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  • पाकिस्तान 100 अरब बढ़ा रहा रक्षा बजट, क्या किसी बड़ी सैन्य तैयारी की ओर इशारा?

    पाकिस्तान 100 अरब बढ़ा रहा रक्षा बजट, क्या किसी बड़ी सैन्य तैयारी की ओर इशारा?



    नई दिल्ली। पाकिस्तान सरकार अगले वित्त वर्ष में अपने रक्षा बजट में करीब 100 अरब पाकिस्तानी रुपये की बढ़ोतरी करने की तैयारी में है। यह बढ़ोतरी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के समर्थन वाले आर्थिक सुधार कार्यक्रम के तहत तैयार किए जा रहे नए बजट का हिस्सा है, जिसमें देश की कुल आय और खर्च दोनों में बढ़ोतरी का अनुमान लगाया गया है।

    मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 2026-27 में पाकिस्तान का रक्षा खर्च लगभग 2.66 लाख करोड़ पाकिस्तानी रुपये तक पहुंच सकता है, जो मौजूदा वित्त वर्ष के 2.56 लाख करोड़ रुपये से अधिक है। वहीं IMF ने अनुमान लगाया है कि इसी अवधि में पाकिस्तान की कुल संघीय आय 17.14 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है, जो पिछले वर्ष की तुलना में करीब 13.5 प्रतिशत अधिक है।

    रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पाकिस्तान सरकार अपने वित्तीय ढांचे में सुधार के लिए बड़े कदम उठा रही है। इसमें केंद्र और प्रांतीय खर्च को GDP के 0.2 प्रतिशत तक बढ़ाना, सभी सरकारी भुगतान को डिजिटल करना और भ्रष्टाचार प्रभावित संस्थानों की जांच शामिल है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि रक्षा बजट में यह बढ़ोतरी पाकिस्तान की सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने और हथियारों की खरीद बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा हो सकती है। हालांकि आर्थिक स्थिति अभी भी कमजोर है और IMF के अनुसार देश की लगभग 40 प्रतिशत आबादी आर्थिक रूप से कमजोर बनी हुई है।

    इसी बीच IMF मिशन पाकिस्तान में नए बजट को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में जुटा है, जिसे जल्द ही संसद में पेश किया जाएगा।

  • आर्थिक संकट के बीच पाकिस्तान का बढ़ता रक्षा बजट: 10 साल में ढाई गुना उछाल, फंडिंग और पारदर्शिता पर उठे सवाल

    आर्थिक संकट के बीच पाकिस्तान का बढ़ता रक्षा बजट: 10 साल में ढाई गुना उछाल, फंडिंग और पारदर्शिता पर उठे सवाल


    नई दिल्ली। गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान में एक ओर जहां सरकार अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से राहत पैकेज पर निर्भर है, वहीं दूसरी ओर देश का रक्षा खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है। पिछले एक दशक में पाकिस्तान का सैन्य बजट करीब ढाई गुना बढ़कर 2.5 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपये के पार पहुंच गया है, जिसने वित्तीय प्राथमिकताओं और पारदर्शिता को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

    उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2016 के आसपास जहां रक्षा बजट करीब 1.08 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपये था, वहीं हाल के वर्षों में इसमें तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह वृद्धि ऐसे समय में हुई है जब पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था उच्च महंगाई, विदेशी कर्ज और कमजोर राजस्व ढांचे जैसी चुनौतियों से जूझ रही है।

    इस बीच International Monetary Fund और World Bank जैसी संस्थाएं पाकिस्तान के वित्तीय अनुशासन पर नजर बनाए हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि रक्षा खर्च के वास्तविक आंकड़ों को लेकर पारदर्शिता की कमी लंबे समय से चिंता का विषय रही है। कई विश्लेषकों का मानना है कि सैन्य पेंशन, रणनीतिक कार्यक्रम और कुछ उच्च-मूल्य परियोजनाओं को अलग मदों में दर्शाया जाता है, जिससे कुल रक्षा व्यय की वास्तविक तस्वीर पूरी तरह सामने नहीं आ पाती।

    रक्षा आधुनिकीकरण के मोर्चे पर पाकिस्तान ने हाल के वर्षों में कई परियोजनाओं पर काम तेज किया है। इनमें नौसेना के बुनियादी ढांचे का विस्तार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं को मजबूत करना और नई सैन्य तकनीकों में निवेश शामिल है। साथ ही चीन के सहयोग से पनडुब्बियों और लड़ाकू विमानों की खरीद भी चर्चा में रही है।

    विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि पाकिस्तान की रक्षा फंडिंग का एक बड़ा हिस्सा बाहरी सहयोग पर आधारित है। चीन से दीर्घकालिक ऋण और रक्षा सहयोग के जरिए महंगी परियोजनाओं की लागत को लंबी अवधि में बांटा जाता है। इसके अलावा सऊदी अरब के साथ हुए समझौते के तहत ऊर्जा और वित्तीय सहायता भी पाकिस्तान की आर्थिक जरूरतों को सहारा देती है।

    हालांकि, इन व्यवस्थाओं के बावजूद सवाल यह उठता है कि आर्थिक दबाव के बीच बढ़ता रक्षा बजट देश की दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता पर क्या असर डालेगा। कुछ विशेषज्ञ इसे सुरक्षा जरूरतों के लिहाज से जरूरी बताते हैं, जबकि अन्य का मानना है कि सामाजिक और विकास क्षेत्रों की कीमत पर रक्षा खर्च बढ़ाना संतुलित नीति नहीं माना जा सकता।

    कुल मिलाकर, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और रक्षा प्राथमिकताओं के बीच यह असंतुलन आने वाले समय में और गहन समीक्षा की मांग करता है खासतौर पर तब, जब अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं देश की नीतियों पर करीबी नजर रखे हुए हैं।

  • यूक्रेन युद्ध रूस पर डाल रहा भारी आर्थिक बोझ, विशेषज्ञों की चेतावनी-आने वाले साल और कठिन

    यूक्रेन युद्ध रूस पर डाल रहा भारी आर्थिक बोझ, विशेषज्ञों की चेतावनी-आने वाले साल और कठिन

    Russia Ukraine War
    नई दिल्ली/रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध अब अपने चौथे वर्ष में प्रवेश करने वाला है। बीते लगभग चार वर्षों में इस संघर्ष ने न केवल हजारों सैनिकों और आम नागरिकों की जान ली हैबल्कि अरबों डॉलर के बुनियादी ढांचे को भी तबाह कर दिया है। अब अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ और आर्थिक विश्लेषक रूस को आगाह कर रहे हैं कि इस युद्ध की कीमत उसे लंबे समय तक चुकानी पड़ेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही युद्ध आज समाप्त हो जाएरूस को आर्थिक रूप से इससे उबरने में कई साल लग सकते हैं। विश्लेषकों के अनुसारयूक्रेन युद्ध के चलते रूस के सैन्य खर्च में अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुई है। रक्षा बजट में 30 से 60 प्रतिशत तक की वृद्धि ने सरकारी वित्त पर जबरदस्त दबाव डाला है। इसके साथ ही पश्चिमी देशोंखासकर अमेरिका और यूरोपीय यूनियन द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों ने रूस की आमदनी के प्रमुख स्रोतों-तेल और गैस-को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। ऊर्जा निर्यात से होने वाली कमाई में गिरावट ने रूस की आर्थिक स्थिति को और कमजोर कर दिया है।

    बढ़ते खर्च और घटती आय के बीच रूसी सरकार की कर्ज पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है। हाल ही में रूसी सरकार ने बॉन्ड जारी कर करीब 108.9 अरब रूबल का कर्ज उठाया। इसके साथ ही 2025 में अब तक कुल कर्ज जारी करने का आंकड़ा 7.9 ट्रिलियन रूबल तक पहुंच चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि सरकार के पास बजट घाटा पाटने के लिए सीमित विकल्प रह गए हैं। रूस की एक और बड़ी चिंता उसका नेशनल वेल्थ फंड या आपातकालीन रिजर्व है। रिपोर्ट्स के मुताबिकइस रिजर्व का आधे से ज्यादा हिस्सा पहले ही खर्च हो चुका है। ऐसे में भविष्य में किसी बड़े आर्थिक झटके से निपटने की रूस की क्षमता कमजोर होती जा रही है। बजट घाटा लगातार बढ़ रहा है और इसकी मुख्य वजह सैन्य अभियानों पर हो रहा भारी खर्च माना जा रहा है।

    आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में रूस के सामने कई और चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। अगर वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें दबाव में रहींरूबल मजबूत बना रहा और आर्थिक विकास अनुमान से कम रहातो सरकार की मुश्किलें और बढ़ेंगी। मजबूत रूबल निर्यात को महंगा बना देता हैजिससे विदेशी मुद्रा कमाने में दिक्कत आती हैजबकि ऊंची ब्याज दरें कर्ज को और महंगा कर देती हैं।विश्लेषकों के अनुसारयदि तेल और गैस से होने वाली आय में और गिरावट आती है और ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैंतो रूस के सामने केवल तीन ही विकल्प बचेंगे। पहलासरकार टैक्स बढ़ा सकती हैजिससे आम जनता और उद्योगों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। दूसरासामाजिक कल्याण और विकास से जुड़े अन्य जरूरी खर्चों में कटौती की जा सकती हैजिसका सीधा असर आम लोगों की जिंदगी पर पड़ेगा। तीसरा विकल्प है और अधिक कर्ज लेनाजो भविष्य में आर्थिक संकट को और गहरा कर सकता है।

    विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि युद्ध ने रूस की अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर कर दिया है। लंबे समय तक चले इस संघर्ष ने निवेशकों का भरोसा कमजोर किया है और विदेशी निवेश लगभग ठप हो चुका है। ऐसे में युद्ध के बाद भी रूस के लिए आर्थिक स्थिरता हासिल करना आसान नहीं होगा।कुल मिलाकरयूक्रेन युद्ध रूस के लिए सिर्फ सैन्य मोर्चे पर ही नहींबल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी एक बड़ी चुनौती बन चुका है। विशेषज्ञों की चेतावनी साफ है-इस जंग की कीमत रूस को आने वाले कई वर्षों तक चुकानी पड़ सकती है।