नहीं आ रहेउन्होंने कहा।
    इसी तरह. महेश हार्डिया. जो पानीपुरी और चाट बेचते हैं. बताते हैं कि 8-10 दिनों से उनका ठेला बंद है। पानी की गंदगी के कारण प्रशासन ने ठेला बंद करने का आदेश दिया था। हम रोज 700-800 रुपये कमाते थे. लेकिन अब काम नहीं हो रहा। अब तक जितनी सेविंग्स हैं. उससे काम चल रहा है। जब तक पानी की समस्या ठीक नहीं होती. काम में सुधार की उम्मीद कम हैमहेश ने कहा।नाश्ते की दुकान चलाने वाली सीमा सिकरवार भी परेशान हैं।दूषित पानी के कारण ग्राहक बहुत कम हो गए हैं। पहले की तरह ज्यादा ग्राहक नहीं आ रहे हैं। अब बोरिंग का पानी इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन इससे भी ज्यादा समस्या हो रही है सीमा ने बताया।दूसरी ओर. इस संकट का असर अब परिवारों पर भी पड़ने लगा है।
    रोशनी कोरी. जो कपड़े की दुकान पर काम करती थीं. ने बताया कि उनके परिवार ने भागीरथपुरा छोड़ने का फैसला किया है। मेरे बेटे की तबीयत खराब हो गई थी. अब ठीक हो गया है. लेकिन इस गंदे पानी के कारण हम सागर लौटने का सोच रहे हैं। हम यहां 8-9 महीने से किराए पर रह रहे थे. लेकिन अब हमें यहां से पलायन करना पड़ रहा हैउन्होंने कहा।इस क्षेत्र में दूषित पानी का असर गहरा है और इससे छोटे व्यापारियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। उनका कहना है कि जब तक पानी की गुणवत्ता ठीक नहीं होती. उनका कारोबार ठीक से नहीं चल पाएगा।
    वहीं. कलेक्टर और नगर निगम कमिश्नर लगातार हालात का जायजा ले रहे हैं और पानी की सप्लाई को सुधारने के प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन जब तक लोग भरोसा नहीं करते. व्यापारियों की स्थिति में सुधार की कोई संभावना नहीं दिख रही है। इंदौर में हुई इस जलसंकट की घटना ने ना सिर्फ स्वास्थ्य को प्रभावित किया है. बल्कि रोजी-रोटी के संकट को भी जन्म दिया है। इस गंभीर स्थिति में छोटे कारोबारी अपनी दिक्कतें साझा कर रहे हैं. और प्रशासन से जल्द सुधार की उम्मीद लगाए बैठे हैं।